Wednesday, February 17, 2010

कथा-पुराण यानी पुरानी कहानी

tp3548[18] संस्कृत में पुराण का अर्थ है प्राचीन, पूर्वकाल संबंधी। इसके अलावा इसमें अतीत की घटना या वृत्तांत या उपाख्यान अथवा पुरातनकालीन, सांस्कृतिक, धार्मिक संहितामूलक इतिहास भी होता है।
पु राना शब्द का इस्तेमाल रोजमर्रा की भाषा में खूब होता है। इसमें ग़ज़ब की लाक्षणिकता है जिसकी वजह से इसमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के भाव समाए हैं। पुराने के अर्थ में जहां इसमें नवीन से हीन या कमतर होने की व्यंजना समाई है वहीं नवीन से प्राचीन या बहुत पहले से उसका अस्तित्व होने की ठसक भी पुरानेपन को महत्वपूर्ण बनाती है। पुराना यानी जो पहले से है, जिसका अस्तित्व अतीत से चला आ रहा है, जो प्राचीन है, जो अच्छी दशा में न हो, जो क्षीण हो चुका हो आदि। इसके उलट पुराना का मुहावरेदार प्रयोग किसी वस्तु के टिकाऊ होने, मज़बूत होने, पक्का या अनुभवी होने के अर्थ में भी होता है। पुराना चावल या पुरानी शराब हमेशा ही ज़ायकेदार होती है। पुराना आदमी का अर्थ अनुभवी व्यक्ति होता है। पुराने लोग, पुरानी बातें जैसे पद में बीते युग के अनुभवी लोगों और कालजयी यथार्थ का ही भाव है।
पुराना शब्द बना है संस्कृत के पुराण शब्द से जिसे आमतौर पर हम प्राचीन धर्म-संस्कृति की जानकारी देनेवाले ग्रंथ के रूप में जानते हैं। पुराण से पुराना के अर्थ में मराठी में पुराणा, असमी में पुरणा, बंगाली में पुरान, उड़िया में पुरुणा, सिंधी, राजस्थानी में पुराणों, नेपाली में पुरानु और गुजराती में पुराणूं रूपांतर प्रचलित हैं। संस्कृत में पुराण का अर्थ है प्राचीन, पूर्वकाल संबंधी। इसके अलावा इसमें अतीत की घटना या वृत्तांत या उपाख्यान अथवा पुरातनकालीन, सांस्कृतिक, धार्मिक संहितामूलक इतिहास भी होता है। इसमें वयोवृद्ध, क्षीण, घिसा हुआ जैसे भाव भी हैं। डॉ राजबली पाण्डेय के हिन्दूधर्म कोश में ऋषि सायण के हवाले से लिखा है कि पुराण वह है जो विश्वसृष्टि की आदिम दशा का वर्णन करता है। पुराण की एक अन्य परिभाषा लक्षणों के आधार पर हैं। पुराण में पांच लक्षण होना आवश्यक हैं-सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं ज्ञेयं पुराणं पञ्चलक्षणम्।। अर्थात सर्ग व  सृष्टि का विज्ञान, प्रतिसर्ग यानी सृष्टि का विस्तार, मन्वंतर यानि मनुओं का काल और फिर वंशानुचरित यानी सूर्य और चंद्रवंशी राजाओं का वर्णन यही पांच लक्षण पुराणों के हैं। महर्षि वेदव्यास पुराण संहिता के रचयिता माने जाते हैं। भारतीय धर्मशास्त्र में अठारह पुराण माने जाते हैं। पुराण मुहावरे के तौर पर भी इस्तेमाल होता है। जब कोई व्यक्ति हरवक्त अपने दुखदर्द की एक सी कहानी बताता है उसे भी पुराण शुरू करना कहते हैं।
पुराण बना है संस्कृत धातु पुर् से जिसमें पूर्वकाल का, प्राचीन जैसे भाव हैं। इससे बने पुरा शब्द का प्राचीन, विगत, ऐतिहासिक या प्राच्य के अर्थ में उपसर्ग की तरह हिन्दी में प्रयोग होता है जिससे कई शब्द बने हैं जैसे पुरालेख यानी पुराने दस्तावेज, पुरालिपि यानी प्राचीन लिपि, पुरावशेष यानी अत्यंत प्राचीन काल के जैविक या स्थावर रचनाओं के चिह्न, पुरातत्व यानी अत्यंत प्राचीनकाल में हुई बातों के बारे में साक्ष्य व प्रमाण सहित शास्त्रीय अध्ययन करना। पुराकथा यानी प्राचीन पौराणिक आख्यान, पुराविद् या पुरातत्विद् यानी अतीत की घटनाओं को जानने और उनका विश्लेषण करनेवाला विद्वान। पुरा शब्द के दायरे में वर्तमानकाल तक चले mahabharata_warआए किसी भी काल का समावेश है यानी सबसे पहले, उसके बाद से लेकर अब तक का समय। अतीत की कहानी भी पुरा में समायी है। इस तरह देखें तो कथा-पुराण और पुरानी कहानी एक ही है मगर दोनों के अर्थ काफी अलग हो जाते हैं।
पुराना के अर्थ में जूना शब्द भी हिन्दी की कुछ शैलियों व अन्य भाषाओं में प्रचलित है। मराठी, मालवी, गुजराती आदि में जूना के रूपांतर प्रचलित हैं। शब्द खूब प्रचलित है। जीर्णः से बने जूना शब्द का प्रयोग कई बार जुनापुराणा के रूप में भी मालवी, राजस्थानी में होता है। जीर्ण का वैदिक रूप जूर्ण था। प्राकृत रूप जुण्ण हुआ जिससे विभिन्न भाषाओं में अलग अलग रूपांतर हुए जैसे हिन्दी में जूना, मराठी में जुना, सिंधी में जुणु और गुजराती में जुनूं आदि। जूना अखाड़ा यानी प्राचीन अखाड़ा। इंदौर में एक किस्म के रिहाइशी इलाके को बाखल कहते हैं। वहां जूनीबाखल नाम से एक इलाका है। पूर्वी शैली में बखरी या बाखर भी प्रचलित है जिसका अर्थ है कई कोष्ठ-प्रकोष्ठोंवाला कच्चा मकान। जूना शब्द बना है संस्कृत के जीर्णः शब्द से जिसमें कमजोर, क्षीण या दुर्बल, कच्चेपन का भाव है। यह बना है संस्कृत धातु जृ से जिसमें क्षरण, घटना, कमजोरआ दि भाव हैं जिनसे हिन्दी के जरा(अवस्था), जीर्ण, जर्जर जैसे कई शब्द बने हैं। खराब दशा के लिए जीर्ण-शीर्ण, जीर्णावस्था शब्द इसी मूल से उपजे है। वृद्धावस्था के लिए जरा शब्द भी जृ धातु से ही बना है जिसका अर्थ निर्बल, टूटा-फूटा, विभक्त, अशक्त, बुढ़ापा आदि होता है। वयोवृद्ध, अशक्त, निर्बल अथवा खंडहर के लिए जराजीर्ण या जरावस्था शब्द भी प्रचलित है। जीर्ण से बना जून या जूना शब्द में पुरातन, प्राचीन या पुरानेपन का भाव है क्योंकि पुरानी होने के साथ ज्यादातर चीजें कमजोर होती जाती हैं।

