Thursday, March 25, 2010

[नामपुराण-3] हरिद्वार, दिल्लीगेट और हाथीपोल

पिछली कड़ियां-A.[नामपुराण-1]B.[नामपुराण-2]DSCN0514
प र्वत भी मनुष्य का प्रिय आश्रय रहे हैं। पहाड़ी कंदराओं में सुरक्षित निवास तलाशने के बाद मनुष्य ने पर्वतीय घाटियों, उपत्यकाओं में बस्तियां बसाईं। पर्वत की तलहटी में स्थित समतल स्थान को उपत्यका कहते हैं जहां तक पहुंचने के रास्तों के नामों में भी पर्याप्त विविधता है जैसे-घाट, घाटी, दर्रा, नाल, फाटा, द्वार, पोल, पास आदि। इनमें पोल या फाटा जैसे शब्दों का प्रयोग मैदानी क्षेत्रों में भी द्वार के अर्थ में होता रहा है। राजस्थान में पोल शब्द खूब प्रचलित है। मूलतः इसमें द्वार का संकेत है मगर सघन बसाहट के बाद अब किसी विशेष आबादी के लिए ये नाम प्रसिद्ध हो गए हैं जैसे चांदपोल, रामपोल, हाथीपोल, बागबानों की पोल, जयपोल, लोहापोल, इमरतिया पोल, मनोहर पोल आदि। पोल का अर्थ खाली स्थान होता है। इसमें मूलतः खोखलापन या पोलापन का भाव है। शब्दकोशों के मुताबिक पोला शब्द संस्कृत की पुल् धातु से बना है जिसमें विस्तार, रिक्तता जैसे भाव हैं। पुल से ही पोला या पोल जैसे शब्द बने हैं। द्वार के साथ मार्ग के अर्थ में इसका रिश्ता संस्कृत के प्रतोली से भी जोड़ा जाता है जिसका अर्थ है नगर की मुख्य सड़क, मुख्य मार्ग आदि। हिन्दी तथा मराठी में इसका रूप होता है पावली या पओली। मराठी में जहां पावली में दहलीज, राहदरी या कदम उठाने, चलने का भाव है वहीं राजस्थानी हिन्दी में पावली (पओली) में बड़ा दरवाजा, फाटक, घर का आंगन, सहन जैसे भाव है। मुख्यरूप से द्वार चहारदीवारी से घिरा वह खाली या रिक्त स्थान होता है जहां से भीतर या बाहर को आवागमन होता है।

घाटियों तक पहुंचने का जरिया दो पहाड़ों के बीच का वह संकुचित स्थान होता है जिसे दर्रा कहते हैं। जाहिर है यह द्वार का ही  फारसी रूप है। दर्रों पर ही व्यापारिक चुंगियां भी होती थीं। हिन्दी के द्वार, अग्रेजी के डोर और फारसी के दर शब्द मूलतः एक ही परिवार के सदस्य हैं। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में द्वार शब्द के लिए मूल धातु dhwer या dhwor है। अब संस्कृत के द्वार (dwaar) शब्द से इसकी समानता पर गौर करें। प्राचीन ईरान की भाषा अवेस्ता और वेदों के भाषा मे काफी समानता है। अवेस्ता में भी द्वारम् शब्द ही चलन में था जिसने पुरानी फारसी में द्वाराया की शक्ल ले ली और फारसी तक आते आते बन गया दरः जिसका मतलब है दो पहाड़ों के बीच का रास्ता। फारसी के दरगाह या दरबान और हिन्दी के द्वारपाल, द्वारनायक अथवा द्वाराधीश, द्वारकाधीश जैसे शब्द इससे ही बने हैं। इन तमाम शब्दों के लिए a432_Stelvioसंस्कृत का शब्द है द्वार्। इसका अर्थ है फाटक, दरवाजा, उपाय या तरकीब। हिन्दी में आमतौर पर बोले जाने वाले द्वारा शब्द (इसके द्वारा, उसके द्वारा) में भी उपाय वाला भाव ही है।
गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित कृष्ण की राजधानी के द्वारवती, द्वारावती या द्वारका जैसे नाम भी समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश वाले भाव की वजह से ही ऱखे गए है। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार इस नगर में प्रवेश के भी कई द्वार थे इसलिए इसे द्वारवती कहा गया। कोटा झालावाड़ के बीच एक छोटा कस्बा है दरा। मूलरूप में इसका नाम दर्रा ही रहा होगा क्योंकि राजस्थान के हाड़ौती अंचल को मालवा से जोड़नेवाले एक पहाड़ी रास्ता यहीं से होकर गुजरता है। पहाड़ी बसाहटों के साथ भी द्वार शब्द जुड़ा हुआ मिलता है जैसे उत्तराखण्ड का प्रमुख कारोबारी शहर और देश का अन्यतम तीर्थ हरिद्वार। दरअसल इसके दो रूप प्रचलित हैं। उत्तराखंड में बद्रीनाथ धाम और केदारनाथ धाम हैं। बद्रीतीर्थ में भगवान विष्णु विराजते हैं जबकि केदारखंड में शिव का वास है। अब शैव इसे हर अर्थात शिव से जोड़ते हुए हरद्वार कहते हैं जिसका अर्थ है केदारखण्ड जाने का रास्ता। इसी तरह वैष्णव लोग इसे विष्णुधाम बद्रीनाथ के लिए जाने का मार्ग मानते हुए हरिद्वार कहते हैं अर्थात हरि के घर का द्वार। उत्तराखण्ड का ही एक अन्य नगर है कोटद्वार। इसी तरह द्वारकोट भी एक जगह है। व्यक्तिनाम के तौर पर हरद्वार निवासी को ठाठ से हरद्वारीलाल कहा जाता है और इस नाम के हजारों लोग होंगे, मगर कोटद्वारीलाल शायद ही कोई मिले।
द्वार के लिए अंग्रेजी में गेट gate शब्द भी प्रचलित है और हिन्दी में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी के डोर शब्द की तुलना में गेट शब्द का उतना ही इस्तेमाल होता है जितना कि दरवाज़ा या फाटक शब्द का होता है। अंग्रेजी के gate शब्द की व्युत्पत्ति संदिग्ध है मगर भाषा विज्ञानी इसे भारोपीय भाषा परिवार का ही मानते हैं और इसकी व्युत्पत्ति पोस्ट जर्मनिक धातु गातां gatan से मानते हैं जिसमें खुले रास्ते, मार्ग या दर्रे का भाव है। इसी तरह प्राचीन नॉर्डिक, फ्रिशियन, और ड्यूश भाषाओं में gat धातु खोजी गई है जिसमें मौद्रिक लेनदेन के अर्थ में खुलने का भाव है यानी टिकटों की बिक्री से होने वाली आय का संग्रहण करना। इस तरह फाटक और गेट शब्द में अंतर्निहित मौद्रिक संदर्भ एक ही हैं। अंग्रेजों के आने से पूर्व द्वार के अर्थ वाले स्थानों के नाम के पीछे जुड़े गेट शब्द की जगह प्रत्यय के रूप में पोल या फाटक शब्द लगाया जाता था। महू में हरी फाटक और दतिया के रिछरा फाटक का नाम लिया जा सकता है। इस फाटक का ही एक रूप फाटा में नजर आता है। महाराष्ट्र में आमतौर पर ऐसे द्वारों को फाटा कहते हैं जैसे झुरली फाटा, पुरार फाटा। फाटा दक्षिण से सुदूर उत्तर तक नज़र आते हैं। उत्तराखण्ड में भी फाटा है और पाक अधिकृत कश्मीर की स्वात घाटी में भी भी फाटा है।
संस्कृत की स्फ ध्वनि में विभाजन, कंपन, आघात, फैलाव जैसे भाव जुड़ते हैं। इससे संबंधित धातु  स्फुट् में निहित विभाजन का अर्थ जुड़ता है दरवाजे के अर्थ में प्रचलित फाटक शब्द से। जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी-उर्दू-इंग्लिश कोश के अनुसार इसका संस्कृत रूप है स्फाटः+कः से जिसका अर्थ हुआ द्वार, गेट, आगम, दर्रा, दरवाज़ा आदि। जाहिर है जहां से प्रवेश होता है वह स्थान चौड़ा, फैला हुआ होता है। सामान्य दो पल्लों वाले द्वार की कल्पना करें तो सहज ही समझ में आता है कि स्फुट्  में निहित विभाजन या बांटने वाले अर्थ का फाटक के संदर्भ में क्या महत्व है। हालांकि ख्यात भाषाविद् रामचंद्र वर्मा अपनी कोशकला पुस्तक मे इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत के कपाट शब्द से बताते हैं। उनका कहना है कि कपाट का रूपांतर कपाटकः में हुआ फिर इसमें से क लुप्त हुआ और पाटकः बचा जो बाद में फाटक बना। कपाट से फाटक शब्द की व्युत्पत्ति कहीं अधिक तार्किक लगती है। मध्यकाल के राजपूत राजाओं नें अपनी राजधानियों और अन्य ठिकानों पर जो किले बनवाए उनमें विभिन्न दिशाओं में खुलनेवाले रास्तों का नाम उन दिशाओं में स्थित नगरों के नाम पर रखा। जयपुर के परकोटे में कई विशिष्ट द्वार हैं जैसे-अजमेरी गेट, सांगानेरी गेट, घाटगेट आदि। आगरा के किले में दिल्लीगेट, लाहौरी गेट हैं। राजस्थान, दिल्ली, मेरठ और दर्जनों अन्य शहरों-कस्बों में ऐसे गेट हैं जिनके पीछे इतिहास और भूगोल झांक रहा है।
 -जारी
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Wednesday, March 24, 2010

