Wednesday, December 14, 2011

जिगरी का गुर्दा और कलेजा

पिछली कड़ियाँ1.आखिर क्या है ये ‘सौहार्द्र’2.दिलो-दिमाग़ की बातें hearts

दि ल की बात निराली होती है, पर किसी ने सोचा नहीं होगा कि इतनी निराली होगी जहाँ जिगर दिल से ज़्यादा मज़बूत नज़र आएगा। गुर्दा भी दिल हो जाएगा और कलेजा भी दिल कहलाने लगेगा। मगर सच यही है कि हृदय को दिल तो कहा ही जाता है साथ ही कलेजा और जिगर भी इसके ही नाम है। पिछली कड़ी में स्पष्ट हुआ कि हृदय से ही दिल बना है। सवाल उठता है कि कलेजा और जिगर कहाँ से आए और क्यों दिल के पर्याय बन गए। मुझे लगता है मूलतः यह लोक-अभिव्यक्ति है। दिल के लिए वृक्क (किडनी) और यकृत ( लिवर ) जैसे महत्वपूर्ण शरीरांगों को क्रमश जिगर और कलेजा कहना सामान्य बात नहीं है। एक खास चीज़ के लिए कई सारी उपमाएँ या पर्याय तभी सामने आते हैं जबकि उसके ज़रिये कई तरह की अभिव्यक्तियाँ होती हों। चिन्तन-पीठ के स्तर पर दिल और दिमाग़ एक मुकाम पर खड़े नज़र आते हैं। यह अलग बात है कि दुनियावी मामलों में दिल की सोच को, दिमाग़ की सोच से कम तरज़ीह दी गई है, बावजूद इसके दिल के बाकी जितने भी पर्याय हैं वे सोचने का काम नहीं करते। उनका ज़िक्र जिस्मानी हिस्से या शारीरिक अवयव की तरह ही होता है।
बसे पहले दिल-गुर्दा की बात। इस शब्दयुग्म में भी मुहावरेदार अर्थत्ता है जिसका अर्थ होता है, शक्ति, सामर्थ्य और हिम्मत। मिसाल के तौर पर देखे-आसमान से छलाँग लगाना आसान नहीं, दिल-गुर्दे का काम है। अब यह गुर्दा शब्द सीधे सीधे दिल का पर्याय तो नहीं, पर दिल के साथ इसे अक्सर जोड़ा जाता है। खून को साफ़ रखने का काम करने वाले हिस्से के लिए हिन्दी में किडनी kidney या गुर्दा बेहद आम शब्द हैं। इसे संस्कृत में एक शब्द है वृक्क जिसका अर्थ है हृदय और गुर्दा। टर्नर के मुताबिक वृक्क शब्द में आंत, गुर्दा, हृदय, फेंफड़े जैसे सभी आन्तरिक अंगों की अभिव्यक्ति होती है। हृदय और गुर्दा शब्द के आदिमूल के साथ हृदय शब्द चस्पा था, इसीलिए बाद के दौर में जिगर या कलेजा जैसे भीतरी हिस्सों के साथ भी हृदय का अर्थ जुड़ता चला गया। वृक्क का अवेस्ताई रूप है वेरेत्का या वेरेद्त्का जिससे इसका पहलवी रूप प्राप्त होता है गुर्तक। फ़ारसी के उत्तरी सीमान्त क्षेत्रों में इसका गुर्दा रूप प्रचलित हुआ। हिन्दी में एक मुहावरा है-बुक्का फाड़ कर रोना। आमतौर पर यह माना जाता है कि वृक्क का अपभ्रंश बुक्का है। मगर  वृक्क का एक रूप वृक्का भी है और बुक्का human-organsभी इसी वृक्क से आ रहा है। अमरकोश के मनुष्य वर्ग के चौंसठवें श्लोक में “बुक्काग्रमांसं” में वृक्क का बुक्का रूप बनता दिख रहा है। टर्नर के कोश के मुताबिक पाली में यह वक्का है, सिन्धी में यह बोक्का है, जिप्सी-रोमानी और जिप्सी-ग्रीक में यह बुको है तो कुर्द में यह जुकुरा है। बहरहाल हिन्दी में बुक्का का अर्थ हृदय है। यह मूलतः संस्कृत रूप बुक्क से आया है। हृदय को चीर कर निकलते रूदन के लिए बुक्का फाड़कर रोना जैसा मुहावरा प्रचलित हुआ।