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Tuesday, February 16, 2010

फ़िरक़ों की अफ़रातफ़री, क़यामत आने को है…

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हि न्दी के सबसे ज्यादा इस्तेमालशुदा शब्दों में अफ़रातफ़री का भी शुमार है जिसका मतलब है अस्तव्यस्त होना, हंगामा होना, बदहवासी फैलना आदि। इस शब्द के और भी कई प्रयोग होते हैं जैसे गड़बड़ी फैलना, घोटाला होना, गोलमाल करना आदि जिनमें मूलतः अनियमितता और बेकायदगी की बात उभर रही है। मुहावरे की शक्ल में इसका प्रयोग अफ़रातफ़री मचना या अफ़रातफ़री फैलना जैसे वाक्यों में होता है। किसी समूह, समाज या समुच्चय की तयशुदा व्यवस्था में घोर व्यतिक्रम आने का परिणाम है अफ़रातफ़री। इसमें नियमों का टूटना, अनुशासन की धज्जियां उड़ना या फिर शांत गतिशील समाज में अचानक किसी भयकारी घटना से उत्पन्न अव्यवस्था है। यानी अफ़रातफ़री में गड़बड़ी का तत्व तो हर हाल में विद्यमान है। भारत की कई भाषाओं में यह शब्द विविध रूपों में है मसलन मराठी में यह अफरातफर है जिसमें अव्यवस्था के साथ साथ रिश्तवतखोरी, आर्थिक अनियमितता या असंतुलन का भाव है। हिन्दी में भी आर्थिक अनियमितता  या भ्रष्टाचार के संदर्भ में पुराने लोग अफ़रातफ़री शब्द का इस्तेमाल करते हैं पर ज्यादातर के लिए अफ़रातफ़री के मायने आज अव्यवस्था ही है। खैर, इल्म की अफ़रातफ़री में इतना भी कम नहीं!!!
अफ़रातफ़री हिन्दी में फ़ारसी ज़बान से आया मगर मूल रूप से यह है अरबी ज़बान का जहां इसका मूल रूप कुछ और है। यह दरअसल एक शब्दयुग्म है जो सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी के दो लफ्जों इफ्रात और तफ्रीत या तफ़्रीक़ से socialism_vs_capitalismashx मिलकर बना है। हिन्दी में बाहुल्य के लिए इफरात शब्द प्रचलित है। अफ़रातफ़री दरअसल इफ्रात और तफ्रीत (तफ़्रीक़) है। मूल अरबी में यह  इफ्रात ओ तफ्रीत या इफ्रातो-तफ्रीक़ है। इसका फारसीकरण हुआ अफ़रा-तफ़री। हिन्दी में यह  हो गया अफरातफरी। इफ्रात ओ तफ्रीत जैसा पद (टर्म) दरअसल इस्लाम धर्म के सम्यक और मानवतावादी दर्शन से उपजा है। ईश्वर की बसाई इस दुनिया में जो कुछ भी चल-अचल रचनाएं हैं वे सब सुंदर हैं और सब पर सबका बराबर का हक़ है। यहां कोई छोटा बड़ा नहीं है, सब समान हैं। न सिर्फ कुर्आन में बल्कि सभी धर्मग्रंथों में यही संदेश किसी न किसी पैग़म्बर के हवाले से आया है, क्योंकि उन्हें अपनी भटकन और साधना के बाद यही तत्वज्ञान मिला था।  हिन्दुस्तानी सरज़मीं के मशहूर शायर इब्ने इंशा साहब यही बात बड़ी खूबसूरती से कहते हैं-इस जग में सबकुछ रब का है, जो रब का है, वो सबका है।
अरबी के इफ्रात ifrat शब्द बना है फ़रात्ता से जिसमें आधिक्य का भाव है। इफ्रात का अर्थ भी आधिक्य, प्रचुरता, बहुत सारा, बाहुल्य, अधिकता या बहुतायत है। इसी तरह तफ्रीत tafrit का अर्थ है कमी, न्यूनता, नष्ट करना, नुकसान करना आदि। कुछ संदर्भों में तफ्रीक के स्थान पर इफ्रातो-तफ्रीक़ भी मिलता है। अरबी में तफ्रीक बना है फ़राक़ा faraqa धातु से जिसका अर्थ है अंतर करना, भेद करना आदि। इससे बने तफ्रीक़ का मतलब हुआ फूट डालना, अलग-अलग करना, बड़ी संख्या में से छोटी घटाना वगैरा वगैरा। रोज़मर्रा की हिन्दी में इस्तेमाल होनेवाला शब्द फ़र्क इसी धातुमूल से उपजा है जिसके मायने भी अंतर, भेद, पार्थक्य आदि हैं। जातिभेद या वर्गभेद को अरबी फारसी में फिरक़ापरस्ती / फ़िरक़ावाराना कहा जाता है और हिन्दी में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। इसमें जो फ़िरक़ा है वह इसी फ़राक़ा से जन्मा है। वर्ग शब्द का अर्थ ही है खाना या खण्ड। अर्थात बंटवारा या भेद। खण्ड-खण्ड करना यानी टुकड़े टुकड़े करना। सो फ़राका  की आत्मा और फ़र्क़  यानी  भेदभाव की मिट्टी से जो ढ़ांचा बना उसका नाम फ़िरक़ा तो होना ही था।  हम मनुष्य की बजाय बनिया-बसोड, कायस्थ-कुर्मी, ब्राह्मण-भंगी और मियां-मुसहर बने रहने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।
कुरान में इफ्रातो-तफ्रीत (या तफ्रीक़) का सीधा-सादा सा मतलब निकलता है किसी को कम ज़्यादा न समझना, किसी भी किस्म की अति से बचना। संस्कृत में भी अति सर्वत्र वर्जयेत् उक्ति प्रसिद्ध है। सनातन हिन्दू परम्परा से लेकर जैन, बौद्ध धर्म तक सादगीपूर्ण जीवन की सलाह देते हुए संग्रह से बचने का उपदेश देते हैं। संग्रह में  समुच्चय है जिसकी रचना आधिक्य से होती है। कामना, लोभ, ईर्ष्या, वासना सभी कुरूपताओं के मूल में यही संग्रहवृत्ति है इसीलिए परिव्राजक के लिए अपरिग्रह का व्रत अनिवार्य है। मगर गृहस्थ के लिए भी अपरिग्रह ज़रूरी है। monkeys-survivingकिसी शायर ने खूब कहा है-और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन, मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे। यानी ग्रहस्थ भी उतने में गुज़ारा करे जितने में शांति और मंगल की सृष्टि हो जाए। सुखानुभव संग्रह में नहीं बल्कि निरपेक्ष जीवन में है। कबीर भी कह गए हैं कि साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।।
सामाजिक व्यवहार में किसी भी तरह का फ़र्क़ वैमनस्यता लाता है। तफ्रीक़ में यही बात है। खुदा की बनाई दुनिया में जब  खुद सिरजनहार ने फ़र्क़ नहीं किया तो हम बंदे कौन होते हैं आपस में फ़र्क़ करने वाले? इसी तरह तफ़्रीत में जो न्यूनता या कमी का भाव है उसकी व्याख्या यही है कि समाज में रंगभेद, जातिभेद और वर्गभेद करनेवाले हम कौन हैं? रंग में, बोली में, जाति में, हैसियत में गरज़ ये कि हर बात में कमी निकालना। यही तफ़्रीत है। तौलना है तो खुद के गुणों को तौलें और खामियों को दूर करें। इस तरह इफ़्रातो-तफ़्रीत (तफ्रीक़) के मायने हुए न्यूनाधिक्य, कमोबेश, थोड़ा-बहुत, कम-ज्यादा आदि। यानी संदेश यही है कि हमें संतुलन रखना है। न ज्यादा और न ही कम। हमारे हर कर्म में तारतम्य, संतुलन बना रहे। किसी बात की कमी भी बुरी और ज्यादती भी खराब। मध्यमार्ग सही है। क़यामत के दिन खुदा की तराजू पर तो सभी एक भाव तुलेंगे फिर आपस में फ़र्क़ क्यों करें?
मगर इन्सान यह नहीं समझता है और इसी वजह से सारी गड़बड़ियां पैदा हो रही हैं। पर्यावरण से लेकर आर्थिक मोर्चे पर और जीव जगत से लेकर अध्यात्म तक। यही है इफ़्रातो-तफ़्रीत (तफ्रीक़) का मूल भाव अर्थात असंतुलन या गड़बड़ी। ईश्वर की बनाई दुनिया में सबके लिए सब कुछ बराबर होना चाहिए था, मगर यहां हुआ इफ्रातो-तफ्रीक यानी भेदभावपूर्ण बंटवारा जिसे गड़बड़झाला कहा जा सकता है। हिन्दी में कहें तो न्यूनाधिक्य। इफ्रातो-तफ्रीक़ में मूल अरबी में ही संभवतया अंतस्वरालोप हो गया होगा और असंतुलन के अर्थ में इसके मायने सामने आए होंगे। अरबी से फ़ारसी में जाकर इसमें से त या क़ का लोप हुआ और बना अफ़रा-तफ़री जिसमें भी मूलतः गड़बड़ी या असंतुलन का ही भाव था। अर्थ विस्तार होते होते इसके दार्शनिक मायने फ़ना हो गए और जो बचा रह गया उसमें अव्यवस्था, गड़बड़ी, हड़बड़ी, घोटाला, गोलमाल जैसे स्थूल भाव ही उजागर होते हैं। यानी इफ़्रातो-तफ़्रीत (तफ्रीक़) में भी अफ़रातफ़री हुई। मुमकिन है क़यामत के दिन भी लोग अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाना चाहें! क्या खुदा की आंखों में धूल झोंक पाएंगे?

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Sunday, February 14, 2010

बहादुर की जाति नहीं होती[माई नेमिज खान-2]

पिछली कड़ी-माई नेमिज खान बहादुर पठान [1] 