किस्सा-कोताह ये कि…

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कि सी प्रसंग को विस्तार से बताने के बाद उसका सार प्रस्तुत करते हुए अक्सर कहा जाता है कि किस्सा-कोताह ये कि...इसका अभिप्राय होता है समूचे प्रकरण का निष्कर्ष सामने रखना या संक्षेप में कहानी बताना। किस्सा कोताह दरअसल अरबी और फारसी के दो शब्दों से मिलकर बना पद (टर्म) है और लालित्यपूर्ण भाषा बोलने के शौकीन इसका खूब प्रयोग करते हैं। भाषा को प्रभावी और मुहावहरेदार बनाने के लिए भी इसका प्रयोग होता है। कोताह शब्द इंडो-ईरानी मूल का है। हिन्दी में कोताह शब्द भी स्वतंत्र रूप में खूब इस्तेमाल होता है। कोताह में कमी, सूक्ष्मता या छोटेपन का भाव है। हिन्दी में इसकी आमद फारसी से हुई है। किसी काम को अपूर्ण या अधूरा छोड़ने के संदर्भ में कोताही करना, कोताही बरतना जैसे शब्दों का प्रयोग लापरवाही उजागर करने के लिए होता है।
कोताह शब्द संस्कृत के क्षुद्रकः के अवेस्ता में हुए रूपांतर कुटक(ह) से बना है। पह्लवी में इसका रूप कुडक या कुटक है और इसकी आमद अवेस्ताके कुटक(ह) से ही हुई है। संस्कृत का क्षुद्रकः बना है क्षुद् धातु से जिसमें दबाने, कुचलने , रगड़ने , पीसने आदि के भाव हैं। जाहिर है ये सभी क्रियाएं क्षीण, हीन और सूक्ष्म ही बना रही हैं। छोटा शब्द संस्कृत के क्षुद्रकः का रूप है जो क्षुद्र शब्द से बना। इसमे सूक्ष्मता, तुच्छता, निम्नता, हलकेपन आदि भाव हैं। इन्ही का अर्थविस्तार होता है ग़रीब, कृपण, कंजूस, कमीना, नीच, दुष्ट आदि के रूप में। अवधी-भोजपुरी में क्षुद्र को छुद्र भी कहा जाता है। दरअसल छोटा बनने का सफर कुछ यूं रहा होगा – क्षुद्रकः > छुद्दकअ > छोटआ > छोटा। संस्कृत क्षुद्र से फारसी में दो रूपांतर हुए। पहला इससे खुर्द बना जिसका अर्थ भी होता है छोटा, महीन आदि। खुर्दबीन, खुर्दबुर्द, खुरदुरा जैसे शब्द इसी मूल से आ रहे हैं। दूसरा रूपांतर क्षुद्रकः के अवेस्ता के कुटक(ह) से हुआ। अवेस्ता का ट फारसी में जाकर त में storytellerबदला क वर्ण का लोप हुआ और इस तरह  कमी, न्यूनता या सूक्ष्मता के अर्थ में कोताह शब्द सामने आया। कोताह का लघु रूप कोतह भी होता है। कमी के लिए कोताही शब्द भी बना। उर्दू फारसी में छोटा के अर्थ में कोताह शब्द से कई समास बनते हैं जैसे कोताह-कद (ठिंगना), कोताह-गरदन, कोतहनज़र, कोतहअंदेश (अदूरदर्शी), कोताहफहमी (कमअक्ल),कोताहदामन (संकीर्ण हृदय का) वगैरह वगैरह।
किस्सा शब्द सेमिटिक भाषा परिवार का है और अरबी से आया है। हिन्दी में इसकी आमद फारसी से हुई है। सेमिटिक धातु q-s- (क़ाफ-साद-) से इसका जन्म हुआ है जिसमें अनुसरण करना, पालन करना, पीछे चलना, ध्यान देना आदि भाव हैं। इससे बना है अरबी का क़स्सा शब्द जिसमें अनुसरण करना, पीछे चलना जैसे भाव हैं। इसी मूल से उपजा है किस्साह qissah जिसका अर्थ है कहानी, कथा, गल्प आदि। मूलतः किस्साह इस्लामी दर्शन का पारिभाषिक शब्द है जिसमें कथा-कहानी वाले मनोरंजन का भाव न होकर दृष्टांत या प्रसंग सुनाने वाले के शब्दों के पीछे चलने का भाव है। अर्थात श्रोता के लिए कहानी पर गौर करना ज़रूरी है तभी उसका निहितार्थ समझ में आएगा। गौरतलब है कि हर संस्कृति में पुराख्यानों का उद्धेश्य समाज को धर्म-नीति की शिक्षा देना रहा है। प्रवचनकर्ता का मानसिक अनुगमन कर ही मूल कथातत्व समझ में आता है जो मूलतः सीख या नसीहत ही होती है।

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Tuesday, March 23, 2010

[नामपुराण-2] सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक

मू ल स्थान के नाम से अपने समूह की पहचान जोड़ने की प्रवृत्ति भारत के सभी समुदायों में देखी जा सकती है। खासतौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा बसने वाले जनसमूहों ने अपनी पहचान को क्षेत्र विशेष के साथ जोडा। राजेश खन्ना के नाम के साथ जुड़ा खन्ना khanna उपनाम दरअसल पंजाब का एक कस्बा है। इसी तरह तलवंडी, भिंडरावाला, माहिवाल, साहिवाल जैसे न जाने कितने शब्द हैं जो मूलतः स्थानों के नाम हैं मगर हम इन्हें किन्हीं व्यक्तियों के उपनाम के तौर पर जानते हैं। महाराष्ट्र के निवासियों के नाम के साथ “कर” ancient-indus-mapशब्द अक्सर जुड़ा होता है। दरअसल यह उनका जातीय परिचय नहीं बल्कि क्षेत्रीय परिचय होता है। गावस्कर gavaskar, बुधकर, वडनेरकर, मंगेशकर जैसे नामों के साथ जुड़े “कर” से अभिप्राय वहां का निवासी होना ही है। कोंकण के मंगेशिम् गांव से ताल्लुक रखनेवाले लोग मंगेशकर हो गए और गावस गांव के लोग गावसकर। महाराष्ट्र के आम्बेड से नाता रखनेवाले महार जाति के एक परिवार ने मध्यप्रदेश के महू में बसेरा किया। इस परिवार में जन्में पुत्र ने आम्बेडकर उपनाम को शोहरत दिला दी। ये थे डॉ भीमराव आम्बेडकर। बुध नामक आबादी से हटकर कहीं और जा बसे लोगों ने अपने नाम के साथ बुधकर लगाना शुरु किया और वडनेर कस्बे से निकले लोग वडनेरकर कहलाए। गौरतलब है यह ‘नेर’ संस्कृत के नगरम् का देशज रूप है। वडनेर कभी वटनगर-बड़नगर अर्थात जहां वटवृक्षों की बहुतायत हो,  रहा होगा। आज यह स्थाव बड़नेरा या वडनेरा के नाम से जाना जाता है। खुद के नाम के साथ स्थान का नाम जोड़ने से जातिभेद भी मिटता था, क्योंकि अलग अलग वर्गों के लोग जब परदेश में जा बसेंगे तब उनकी पहचान जाति नहीं, वह स्थान होगा जहां से वे आए हैं। शिक्षा के विस्तार और आप्रवासन के चलते जातिप्रथा शिथिल हुई थी। कल्पना की जा सकती है कि मुहूर्त विचार और शुभ-अशुभ जैसी सोच के चलते मध्यकालीन समाज ने अपने बौद्धिक विकास के सारे रास्ते बंद कर लिए थे। जातिवाद जैसी बुराइयां सदियों के इसी ठहरे पानी वाले कूपमंडूक समाज की देन रहीं। अब बालठाकरे अगर मुंबई में रहनेवालों की पहचान मुंबईकर से करते हैं तो बुरी बात नहीं, मगर इसे अमल में लाने के उनके तरीके की भर्त्सना की जानी चाहिए। 
नाम की वजह से उपनाम बनने के कुछ अन्य उदाहरण देखें। निरन्तर आप्रवासन के चलते स्थान आधारित पहचान को अपने मूल नाम से जोड़ने का मकसद पुरखों की भूमि या मूलस्थान के नाम को अपने परिचय से जोड़ कर स्थायी बनाना था। स्थान नाम की तरह नदियों के नाम से भी मानव समूहों की पहचान होती रही है। खास तौर पर ब्राह्मण वर्ग में यह परिपाटी अधिक रही है। गौरतलब है कि प्राचीन काल से ही दुनियाभर में जलस्रोतों के किनारे ही बसाहटों की शुरुआत हुई और फिर वहां स्थायी बस्तियां बस गईं जो कालांतर में नगरीय सभ्यता का केंद्र बनीं। सिंधु नदी के किनारे आज से चार हजार साल पहले जो समृद्ध सभ्यता विकसित हुई उसे इस महान नदी के नाम पर ही सिन्धु घाटी sindhu की सभ्यता सैंधव सभ्यता कहा Copy of collage-715691 जाता है। भारतवर्ष में निवास करनेवाले सभी लोग हिन्दू कहलाते हैं। हिन्दू शब्द का उद्गम सिन्धु से ही हुआ है। हिन्दू नाम से जुड़ी कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनकी नकारात्मक और सकारात्मक व्याख्या की जाती है। इस बारे में विस्तार से यहां लिखना अभीष्ठ नहीं है क्योंकि इस पर पर्याप्त सामग्री मौजूद है। किन्तु यह निर्विवाद है कि किसी जमाने में हिन्दू शब्द जाति बोधक नहीं, बल्कि स्थानवाची था। आज भी हिन्दू और हिन्दुस्तान से स्थान का बोध पहले होता है न कि धर्म या जाति का। सैंधवजनों का मूल स्थान ही हिन्दुस्तान है। ग्रीक भाषा में सिन्धु को इंडस कहा गया। इंडियन, इंडियाना जैसे शब्दों के मूल में सिन्धु ही है। दिलचस्प यह भी कि भारत की खोज के नाम पर शुरु हुए अभियान का हासिल था आज की महाशक्ति अमेरिका। कुछ देशोवाले पूर्वी द्वीपसमूह को वेस्ट इंडीज नाम मिला जिसके मूल में यही इंडिया india यानी सिन्धु है। पौराणिक चरित्रों राजा दुष्यंत और शकुंतला के  पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत हुआ। भरत bharat की संतति या भारत से जुड़ा हुआ व्यक्ति ही भारतीय कहलाता है। मूलनाम से जुड़ी यह पहचान कितनी महत्वपूर्ण है, इसे जानने के लिए कभी पाकिस्तानी दूरदर्शन या रेडियो प्रसारण सुनें। दुनियाभर में भारत को इंडिया कहा जाता है, मगर पाक संचार माध्यमों में भारत के उल्लेख से बहुत सुकून मिलता है। ध्यान रहे, भरत शब्द उसी भृ धातु से बना है जिसमें भरण-पोषण का भाव है। जाहिर है राजा ही प्रजा का भरणपोषण करता है। भरथः का अर्थ है प्रभुसत्ता प्राप्त राजा। भाषाविज्ञानियों के अनुसार संस्कृत के भ्रातृ bhratri, फारसी के बिरादर bradar और अंग्रेजी के ब्रदर जैसे भाईचारा साबित करनेवाले शब्दों के मूल में भी यही भृ धातु है। माना जा सकता है कि सदियों पहले भरतभूमि पर जन्मे जैन और बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने तब के ज्ञात संसार में विश्वबंधुत्व का प्रसार करने की ऊर्जा, अर्थ और प्रेरणा इसी शब्द से ग्रहण की होगी।