हिन्दी में दिल या हृदय के लिए कलेजा शब्द भी खूब प्रचलित है मगर इनके अर्थ-प्रयोगों में पर्याप्त भिन्नता है। जैसा कि ऊपर कह आए हैं, कलेजा सोचने का काम नहीं करता। दिल चुराया जाता है, कलेजा नहीं।  अलबत्ता दिल चीरने की तर्ज पर कलेजा चीरने की बातें भी हैं। कोई अपना, सगा सा अगर दिल का टुकड़ा है तो उसी तर्ज़ पर कलेजे का भी टुकड़ा होता है। हाँ, मांसाहारी लोग कलेजे के टुकड़े को कलेजी कह कर उदरस्थ कर लेते हैं। दिल के टुकड़े को दिली-चीज़  नहीं कहा जाता। कलेजा यूँ तो दिल का ही नाम है मगर इसका अर्थ लीवर भी होता है। लीवर जिसे संस्कृत में यकृत कहते हैं। कलेजा बना है संस्कृत के कालेयम् से। गहरे लाल या कालिमा की हद तक लाल रंग के इस अवयव को अपने वर्ण की वजह से ही यह नाम मिला होगा।  इंडो-ईरानी भाषाओं में का रूपान्तर अक्सर में होता है जैसे यश्न का जश्न रूप। यव् से जौ का बनना। कालेयम् का कलेजा में रूपान्तर समझना बहुत आसान है। प्राकृत में इसका रूप कलिया होता है। लहँदा, पंजाबी, हिन्दी, बांग्ला में यह कलेजा है। नेपाली में यह कलेजो, असमी में कॉलिजा है, अवधी में यह करेजा, करेजो, करेजू, करेजवा है। सिन्धी-कच्छी रूप करजो है। हिन्दी के लोकगीतों में कलेजा का करेजा, करेजवा जैसे रूप ही देखने को मिलते हैं जिनका अभिप्राय लीवर से नहीं बल्कि हृदय से होता है। दिल, जिगर सम्बन्धी ज्यादातर मुहावरे कलेजे के सन्दर्भ में भी प्रयोग होते हैं जैसे कलेजा फुँकना, कलेजा जलना, कलेजा निकाल कर रखना आदि।
ब खबर लेते हैं जिगर की। एक मशहूर शायर हुए हैं जिगर मुरादाबादी। ज़ाहिर सी बात है कि जिगर में अगर महज़ लिवर ही होता तो वे अपना तख़ल्लुस जिगर कतई न रखते। दिल में जो बात है, वो कुछ खास है। जिगर, कलेजा, गुर्दा इसलिए खास नहीं क्योंकि वे सिर्फ़ दिल नहीं, कुछ और भी हैं। बहरहाल दिल वाले तमाम मुहावरे जिगर पर भी फिट बैठते हैं। बस, जिगर चुराया नहीं, दिखाया जाता है और दिल चुराया भी जाता है, दिखाया भी जाता है। जिगर दिखाना यानी शौर्य का प्रबन्ध करना। शौर्य के सन्दर्भ में दिल के साथ जब गुर्दा जुड़ता है तब जिगर वाली बात पैदा होती है। जिगर, लिवर और संस्कृत का यकृत सगे भाई हैं यानी आदि भारोपीय भाषा से जन्मे हैं। के में तब्दील होने के नियम को याद रखा जानाचाहिए। यकृत के रूप अवेस्ता में याकर, यकारा होता है तो सुदूर लैटिन में यह जेकुर है। पहलवी में यह जकार और फिर जगार हुआ। इसके बाद फ़ारसी में यह जिगर हुआ। कुर्द में यह जर्ग़ है। जिगर का एक रूप होता है दिगर जो कुछ अफ़गानी ज़बानों में है। इसका पश्तो रूप लिगर बनता है। यही प्रक्रिया सुदूर यूरोप की अंग्रेजी में भी घटी जहाँ इसका रूप लिवर हुआ। दिल का टुकड़ा, कलेजे का टुकड़ा की तर्ज़ पर जिगर का टुकड़ा भी प्रसिद्ध मुहावरा है। यह फ़ारसी के लख्ते जिगर से आया है जिसका अभिप्राय सन्तान से है। यारी-दोस्ती की पुख्तगी बताने के लिए जिगरी शब्द भी आजकल चलन में है। जिगरी यानी जो दिल के क़रीब हो।