मध्यकाल में बहादुर शब्द की महिमा खान शब्द की तरह ही बढ़ती रही। शौर्यसूचक इस शब्द की व्याप्ति सिर्फ शासक वर्ग तक सीमित न रहकर आम लोगों में भी हुई।
ब हादुर शब्द भी खान की तरह तुर्क-मंगोल संस्कृति से उपजा है जिसका इस्तेमाल मुगलों और अंग्रेजों ने रेवडियां बांटने में किया। इस शब्द की अर्थवत्ता और उससे जुड़ा रुतबा इतना जबर्दस्त है कि उत्तर भारत की मार्शल कौमों (लड़ाका जातियां) में पुरुषों के नाम के साथ यह शब्द लगाना शान की बात मानी जाती है मसलन- विजय बहादुर, जंग बहादुर। यही नहीं, नेपाल के क्षत्रियों में तो यह परंपरा इतनी प्रचलित है कि भारत में तो अब नेपालियों के लिए बहादुर शब्द ही पहचान बन गया है। बहादुर शब्द वैसे तो हिंन्दी में उर्दू-फारसी के जरिये आया मगर है तुर्की जबान का। बल्कि यूं कहें कि इसकी पैदाइश मंगोल जबान में हुई और परवरिश तुर्की जबान में। तुर्की में इसका उच्चारण होता है बगातुर यानी वीर, योद्धा, बलवान या नायक। इसी तरह मंगोल जबान में इसका उच्चारण होता है बघातुर। मूलतः तुर्क-मंगोल (पश्चिमी एशिया वाला तुर्की नहीं बल्कि मध्यएशिया के तुर्कमेनिस्तान वाला तुर्क, जहां से तुर्किक समुदाय और भाषा का उद्गम हुआ है) भाषा परिवार का शब्द है बघातुर  जिसमें रुतबा, शौर्य और जुझारूपन के भाव है। समुच्चय रूप में ये सभी भाव योद्धा से जुड़ते हैं और इसका अर्थ भी यही है-वीर, लड़ाका। एक पौराणिक शूरवीर जिसके किस्से लोकगाथाओं में मिलते हैं। बघातुर शब्द तुर्क-मंगोल संस्कृति से निकल कर मध्यकाल में सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम में बुल्गारियाई भाषाओं में विभिन्न रूपांतरों के साथ प्रचलित हो गया। इस शब्द को लोकप्रिय बनाने में खान नामधारी तुर्क-मंगोल बघातुरों का ही योगदान रहा मसलन चंगेज़ खान। तेरहवीं सदी में एशिया से यूरोप तक फैले उसके विशाल साम्राज्य में इस नाम की महिमा खान शब्द की तरह ही बढ़ती रही। शौर्यसूचक इस शब्द की व्याप्ति सिर्फ शासक वर्ग तक सीमित न रहकर आम लोगों में भी हुई।
मंगोल भाषा में इस शब्द का व्यापक प्रयोग होता रहा। इसका कारण रहा मंगोल अमीरों और राजाओं द्वारा अपने नाम के साथ इसका प्रयोग करने का चलन। प्रसिद्ध मंगोल योद्धा चंगेज खान के पिता का नाम था येसुगी बघातुर(1100-1180) और उसके दादा का नाम था बैरतान बघातुर। जाहिर है नाम के साथ इस लफ्ज के इस्तेमाल की रिवायत भी मंगोलिया से चल कर तुर्कमेनिस्तान, ईरान होते हुए हिन्दुस्तान और नेपाल तक आम हो गई। उधर ईरान के उत्तर में जॉर्जिया होते हुए यह रूस में दाखिल हुआ और फिर एशिया की सरहद लांघते हुए यूरोप की बुल्गारी भाषा में समा गया।  Abdul_Ghafar_[15]बुल्गारी में इसका उच्चारण बगातुर, रूसी में बोगातिर, पोलिश में बहातेर, फारसी और हिन्दी उर्दू में बहादुर, जॉर्जियाई में बगातुर, हंगारी में बतोर, उज्बेकी, तातार और कुर्दिश में बातिर, तुर्किक में बातुर और मंगोल में बटोर है। मंगोलिया की राजधानी उलानबटोर में भी यही बहादुर शब्द झांक रहा है जिसका मतलब होता है बहादुरों का घर।
भारत के उत्तरी इलाके में बहादुर का बोलबाला कुछ इस कदर बढ़ा कि इसके हिन्दी अर्थ वीर ने इसका साथ देना पसंद किया। नतीजतन बहादुरों की शान बढ़ाने वाला एक नाम और बन गया-वीर बहादुर। भारत में जब मुस्लिम शासन खत्म हुआ तो अंग्रेजों ने प्रभावी हिन्दू और मुस्लिम ज़मींदारों को उपाधियां बांटीं जिनमें खान बहादुर मुसलमानों के लिए थी और राय बहादुर हिन्दुओं के लिए। मज़े की बात यह कि खान और बहादुर दोनों ही शब्द मंगोल मूल के थे, जिनका धर्म से कोई लेना देना नहीं था। यह फर्क करना सबसे पहले अंग्रेजों ने ही शुरू किया। शब्दों का सफर अजीब होता है। खान की जो प्रभावशीलता अंततः धर्म की चमक से जुड़ गई, वहीं उसी मूल से निकले बहादुर शब्द में वीरता का भाव बरक़रार रहा और इसका दायरा हिन्दू-मुस्लिम दोनों कौमों में विस्तृत होता रहा।
इसी किस्म का एक शब्द है पठान यानी खालिस अफगानी लोग। भारतवर्ष की आज़ादी के वक्त जब दोनों देशों के कई नेता बेहद आत्ममुग्ध, स्वार्थ के नशे में चूर थे तब इस देश का एक महान नेता तथाकथित राष्ट्रवादियों के हाथों ठगे जाने से सर्वाधिक दुखी था। वह एक सच्चा पठान था- खान अब्दुल गफ्फार खान यानी सीमांत गांधी। विभाजन के पूर्व  भारत के पश्चिमी क्षेत्र पख्तूनिस्तान में आजादी की अलख जगानेवाला सीमांत गांधी। हिन्दुस्तान का विभाजन न होता तो आज शायद इस्लामी आतंकवाद नाम की समस्या भी यहां नहीं होती। भारत के मुस्लिम समाज में बहुत से लोग पठान उपनाम का इस्तेमाल करते है। आज पठान शब्द से एक धर्म या जाति-विशेष का हो कर रह गया है मगर किसी वक्त ऐसा नहीं था, बल्कि पश्चिमोत्तर भारत के एक खास इलाके में रहनेवाले सभी लोग पठान कहलाते थे ठीक वैसे ही जैसे पंजाब निवासी पंजाबी, महाराष्ट्र के लोग मराठी और गुजरातवासी गुजराती। दरअसल इस्लाम के जन्म से भी सदियों पहले वैदिककाल में जब अलग-अलग गण हुआ करते थे भारत के उत्तर-पश्चिमी इलाके में पक्थ नाम का एक गण था। इसका क्षेत्र आज के रावलपिंडी से लेकर अफगानिस्तान के दक्षिण-पूर्वी इलाके तक थे। इसमें उत्तर में आज के पेशावर-काबुल से लेकर दक्षिण मे क्वेटा जैसे इलाके आते हैं।
खास बात ये कि ये समूचा क्षेत्र पहाड़ी है। पख्त शब्द मूल रूप से पष् धातु से बना है जिसमें ऊंचाई, बुलंदी और मजबूती जैसे अर्थ निहित हैं। समझा जा सकता है कि ये सब विशेषताएं पहाड़ में ही होती है और पहाड़ी क्षेत्र होने से ही इसे पक्थ नाम मिला होगा। इससे बने पठार(हिन्दी ), पुख्ता (फारसी) और पाषाण् ( संस्कृत) जैसे शब्द भी इसी तथ्य को साबित करते हैं। जाहिर है पक्थगण का एक रूप पहले पश्त या पष्त रहा होगा। क्योंकि आज भी इस इलाके के लोग खुद को पश्तून कहते हैं। इनकी बोली भी पश्तो या पुश्तो कहलाती है। पक्थ गणवासी ही पख्तून कहलाए। इन लोगों का इलाका पख्तूनिस्तान कहलाया और पख्तून से ही बना पठान। अविभाजित भारत में पेशावर, सियालकोट, रावलपिंडी के हिन्दू भी पठान ही थे और मुस्लिम भी। भारत में मुस्लिम आक्रमण के वक्त तक इस पूरे क्षेत्र में हिन्दू राजा जयपाल का शासन था जो पठान था। छह सदी ईसापूर्व हुए प्रख्यात वैयाकरण पाणिनी भी पठान थे। रावलपिंडी, क्वेटा जैसे क्षेत्रों में आज भी हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और वे पठान ही हैं। पठानकोट  नाम के साथ पठान शब्द भी किसी ज़माने में वहां पठानों की बहुतायत होने का संकेत करता है। महाराष्ट्र में पैठण नाम का स्थान अपनी नफीस बुनावट वाली साड़ियों और संत एकनाथ के जन्मस्थान के लिए मशहूर है। प्राचीनकाल में इसका नाम प्रतिष्टान था जिसका अपभ्रंश पैठण हुआ। ग्रियर्सन ने अपने भाषायी सर्वे में इसे पश्तून का भारतीय रूप समझा था।

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Saturday, February 13, 2010

माई नेमिज खान बहादुर पठान [1]

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इ न दिनों खान नाम चर्चा में है। माई नेम इज़ खान फिल्म विवाद में है। विवाद में लाने के सारे तत्व फिल्म के जन्म से जुड़े हैं। इसके बावजूद इस शब्द से जुड़ी जातीय पहचान का मिथ आज भी उतना ही रहस्यमय और आवरणों में लिपटा है। ऐसा नहीं कि खान के जातीय पहचान से जुड़े मिथ्या गर्व का खुलासा होना बहुत महत्वपूर्ण हो, मगर यह जानना तो ज़रूरी है ही कि आज चाहे खान शब्द को इस्लाम या एक जाति विशेष से जोड़ कर देखा जा रहा है, मगर मूल रूप में खान शब्द का इस्लाम धर्म या मुस्लिम समाज से पुरातन संबंध नहीं है। खास तौर पर इस्लाम की सरज़मीं अरब और अरबी समाज संस्कृति से खान का रिश्ता नहीं है। यही बात बहादुर शब्द के साथ भी है जो तुर्क मंगोल संस्कृति से उपजा शब्द है। यह जानना दिलचस्प है कि कुबलाई खान और चंगेज़ खान जैसे महान खान, मुसलमान नहीं थे। कुबलाई खान बौद्धधर्म की एक विशेष शाखा का अनुयायी था जबकि चंगेज़ खान चीन के शॉमन पंथ का अनुयायी था। खान वंशावली या खान सम्प्रभुता को अंग्रेजी में खानेट कहा जाता है। इतिहास में कई खानेट दर्ज है जो दसवीं सदी से शुरू होते हैं मसलन काराखानेट या इलेकखानेट। इनमें से ज्यादातर फारस या मध्यएशिया से लेकर सुदूर पूर्वी योरप के बल्गारिया तक पसरे थे। सुदूर मंगोलिया और मध्यचीन में जन्मे खान शब्द की पहचान कभी मंगोल वंश के शासकों ने अपनी सम्प्रभुता की सबसे बड़ी पदवी के तौर गढी थी, ठीक वैसे ही जैसे भारत में स्वामी शब्द में मालिक, शक्तिवान, पिता, पति, पालक, शासक अर्थात सर्वोच्चता के भाव निहित हैं। इसी तरह खान शब्द की अर्थवत्ता भी विकसित हुई थी। खान और बहादुर की इसी कतार में आगे खड़ा है पठान जिसके साथ भी जातीय पहचान जुड़ी है, दरहकीक़त यह सिर्फ इलाक़ाई पहचान बतानेवाला शब्द है।
खान शब्द के मूल में मंगोल और चीनी संस्कृति का भाषायी आधार है। इसकी व्युत्पत्ति संभवतः चीन के महान वंश हान से हुई है। हान वंश ने  दो सदी ईसापूर्व से लेकर ईस्वी 220 तक चीन में शासन किया। चीन के मध्यप्रान्त शांक्सी से होकर गुज़रनेवाली हानशुई नदी के नाम पर चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध हान वंश का नामकरण हुआ। यह ठीक वैसे ही है जैसे सिन्धु नदी के नाम पर सैन्धव सभ्यता की पहचान बनी। मंगोल जाति के लड़ाकों ने जब मध्य चीन के राज्यों 800px-Emperoryuandinastycollage पर कब्जा करना शुरू किया तब उपाधि के तौर पर उस क्षेत्र के महान हान वंश के नाम पर कुछ नए शब्द जैसे काघान kaghan, कागान kagan, खाकान khakan या कान kan सामने आए। चीनी भाषा का एक उपसर्ग है के-ke जिसमें महानता, सर्वोच्चता का भाव है। हान han से पहले के जुड़ने से बना ke-han जिससे उक्त मंगोल रूपांतर बने। मंगोल भाषा में इन सभी नामों में शासक या सत्ता के सर्वोच्च पदाधिकारी का भाव था।
इतिहास में सबसे पहले काघान के तौर पर रुआनरुआन कबीले से जुड़े मंगोल शासक मुरुंग तुयुहुन का नाम दर्ज है जो ईसा की दूसरी सदी के उत्तरार्ध में दक्षिणी मंगोलिया से सटी चीन की उत्तरी पट्टी का शासक था। खान उपाधि लगाने वाले शासकों के तौर पर सबसे व्यवस्थित वंशावली मंगोलिया के रुआनरुआन कबीले में नजर आती है। इससे जुड़े कुछ नाम देखें- क्योदोफा खान, इकुगाई खान, चिल्लिन खान, चू खान, फुमिंगदुन खान और तुहान खान। ये थे असली खान नाम जो सभी तीसरी सदी से पांचवी सदी तक चीन के उत्तरी हिस्से के शासक रहे। गौरतलब है कि इसके सदियों बाद इस्लाम धर्म का आविर्भाव हुआ। हालांकि बारहवी से चौदहवीं सदी तक भी चीन और मंगोलिया के शासक काघान या खाकान उपाधि धारण करते रहे थे और अनेक मंगोल कबीलो में यह शब्द राज्यप्रमुख के तौर पर अपनी पहचान बना चुका था। मुस्लिम शासक के तौर पर पहला खाकान तैमूर लंगड़ा ही सामने आता है। हालांकि मंगोलिया और चीन में तैमूर के समकालीन कई खाकान थे जो बौद्ध, नव-ताओवादी, नव-कन्फ्यूशियसवादी और शॉमन विचारधारा को माननेवाले थे। युआन वंश में भी कई खान हुए हैं। चीन का महान शासक कुबलाई खान इस वंश का संस्थापक माना जाता है। चीन की वर्तमान राजधानी पेइचिंग का नाम यूआन साम्राज्य के वक्त तातू, दादू या देदू था जिसका मतलब था महान राजधानी। मार्कोपोलो के वृत्तांत से पता चलता है कि पेइचिंग का नाम इसी अर्थ में कुबलाई खान के वक्त खानबालिक Khanbaliq रख दिया गया था जिसका मतलब होता है महान खान की राजधानी।
खान के ये सभी बहुरूप आज तुर्की मूल के माने जाते हैं। खान नामधारी शासकों की परम्परा फारस से लेकर तुर्की तक रही। दिलचस्प यह कि खान, खाघान, काघान जैसे उच्चारणों के साथ ये पदनाम मंगोल और तुर्कमानी हमलावर सुदूर पश्चिम स्थित तुर्की तक ले कर गए इसी वजह से इन्हें तुर्की मूल का मान लिया जाता है। काघान का अरबीकरण खाकान के रूप में हु्आ। अरब के कुछ सियासी अमलदारों के नामों के साथ यह खाकान शब्द नजर आता है पर अरब समाज ने सत्ता प्रमुख के तौर पर इस उपाधि में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। यह दिलचस्प है कि भारत में मुहम्मद बिन कासिम (695–715) से बाबर (1483-1531) तक जितने भी मुस्लिम हमलावर आए उनमें अधिकांश के साथ खान उपाधि नहीं लगी थी जबकि अपने वक्त में ये तमाम लोग किसी न किसी मूल इलाके के सर्वेसर्वा थे। भारत के कुछ हिस्से चंगेज़ खान के आक्रमण की चपेट में ज़रूर आए थे मगर चंगेज़ का धर्म इस्लाम नहीं था बल्कि शॉमन पंथ था। भारत में मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर अपनी मां की तरफ से चंगेज़ खान (1206-1227) और पिता की