भारत में ब्राह्मणों की अनेक शाखाएं नदियों के नाम पर हैं। नदियों को अक्सर सीमा रेखा भी माना जाता रहा है। विद्याध्ययन या विद्याप्रसार के लिए जब ब्राह्मण वर्ग के लोगों का आप्रवासन हुआ तब अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान को उन्होंने अपने नाम से जोड़ा या परदेश के लोगों नें उनकी शिनाख्त उनके मूलस्थान के आधार पर की।  जैसे सरयू नदी के आधार पर ब्राह्मणों का एक वर्ग सरयूपारीण या सरयूपारीय ब्राह्मण कहलाता है। नर्मदा घाटी और वहां के विशाल उपजाऊ क्षेत्र में निवास करनेवाले ब्राह्मणों को नार्मदीय ब्राह्मण कहा जाता है। गंगा के नाम से गांगेय शब्द चला। प्राचीन सरस्वती नदी के नाम पर सारस्वत ब्राह्मणों की पहचान बनी। प्राचीनकाल में स्थल मार्ग की तुलना में जलमार्ग आवागमन और व्यापार का बड़ा जरिया था। नदियों के किनारे नगरों के बसने का क्रम शुरु हुआ। नदियां ही परिवहन का प्रमुख जरिया थीं। नदी किनारे बड़े नगर इसलिए बसे क्योंकि वहां बड़े घाट विकसित हुए जो व्यापार का केंद्र थे। इन्हें पत्तन, पट्टण कहा जाता था। देशभर में कई ऐसे नगर हैं जिनके साथ पट्टन शब्द लगता है जैसे विशाखापट्टन, मछलीपट्टन, मद्रासपट्टिनम्, प्रभासपट्टन। पट्टन का ही एक रूप पाटण हुआ। देश में पाटण नाम की भी कई बस्तियां हैं जैसे झालरा पाटन, फूटी पाटन, पाटन आदि। जाहिर है कभी ये नदी आधारित व्यापार के बड़े केंद्र रहे होंगे। -जारी
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Monday, March 22, 2010

ये भी फासिस्ट, वो भी फासिस्ट

a-villani-benito-mussolini फासिज्म चाहे आज सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धांत न हो मगर इसका प्रेत अभी भी विभिन्न अतिवादी, चरमपंथी और उग्र विचारधाराओं में नज़र आता है। राजनीतिक शब्द के रूप में इसे स्थापित करने का श्रेय इटली के तानाशाह बैनिटो मुसोलिनी को जाता है। 
फा सिज्म शब्द दुनियाभर की भाषाओं में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली राजनीतिक शब्दावली की चर्चित टर्म है। हिन्दी में इसका रूप फासीवाद है। हालांकि अंग्रेजी, इतालवी में इसका उच्चारण फैशिज़म होता है मगर हिन्दी में फासिज्म उच्चारण प्रचलित है।  फासीवादी विचारधारा को माननेवाला फासिस्ट कहलाता है। राजनीतिक दायरों में फासिस्ट कहलाने से लोग बचते हैं। आज की राजनीति में फासिस्ट या फासिज्म शब्द के साथ मनमाना बर्ताव होता है। अतिवादी विचारधारा से जुड़े लोग एक दूसरे को फासिस्ट कह कर गरियाते हैं। खुद को नायक समझनेवाला कभी नहीं चाहेगा कि उसे खलनायक की तरह देखा जाए। धर्म और नैतिकता की दुनिया में तो हमेशा नायक सत्य की तरह एक ही होता है और पूरी प्रखरता से उभरता है, मगर राजनीति के मैदान में सभी खिलाड़ी खुद को नायक समझते हैं। नायक और नेता का अर्थ यूं तो एक ही है अर्थात समूह का नेतृत्व करना, उसे राह दिखाना, मगर नेता शब्द ने अपनी अर्थवत्ता खो दी है। अब नेता का अर्थ जबर्दस्ती खुद को समूह पर थोपनेवाला, बाहुबली, दबंग आदि हो गया है। नेतागीरी शब्द की नकारात्मक अर्थवत्ता से यह स्पष्ट हो रहा है। इसके बावजूद ये सभी लोग समाज में स्वीकार्य होने के लिए पहले खुद को नेताजी कहलवाते हैं, फिर नायक होने की चाह पालने लगते हैं, मगर जनसंचार माध्यमों के जरिये आज सबकी असली तस्वीर दुनिया के सामने किसी न किसी रूप में आ ही जाती है।
यूरोप की राजनीति में फासिज्म fascism शब्द का प्रयोग प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ज्यादा सुनाई पड़ने लगा। यह इतालवी भाषा से जन्मा है। फासिज्म लैटिन भाषा के फैसेस या फासिस fasces शब्द से बना है। फैसेस दरअसल एक प्राचीन रोमन प्रतीक है जिसमें कटी हुई लकड़ियों के बंडल के साथ एक कुल्हाडी होती है। दरअसल यह सर्वाधिकार का प्रतीक था। रोमन परम्परा के मुताबिक प्राचीनकाल में रोमन लोग इंसाफ के लिए अदालत जाते समय अपने साथ लकड़ियों का छोटा बंडल और कुल्हाड़ी साथ रखते थे। एक साथ बंधी हुई कटी टहनियां दरअसल दंडविधान का प्रतीक थीं और कुल्हाड़ी न्याय के अधिकार का प्रतीक। इसका निहितार्थ था शिरच्छेद अर्थात सजा के बतौर कलम किया Fasces हुआ सिर। राजनीतिक विचार के रूप में बाद में इन प्रतीकों की व्याख्या कुछ और हो गई। लकड़ी का बंडल बाद में संगठन, शक्ति, एकता जैसे भावों से व्याख्यायित किया जाने लगा और राजनीतिक उद्धेश्य के लिए संगठित समूह के तौर पर इसका अर्थ निकाला जाने लगा। इतालवी भाषा में फासी शब्द फाशी की तरह उच्चरित होता है।
राजनीतिक शब्द के रूप में इसे स्थापित करने का श्रेय इटली के तानाशाह बैनिटो मुसोलिनी को जाता है। मुसोलिनी ने इटली में “राज्य के सर्वाधिकार” की जो शासन प्रणाली चलाई उसे ही फासिज्म कहा गया। मुसोलिनी ने 1915 में फासिस्ट नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। फासिज्म की कई तरह से व्याख्या की जाती है। इसे बड़ी आसानी से साम्यवाद या समाजवाद के विरुद्ध पैदा आंदोलन समझा जाता है। हालांकि मूल रूप में यह साम्राज्यवाद, बाजारवाद, उदारतावाद जैसी प्रवृत्तियों के खिलाफ था। यह विरोधाभास है कि इनमें से कई बुराइयां खुद फासिज्म के साथ जुड़ गई। विभिन्न विकृतियों के चलते फासिज्म कभी एक स्वस्थ और मज़बूत राजनीतिक विचार नहीं बन सका। बाद में पूंजीपतियों के एजेंटों, दलालों और गुंडों को फासिस्ट कहा जाने लगा था। आजादी से पहले भारत में कांग्रेसी नेता  अपने समान ही स्वतंत्रता संघर्ष कर रहे उग्र विचारधारा वाले क्रान्तिकारी नेताओं जैसे भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद को फासिस्ट कहते थे।प्रसिद्ध क्रान्तिकारी, लेखक मन्मथनाथ गुप्त ने अपने संस्मरणों में एकाधिक बार इसका उल्लेख किया है। फासिस्ट शब्द को दिलचस्प ढंग से परिभाषित करते हुए गुप्तजी लिखते हैं कि जब पूंजीवाद लोकतंत्र के जरिये अपना मतलब सिद्ध करने में असमर्थ हो जाता है, तो वह अपने उग्र नंगे रूप में यानी फासिस्ट रूप में प्रकट होता है। फासिज्म के साथ उलटबांसियां हैं। इसके साथ साम्यवादी विचारधारा के विरोध की बात जुड़ी है। जवाहरलाल नेहरू वामपंथियों को फासिस्ट कह कर गरियाते थे और अब वामपंथी, हिन्दू (अतिवादी) विचारधारा से जुड़े लोगों को फासिस्ट कहते हैं। जो भी हो, यह तय है कि शुरू से ही किसी भी किस्म की चरमपंथी या अतिवादी विचाराधारा को फासिज्म के दायरे में समझा जाता रहा है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में फासीवादी ताकतों की भूमिका के मद्देनजर इसकी एक खास तस्वीर बनी। यह एक सिद्धांतहीन विचारधारा है। इसकी कोई सर्वस्वीकार्य कार्यप्रणाली नहीं है। मूलतः किसी न किसी तरह सत्ता और शक्ति हथियाना इसका लक्ष्य होता है। सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट जैसे आदिम और प्रकृतिसिद्ध नीति का ये समर्थन करते हैं अर्थात शक्तिशाली निर्बलों पर शासन करते हैं। दृढ़ता, आक्रामकता और साहस (प्रकारांतर से बलप्रयोग) जैसे प्रबोधनों से ये अपने वर्ग के लोगों को उत्साहित करते हैं और सीमित सफलता अर्जित करते हैं। शांति, सौहार्द, लोकतंत्र, उदारता, नैतिकता जैसे गुणों को इस विचारधारा के तहत अपने लक्ष्य से भटकानेवाले तत्व के रूप में देखा जाता है। फासिज्म चाहे आज सर्वमान्य राजनीतिक सिद्धांत न हो मगर इसका प्रेत अभी भी विभिन्न अतिवादी, चरमपंथी और उग्र विचारधाराओं में नज़र आता है।

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Sunday, March 21, 2010

[नामपुराण-1] नाम में क्या रखा है…

आश्रय का निर्माण होने के बाद उसका नामकरण करने की परिपाटी भी प्राचीनकाल से ही चली आ h1रही है। यह आश्रय चाहे राष्ट्र हो प्रांत हो, नगर हो अथवा ग्राम, हर आश्रय का एक नाम ज़रूर होता है। हर काल में लोगों ने अपने निवास-ठिकाने बदले हैं और नई स्थिति में उनका नया नाम भी रख दिया गया। यह प्रक्रिया राष्ट्रों के नाम बदलने से लेकर मकानों के नाम बदलने तक जारी रहती है। नामकरण के पीछे जो सहज प्रवृत्ति काम करती है वह होती है स्व अर्थात निजता की स्थापना। विभिन्न परिस्थितियों में इस निजता के आयाम भी अलग अलग होते हैं। जैसे जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र, बोली अथवा अन्य कोई विशिष्ट पहचान चिह्न जो समूह या व्यक्ति की निजता से जुड़ता हो। जाति-धर्म के आधार पर मानव-समूहों की पहचान सरनेम या उपनाम के जरिये सामने आती है।