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Monday, December 12, 2011

दम्पती यानी घर के मालिक


हिन्दी में घरबार, घरबारी या गृहस्थ ऐसे शब्द हैं जिनसे रिश्तों और प्रेम की डोर से बंधी एक ऐसी व्यवस्था का बोध होता है जिसे एक पारिवारिक परिसर कहा जा सकता है। ऐसा ही एक शब्द है दम्पती जिसमें निवास, आवास और आश्रय की महत्ता झलक रही है। आमतौर पर रोटी, कपड़ा और मकान किसी भी दाम्पत्य का आधार माने गए हैं। इसमें गौर करें तो मकान ही एक ऐसी व्यवस्था है जिसे साथ-साथ रहकर पति-पत्नी घर का रूप देते हैं, वर्ना रोटी और कपड़ा तो मनुष्य की वैयक्तिक मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। विवाहपूर्व भी स्त्री और पुरुष किसी न किसी आश्रय में रहते ही हैं। वह घर उनके माता-पिता का होता है। विवाहित व्यक्ति को सबसे पहले भोजन और वस्त्र की नहीं, आश्रय की तलाश होती है। ऐसा स्थान जहाँ वे दाम्पत्य जीवन जी सकें। जहाँ रह कर वे दम्पती कहला सकें। सामान्य विवाहित जोड़े को दम्पती तभी कहा जाता है जब वह अपना आशियाना बना लेता है। देखा जाए तो घर-मालकिन और घर-मालिक जैसे शब्द दरअसल गिरस्त और गिरस्तिन के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। किराए के मकान में भी घर बसाया जा सकता है। दम्पती में इसी घर का भाव है, न कि मकान का। आमतौर पर पति शब्द में ही घर-मालिक का भाव मौजूद है मगर दम्पती जैसा एक शब्द ऐसा भी है जिसमें पति-पत्नी के भाव के साथ दोनों को समान रूप से घर-मालिक, गृहस्वामी बताया गया है।


हिन्दी में संस्कृत मूल के दम्पति का दम्पती रूप भी प्रचलित है। दम्पति का जम्पती रूप भी है । इस तरह हिन्दी में दम्पति, दम्पत्ति, दम्पती  और जम्पती रूप प्रयुक्त होता है। इस बारे में धर्मनारायण मिश्र मजेदार बात कहते हैं कि पति-पत्नी के अर्थ में दम्पति, दम्पत्ति और दम्पती इनमें से दम्पत्ति तो सर्वथा अशुद्ध है, लगता है कि यह सम्पत्ति के अनुकरण में बना है। हिन्दी में भी दम्पति और दम्पती रूप प्रचलित हो गए। किन्तु संस्कृत परम्परा में दम्पति (ह्रस्व इ) के पक्ष में ऋग्वेद की गवाही मिलती है जिसमें इसका अर्थ पारिवारिक सम्पत्ति अर्थात घर के सह-स्वामित्व का भाव है। बाद में वेद से इतर अनेक संस्कृत ग्रन्थों में दम्पती शब्द का बरताव भी होने लगा।मोनियर विलियम्स के संस्कृत कोश में दम्पति ही है- दम्पति m. The lord of the house (Agni, Indra, the Aśvins), " the two masters ". उधर वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत कोश में दम्पती है। संस्कृत में दम्पति का जम्पती रूप भी है। आपटे कोश में इसकी व्युत्पत्ति जाया पतिश्च दी गई है जिसका अर्थ है पति और पत्नी। प्रामाणिक हिन्दी कोश (आचार्य रामचन्द्र वर्मा) भी मानते हैं कि हिन्दी में दम्पति के आधार पर दंपति रूप ही ज्यादा प्रसारित हुआ है। इसके उलट हिन्दी शब्दसागर में दंपति और दंपती दोनों प्रविष्टियाँ हैं किन्तु दंपति प्रविष्टि के आगे उसका अर्थ न देकर दंपती वाली प्रविष्टि की ओर निर्दिष्ट किया जाता है। ज़ाहिर है कोश के सम्पादकों का मत दंपती के पक्ष में है। कीथ-मैकडॉनेल के वैदिक इंडेक्स में भी दम्पति का प्रयोग है।