marco-needs-a-wallet_ ... मार्कोपोलो ने अपने प्रसिद्ध यात्रा वर्णन में कुबलाई खान के बौद्ध होने और चीन में उसे खाकान कहने वाले कई प्रसंग बताए हैं...

तरफ से तैमूर लंग (1336 –1405) का वंशज था। इतिहासकारों के मुताबिक तैमूर लंग भी अपना रिश्ता चंगेज़ खान से जोड़ता था, मगर यह कभी प्रमाणित नहीं हो सका। न जाने कितने खान यहां हैं। सब चंगेज़ से ही रिश्ता जोड़ना चाहते हैं जो न मुसलमान था और न ही महान निर्माता या दूरदृष्टा। वो सिर्फ एक योद्धा था, अलबत्ता डाक प्रणाली में उसकी सूझबूझ अनोखी थी जिसके जरिये सदियों पहले भी तेजी से संवाद प्रेषण  हो जाता था।
मंगोलिया और चीन के जिन खान शासकों ने गर्व से खान उपाधि को अपने नाम के साथ जोड़ा, वैसा कुछ उन्ही मंगोल खाकानों या खानों के वंशजों नें भारत में मंगोल या मुगल साम्राज्य स्थापित करने के बाद नहीं किया। आश्चर्य है कि इसे इस्लाम का प्रभाव कहिए या खुद की पहचान को इस्लाम की मूल सरजमीं से जोड़ने की चाह, भारत में आए मंगोलों और तुर्कों के वंशज, मुगल शासकों नें अरब या फारस के शासकों द्वारा इस्तेमाल की जानेवाली उपाधियों को अपनाया जैसे सुल्तान, बादशाह, शहंशाह या मलिक आदि। खान की उपाधियां ज़रूर मुगलों नें अपने अहलकारों को इफरात में बांटी। दरअसल मंगोलिया से तुर्की पहुंचने के बाद खान शब्द वहां भी उपाधियां बांटने का उपकरण बन कर रह गया। तुर्की के आटोमन शासकों ने तूरान क्षेत्र के शासकों को खान उपाधि दी। यही क्रम भारत में भी मुगलों ने चलाया। राज्याध्यक्ष द्वारा प्रदत्त यह खान उपाधि बड़े सम्मान का प्रतीक बनी और बाद में अगली पीढ़ियों ने भी इसका इस्तेमाल किया। पीढ़ी दर पीढ़ी खान शब्द का दायरा बढ़ता गया। आखिर इसके साथ जातीय पहचान कैसे न जुड़ती? मंगोल दायरे से बाहर निकलने के बाद खाकान शब्द का स्त्रीवाची खातून बना  जिसका अर्थ साम्राज्ञी था। बाद में फारसी में किसी भी सम्भ्रान्त स्त्री के लिए खातून, खानम या खानुम शब्द का प्रयोग होने लगा। खान से संबंधित कई शब्द आज हिन्दी उर्दू में प्रचलितत हैं जैसे खान ए खानान जिसे खानखाना  भी कहा जाता है। इसका अर्थ शहंशाह जैसा ही है अर्थात राजाओं में श्रेष्ठ। खानज़ादा यानी खान का बेटा या राजपुत्र (अथवा दासीपुत्र ), खानदान यानी कुल, कुटुम्ब। खानदानी यानी कुलीन। सतपुड़ा का दक्षिणी हिस्सा जो भारत को दक्षिण से अलग करता है, महाराष्ट्र के उत्तरी क्षेत्र तक पसरा है। इसे खानदेश कहते हैं। कोश इसकी व्युत्पत्ति खंद, खांद से बताते हैं जिसका अर्थ जंगल या उबड़-खाबड़ इलाका है। खंद का अर्थ खण्ड ही यहां लगाना चाहिए। मगर मुझे लगता है कि मध्यकाल तक खान शब्द से मुसलमानों की शिनाख्त की जाने लगी थी। इस क्षेत्र का नाम खानदेश इसलिए पड़ा क्योंकि दक्षिण में शासन करने को लालायित मुग़लों का यहां शासन था। इससे आगे उन्हें हमेशा दक्षिण के सशक्त रजवाड़ों ने रोक कर रखा। महाराष्ट्रीयों ने दरअसल अपने क्षेत्र में भीतर तक घुस आए मुस्लिम शासन और उनकी आबादी को देखकर यह नाम दिया होगा, ऐसा लगता है। अन्यथा इस क्षेत्र का प्राचीन नाम विदर्भ  ही है। [अगली कड़ी में समाप्त]

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Friday, February 12, 2010

अजीत वह, जो पराजित होता रहे


सफर के मित्र रंगनाथ सिंह ने पिछली किसी कड़ी में पूछा था कि उनके दायरे के कुछ लोग हैं जो अजित लिखते हैं और कुछ अजीत, सही क्या है। मैं जानता हूं कि इस पर लिखने से तमाम अजीत नाराज हो जाएंगे। किन्तु रंगनाथ सिंह की जिज्ञासा का जवाब भी ज़रूरी है। हिन्दी में जीत के लिए जय, विजय जैसे शब्द प्रचलित हैं जो मूल रूप से संस्कृत के हैं जिनका अर्थ जीत, mahayana-buddhaविजयोत्सव अथवा कामयाबी है। ये बने हैं संस्कृत की जि धातु से जिसमें जीतना, हराना, दमन करना, नियंत्रण करना, काबू करना जैसे भाव हैं। जि धातु में उपसर्गों और प्रत्ययों के लगने से कई शब्द बने हैं जिनसे हिन्दी समृद्ध हुई है। हिन्दी के अनेक पुरुषवाची और स्त्रीवाची नामों का मूल भी यह धातु है, जैसे अजय, अजित, जीत, जीतेन्द्र, अविजित, विजय, विजया, विजयश्री, जयश्री, अपराजिता, जया, जयंत, जयंती, वैजयंती, अजिताभ समेत कई अन्य शब्द इस सूची में अभी शामिल हो सकते हैं।
हिन्दी में अजीत और अजित नाम प्रचलित हैं। अक्सर इनमें अजीत का अधिक प्रचलन हैं, जबकि यह अशुद्ध प्रयोग है। जि धातु में विजय का भाव है। इससे बने जित शब्द का अर्थ है जिसे जीता जा चुका है, जो परास्त है, जिसे वशीभूत किया जा चुका है अथवा जिसकी मात हो चुकी है। जि धातु से ही बनता है जित् जिसमें जीतने और परास्त करने का भाव है। मगर अजित शब्द जित् से नहीं बल्कि जित से बन रहा है। जीत शब्द संस्कृत में नहीं है बल्कि यह जित् से बना देशज रूप है। इस तरह देखें तो अ+जित का अर्थ हुआ जिसे परास्त न किया जा सके, जो अविजित है, अनिरुद्ध है। विष्णु, शिव और बुद्ध का नाम अजित ही है। उत्तर भारतीयों में स्वर के दीर्घीकरण की प्रक्रिया कहीं कहीं प्रभावी हो जाती है। अनिता का अनीता या सलिल का उच्चारण अक्सर सलील सुनाई पड़ता है। अजित इसी प्रक्रिया के चलते अजीत बना। यह भी हुआ कि वर्णविग्रह के आधार पर लोगों ने जीत का  अर्थ विजय तो समझा और इसके साथ अ लगाकर इसे अजेय बनाना चाहा मगर अ+जीत का यह  अर्थ निकला, जो किसी से न जीत सके। जो सदैव परास्त हो। तो इस तरह जित के दीर्घीकरण से जो अजीत सामने आता है उसका अर्थ नकारात्मक है। संभव है अजीत नाम वाले किरदारों के साथ ऐसा न हो। बांग्ला और मराठीभाषी इस नाम का उच्चारण व इस्तेमाल अपेक्षाकृत सही करते हैं।
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Thursday, February 11, 2010

रक्तपात, खूनखराबा और विरक्ति

पिछली कड़ियों-img1090614025_1_1पहले से फौलादी हैं हम…और जब आंख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है....से आगे