दुनियाभर की विभिन्न संस्कृतियों में स्थान के नाम से अपनी पहचान को जोड़ कर चलने की परम्परा रही है। इसे शायरों के नाम से आसानी से समझा जा सकता है। शायर अक्सर एक तख़ल्लुस लगाते हैं जैसे फिराक़ गोरखपुरी साहब का  असली नाम रघुपतिसहाय था। इसी तरह प्रसिद्ध शायर शीन काफ़ निज़ाम का असली असली नाम है शिवकिशन कल्ला और उनका ताल्लुक राजस्थान के प्रसिद्ध पुष्करणा ब्राह्मण समुदाय से है। एक शायर का नज़रिया जाति या सम्प्रदाय से ऊपर होता है। तख़ल्लुस के साथ एक खास बात उस शायर के मिजाज़ को समझने की भी होती है। शायर का स्वभाव, जीवन-दर्शन जैसा होगा, वह उसी किस्म का तख़ल्लुस रखेगा।
प्रसिद्ध रूसी जनकवि रसूल हमजातोव के पिता का नाम था हमज़ात त्सादासा। गौरतलब है रसूल पूर्वी सोवियत संघ से अलग हुए के दागिस्तान गणतंत्र के निवासी थे। उनके गांव का नाम था त्सादा इसीलिए उनके पिता हमज़ात त्सादासा कहलाए। दुनियाभर में पिता का नाम पुत्र के नाम से जोड़ने की परम्परा है सो हमज़ात के बेटे रसूल का नाम हुआ रसूल हमज़ातोव यानी हमज़ात का बेटा रसूल। असदुल्ला खां गालिब, मीर तकी मीर, मोमिन, शेख इब्राहीम ज़ौक़, मिर्जा हादी रुस्वा जैसे नामों के पीछे जुड़ी पहचान ही उनका तख़ल्लुस रहा है। तख़ल्लुस दरअसल शायर अपने मिजाज की पहचान करते हुए रखते थे। इससे अलग अधिकांश शायरों में तखल्लुस के साथ मूलस्थान का नाम जोड़ने की परम्परा ज्यादा रही है जैसे अदम गोंडवी, वसीम बरेलवी, हसरत जयपुरी, क़ैफ़ भोपाली, राहत इंदौरी, शकील बदायूंनी आदि। इस परम्परा का उत्कर्ष वाराणसी के पास मछली शहर से जुड़े शायर सलाम साहब के पूरे नाम में नजर आता है। वे फख्र से अपना नाम सलाम मछलीशहरी लिखते थे। शायराना तबीयत का कोई व्यक्ति शायद अटपटा सा मछलीशहरी उपनाम न रखना चाहे।-जारी
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Friday, March 19, 2010

अतिशय की महिमा अनंत

girmar-temples

आ मतौर पर हिन्दी में अतिशय शब्द का प्रयोग बहुत सारा, काफी, बहुलता, अत्यधिक, ज्यादा के अर्थ में होता है। काव्यशास्त्र में एक अलंकार का नाम भी इससे जुड़ा है जिसे अतिशयोक्ति (अतिशय + उक्ति) अलंकार कहते हैं। नाम से ही स्पष्ट है कि बहुत बढ़ा-चढ़ा कर कही गई बात को ही अतिशयोक्ति कहते हैं। इसके अलावा रोजमर्रा में जैन तीर्थों से संदर्भ में भी अतिशय क्षेत्र जैसा शब्द युग्म सुनने पढ़ने को मिलता है। सनातन धर्म से हटकर देखें तो भारत के सभी धर्मों में जैन धर्म ही सर्वाधिक प्राचीन है और देशभर में इससे जुड़े हजारों स्थान मौजूद हैं जिनमें से कई अतिशय क्षेत्र कहलाते हैं।  अतिशय शब्द की अर्थवत्ता बहुआयामी है और इसमें चमत्कार, प्रभाव, अधिकता, श्रेष्ठता, उत्तमता, विशिष्टता जैसे अनेकार्थ निहित हैं। जिन गुणों से तीर्थंकर समूचे जग को प्रकाशित करते हैं उन्हें अतिशय कहा जाता है। जाहिर सी बात है कि समाज को राह दिखानेवाले महापुरुषों का व्यक्तित्व रूप, गुण व वैभव में आम लोगों से कहीं अधिक प्रभावी होता है। यह विशिष्टता ही उन्हें अतिशयता प्रदान करती है। अतः अतिशय में अलौकिक या लोकोत्तर का भाव है।
अतिशय शब्द संस्कृत की शी धातु में अति उपसर्ग लगने से बना है। शी धातु में लेटना, विश्रान्ति, आराम, निद्रा जैसे भाव हैं। इसमें अति- लगने से बनता है अतिशी जिसका अर्थ है देर तक सोना या जल्दी सोना। इसके अलावा इसमें आगे बढ़ना, श्रेष्ट होना जैसे भाव भी हैं। देर तक सोने का भाव शी धातु में निहित अर्थ से उत्पन्न है जबकि आगे बढ़ना और श्रेष्ठता जैसे भावों के मूल में शी से पूर्व लगे उपसर्ग अति- का योगदान है। संस्कृत का अति उपसर्ग बहुत महत्वपूर्ण है muktagiri1 जिसे संज्ञा या क्रिया से पूर्व लगा कर विशेषणों की रचना होती है। मुख्यतः इससे ऊंचा, आगे, उत्तम जैसे भावों की रचना होती है। अति बना है अत् धातु से जो गतिवाचक धातु है। बढ़ना, आगे जाना, चलना, घूमना जैसे अर्थ इसमें समाहित हैं। जाहिर है आगे बढ़ने में गति तो है ही, इससे आगे आने का भाव उभर रहा है जो गतिमान या बढ़नेवाली संज्ञा को विशिष्ट बनाता है। इस अत् का ही अगला रूप अट् है जिसमें भी यही भाव हैं और पर्यटन, देशाटन, तीर्थाटन जैसे जाने-पहचाने शब्द इससे ही निकले हैं mahavir-bhagwan-mahavir-swa जिनका अर्थ भी घूमना-फिरना ही है। अतिशी से बना अतिशय जिसका अर्थ आधिक्य, विशिष्टता, प्रमुखता, उत्कृष्टता, श्रेष्ठता आदि होता है। अतिशयन यानी आगे बढ़नेवाला। पर्यटन की तरह अतिशयन गतिवाची न होकर भाववाची है। आगे बढ़ने से अभिप्राय कर्म और गुण में बढ़ा-चढ़ा होना है।
जिनेन्द्र सिद्धान्त कोश के मुताबिक जैन तीर्थंकरों के विशिष्ट गुण ही अतिशय कहलाते हैं। तीर्थंकरों में चौंतीस अतिशय होते हैं जिनमें जन्मजात चार विशेषताएं (अतिशय) प्रमुख हैं -1. इनका स्वरूप लोकोत्तर होता है। मैल, पसीना या कोई दाग नहीं होता। 2. श्वासोच्छवास सुगंधित होता है। 3. वात्सल्य रूप होने के कारण उनके रुधिर का रंग लाल न होकर श्वेत होता है अर्थात दूध की तरह होता है। इसके अनुरूप ही त्वचा भी शुभ्र आभायुक्त होती है। 4. उनके नित्यकर्मों ( भोजन-विसर्जन )का आभास सामान्य मनुष्यों को नहीं होता।
प्राकृत शब्दकोश (पाइवसद्दमहण्णवो) के मुताबिक अतिशय का प्राकृत रूप अइसय है और जैन ग्रन्थों में अतिशय का संदर्भ इसी रूप में आता है। अतिशय यानी श्रेष्ठता, उत्तमता, महिमा, प्रभाव आदि। इसमें वैभवयुक्त व सम्पत्तिशाली, दूसरे को मात करनेवाला, चमत्कारिक और उत्कृष्टता का भाव भी है। जैन पंथ की मान्यता के मुताबिक तीर्थ चार प्रकार के होते हैं –1.सिद्ध क्षेत्र 2.अतिशय क्षेत्र 3.पूर्ण क्षेत्र 4.ज्ञान क्षेत्र। सिद्ध तीर्थ उन्हें कहते हैं जहां तीर्थंकर का वास रहा हो। वे तमाम स्थान जहां तीर्थंकर का जन्म, दीक्षा, कैवल्य ज्ञान, विहार अथवा मोक्ष प्राप्ति जैसी घटनाएं हुई हों, वे सभी सिद्ध क्षेत्र कहलाते हैं। अतिशय क्षेत्र वे हैं जहां प्राचीनकाल में जैन धर्म प्रभावी रहा था और जैन देवालयों की अधिकता हो। यहां स्थापित मंदिर व तीर्थंकरों की मूर्तियां अति प्राचीन, भव्य और कलात्मक हों। उनका सौन्दर्य अप्रतिम हो। इन प्रतिमाओं के साथ आभामंडल हो। स्थान का महा्त्म्य लोकमानस में चमत्कारपूर्ण हो। आस्था के अनुरूप यहां के अधिष्ठाता देव का प्रभामंडल लोगों में मंगलभावना उत्पन्न करता हो। इस क्षेत्र के साथ किसी न किसी प्रभावशीलता या चमत्कार की मान्यता अवश्य जुड़ी रहती है। ऐसे स्थान को अतिशय क्षेत्र कहते हैं।