मोनियर विलियम्स के संस्कृत कोश में दम का अर्थ घर, मकान,आश्रय बताया गया है वहीं बांधने का, रोकने का, थामने का, अधीन करने का भाव भी है। यही नहीं, इसमें सज़ा देने, दण्डित करने का भाव भी है। अनिच्छुक व्यक्ति या जोड़े को चहारदीवारी में रखना दरअसल सज़ा ही तो है।  दम्पति का एक अन्य अर्थ है गृहपति। पुराणों में अग्नि, इन्द्र और अश्विन को यह उपमा मिली हुई है। दम्पति का एक अन्य अर्थ है जोड़ा, पति-पत्नी, एक मकान के दो स्वामी अर्थात स्त्री और पुरुष। दम् की साम्यता और तुलना द्वन्द्व से भी की गई है जिसमें द्वित्व का भाव है अर्थात जोड़ी, जोड़ा, युगल, स्त्री-पुरुष आदि। जो भी हो, दम्पति में एक छत के नीचे साथ-साथ रहने वाले जोड़े का भाव है। आजकल सिर्फ़ पति-पत्नी के अर्थ में दम्पति शब्द का प्रयोग होने लगा है जबकि इसमें घरबारी युगल का भाव है। दम्-पति अर्थात घर के दो स्वामी। दम्पती से बना है दाम्पत्य। यह शब्द वैवाहिक स्थिति को दर्शाता है अर्थात पति-पत्नी के साथ साथ रहने की अवस्था ही दाम्पत्य है। ज़ाहिर इसमें उनके घरबारी होने का ही भाव है।...विवाह संस्था के दो रक्षक यानी पति-पत्नी, एक छत के नीचे जीवन-यापन करता युगल यानी पति-पत्नी। ज़ाहिर इसमें उनके घरबारी होने का ही भाव है। दम्पती से बना है दाम्पत्य। यह शब्द वैवाहिक स्थिति को दर्शाता है अर्थात पति-पत्नी के साथ साथ रहने की अवस्था ही दाम्पत्य है। मगर सिर्फ साथ साथ रहना दाम्पत्य नहीं है बल्कि  एक दूसरे के अधीन हो जाना, एक दूसरे को सहारा देना ही दाम्पत्य है। मगर अनिच्छित दाम्पत्य सज़ा से कम नहीं होता। 


ह जो दम् शब्द है, यह भारोपीय मूल का है और इसमें आश्रय का भाव है। आश्रय के अर्थ में भारतीय मनीषा में धाम शब्द का बड़ा महत्व है। धाम का मोटा अर्थ यूं तो निवास, ठिकाना, स्थान आदि होता है मगर व्यापक अर्थ में इसमें विशिष्ट वास, आश्रम, स्वर्ग सहित परमगति अर्थात मोक्ष का अर्थ भी शामिल है। धाम इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की dem/domu धातुओं से इसकी रिश्तेदारी है जिनका अभिप्राय निर्माण से है। संस्कृत धातु धा इसके मूल में है जिसमें धारण करना, रखना, रहना, आश्रय जैसे भाव शामिल हैं। यूरोपीय भाषाओं में dome/domu मूल से कई शब्द बने हैं। गुम्बद के लिए अंग्रेजी का डोम शब्द हिन्दी के लिए जाना पहचाना है। सभ्यता के विकासक्रम में डोम मूलतः आश्रय था। सर्वप्रथम जो छप्पर मनुष्य ने बनाया वही डोम था। बाद में स्थापत्य कला का विकास होते होते डोम किसी भी भवन के मुख्य गुम्बद की अर्थवत्ता पा गया मगर इसमें मुख्य कक्ष का आशय जुड़ा है जहां सब एकत्र होते हैं। लैटिन में डोमस का अर्थ घर होता है जिससे घरेलु के अर्थ वाला डोमेस्टिक जैसा शब्द भी बनता है । अवेस्तन में इसका रूप दंग-पैतोइस होता है । अंग्रेजी के डेस्पट शब्द पर गौर करें जिसका अर्थ निरंकुश शासक या तानाशाह है । यह मूलतः ग्रीक पद despótēसे विकसित हुआ है जिसका अर्थ शासक, पालक है और इसका रिश्ता भी लैटिन के डोमस domus से है । भारोपीय पद डेम-पोटिस से इसकी समतुल्यता गौरतलब है । यह गौरतलब है कि रोमन संस्कृति में जो डेमपोटेस महल में रहनेवाले शासक के अर्थ में सिर्फ़ पुरुषवाची सर्वसत्ता का प्रतीक था, भारतीय संस्कृति में दम्पती के अर्थ में उसमें पति-पत्नी की अर्थवत्ता और सत्ता स्थापित हुई ।