सं स्कृत में खून के लिए रक्त के अलावा एक अन्य शब्द है शोण जिसका मूलार्थ है लाल रंग। इसमें लालिमायुक्त गहरे रंग का भाव भी है। सिंदूर, अग्नि, सूर्य, माणिक, मणि अथवा लाल गन्ने को भी शोण कहा जाता है। लाल रंग से जुड़ कर शोण का अर्थ बनता है रक्त, रक्तिम या रक्ताभ। शोण एक नदी का भी नाम है। संभवतः आज की सोन नदी इसका ही अपभ्रंश है। सोनभद्र के लिए प्राचीन संदर्भों में शोणभद्र उल्लेख भी मिलता है। बिहार की राजगृह पहाड़ियों का एक नाम शोणगिरि भी है। शोण से ही बना है शोणित शब्द जिसका अर्थ है रक्त। लाल चंदन को शोणित चंदन कहा जाता है। इसके अलावा शोणित का अर्थ ताम्बा, लाल पत्थर, गुलाल, केसर आदि भी भी होता है। संस्कृत का श वर्ण फारसी में जाकर ख में तब्दील होता है। भाषाविद् आनंद गहलोत के अनुसार इसी शोण का परिवर्तित रूप फारसी में खून हुआ। हालांकि जॉन प्लैट्स के कोश के अनुसार फारसी का खून शब्द अवेस्ता के वोहनिश vohunish या vohuni से बना है। यहां आदिव्यंजन व का लोप हो रहा है और ह ध्वनि ख में बदल रही है। अन्तिम व्यंजन श का भी लोप हो रहा है। तब जाकर वोहनिश से खून बन पाना संभव लगता है। यह व्युत्पत्ति कुछ दुरूह और अव्यावहारिक लगती है। रक्त के अर्थ में वोहनिश शब्द निश्चित ही वह् धातु में निहित बहाव के गुण के आधार पर बना होगा।
शोण से खून शब्द बनने की बात ज्यादा तार्किक लगती है क्योंकि मध्यकालीन फारसी में रक्त के लिए ख़ोन xon शब्द प्रचलित था। नुक़ते वाला ख़ फारसी में रोमन वर्ण x से व्यक्त किया जाता है। विभिन्न संदर्भों के मुताबिक वोहनिश का अर्थ रक्त न होकर रक्त का बहाव है। इसका मूलार्थ है स्रियों का मासिक धर्म। इस तरह देखें तो फारसी के ख़ून का रिश्ता संस्कृत के शोण, शोणित से जुड़ता है न कि वोहनिश से। वैसे डॉ विल्हेम ग्रैगर के मुताबिक vohuni की मूल संस्कृत धातु वस् है। पश्तो से लेकर सुदूर तुर्की तक फैले विशाल क्षेत्र में इस शब्द के विविध रूप देखने को मिलते हैं जैसे बलोची में यह होन है तो कुर्दिश में ख्विन, पश्तो में इसे विन कहते हैं और ज़ज़ाकी में गुन। फारसी में खून का अर्थ रक्त तो होता ही है साथ ही इसका अर्थ हत्या या मौत के घाट उतारना भी होता है। किसी का खून हो गया शब्द में हत्या का ही भाव है। खून शब्द से बने कई मुहावरे हैं जो बरास्ता फारसी, हिन्दी-उर्दू में प्रचलित हैं जैसे खून सफ़ेद होना या ख़ून पानी होना अर्थात सहज मानवीय रिश्तों-भावनाओं का तिरोहित होना। जाहिर है खून का असली गुण गर्मजोशी है। खून जब पानी हो जाएगा तब blood123रिश्तों में ठण्डक तो महसूस होगी ही। यही बात खून के सफेद होने में है। लाल रंग ही उसकी जीवंतता का प्रतीक है। मृतदेह धीरे धीरे सफेद पड़ती जाती है क्योंकि खून पानी बनने लगता है। खून की नदियां बहाना मुहावरा आमतौर पर कत्लेआम या नरसंहार के संदर्भ में प्रयुक्त होता है। इसी तरह मारपीट या हिंसा के लिए खून-खराबा होना मुहावरा है। खून ख़ौलना यानी उत्तेजित होना। बहुत अधिक तंग करने के अर्थ में खून चूसना या खून पीना जैसे मुहावरे प्रचलित हैं। बहुत अधिक परिश्रम और लगन के लिए खून-पसीना एक करना मुहावरा बहुत लोकप्रिय है। अपमान सहने या क्रोध को दबाने के लिए खून का घूंट पीना मुहावरा कहा जाता है।
संस्कृत धातु रंज् [ranj] का मतलब होता है लाल रंग या रंगे जाने योग्य। लाल होना, चमकना, प्रसन्न होना, संतुष्ट होना। अब गौर करें कि चेहरे की चमक आमतौर पर उसके रक्ताभ होने से ही झलकती है और चेहरा तभी चमकेगा जब मन में प्रसन्नता होगी, सो प्राचीनकाल में मुख्य रंग के तौर पर लाल की ही प्रधानता मानी गई। उगते और डूबते सूर्य के रंग भी यही हैं जिनसे प्रकृति की चमक उजागर होती है। खून के लिए हिन्दी में रक्त शब्द प्रचलित है जो रंज् धातु से जन्मा है। यूं रक्त का अर्थ है रंगना, रंगा हुआ होना, लाल रंग का, रंगीन आदि। एक लाल रंग का बीज रक्तिका (Abrus precatorius)कहलाता है। राजस्थानी मालवी में उसे गुंजा भी कहते हैं। यह रक्तिका भार की एक इकाई भी है जिससे सोना चांदी तौली जाती है। बोलचाल की भाषा में इसे रत्ती कहते हैं। पल में रत्ती, पल में माशा जैसी कहावत में यही रत्ती है जिसका अर्थ है घड़ी घड़ी बदलता रवैया। बारीक से बारीक बात का पता रहने के अर्थ में राई-रत्ती का हाल पता होना मुहावरा कहा जाता है।  रक्त में आ उपसर्ग लगने से बनता है आरक्त यानी लालिमा या लाल होना। संसार के Chapter4-2 मोह-बंधन को त्याग कर परिव्राजक हो जाने वाले को विरक्त कहा जाता है जो रक्त में वि उपसर्ग लगने से बना है। गौर करें रक्त में जीवन का उल्लास, लगाव और खुशी का भाव है। वि उपसर्ग का प्रयोग अनुपस्थिति के अर्थ में होता है। यानी जब मनुष्य के मन में नैराश्य घर कर जाता है तब उसे विरक्ति कहा जाता है। किसी के प्रति विशेष अनुराग या जुड़ाव का भाव अनुरक्त शब्द से भलीभांति व्यक्त होता है। खूनखराबा के लिए रक्तपात शब्द भी प्रचलित है। रक्त में जुड़ाव का भाव महत्वपूर्ण है तभी रक्त संबंध जैसा शब्द बना।
रंगरेज को हिन्दी में रजक भी कहते हैं जो इसी कड़ी का शब्द है। रंज् से बने रंगः में रंगने का मसाला, वर्ण, मनोरंजन स्थल, रंगशाला, नाट्यशाला, महावर आदि कई अर्थ शामिल हो गए है। यही रंग फ़ारसी में भी जस का तस मौजूद है और फारसी के प्रत्ययों, उपसर्गों के ज़रिये कई नए शब्द बन गए हैं जितने हिन्दी में भी नहीं बने । इनमें से ज्यादातर आम बोलचाल में प्रचलित हैं मसलन-रंगीन, रंगत, रंगदार, रंगबरंग, रंगरेज, रंगसाज़, रंगारंग, रंगीनमिजाज़, रंगों बू, रंगरोगन वगैरह। रंग शब्द ने कई मुहावरे भी बनाए है जैंसे रंगबाजी, रंगदारी, रंग दिखाना, रंग उड़ना, रंग जमाना, रंग बदलना, रंग में आना, रंगा सियार और रंगे हाथों पकड़ना आदि। रंगत बदलना या चेहरे की रंगत बदलना में खून की भूमिका स्पष्ट है। हर्ष या विषाद के क्षणों में शरीर में रक्त प्रवाह घटता-बढ़ता है जिसे चेहरे के रंग बदलने से साफ समझा जा सकता है। रंज् धातु से ही बना है राग जिसका मतलब भी वर्ण, रंग, लालिमा, अबीर-गुलाल, महावर आदि होता है मगर इसका अर्थ खुशी, आनंद, उल्लास के साथ साथ एकदम विपरीत क्रोध और रोष भी होता है। मराठी में गुस्से के लिए बहुप्रचलित शब्द राग ही है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की विभिन्न स्वरसंगतियों को भी राग ही कहा जाता है राग यानी लगाव के विपरीत अर्थ वाला शब्द है विराग या वैराग्य  जिससे बना है बैराग या बैरागी।

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Wednesday, February 10, 2010

जब आंख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है....