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Thursday, March 18, 2010

तूफान, बंवडर और चक्रवात

Sea-Spray

तू फान हिन्दी का आम शब्द है। तेज हवा या चक्रवात के लिए इसका इस्तेमाल होता है। पारिभाषिक रूप में समुद्री सतह पर तेज बारिश के साथ चलनेवाले तेज अंधड़ को तूफान कहते हैं मगर हिन्दी में इस शब्द का साधारणीकरण और सरलीकरण दोनो हुआ है। तूफान शब्द का इस्तेमाल अब जमीन की सतह से उठने वाली धूल भरी आंधी के लिए भी होता है। तेज हवा और वर्षा का वेगवान स्वरूप सब कुछ तहस नहस कर देता है इसलिए मुहावरे के रूप में तूफान शब्द का अर्थ विपत्ति, आफ़त, गुलगपाड़ा, बखेड़ा, झगड़ा, विप्लव आदि भी है। शोर-गुल, हल्ला-गुल्ला के लिए भी तूफान शब्द का इस्तेमाल होता है और झूठे दोषारोपण से मचे बवाल को भी तूफान कहा जाता है। भारतीय रेलवे ने छठे दशक में दिल्ली से हावड़ा के बीच एक खास ट्रेन चलाई थी जिसका नाम था तूफान मेल। सत्तर के दशक में अपने बचपन में उसके चर्चे सुनते थे। बाद में तेजरफ्तार, हड़बड़ी में रहनेवाले और भागते दौड़ते काम को अंजाम देने वाले व्यक्ति की सिफत बताने के लिए तूफानमेल मुहावरा ही चल पड़ा था। आशिक या माशूक के लिए भी तूफाने हमदम शब्द का प्रयोग उर्दू मे होता है। तूफान शब्द की आमद हिन्दी में बरास्ता फारसी, अरबी से हुई है। वैसे यह सेमिटिक भाषा परिवार का भी नहीं है। तूफान की व्युत्पत्ति के पीछे दो तरह के आधार मिलते हैं। पहला आधार इसे ग्रीक मूल का सिद्ध करता है और दूसरा चीनी मूल का।
ग्रीक पुराकथाओं का एक प्रसिद्ध चरित्र है टाईफोन typhoon जो प्रकृति की देवी जिया Gaia और ग्रीक मान्यता के अनुसार सृष्टि रचना के शुरुआती देवताओं में एक टार्टरस Tartarus की संतान था। टाईफोन को प्रचंड हवा का जन्मदाता माना जाता है। यह विशालकाय था जिसके सिर पर एक सहस्त्र नागों के फन थे, जिनकी फुंफकारों से तेज हवाएं चलती थी। इसकी आंखे आग उगलती थीं। इसके विभिन्न रूप मिलते हैं जैसे प्राचीन ग्रीक में टाईफियस, टाईफोस या टूफोस जैसे संदर्भ भी मिलते हैं। पौराणिक संदर्भों से ग्रीक में टुफोस, टाईफोन, टाइफस जैसे शब्दों में धुआं, धुंध, तेज हवा, चक्रवात जैसे भाव भी शामिल हुए। टाइफस के धूम्र जैसे अर्थ की तुलना भाषाविज्ञानी संस्कृत के धूपः शब्द से करते हैं जिसका अर्थ भी धुंआं होता है। ये सभी शब्द भारोपीय भाषा परिवार के हैं। लैटिन के टाईफोन शब्द को प्रचंड चक्रवाती हवा के रूप में नई अर्थवत्ता मिली और यह अंग्रेजी में दाखिल हुआ। गौरतलब है कि अंग्रेजी का टाईफून शब्द चक्रवात, अंधड़ या बवंडर के अर्थ में प्रचलित है।
सेंचुरी डिक्शनरी के मुताबिक अंग्रेजी का टाईफून पुर्तगाली शब्द सम्पदा से आया है, जहां इसका रूप है तुफाओ tufao. पुर्तगाली भाषा में इस शब्द की आमद अरबी से मानी जाती है। अरबी, फारसी और हिन्दी में समान भाव से चक्रवाती हवाओं के लिए तूफान शब्द प्रचलित रहा है। दिलचस्प है कि प्राचीन ग्रीक पुराकथाओं की तरह ही मिस्र की प्राचीन कथाओं में भी टाईफोस का उल्लेख है। आमतौर पर यह माना जाता है कि अरबी, फारसी, उर्दू, हिन्दी का तूफान शब्द ग्रीक मूल का है। प्राचीन ग्रीस से यह मिस्र में आया और वहां से यह अरबी शब्दसंपदा में शामिल हुआ। तेज हवा जब भी चलती है, वह भंवर बनाती है। जल या वायु के तेज प्रवाह में ऐसा होता है। चक्रवाती हवा के इस चरित्र को देखते हुए विद्वान तूफान

... मुहावरे के रूप में उथलपुथल जैसी स्थितियों के लिए बवंडर शब्द का प्रयोग होता है।  हिन्दी की कुछ लोक शैलियों में इसे बवँड़ा भी कहाजाता है। बौराना की तर्ज पर बवँड़ियाना शब्द भी लोकभाषा में है।  हमें तो तूफाने हमदम की तर्ज पर दिल में तूफान मचा देने वाले आशिक माशूक के लिए बवँड़ा और बवँड़ी शब्द रुच रहा है। आपकी क्या राय है? कॉइन करें?... tornado

शब्द का रिश्ता सेमिटिक धातु ताफा tafa से जोड़ते हैं जिसमें घूमने, मुड़ने, चक्कर लगाने का भाव है। इस्लामी चिन्तन के दायरे में Tawaaf तवाफ का महत्व है जिसका रिश्ता इसी ताफा से है। तवाफ़ यानी प्रदक्षिणा, परिक्रमा। इसमें किसी बिन्दु से शुरू कर फिर उसी स्थान पर लौटने का भाव है। यह क्रिया बारम्बार दोहराई जाती है। इसके पीछे चेतना को एकाग्र कर ज्ञान प्राप्ति की सोच है। दरअसल प्रदक्षिणा चिन्तन का स्थूल रूप है और आत्ममंथन सूक्ष्म रूप। प्रदक्षिणा के जरिये एकाग्र होने की प्रक्रिया सम्पन्न होती है और आत्ममंथन से ज्ञान रूपी सार प्राप्त होता है।
तूफान के साथ चीनी भाषा का रिश्ता भी है। चीनी भाषा में तूफान को ताई फंग t'ai fung कहते हैं जिसका अर्थ है प्रचड, वेगवान हवा। चीनी भाषा में तू-ता-ताई-ताओ जैसे शब्दों में महानता का भाव है। इसी तरह फंग, फेंग या फैंग का अर्थ है वायु। कैंटनी ज़बान में इसका रूप फोंग है। ताईफोंग के तूफान में रूपांतर की कल्पना आसान और दिलचस्प है। खासतौर पर तब, जब अर्थ चक्रवाती हवा ही हो। कुछ संदर्भ बताते हैं कि ताईफंग का अर्थ दरअसल पूर्वी चक्रवाती हवाएं हैं जिसका अभिप्राय फारमोसा क्षेत्र से आन वाली हवा है। गौरतलब है कि ताईवान इसी क्षेत्र में आता है और ताई से तात्पर्य ताईवान से ही है। यूं चीनी समाज में इसके पाओ फंग, दाओ फंग या तूफोंग जैस रूप भी मिलते हैं। अर्थ साम्य या ध्वनिसाम्य के बावजूद यह कहना मुश्किल है कि भारत से लेकर पश्चिम एशिया में प्रचलित तूफान शब्द चीन के भाषाई आधार से उठ कर अरबी, फारसी और हिन्दी में समाया होगा, क्योंकि इसका यह उच्चारण इसी क्षेत्र में प्रचलित है। ग्रीक भाषाई आधार से बरास्ता मिस्र होते हुए अरबी भाषा में समाने की कल्पना कहीं आसान है। टाइफून का तूफान में बदलना सहज है बनिस्बत ताईफंग के। फिर भी एक ही अर्थ में दो सुदूर स्थित दो क्षेत्रों में ध्वनि और अर्थसाम्य रखनेवाले दो शब्दों से तूफान शब्द की अर्थवत्ता और इसका दायरा बढ़ा ही है।
प्रचंड, तेज वायु के लिए हिन्दी में चक्रवात और बवंडर जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। चक्रवात शब्द से जाहिर है कि यह चक्र + वात से बना है अर्थात तेज गति से घूमती हुई हवा यानी तूफान। चक्रवात में तेज भंवर बनता है जो आसमान में धूल के बगूले उठाता है। इसे ही अंधड़ भी कहते हैं जो बना है  अन्ध् धातु से जिसमें गहरापन, कालापन, अन्धता, दिखाई न पड़ना, तमस आदि भाव है। अंधड़ बना है अंध+ड़ (प्रत्यय) से। जिसका अर्थ है धूल भरी तेज हवा।  आंधी भी इसी मूल से उपजा शब्द है जिसमें तेज रफ्तार हवा से उड़ते धूलकणों की वजह से कुछ दिखाई नही पड़ता है। हिन्दी में आंधी-तूफान शब्द युग्म का प्रयोग भी आम है। इसका प्रयोग जल्दबाजी या हड़बड़ी दिखाने के अर्थ में मुहावरे की तरह भी होता है।
इसी कड़ी में आता है बवंडर जिसका अर्थ तेज हवा का वह तेज स्वरूप है जिसमें भंवर सा बनता है और धूल का गुबार आसमान पर छा जाता है। जॉन प्लैट्स के कोश में बवंडर का उद्गम वात + मंडल से माना गया है जबकि हिन्दी शब्दसागर में इसे वायु + मंडल से उत्पन्न बताया गया है। वात और वायु दोनों का अर्थ एक ही है। इन दोनों शब्दों की व्युत्पत्ति संस्कृत की वा धातु से हुई है जिसका अर्थ है हवा का चलना, शीतल करना, खिलना, ठंडा करना, हिलना-डुलना, जाना, चलना आदि। मंडल में गोल घूमना या चक्रगति का भाव स्पष्ट है। गौर करें हवा के शीतलता, गतिमानता जैसे प्रमुख गुण इन अर्थों में स्पष्ट हो रहे हैं। इससे बने वायु शब्द का अर्थ है हवा, पवन, वायुदेवता आदि। इसी तरह वात शब्द का अर्थ भी वायु है। मुझे लगता है वात + मंडल से बवंडर की व्युत्पत्ति हुई होगी। वातुल / वातुला से ही बना है बावला या बावरा जैसा शब्द। अर्थात जो अपनी धुन में फिरता है। बंगाल का प्रसिद्ध भक्त सम्प्रदाय बाउल, इसी वातुल से संबंधित है। गौर करें दिमागी बीमारी के संदर्भ में अक्सर बाहरी हवा लगने की बात कही जाती है। शरीर के प्रमुख दोषों में वायु दोष भी एक है। बहरहाल, वातमडंल > वाअंडल > बवंडर इस क्रम में यह शब्द बना होगा। वा से ही एक अन्य शब्द बना है वः जिसमें वायु, पवन, वात, वरुण, समुद्र जैसे भाव हैं। वः (अर्थात वह्) शब्द से ही वर्ण विपर्यय के जरिये हिन्दी का हवा शब्द बना है। इसके अलावा बहाव, बहना जैसे देशज रूप भी इसी मूल से निकले हैं। मुहावरे के रूप में उथलपुथल जैसी स्थितियों के लिए बवंडर शब्द का प्रयोग होता है। हिन्दी की कुछ शैलियों मे इसे बवँड़ा भी कहाजाता है। बौराना की तर्ज पर बवंड़ियाना शब्द भी लोकभाषा में है। 

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Wednesday, March 17, 2010

गोदाम, संसद या डिपो में समानता

संबंधित पोस्ट-Godown-for-Storage 1.भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना 2.कोठी में समाएगा कुटुम्ब 3.अंडरवर्ल्ड की धर्मशाला बनी चाल 4.बस्ती थी, बाज़ार हो गई 5.बंदरगाह से बंदर की रिश्तेदारी !6.लंगर में लंगूर की छलांग 

गो दाम, संसद या डिपो में क्या समानता है? चकराइये नहीं, ये सभी स्थानवाची और समूहवाची संज्ञाएं हैं। अर्थात यहां किसी वस्तु या मनुष्यों के इकट्ठा होने का भाव है। किसी स्टोर या भण्डार के अर्थ में हिन्दी में गोदाम शब्द बहुत प्रचलित है। भंडार उस स्थान को कहते हैं जहां व्यापार के जरिये लाया गया बहुत सारा सामान एक साथ रखा जाता हो। हिन्दी में इस शब्द की आमद अंग्रेजी के गोडाउन godown शब्द से हुई है। दरअसल यह मूलतः मलय भाषा का शब्द है जिसमें इसका उच्चारण होता है गदोंग, गोदोंग, गुदांग या गुदंग। मलेशिया में इसका मतलब होता है समुद्रतट पर जहाज से उतारे जानेवाले माल को सुरक्षित रखने का स्थान, डिपो depot या भण्डारगृह आदि। मलेशिया में गुदंग gudang नाम का एक प्रसिद्ध बंदरगाह भी है। गौरतलब है कि अंग्रेजों से भी पहले से पूर्वी एशियाई क्षेत्र में पुर्तगालियों का दखल था और वे मलेशिया, इंडोनेशिया में अपनी जड़ें जमा चुके थे। इनके साथ यह शब्द भी यूरोप पहुंचा जहां पुर्तगाली जबान में इसका उच्चारण हुआ गुदाओ। वैसे हिन्दी में कोठार, भंडार, आगार, कोठी, कोष्ठागार जैसे शब्द डिपो या गोदाम के अर्थ में खूब प्रचलित हैं। अग्रेजी का वेयरहाऊस शब्द भी जाना-पहचाना है।
वैसे भाषाविज्ञानियों का मानना है कि चाहे यह शब्द मलय भाषा का है, मगर अंग्रेजी में इसकी आमद भी भारतीय भूमि से ही हुई है। दरअसल भंडार के अर्थ में गदोंग gadong, गोदोंग godong जैसे शब्दों से तमिल तेलुगु भाषाओं का रिश्ता सदियों पहले ही जुड़ चुका था। तमिल और तेलुगु व्यापारियों के समुद्रपारीय संबंध सदियों से हिन्द-चीन क्षेत्र के राष्ट्रों से रहे हैं। बर्नेल और यूल के मुताबिक मुमकिन हैं ये शब्द भारतीय मूल के हों क्योंकि पूर्वी एशियाई देशों की image भाषाओं, खासतौर पर मलय भाषा के कई शब्दों पर तमिल,  तेलुगु का प्रभाव है। तेलुगु में गिदांगी gidangi और तमिल में किदांगु kidangu जैसे शब्द गोदाम के अर्थ में पहले से इस्तेमाल होते आए हैं। विद्वानों का कहना है कि इन भाषाओं से ये शब्द सिंहली भाषा में पहुंचे जो श्रीलंका की भाषा है। सिंहली में इसका रूप हुआ गुदामा। जितने भी यूरोपीय कारोबारी पूर्वी एशिया जाते थे, उनके लिए भारतीय प्रायद्वीप अर्थात कोरोमंडल का तट से होते हुए या श्रीलंका का चक्कर लगा कर जाना ज़रूरी होता था। यहां के बंदरगाहों पर वे रसद-पानी लेने ज़रूर उतरते थे। कोई ताज्जुब नहीं कि मलेशियाई मूल के इस शब्द से परिचित होने का मौका उन्हें वहां पहुंचने से पहले ही मिल चुका था।
बहरहाल, भारत की कई भाषाओं में आज गोदाम शब्द मौजूद है जैसे मराठी-कोंकणी में यह गुदांव या गुदाम है तो ओडिया में गुदामा gudama। हिन्दी उर्दू में गोदामयह  godam है तो बंगाली, असमी में भी इसका रूप गुदाम है। तेलुगु में यह गदांगु, गिदिंगी है। गौरतलब है कि बंदरगाह का वह हिस्सा जहां जहाजों को खाली किया जाता है या माल उतारा जाता है गोदी कहलाता है। यह गोदी godi शब्द भी इसी मूल का है मगर पूरी तरह भारतीय रंग 17में रंगा हुआ है। गोदी शब्द का प्रयोग कोंकणी, मराठी, गुजराती, हिन्दी में होता है। गोदाम शब्द का प्रयोग अकसर हिन्दी में मालगोदाम के रूप में भी होता है। उत्तरांचल की एक सैरगाह का नाम है काठगोदाम। जाहिर है किसी जमाने में यहां अंग्रेज व्यापारियों ने टिम्बरयार्ड बनवाया था। इस क्षेत्र में रेल लाईन बिछाने के लिए तब बड़े पैमाने पर जंगलों को काटा गया था ताकि लकड़ी के स्लीपर बनाए जा सकें। जाहिर है तब गुमनाम सी एक बस्ती को काठगोदाम (काष्ठ = लकड़ी) नाम मिल गया।
 गोदाम के अर्थ में ही जिस शब्द का हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है  वह है depot डिपो। मूलतः यह शब्द अंग्रेजी से आया है जिसका मतलब है जहां बहुत सी वस्तुएं जमा की गई हों या एक साथ रखी गई हों। यह शब्द अंग्रेजी के ही डिपॉजिट deposit का संक्षिप्त रूप है। डिपॉजिट का अर्थ भी कतार में रखना, नीचे रखना, जमा करना, इकट्ठा करना, भंडार आदि है। डिपॉजिट लैटिन भाषा के डिपॉनेयर deponere के ही एक रूप डिपॉजिटस depositus से बना है। deponere बना है de + ponere से अर्थात इसका मतलब होता है एक के बाद एक रखना, आगे रखना। जाहिर है यह क्रिया माल के भंडारण के अर्थ में ही आगे चल कर रूढ़ हुई। इस शब्द शृंखला का रिश्ता अंग्रेजी के पोजीशन शब्द से है जिसका अर्थ है स्थान, जगह, अवस्था, स्थिति, दर्जा, हालत आदि। यह बना है लैटिन के पोजीशनेम से जिसमें दृढ़ता, स्थिरता, स्थिति का भाव है। प्राचीन भारोपीय शब्द po-s(i)nere से बना है यह शब्द। इसमें जो सिनेयर है उसकी मूल धातु है si अर्थात सी जिसमें रुकना, अटकाना, ठहराना जैसे भाव हैं। इसका रिश्ता भारोपीय धातु sed से भी है जिससे अंग्रेजी में seat (कुर्सी), site (स्थल, जगह) जैसे शब्द बने हैं तो संस्कृत में सद जैसा शब्द भी बना है जिसका अर्थ है विराजना, बैठना। यहां भी पोजीशन या स्थिति का भाव ही है। अंग्रेजी के सीट से सद की समानता गौरतलब है। यह सद ही सभासद, सदस्य, संसद या सांसद में नज़र आता है जिसमें स्थान, बैठक जैसे भाव है। साफ है कि गोदाम, संसद या डिपो में काफी समानता है। संसद या लोकतांत्रिक संस्थाओं में सदस्य भी व्यापार प्रक्रिया का हिस्सा हैं। वे खरीदे बेचे जाते हैं। उन्हें जिन्सों की तरह इन संस्थाओं में भरा जाता है। अधिक जगह बनाने के लिए संख्या बढ़ाई जाती है। वर्ग विभाजन भी वैसा ही होता है जैसा किसी गोदाम में होता है। कौन पहले आया, कितना पुराना, कितनी तादाद, कितना टिकाऊ है वगैरह वगैरह। जो टिकाऊ है सो टिकता है, जो पुराना है, सो आऊट हो जाता है।