red-rose-side पिछली कड़ी-पहले से फौलादी हैं हम…से आगे

सं स्कृत की लोह् धातु में मूलरूप से लाल रंग का भाव है। वैसे इसका अर्थ है किसी भी किस्म की धातु। धातु अर्थ में भी इसमें ताम्बा का भाव प्रबल है। लोह् से जुड़े लाल रंग के भाव का विश्लेषण करें तो लाल रंग की महिमा नजर आती है। लौह अयस्क जिस मिट्टी से निकलता है वह लाल रंग की होती है। जाहिर है लाल रंग की मिट्टी से लौह अयस्क निकलने की वजह से ही लोह् शब्द का जन्म हुआ जिसका अर्थ लाल रंग है। ताम्बा धातु भी लाल रंग की होती है और प्राचीनकाल से ही इस धातु का ज्ञान मनुष्य को था इसलिए लोह् में ताम्बे का भाव भी है। गौर करे कि खून के लाल रंग में भी लौह तत्व का ही महात्म्य है इसलिए रक्ताल्पता की अवस्था में डॉक्टर खून में लौहतत्व बढ़ानेवाली दवाइयां देते हैं साथ ही हरी सब्जियां खाने की सलाह देते हैं ताकि खून में लोहा घुल सके।
आखिर खून और लोहे में कुछ रिश्तेदारी तो है। यह रिश्तेदारी सिर्फ रंग की वजह से है या कोई और वजह भी है? शब्दों के सफर में तो इस रिश्तेदारी में सिर्फ रंग ही नज़र आ रहा है। संस्कृत की लोह् धातु का रिश्ता रुह् धातु और उससे बने रोह शब्द से है जिनमें आगे बढ़ने, गति करने, विकसित होने के साथ लाल रंग का भाव भी है। ऐसा लगता है रुह् से ही लोह का विकास हुआ है। शरीर में हर तरह की गति सिर्फ रक्त संचार से ही होती है। हृदय से लेकर मस्तिष्क तक में अगर रक्त गति भ्रमण न करे तो शरीर का जीवित रहना असंभव है। पैरों से सिर की ओर रक्त की गति ऊर्ध्वगामी होती है। रोह से ही बने हैं आरोहण, रोहण जैसे शब्द जिनमें चढ़ना, बढ़ना, ऊपर उठना जैसे अर्थ निहित हैं। पर्वतारोहण शब्द से यह उजागर है। राजगद्दी पर बैठने के लिए सिंहासनारोहण में यही रोह धातु नज़र आ
iron ore-1फौलाद शब्द बना है फारसी के पुलाद से जिसका रिश्ता लौह lauha से है। इस शब्द के विभिन्न रूप मध्यएशिया, मध्यपूर्व की भाषाओं में प्रचलित हैं। गौरतलब है कि संस्कृत के लोह धातुमूल में सोना, चांदी, ताम्बा समेत लाल रंग का भाव प्रमुख है…
रही है। रुह् का अगला रूप हुआ रुध् जिसका भारोपीय धातुरूप है reudh जिसमें लाल रंग का भाव है। रक्त के लिए संस्कृत हिन्दी में रुधिर शब्द है जो इसी धातु से बना है। गौर करें अंग्रेजी के रेड red शब्द पर जो इसी मूल से उपजा है जिसका अर्थ लाल रंग होता है। कई यूरोपीय भाषाओं में इसके मिलते जुलते रूपांतर हैं जैसे स्वीडिश में यह रॉड है तो डच में रुड और लिथुआनी में रुडास। गालों पर लाली लाने के लिए लगाए जानेवाले रूज़ शब्द की व्युत्पत्ति भी इसी मूल से हुई है। यहां रुह् में निहित गतिवाचक भाव पर गौर करें तो पाएंगे कि ज्यादा परिश्रम करने से शरीर में रक्त प्रवाह तेज होता है और चेहरा लाल हो जाता है। परिश्रमी व्यक्ति का रंग अक्सर ताम्बई या लाल होता है जो रक्त की वजह से है। रुह धातु से ही बना है रोहित जिसका  अर्थ है लाल, लालरंग का, एक प्रकार का हिरण जिस पर ताम्बई या पीले चित्ते पड़े हों। रोहितम् का अर्थ है केसर, जाफरान या अग्नि। गौर करें ये सभी ताम्बई या लाल आभा से युक्त हैं।
रोहित का अगला रूप होता है लोहित। यहां रोह के लोह में बदलने का तिलिस्म समझ में आ रहा है। रोह के गतिवाचक भाव ने लोह धातु में सिर्फ लाल रंग से रिश्ता रखा। लोहित का अर्थ भी लाल ही होता है। इसके अन्य अर्थ हैं- ताम्बा, मंगल ग्रह, रुधिर, जाफ़रान, केसर आदि। लाल चावल को भी लोहित कहते हैं। असम की प्रसिद्ध नदी ब्रह्मपुत्र का एक नाम लोहित भी है क्योंकि लगातार पहाड़ों से बह कर आते पानी की वजह से उसका रंग धूसर, मटमैला रहता है। एक शब्द है नीललोहित जिसका अर्थ है गहरे लाल रंग का। लाल रंग के अर्थ में ताम्बई, सुनहरी और पीतवर्ण का समावेश लोह शब्द में निहित है। आमतौर पर फारसी का समझा जानेवाला लहू शब्द भी लोह मूल से ही उपजा है। रक्त के विकल्प में खून और लहू दोनों ही खूब इस्तेमाल होते हैं। लहू शब्द का प्रयोग शायरी और मुहावरों में खूब हुआ है। ग़ालिब के एक शेर का प्रसिद्ध मिसरा है-जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। जाहिर है, कठोर वर्णों की तुलना में कोमल वर्णों का चयन करनेवाले फारसी के खास चरित्र को अपनानेवाली हिन्दुस्तानी से उपजी उर्दू ने रक्त की बजाय लहू को कहीं आसानी से अपनाया। इससे बने कुछ मुहावरे जैसे लहू-लूहान होना यानी ज़ख्मी होना, लहू का प्यासा iron_ore_1होना, आंख से लहू टपकना यानी उद्दाम आवेग में आंखे लाल होना, लहू पीना यानी किसी को बहुत ज्यादा कष्ट देना या लहू का पानी होना यानी किसी की गैरत का मर जाना या स्वाभिमान गंवाना आदि। हिन्दी में लहू के एक रूप लोहू भी है जो लोह यानी लोहा के अधिक नज़दीक है।
लोहे का जिक्र हो तब लोहे में लगने वाले ज़ंग का उल्लेख भी ज़रूरी है। अंग्रेजी में इसे रस्ट rust कहते हैं जो इसी मूल से उपजा है। रस्ट का अर्थ होता है लाल या लाल रंग। इसका प्रयोग लोहे की ऊपरी सतह पर नमी के चलते जमने वाली लाल रंग की परत के संदर्भ में होना शुरू हुआ। अंग्रेजी में यह प्राचीन जर्मनिक के rudu से आया। भारोपीय धातु reudh से यूरोपीय भाषाओं में रेड यानी लालरंग समेत कई शब्द बने जिसका एक रूप पुरानी अंग्रेजी का rusta भी था जिसने अंग्रेजी में रस्ट का रूप लिया। -जारी