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Tuesday, March 16, 2010

नववर्ष-3 /क्या हैं गुड़ी पड़वा और नवसंवत्सर

नातन भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष माना जाता है। इसे संवत्सर प्रतिपदा भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी दिन से सृष्टि का आरम्भ हुआ था। सिन्धी समाज का प्रख्यात पर्व चेटिचंड भी वर्ष प्रतिपदा के अगले दिन शुरू होता है। शुक्लपक्ष में चांद अपने पूरे सौन्दर्य के साथ आकाश में jjविराजमान होता है इसलिए चैत्रचंद्र का देशज रूप हुआ चैतीचांद और फिर सिंधी में हुआ चेटिचंड। महाराष्ट्र में यह पर्व गुड़ी पड़वा के नाम से मनाया जाता है। वैसे नवसंवत्सर के लिए गुड़ी पड़वा अब समूचे देश में सामान्य तौर पर जाना जाने लगा है। ऐसा माना जाता है कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस को ब्रह्माजी ने सृष्टि की शुरुआत का दिन तय किया इसलिए इसे प्रतिपदा कहा गया अर्थात पहली तिथि। प्रति+पद का अर्थ हुआ पग पग पर। प्रतिपदा में इसका अर्थ किसी पक्ष की पहली तिथि के रूप में रूढ़ हुआ। प्रतिपदा से ही मराठी में पाडवा शब्द बना है। प्रतिपद > पडिवअ > पाडवा इस क्रम में इसका विकास हुआ। बांग्ला में इसे परब और गुजराती में पाडवो कहते हैं।
गुड़ी शब्द को यूं तो संस्कृत के गुड़ः से बना है जिसमें गेंद, गोल गोल गुटिका या कपड़े से बनी पुतली का भाव है जिससे लड़कियां खेलती हैं जिसे गुड़िया कहते हैं। मगर गुडीपड़वा में इस गुडी का भाव स्पष्ट नहीं हो रहा है। यूं गुडी का एक अर्थ गुड में निहित पिंड से भी निकाला जाता है। पिंड में निहित गठान, संगठित ठोस रूप का भाव बंधन से लगाया जाता है। वर्ष प्रतिपदा पर दण्ड के सिरे पर गुड़ी को बांधा जाता है। मगर ये अनुमान मात्र हैं। कृपा कुलकर्णी के Gudi मराठी व्युत्पत्ति कोश में गुड़ी का मूल संस्कृत के गूर्दः से माना गया है जिसका अर्थ चिह्न, प्रतीक या पताका आदि बताया गया है। मगर यह शब्द वाशि आप्टे के संस्कृत हिन्दी कोश में नहीं है। मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश में गुर्द या गूर्द शब्द ज़रूर है पर इसका अर्थ वहाँ उछाल, छलांग या पेंग बढ़ाना बताया गया है । विलियम व्हिटनी इसका अर्थ ऊँचा करना बताते हैं जिससे कुलकर्णी के पताका, उछाल, ऊँचाई, फहरना, लाठी, काठी, दण्ड जैसे आशयों की पुष्टि होती है और गुड़ी में झण्डा, ध्वज या पताका की अर्थवत्ता स्थापित होती है । हिन्दी-पंजाबी में गुड़ी का एक अर्थ पतंग भी होता है। आसमान में ऊंचाई पर फहराने की वजह से इससे भी पताका का आशय स्थापित होता है। प्राचीनकाल में विजयोत्सवों पर भी पतंगे उड़ाई जाती थी ।
मराठी व्युत्पत्ति कोश के संशोधन पत्र में भाषाविद् श्रीपाद जोशी इस शब्द को कन्नड़ मूल का बताते हैं। आर्यभाषा परिवार से संबंधित होते हुए भी मराठी का द्रविड़ भाषा परिवार से भी रिश्ता है। महाराष्ट्र उत्तर भारत को दक्षिण से जोड़ता है। मराठी पर दक्षिण की भाषाओं में सर्वाधिक प्रभाव कन्नड़ भाषा का है। गुड़ी पड़वा दरअसल मराठी में गुढ़ी पड़वा लिखा जाता है। मराठी में गुढ़ी का अर्थ है छोटा देवालय, मंदिर। गुढ़ी की व्युत्पत्ति कन्नड़ भाषा के गुडि से मानी जाती है जिसका अर्थ मंदिर है। मंदिर गुम्बद और कलश की ऊंचाई का भाव इसमें निहित है। तमिल में इससे मिलता जुलता शब्द है कोडि जिसका अर्थ है पताका, ध्वज। इसी तरह एक अन्य शब्द है कोडु जिसका मतलब है चोटी, ऊंचाई, शिखर आदि। मराठी में भी कोडि का अर्थ है शिखर, पताका। इस तरह देखें तो कन्नड़ के गुडि शब्द में भी बाद में पताका, ध्वज, झंडा जैसे अर्थ रूढ़ हुए। मराठी के गुड़ी या गुढ़ी में एक लम्बे दण्ड की रेशमी वस्त्र से सज्जा करने, उसके सिरे पर चांदी या पीतल का छोटा गिलास या लोटा बांधने और फिर उसे पुष्पहार से विभूषित कर उसकी पूजा करने के पीछे एक पुण्य अवसर पर प्रतीक स्वरूप देवालय की प्रतिष्ठा करने का ही संकेत और भाव है।  रेशमी वस्त्र पताका का प्रतीक भी है। दण्ड और उसके शिखर में मंदिर की उच्चता और गुरुता का भाव है। दण्ड के शिखर पर बंधा लोटा मंदिर कलश का प्रतीक है। घर के बाहर खुले में इसे बांधने के पीछे सबके कल्याण और सूर्योपासना का भाव है।
संवत्सर शब्द के पीछे भी प्राचीन पशुपालन संस्कृति है। उर्दू-हिन्दी में प्रचलित बच्चा संस्कृत के वत्स से ही बना है जिसके मायने हैं शिशु। वत्स के बच्चा या बछड़ा बनने का क्रम कुछ यूं रहा है-calves-whispering वत्स > वच्च > बच्च > बच्चा या फिर वत्स > वच्छ > बच्छ > बछड़ा। संस्कृत का वत्सर: भी वत्स से ही बना है। इसके अलावा इसका अर्थ है वर्ष, भगवान विष्णु या फाल्गुन माह। इस वत्सर: में ही सम् उपसर्ग लग जाने से बनता है संवत्सर जिसका अर्थ है वह शिशु जो एक साल का हो चुका है। नए साल के अर्थ में नवसंवत्सर शब्द भी बन गया। संवत्सर का ही एक रूप संवत् भी है। वत्सर: से वत्स की उत्पत्ति के मूल में जो भाव है वह साफ है। बात यह है कि वैदिक युग में वत्स पशु शावक को कहते थे। खासतौर पर गाय के शावक के लिए। बछड़ा, किसी भी जानवर के बच्चे के लिए वत्स शब्द प्रचलित था। वत्स् बना है वद् धातु से जिसका अर्थ है उच्चारण करना, बोलना, कहना, ध्वनि करना। वत्स के अर्थ में भाव यही था कि पशुशावक हमेशा रम्भाता रहता है। कुछ न कुछ अस्पष्ट सी ध्वनियां करने की वजह से उसके लिए वत्सः या वत्सकः जैसे शब्द बने। बाद में किसी भी शिशु के लिए वत्स शब्द का प्रयोग होने लगा क्योंकि कुछ न कुछ बोलने, ध्वनि करने का स्वभाव सभी शिशुओं में समान रूप से होता है। वत्सतरः का अर्थ होता है वह बछड़ा जिसने हाल ही में अपनी मां का दूध पीना छोड़ा है। इसका अर्थ यह भी है कि बछड़ा बड़ा हो गया है।
जाहिर है कि बाद के दौर में इसमें (प्राकृत-अपभ्रंश काल) नादान, अनुभवहीन, कम उम्र अथवा वर्षभर से ज्यादा आयु का, जैसे भाव पुख्ता हो गए। बाद में किसी भी बालक के लिए वत्स या बच्चा शब्द चलन में आ गया। यही नहीं मनुष्य के अलावा गाय–भैंस के बच्चों के लिए भी बच्छ, बछड़ा, बाछा, बछरू, बछेड़ा जैसे शब्द प्रचलित हो गए। ये तमाम शब्द हिन्दी समेत ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मालवी आदि भाषाओं में खूब चलते है। फारसी में भी बच्च: या बच: लफ्ज के मायने नाबालिग, शिशु, या अबोध ही होता है। ये सभी शब्द वत्सर: की श्रृंखला से जुड़े हैं। इन सभी शब्दों में जो स्नेह-दुलार-लाड़ का भाव छुपा है, दरअसल वही वात्सल्य है। प्रचीनकाल में एक गण का नाम भी वत्स था।
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Monday, March 15, 2010

सत्तू-प्रेम या सत्तू-आसक्ति…

Image310 आप कहां से जुगाड़ करते हैं ?

भा रतीय खानपान के चर्चे दुनियाभर में यूं ही नहीं हैं। इसे बनाने की आसान विधियां, पौष्टिकता और ज़ायका ही इसे सबसे खास बनाता है। यही वजह है कि आम आदमी का सत्तू, दाल-बाटी, दाल-बाफले या लिट्टी-चोखा जैसे व्यंजन फुटपाथ से लेकर फाइवस्टार होटलों तक बनते और परोसे जाते हैं। सत्तू अपने आप में पूरा आहार है। खासतौर पर अपने सुपाच्य गुण और ठंडी तासीर के चलते गर्मियों की शुरुआत से ही घरों में सत्तू का प्रयोग शुरू हो जाता है। भुने हुए अनाज जैसे गेहूं, जौ, मक्का के साथ भुने हुए चने को पीस कर बनाए गए चूर्ण को सत्तू कहते हैं। गांव-देहात की रसोई की अनिवार्य वस्तु है सत्तू। समझदार गृहस्थों के यहां सत्तू एक ज़रूरी आहार है। पोहा, उपमा से भी ज्यादा गुणवान और जल्दी बननेवाला इंडियन फास्टफूड या चटपट रसोई। डब्बे में से सत्तू पाऊडर निकालिए, पानी मिलाइये फिर नमक या शकर मिलाइये और पी जाइये।
किसी ज़माने में राहगीरों-बटोहियों का पसंदीदा आहार होता था सत्तू। साथ में पानी का गिलास और चम्मच रखने भर से काम हो जाता था। जहां कहीं ठौर मिला, सत्तू घोलकर पिया और सुस्ताने लगे। कहीं पढ़ा है कि मगध की सेनाओं नें सत्तू के भरोसे कई मोर्चे फतह कर लिए थे।  फौज के लिए सत्तू से ज्यादा मुफीद भोजन भला और क्या हो सकता था। नासा वाले चाहें तो  अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सत्तू जैसे भोजन पर विचार कर सकते हैं।सत्तू का इस्तेमाल लगभग समूचे भारत में होता रहा है। हिन्दी, मराठी और पंजाबी में इसे सत्तू कहते है। सिंधी में इसका रूप है सांतु, कश्मीरी में यह सोतु है तो गुजराती, कुमाऊंनी में यह सातु कहलाता है और भोजपुरी समेत पूर्वी बोलियों में इसे सतुआ भी कहते हैं। सत्तू बना है संस्कृत के सक्तु या सक्तुकः से जिसका अर्थ है अनाज को भूनने के बाद उसे पीस कर बनाया गया आटा। प्राचीनकाल में भारत में जौ का प्रचलन अधिक था। गेहूं का इस्तेमाल बढ़ने के बाद सत्तू में इसकी अनिवार्यता भी बढ़ गई। गेहूं के स्थान पर मकई का प्रयोग भी होता है। सामान्यतौर पर एक भाग चना और आधा भाग गेहूं और चौथाई भाग जौ को पानी में कुछ घंटों भिगाने के बाद सुखाया जाता है। फिर उसे भून कर पीस लेते हैं। यह मिश्रण ही सत्तू कहलाता है।
संस्कृत के सक्तु या सक्तुक का जन्म हुआ है सञ्ज् या संज् धातु में क्तिन् प्रत्यय लगने से, जिसमें मिलने, जुड़ने, संयुक्त होने, संलग्न होने का भाव है। क्रम कुछ यूं रहा होगा-सक्तुकः >सत्तुकः > सत्तुअ > सत्तू / सतुआ। इसी तरह जकड़ना, चिपटना, चिपकना, सम्पर्क में आना आदि अर्थ भी इसमें निहित हैं। स्पष्ट है कि एक दूसरे मे मिलाना, जोड़ना ही इसमें प्रमुख भाव हैं। सत्तू के अर्थ में किन्हीं अनाजों को आपस में मिलाने और पीस कर एकाकार करने में सञ्ज् धातु में निहित भाव स्पष्ट है। सञ्ज् या संज् धातु का ज दरअसल संस्कृत की यु धातु का अगला रूप रहा होगा। संस्कृत की यु धातु भारोपीय भाषा परिवार की आदिधातुओं में है जिसका विस्तार भारतीय भाषाओं के अलावा कई विदेशी भाषाओं में हुआ है। bihari-littiयु धातु में जुड़ने, जोड़ने का भाव है। युक्त, युग, जुग, जोड़ी, जुट्, संयुक्त, योग, जोग, संजोग, जुगाड़ जैसे अनेक शब्द इस मूल से निकले हैं। कुल मिलाकर सत्तू भी एक किस्म का जुगाड़ ही है। य वर्ण ज में ही तब्दील होता है जैसे योग से जोग का रूपांतर। सञ्ज् में इसी यु की अर्थछाया नज़र आ रही है। बहरहाल। सक्तु की तरह सञ्ज् धातु में क्त प्रत्यय लगने से सक्त भी बना है जिसमें जुड़ना, चिपकीना, भक्त, संबंध होना, जैसे भाव हैं। सक्त का स्वतंत्र प्रयोग हिन्दी में नहीं होता मगर इसमें आ उपसर्ग लगने से बने आसक्त का प्रयोग प्रेम, अनुराग, अनुरक्त होने के संदर्भ में खूब होता है। आसक्ति का अर्थ है किसी से प्रेम संबंधी जुड़ाव। अनासक्त्ति में वैराग्य या उदासीनता का भाव है।
सत्तू के विविध व्यंजन बनते हैं। महानगरों के ड्राईंगरूम में भी अब सत्तू की पहुंच है जहां इसे सुगंधित बना कर शर्बत की तरह पेश किया जाता है। इसी तरह सत्तू घोलकर, उसे ठण्डा कर आइस्क्रीम की तरह भी खाया जाने लगा है। पारम्परिक तरीकों में सत्तू के गाढ़े या पतले घोल में नमक, जीरावण डालकर पिया जाता है। ऊपर से नीम्बू भी डाल लें तो आनंदम् आनंदम्। गुड़ या शक्कर डालकर इसका जायका बदला जाता है। लिट्टी चोखा का भरावन (स्टफिंग) भी सत्तू से ही होती है। सत्तू की पीठी की कचौरी या परांठा भी बनता है। वैसे सत्तू देश के पूर्वांचल में ज्यादा खाया जाता है जहां के लोक जीवन में बतौर फटाफट आहार इसके विविध रूप हैं। सत्तू में जब तक चने का अनुपात और अनाज की सिंकाई सही न हो, स्वाद नहीं आता। बाजार के सत्तू में चने का अनुपात सही नहीं मिलता।