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Tuesday, February 9, 2010

हुजूर, अंगूर नहीं, खट्टे हैं खजूर…

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इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया की हर भाषा में शब्दों का कारवां सचमुच सौदागरों ने ही आगे बढ़ाया। ये सौदागर ही थे जो लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दूर-दराज़ देशों से जोखिम उठाकर माल असबाब लाया करते। इनके जरिये ही लोग दुनिया जहान की चीज़ों, बोलियों और रीति-रिवाज़ों से परिचित होते। खाने-पीने की कितनी ही वस्तुओं के नाम आज दुनियाभर में मशहूर हैं वे इन्ही सौदागरों की वजह से है। सौदागरों में सबसे मशहूर हुए हैं अरब के सौदागर क्योंकि समुद्री यात्राओं में इनके जैसा पूरे एशिया में कोई ओर नहीं था। पश्चिमी दुनिया को भारतीय मसालों से परिचित कराने का श्रेय इन्हीं अरब सौदागरों को जाता है। हालांकि तब अरब का क्षेत्र अरब नाम से नहीं जाना जाता था। आज से चार हजार साल पहले से यूरोप और पूर्वी एशिया में सामुद्रिक मार्ग से व्यापारिक रिश्ता कायम था। फोनेशियाई लोग इसमें माहिर थे। अरबी संस्कृति में जो कुछ भी आज पूर्वी एशियाई असर है उसमें इन फोनेशियाई व्यापारियों का भी योगदान है।
भारतीय खान-पान की एक खासियत उसका खट्टा-मीठा-चरपरा होना है। उत्तर की ओर जहां तीखा-चरपरा स्वाद बढ़ता जाता है वहीं दक्षिण की ओर बढ़ते हुए उसमें खटास की मात्रा बढ़ने लगती है। खटाई के लिए प्राचीनकाल से भारत में इमली का प्रयोग होता है। इमली में खट्टापन होता है इसीलिए इसका नामकरण इमली हुआ। यूं नामकरण के आधार पर इमली को आँवले की बहन कहना चाहिए। संस्कृत में इमली को अम्लिका कहते हैं जो अम्ल से बना शब्द है। अम्ल का अर्थ होता है खट्टा, तिक्त स्वादयुक्त। अम्ल शब्द बना है संस्कृत धातु अम् से जिसमें शीघ्रता का भाव है। अम् का एक अन्य अर्थ होता है कच्चापन। गौर करें जितने भी मीठेफल होते हैं वे अपनी कच्ची अवस्था में खट्टे, तीते या कड़ुए स्वाद वाले ही होते हैं। आम के कच्चे रूप को देसी ज़बान में अमियां ही कहते हैं जिसमें से कच्चापन झांक रहा है। कच्चापन एक किस्म की खटास पैदा tamarind_tree_fruits_6करता है जो जीभ को तो सुहाती है मगर व्यवहार को नहीं। मन तभी खट्टा होता है जब किसी का बर्ताव बुरा लगे। किसी का व्यवहार तभी बुरा लगता है जब उसमें परिपक्वता न होकर कच्चापन हो। इस कच्चेपन में शीघ्रता या जल्दबाजी झांक रही है। कच्चाफल खाना एक किस्म की जल्दबाजी ही है, क्योंकि फल के पकने तक  इंतजार नहीं करना चाहते। जल्दबाजी में कच्चापन हाथ आता है। कच्ची या अधपकी चीज़ से हमेशा नुकसान होता है। इसीलिए कहते हैं कि सहज पके सो मीठा होय। इमली के खट्टेपन के पीछे इमली का कच्चापन नहीं बल्कि अम् धातु में निहित कच्चेपन का अर्थ है। इमली तो पकने के बाद भी खट्टी ही होती है और कच्ची भी खट्टी ही होती है। खटास के लिए भी अम्ल शब्द का ही प्रयोग होता है। एसिड यानी अम्ल। इसी अम्ल से बना है आमलकः जिसका देशज रूप हुआ आँवला। इसी तरह आम का मूल भी यही अम् धात है। हमारे यहां जितना लोकप्रिय आम है उससे ज्यादा मशहूर इससे बना मसाला अमचूर (आम्रचूर्ण)है।  प्रसंगवश बताते चलें कि हिन्दी में खट्टा, खटास जैसे शब्द संस्कृत के कटु से बने हैं जिसका अर्थ होता है तेज़, तीखा, तिक्त, कड़ुआ, आम्लिक, तेज़ गंधयुक्त आदि। खट्टापन भी तीक्ष्ण असरवाला होता है इसलिए तिक्त के अर्थ में कटु शब्द इसके लिए प्रचलित था। बाद में लोकमानस ने खट्टे के अर्थ में कटु से ही खट्टा शब्द बनाया और कड़ुआ शब्द भी इसी कटु से बना लिया।
गौरतलब है इमली, आँवला और अमचूर का शुमार भी भारतीय मसालों में होता रहा है। अरब व्यापारी जब भारत आए तो सबसे पहले दक्षिण-पश्चिमी तटवर्ती इलाकों में ही उनके जहाजों ने लंगर डाला था। बाद में गुजरात तट से भी उनका कारोबार चलने लगा। मज़े की बात यह कि पश्चिमी दुनिया को इमली की खटास से परिचित कराने का काम इन्हीं अरब सौदागरों ने किया। अरबों ने दक्षिण भारत में जब रसम का स्वाद चखा तो वे इसकी खटाई के शैदाई बन गए। वैसे राजस्थान में इमली को आमली कहते है और उससे बनने वाला रसीला पेय अमलाना कहलाता है जो लू का रामबाण इलाज है। इसमें गुड पड़ता है। बहरहाल, जब अरबों को इमली की जानकारी मिली तब उनकी कारोबारी बुद्धि सक्रिय हुई। उन्हें लगा कि निश्चित ही भोजन को और ज़ायकेदार बनाने में इमली बेहद ज़रूरी पदार्थ है और वे पश्चिमी दुनिया को इससे परिचित कराने के बारे में सोचने लगे। यहां समस्या थी कि इमली को अरब में क्या कह कर बेचा जाए। आखिर इमली नाम से वहां इसे कौन खरीदेगा? या इसका निहितार्थ उन्हें कितना समझ में आएगा। व्यापारी के पास हर समस्या का इलाज होता है। अरबों ने पाया कि इमली का रंग और आकार बहुत कुछ सूखे हुए खजूर कि कुछ किस्मों से मिलता-जुलता था। सो उन्होंने इसे तमर ऐ हिन्द कहा अर्थात हिन्दुस्तानी खजूर। उन्हें पता था कि अरब में खजूर सबसे लोकप्रिय फल है। इसी नाम का प्रयोग किसी अन्य देश से आए फल के लिए करने से उसकी लोकप्रियता भी बढ़ने की संभावना थी। यही हुआ। तमर ए हिन्द tamar e hind या तम्र उल हिन्द tamr-ul Hind अरब में मशहूर हो गई। बाद में अरब सौदागरों ने इसे भूमध्यसागरीय व्यापार के जरिये यूरोप तक पहुंचा दिया।
ध्यान दें कि अरब में खजूर को तम्र कहा जाता है। उर्दू-फारसी में इसका रूप तमर हो जाता है। मद्दाह के कोश में देखें तो तमर शब्द का अर्थ सूखा हुआ खजूर मिलेगा जबकि उसके नीचे ही तमर-हिन्दी शब्द मिलेगा जिसके आगे उसका अर्थ इमली लिखा गया है। भाषाविज्ञानी तम्र को सेमिटिक मूल का शब्द मानते हैं। कोशो में खजूर के अर्थ में तम्र का उद्गम हिब्रू के तमर tamar से बताया जाता है जिसका अर्थ एक किस्म का ताड़ का वृक्ष ही है। मुझे लगता है हिब्रू तम्र और अरबी तमर जैसे शब्द भी भारतीय मूल से उपजे हैं और हजारों वर्ष पूर्व फोनेशियाईयों की व्यापारिक गतिविधियों का हिस्सा बनते हुए सामी भाषाओं में दाखिल हुए। संस्कृत में ताड़ प्रजाति का एक प्रसिद्ध वृक्ष है तमाल जिसका साहित्य से लेकर आयुर्वेद तक उल्लेख है। “तरणि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए” जैसे पद्य में अनुप्रास  की छटा के साथ तमाल की छाया भी साफ दिख रही है। तमाल का अर्थ होता है जो काली छाल वाला हो। तमाल की एक किस्म से तेजपत्र होते हैं जिसका शुमार भी भारतीय मसालों में होता है। तेजपत्ता या तेजपान को तमालपत्र भी कहा जाता है। संस्कृत में तम् धातु में कालापन या अंधेरे का भाव है। यह तमाल ही हिब्रू का तम्र और अरबी का तमर है। यह आश्यचर्यजनक है कि एक palm भारतीय फलदार वृक्ष के नाम पर सुदूर पश्चिम एशिया में उगनेवाले उसी जाति समूह के एक अन्य वृक्ष, जिस पर खजूर उगते हैं, का नामकरण हुआ। फिर सुदूर पश्चिम से व्यापारी आते हैं और इमली की सादृश्यता तम्र से जोड़ते हैं जो मूलतः भारतीय आधार से उठा शब्द है। फिर इमली तमर-उल-हिन्द बनकर अरब पहुंची। वहां से स्पेन होते हुए यह ब्रिटेन पहुंची और इसका रूपांतर तब तक टैमरिंड tamarind (tamar-ind) अर्थात इमली हो चुका था।
प्रसंगवश बताते चलें कि महाराष्ट्र में इमली का प्रयोग खूब होता है। हालांकि वहां खानपान में खटास के लिए कोकम का प्रयोग भी किया जाता है। इमली और कोकम दोनों का शर्बत भी प्रसिद्ध है। मराठी में इमली को चिंच कहते हैं। संस्कृत में एक शब्द है चिञ्चा जिसका मतलब होता है इमली का पेड़ या उसका फल। मराठी में भी इमली का शुद्ध रूप चिञ्च ही है। मगर मराठी व्युत्पत्ति कोश में कृ.पा. कुलकर्णी इस शब्द को द्रविड़ मूल का मानते हैं और फिर उसका संस्कृत में प्रवेश हुआ बताते हैं। संस्कृत में तिन्तिड़िका, तिन्तिड़ी या तिंतिलिका एक वृक्ष का नाम है जिसका अर्थ है इमली का पेड़। भाषाविज्ञानियों का कहना है कि द्रविड़ चिञ्चा का चेहरा चिञ्चिणी,तित्तिंणी में बदला फिर इस शब्द का संस्कृत रूपांतर बतौर तिन्तिड़िका, तिन्तिड़ी या तिंतिलिका में हुआ होगा। छत्तीसगढ़ के  बस्तर में इमली को तितिर कहते हैं और बंगाल में इमली को तेंतुली कहते हैं जो इसके द्रविड़ मूल से होने की पुष्टि करते हैं। एक खास बात और। मालवा में एक खेल खेलते हैं अष्टा, चंगा, पो। यह चौपड़ की तरह होता है और मोहरों से खेला जाता है। पासे के रूप में  इसमें इमली के बीज के दोनो हिस्सों से गणना की जाती है जिसे चिंयाँ कहते हैं। यह माना जा सकता है कि मालवी में इमली के बीजों को चिंयाँ कहा जाता है जो मूलतः चिंञ्चा का ही देशज रूप है। 
पुछल्ला-भोपाल का एक पॉश इलाका है चार इमली जहां अधिकांश भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहते हैं। चार इमली से ऐसा लगता है जैसे यहां इमलियों के चार पेड़ हों। दरअसल एक सदी से भी पहले किसी वक्त यहां इमली के पेड़ों की बहुतायत थी जहां चोर आकर छुपते थे या अपना माल छुपाते थे। इसीलिए आसपास के इलाके में इसे चोर इमली कहा जाने लगा। बाद में चोर से समानता न बैठा पाने की वजह से इसे चार इमली कहा जाने लगा। शायद इसके पीछे यह वजह भी रही हो कि आला अफ़सर चोर इमली मं बसते अच्छे नहीं लगते। लोग पता नहीं क्या क्या मायने निकालते।

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Sunday, February 7, 2010

विश्व पुस्तक मेला में मित्रों से मिलना

Cover1राजकमल से छपेगा शब्दों का सफर

बी ते तीन दिनों से हम शब्दों का सफर से छुट्टी पर थे। नेशनल बुक ट्रस्ट के द्विवार्षिक आयोजन विश्वपुस्तक मेला देखने की बड़ी इच्छा थी। दिल्ली में रहते हुए भी इसे देखने का कभी योग नहीं बना। इस बार एक खास वजह से इस आयोजन में शरीक होने का सुयोग बन गया। बीते दो साल से सफर के साथियों का आग्रह था कि इसे पुस्तकाकार आना चाहिए। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग और राजकमल प्रकाशन से इसके लिए हमने सम्पर्क किया था और खुशी की बात है की दोनों ने ही इसमें रुचि दिखाई थी। दोनो ही प्रकाशनों का हिन्दी किताबों की दुनिया में एक नाम है, मगर किताब का प्रकाशन तो किसी एक जगह से ही होना था, सो राजकमल को किताब देने का फैसला किया गया। उम्मीद है मई जून तक किताब का पहला खण्ड बाजार में आ जाएगा। इससे जुड़ी औपचारिकताओं के संदर्भ में दिल्ली आना था सो इसी अवसर पर पुस्तक मेला घूमने-फिरने का भी मन था। अपने काम से जुड़ी कई पुस्तकों को एक ही जगह तलाशने की सुविधा और उनके मिलने की आशा भी थी। कई मित्रों से मिलने का कार्यक्रम भी बन गया और वे पुस्तक मेले में ही पंहुचे। दिल्ली अमर उजाला में डिप्टी एडिटर पंकज मुकाती सबसे पहले मिलने पहुंचे, मगर उनसे पहले मुलाकात हो गई कवि ब्लागर अविनाश वाचस्पति और पवन चंदन से। अविनाश जी से तो यह दूसरी मुलाकात थी, मगर पवन चंदन से पहली बार मिलना हुआ। इनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। फिर आए पंकज मुकाती। पंकज हमारे बहुत स्नेही-लाड़ले दोस्त हैं। पवन चंदन और अविनाशजी ने कुछ तस्वीरें इस मौके पर लीं। अविनाशजी ने बताया कि कविता वाचक्नवी भी कुछ देर में आएंगी। हम और पंकज पत्रकारिता की दुनिया के हालचाल साझा करने के लिए इन दोनों से इजाज़त लेकर कुछ देर को अलग हो गए।
दिल्ली पुस्तक मेला से मैं कतई प्रभावित नहीं हुआ। मैं हिन्दी का पाठक हूं और लगातार दुर्लभ और मूल्यवान प्रकाशनों की खोज में रहता हूं।
baba tanu 043 baba tanu 048 baba tanu 052 सबसे ऊपर दाएं से अभय, मनीषा, स्वधा, नीलाभ और एक अन्य साथी। नीचे अविनाश वाचस्पति के साथ पंकज। सबसे नीचे पवन चंदन। IMG_1664   aap     
ऐसे आयोजनों में प्रकाशकों को भी सुविधा रहती है कि वे बहुप्रतीक्षित पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन कर सकें और पुराना स्टाक भी खपा सकें। मेरे पास हिन्दी-मराठी के करीब तीस ग्रंथों की सूची थी। बड़ा अजीब लगा कि चाही गई पुस्तकों में मुझे मराठी भाषा की तीन पुस्तकें मिलीं, मगर हिन्दी के अधिकांश ग्रंथ अनुपलब्ध ही रहे। दो ऐसी पु्स्तकें जरूर मुझे काम की मिलीं जो मेरी सूची में नहीं थी। एक सांस्कृतिक प्रतीक कोश और दूसरी केंद्रीय हिन्दी संस्थान की उर्दू परिचय कोश। किताबों का बोझा संभालते हम थक चले थे अभय भाई का कहीं अता-पता न था। पंकज को अखबार के दफ्तर पहुंचना था क्योंकि साढ़े चार बज चुके थे। हमने वापसी का फैसला किया और मेट्रो स्टेशन पहुंच गए। तभी अभय का फोन आया कि वे 12 नंबर स्टाल पहुंच गए हैं। पंकज को विदा कर हम फिर भारी क़दमों से लौटे मगर अभय से मिल कर सारी थकान दूर हो गई। अभय ने aaइलाहाबाद से आए नीलाभ जी से परिचय कराया और शब्दों का सफर के बारे में उन्हें जानकारी दी। यह सुखद संयोग था कि जिन अभय ने शब्दों का सफर को हिन्दी ब्लाग-जगत से सबसे पहले भलीभांति परिचित कराया, उसके पुस्तकाकार आयोजन का पुख्ता आधार जिस दिन रखा गया, वे हमारे साथ थे और उनसे रूबरू होने का वह पहला अवसर था। तभी गीत चतुर्वेदी, मनीषा पांडे नमूदार हुए। एक प्यारी सी नन्हीं-मुन्नी भी उनके बीच चहक रही थी। पता चला कि गीत की बिटिया स्वधा हैं, पापा के साथ अकेली चली आईं। मनीषा से खूब हिली हुई थीं। सबके किरदारों को अपने अंदाज़ में पहचान कर उसके साथ एक टैग लगवाने का शग़ल चल रहा था। बिटिया ने अभय को हैडमास्टर का खिताब दिया और हमारे किरदार की शिनाख्त डस्टबिन के रूप में की। गीत बेटी से नाराज हो गए। हमने कहा कि हमें यह नाम अच्छा लगा है। हालीवुड का एक किरदार है मि.बीन्स। खूब हंसाता है। हम भी डस्टबिन बनकर  खुश हैं।
अभय, नीलाभ से बातें हो रही थीं कि और चोखेरबाली समूह की ब्लागर सुजाता के साथ अन्य सदस्य यानीमसिजीवी, राजकिशोर  और  प्रकाशन विभाग की संपादक  आर.अनुराधा  आ गए। कुछ देर में डॉ वेदप्रताप वैदिक भी आ पहुंचे। साढ़े छह बज चुके थे और अभय को गोरखपुर के लिए शाम साढ़े सात की ट्रेन पकड़नी थी जहां आठ को उनकी फिल्म का प्रदर्शन था। मनीषा और गीत को भी रात नौ की ट्रेन से भोपाल लौटना था। सबने विदा ली। हमने वहीं अनुराधाजी को यह सूचना दी कि शब्दों का सफर का प्रकाशन राजकमल से होना तय किया है। शब्दों का सफर प्रकाशन विभाग से निकले यह हमारी भी इच्छा थी। अनुराधाजी यह जानकर कुछ नाराज भी हुईं, हमें भी बुरा लग रहा था। पर क्या किया जा सकता था। उसे छपना तो किसी एक संस्थान से ही था। अनुराधाजी ने इस दौरान बहुत सहयोग किया। हम उनके आभारी हैं।  निश्चित ही आगे उनके लिए काम करने का योग बनेगा। टीवी के दिनों के साथी पत्रकार समरेन्द्र भी वहां मिले। प्रगति मैदान से इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग तक हम, मनीषा और नन्ही स्वधा पैदल मार्च करते हुए आए। यहां हम नवभारत टाईम्स में चंदूभाई से मिलने चले गए और गीत मनीषा भोपाल के लिए रवाना हो गए। चंदूभाई के साथ ही हम आटो से वैशाली तक आए। कुछ देर हमारे घर चंदूभाई गपियाए। छह फरवरी को कुछ अन्य लोगों से मिलने का मंसूबा बांधे इस तरह पांच फरवरी का दिन तमाम किया मगर अगले दिन किसी से मिलना हो नहीं पाया। नोएडा में मोबाईल सिग्नल की समस्या रही। अजय झा, खुशदीप सहगल से फोन करते रहे पर सम्पर्क नहीं हुआ। प्रतिभावान गायक-पत्रकार गिरिजेश सुबह मिलने आ गए थे। स्टार न्यूज के ज़माने की यादें साझा की। हर्षवर्धन त्रिपाठी से भी मिलना तय था पर गिरिजेश ने बताया कि उन्हें अचानक उत्तराखण्ड जाना पड़ा।  रवि पाराशर, आलोक शर्मा, अजित अंजुम, मुनीष, अशोक पांडे, दिलीप मंडल, प्रत्यक्षा सहित नभाटा के दफ्तर जाकर भी कई साथियों से मिलना न हुआ। शकील अख्तर और अरुण दीक्षित से चलती सी मुलाकात हुई। छह की शाम हम भी भोपाल के लिए रवाना हो गए।

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कोई वाकौ देवांग कहै है…

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भी देवांग नाम के कपड़े  tafataका नाम सुना है? आज जिसे हम टेपेस्ट्री के नाम से जानते हैं, किसी ज़माने में उसका नाम देवांग था। रेशम से मिलती-जुलती किस्म के एक चमकदार कपड़े को ताफता कहते हैं। यह धूपछांही भी कहलाता है क्योंकि इसका ताना एक रंग का होता है और बाना दूसरे रंग का। रोशनी के विविध आयामों के साथ यह रंग बदलता है। यह भी इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है और भारतीय भाषाओं में इसकी आमद बरास्ता फारसी हुई है। मध्यकालीन शृंगार रस के कवि बिहारी के प्रसिद्ध दोहे में इसका प्रयोग देखिए- छुटि न सिसुता की झलक, झलक्यो जोबन अंग। दीपति देह दुहुन मिली, दिपत ताफता रंग।। वयः संधि के तथ्य को धूपछांही ताफता रंग के जरिये बहुत खूबी से समझाया है। ताफता का एक अन्य नाम देवांग भी है। हालांकि हिन्दी में यह अप्रचलित है किन्तु बिहारी पर लिखी प्रसिद्ध हरिप्रकाश टीका में ताफता के संदर्भ में देवांग शब्द का उल्लेख भी है। ख्यात समालोचक पं पद्मसिंह शर्मा ने संजीवन भाष्य में इसे उद्धरित किया है।  इसके चमक-दमक वाले गुण की वजह से इसे देवांग यानी देवताओं की प्रकाशमान, कांतिवान काया समान चमकदार कपड़ा कहा गया है। फारसी का ताफ्तः (ताफ्ताह) हिन्दी में आकर ताफता हुआ। यही शब्द अंग्रेजी में जाकर टाफेटा taffeta हुआ।
मोटे कपड़े या पर्दों को अंग्रेजी में टेपेस्ट्री कहते हैं जिसका मूल भी यही ताफ्तः है जिसके मूल में ताफ्तान  है।  इसमें चमक, प्रकाश या कांति का भाव है। यह ताब का पू्र्व रूप है जिसका अर्थ भी दीप्ति या प्रकाश है।  ताब की रिश्तेदारी संस्कृत की तप् धातु से बने तपः से है जिसका अर्थ गरमी, दाह, प्रज्जवलन आदि है। अग्नि में दीप्ति समाई हुई है इसलिए तपः में चमक, प्रकाश या रोशनी का भाव भी है। फारसी का ताब इसी का रूपांतर है जिसमें गरमी, आभा, चमक, मज़ाल, हिम्मत और सामर्थ्य जैसे भाव हैं। हिन्दी का कठिन परिश्रम के लिए तप शब्द भी इसी मूल का है। कठिन साधना करने की वजह से ही परिव्राजक को तपस्वी कहा जाता था। श्रम से उपजे स्वेदकणों में भी चमक का भाव है। परिश्रम से व्यक्तित्व अनुभव की आभा से दमकता है। तपस्वी को ही ऋषि का दर्जा मिलता है। तपना, तपाना, ताप जैसे शब्द इसी मूल से आ रहे हैं। फारसी में खाना पकाने के बर्तन, देग या हांडी को तबाक भी कहते हैं। जाहिर है इसे आग पर रखा जाता है ताप के जरिये इसमें भोजन पकाते हैं इसीलिए इसे तबाक कहते हैं। तवा भी इसी मूल से आ रहा है। तबाक का हिन्दी में देशज रूप तबकड़ी है। स्पष्ट है कि टाफेटा, टेपेस्ट्री, ताफता या ताफ्तः जैसे शब्द जो एक खास किस्म के कपड़े के लिए इस्तेमाल होते हैं जिनका इस्तेमाल रोशनदान, दरवाजे के पर्दे के लिए होता है ताकि खिड़की या दरवाजा खुला रहने पर भी परदे के जरिये भीतर की निजता सुरक्षित रहे मगर रोशनी भी अवरुद्ध न हो, इसलिए इस कपड़े में धूपछांही चमक की खासियत होती थी जो इसके विशिष्ट तानेबाने से आती थी। ये तमाम शब्द मूलतः संस्कृत के तपः से आ रहे हैं जिसमें चमक का भाव है।
प्राचीनकाल में प्रचलित एक प्रसिद्ध कपड़े किमख्वाब का रिश्ता भी चीनी भाषा से जुड़ता है। किमख़्वाब एक बेहद कीमती कपड़ा है जिसे रेशम और स्वर्णतन्तुओं से बुना जाता है। यह शब्द चीनी, जापानी, अरबी, तुर्की, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी और हिन्दी में समान रूप से जाना जाता है। पश्चिम में इसे किन्कॉब kincob कहा जाता है जिसके मायने हैं स्वर्णनिर्मित कपड़ा। चीनी में इसे किनहुआ, फारसी में किमख्वा और हिन्दी में किमख्वाब कहा जाता है। मूलतः यह चीनी भाषा से ही अन्य W-3983-Blueभाषाओं में गया है। चीनी में किन का अर्थ है स्वर्ण और हुआ का अर्थ होता है पुष्प। भाव है स्वर्णतन्तुओं की फुलकारी वाला वस्त्र अथवा स्वर्णतन्तुओं से निर्मित फूलो जैसे नर्म एहसास वाला महीन वस्त्र। शुक्ला दास की फैब्रिक आर्टः हैरिटेज आफ इंडिया में बताया गया है कि जापान में किमख्वाब को चिनरेन कहते हैं जो वहां चीनी भाषा से ही गया है। एक अन्य व्युत्पत्ति के अनुसार यह चीनी और इंडो-ईरानी मूल से बना शब्द युग्म है। किमख्वाब में स्वर्ण के अर्थ में चीनी मूल का किन् शब्द ही है मगर खुवाब (xuwab) का रिश्ता इंडो-ईरानी परिवार से है। संस्कृत का एक शब्द है स्वपस् जो स्व+अपस्(मोनियर विलियम्स) से मिलकर बना है जिसका अर्थ है करना, बहुत अच्छा करना, कुशलता से करना आदि।  स्वपस् का अगला रूप हुआ अवेस्ता का ह्वपः (hvapah)। गौर करें संस्कृत का स अवेस्ता में जाकर ह में तब्दील हो रहा है। इसका फारसी रूप हुआ खाब या खूब (xuwab) अर्थात प्रवीणता के साथ किया कार्य, महीन, बारीक काम, कलाकर्म जिसमें दस्तकारी का काम भी शामिल हो। सोने की कारीगरी वाले कपड़े के तौर पर किमख्वाब का अर्थ यहां स्पष्ट है।
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