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Sunday, March 14, 2010

मय्यादास की माड़ी-शाबा शाबा वे फिरंगिया

logo पुस्तक चर्चाइस हफ्ते भीष्म साहनी की कृति  मय्यादास की माड़ी जो सवा सौ साल पहले आम जन-जीवन पर सामंती छाया का दस्तावेज है। इस उपन्यास  में लेखक के प्रसिद्ध उपन्यास तमस  से पहले का दौर है। यादगार किरदारों के इर्दगिर्द घूमता कथानक एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दौर की पड़ताल है। पुस्तक  राजकमल से प्रकाशित हुई है और मूल्य है-150 रु (पेपरबैक) पृष्ठ-333

Bhisham S भीष्म साहनी (1915-2003) रावलपिंडी में जन्मे थे। भीष्मजी  वामपंथी  थे किन्तु उनकी कृतियों में इस परम बौद्धिक विचारधारा की जुगाली नही दिखती बल्कि जनवादी रुझान कथानक के चरित्रों में, संवादों में खुद ब खुद उभरता है। भीष्म साहनी की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति तमस है जिस पर टेली सीरियल  और फिल्म भी बन चुकी है। भारत सरकान ने उन्हें पद्य भूषण सम्मान प्रदान किया था।
क ल ही ख्यात लेखक भीष्म साहनी का उपन्यास मय्यादास की माड़ी खत्म किया। करीब बीस साल पहले इसे टुकड़ा टुकड़ा पढ़ा था, इस बार एकबारगी पढ़ डाला। भीष्म साहनी मेरे पसंदीदा लेखकों में हैं। चीफ़ की दावत उनकी चर्चित कहानी है। प्रेमचंद और यशपाल की परम्परा के भीष्म साहनी की हर रचना उनकी सहज लेखन शैली और जनवादी रुझान के चलते आम आदमी की व्यथा और संघर्ष का बयान है। विभाजन की स्थितियों पर लिखा उपन्यास तमस हिन्दी साहित्य की श्रेष्ठ कृति है। इसी कड़ी में है मय्यादास की माड़ी जिसकी विषयवस्तु में अठारहवीं सदी का पंजाब और ग्रामीण कस्बाई समाज है, जो धीरे धीरे अंग्रेजों की औपनिवेशिक गुलामी के लिए तैयार होता जा रहा था।
करीब चार सदी पहले सात समंदर पार से आए अंग्रेज तिजारतियों नें ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिये हिन्दुस्तान से कारोबार शुरू किया। धीरे धीरे उनका दखल स्थानीय प्रशासन में हुआ और फिर यह दखलंदाजी कंपनीराज जैसी एक ऐसी अस्थाई व्यवस्था में ढल गई जिसका 1857 के सिपाही विद्रोह के बाद ब्रिटिश राज में तब्दील होना इतिहास में मानो पूर्वनियोजित था। कंपनी राज से पहले ही गौरांग प्रभुओं ने इस मुल्क के तत्कालीन बंटे हुए शासन-समाज को भांप लिया था। सत्ता का असली सुख राजा नहीं बल्कि उसके कारिंदे भोग रहे थे, क्योंकि पूरे देश में सर्वमान्य कानूनी अमलदारी नहीं थी। ज़मींदारों, तालुकदारों और कारिंदों के अपने अपने कानून थे जिनके बीच आम जनता पिस रही थी। अंग्रेजों ने अपने विस्तारवाद को ढकने और भारत को उपनिवेश बनाने का औचित्य सिद्ध करने के लिए दिखावे के तौर पर यही जाहिर किया कि जाहिलों के इस मुल्क में कानून का राज कायम करना उनकी जिम्मेदारी है। मय्यादास की माड़ी को पढ़ते हुए यह समूचा परिदृष्य धीरे धीरे समझ में आता है। भारत को औपनिवेशिक गुलाम बनाने की चालों में स्वार्थी उच्चवर्ग सहायक होता है और राजाओं के मनमाने राज से जनता को निजात दिलाने के लिए अंग्रेजों का कानून देश को गुलामी की कालकोठरी में धकेल देता है।
कहानी झेलम और चनाब के दोआब में बसे एक कस्बे की है, जिसका अहम हिस्सा है मय्यादास की माड़ी। एक बदलते दौर में लगातार ढहते बिखरते जाने को अभिशप्त गढ़ी, जिसे बनाया था मय्यादास ने, जो अफ़गानिस्तान तक पसरे सिख राज्य का काबुल में ऊंचा ओहदेदार था। कारदार के पद से तरक्की कर, बदलती हैसियत के साथ अपने पुश्तैनी गांव में इस माड़ी के निर्माण के साथ उसका रसूख और दबदबा बढ़ता जाता है। वह बड़ा दीवान कहलाता है। करीब डेढ़ सदी पहले दुनियाभर में आ रहे बदलाव की खबरों से दूर इस कस्बे का जीवन किस तरह माड़ी में होनेवाली घटनाओं से जुड़ा था इसका दिलचस्प ब्योरा उपन्यास में है। मैयादास का सदाचारी रूप मगर वक्त को न पहचान पाने की वजह से उसका दुखद अंत पूरे कथानक पर छाया है। पंजाब के अधिकांश इलाके पर अंग्रेजों की अमलदारी scan0001कायम हो जाती है, लाहौर सिखों के हाथ से निकल जाता है। अंग्रेज भक्त बन कर नई व्यवस्था में पद और रुतबा हासिल करने की होड़ में पुराने रईसों, तालुकदारों के घरों में फूट  पड़ने लगती है। सिख राज के समर्थक पीछे धकेले जाते हैं। भितरघाती और अंग्रेजों के टहलुए किसी न किसी तरह कृपापात्र बनने की जुगत करने में जुट जाते हैं।
मय्यादास का सौतेला भतीजा धनपतराय भी इनमें शामिल है। मैयादास ने लाहौर दरबार को अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए एक लाख अशर्फियों की मदद दी थी। अंग्रेजों की जीत के साथ यह मदद उसके लिए विपत्ति बनकर लौटती है। अंग्रेज नई ज़मींदारी व्यवस्था कायम करते हैं। दलपत को तीन गांवों का मुरब्बा बख्शा जाता है। वह मैय्यादास को माड़ी से बेदखल करता है, पर कस्बेवालों के समझाने पर मान जाता है। मगर माड़ी पर उसकी नज़र गड़ी रहती है। गर्दिश में रुसवाई का सदमा मैय्यादास की मौत बन जाता है। माड़ी के इर्दगिर्द पसरे कस्बे की तीन पीढ़ियां पुराने ज़माने को मुट्ठियों में थामने की कोशिश के बीच उसे लगातार फिसलते देख रही हैं और सुन रही हैं बदलाव की आहट जो रेल लाईन पर भागते काले दैत्याकार इंजन के धुंए से भी ज्यादा आशंकित करनेवाली हैं। इस सबके बीच है उस दौर की पंजाबी संस्कृति, लोगों के क़ायदे, आपसी व्यवहार, शादी-ब्याह, गीत, दर्द के नग्में और खुशियों के तराने। आज़ादी से पहले के बदलते भारत की तस्वीर उकेरते अनेक कथानक प्रेमचंद, यशपाल, अमृतलाल नागर और भगवती चरण वर्मा जैसे ख्यात लेखकों ने लिखे हैं, मगर अठारहवीं सदी के भारत का चेहरा मैयादास की माड़ी में उभरता है जिसमें उपनिवेश काल है, ब्रिटिश साम्राज्यशाही का लोलुप चरित्र है, अतीत में डूबा और परम्पराओं में जकड़ा समाज है जिसके लिए जीवन का अर्थ सुबह से शाम हो जाने जितना ही सहज और सामान्य है। किसी किस्म के बौद्धिक, आत्मिक और वैज्ञानिक विकास के लिए इस सुबह और शाम के बीच कोई गुंजाईश कम से कम सोच के स्तर पर नहीं है।
उपन्यास में सहज सरल भाषा में उस दौर का खाका खींचा गया है। कई प्रसंग अनूठे हैं। पश्चिमी पंजाब में पेशावर को कराची और कोलकाता से जोड़ने के लिए जब ग्रांड ट्रक ट्रैक बनाया जा रहा था तब यात्रा के इस अनूठे साधन को लेकर लोगों में कितनी तरह की भावनाएं, आशंकाएं थी उसका बेहद मज़ाहिया ब्यौरा भीष्म साहनी की कलम से निकला है। यह ब्यौरा हम कबाड़खाना पर लगा रहे हैं। यहां पेश है रेल की प्रशंसा में रचा गया लोकगीत- गड्डी आई गड्डी आई मंगोवाल दी/ बुड्ढे दी दाढ़ी विच अग्ग बाल दी/ शाबा शाबा वे फिरंगिया/ अटल होवी राज/ तू सभणा दा सरताज...

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