चलते चलते- सीधे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति को शालीन कहा जाता है। शाल् यानी रहने का स्थान, शाला, धर्मशाला, पाठशाला आदि इससे ही बने हैं। संस्कृत का शालः बना है शल् धातु से जिसमें तीक्ष्ण, तीखा, हिलाना, हरकत देना, गति देना, उलट-पुलट करना जैसे भाव है। ये सभी भाव भूमि में हल चला कर खेत जोतने की क्रिया से मेल खाते हैं। हल की तीक्ष्णता भूमि को उलट-पुलट करती है। शालः शब्द के मूल में बाड़ा अथवा घिरे हुए स्थान का अर्थ भी निहित है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक शालीन वह व्यक्ति है जिसके रहने का ठिकाना है। मोटे तौर पर यह अर्थ कुछ दुरूह लग सकता है, मगर गृहस्थी, निवास, आश्रय से उत्पन्न व्यवस्था और उससे निर्मित सभ्यता ही घर में रहनेवाले व्यक्ति को शालीन का दर्जा देती है। कन्या के लिए हिन्दी का लोकप्रिय नाम शालिनी संस्कृत का है जिसका अर्थ गृहस्वामिनी अथवा गृहिणी होता है। व्यापक अर्थ में गृहस्थ ही शालीन है। स्पष्ट है कि आश्रय में ही शालीनता का भाव निहित है। जिसका कोई ठौर-ठिकाना न हो वह आवारा, छुट्टा सांड जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है। हमेशा घर में रहनेवाले व्यक्ति को घरू या घरघूताघरघुस्सू आदि विशेषण दिये जाते हैं।

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Sunday, December 11, 2011

डेरा डालना, डेरा उठाना

Tent Campपिछली कड़ीः भेद की दीवारें, दीवारों के भेद 
कि सी स्थान पर अस्थाई मुकाम या पड़ाव के लिए हिन्दी में डेरा शब्द बहुत प्रचलित है। खेमा, तम्बू, टेन्ट, झोपड़ी, मकान, मन्दिर, मकान, ठिकाना और छोटी बस्ती के लिए डेरा शब्द प्रयुक्त होता है। इस शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है। डेरा वैसे तो आश्रय शब्दावली से निकला शब्द है जिसमें आवास, निवास और रहवास का भाव है मगर यह समूहवाची भी है। डेरा एक मोहल्ला, ढाणी, पिण्ड के अलावा धार्मिक या जातीय पहचान वाले समूह की बसाहट भी हो सकता है और सामान्य अर्थों में तम्बू, छोलदारी या अस्थायी बस्ती भी। डेरा अपने आप में पंथ का पर्याय भी है। भारत के पश्चिमी सीमान्त पर आज़ादी से पहले डीआई खान या डीजी खान जैसे नामों वाली बस्तियाँ थीं जिनमें डेरा शामिल था जैसे डेरा इस्माइल खान या डेरा ग़ाजी खान। इनके नाम से ही ज़ाहिर होता है कि कभी यहाँ इस्माइल खान या ग़ाज़ी खान जैसे किसी योद्धा ने अपने लावलश्कर के साथ शिविर डाला होगा। डेरा बस्सी, डेरा बाबा नानक जैसी और भी बस्तियों के नाम हम सबने सुने हैं।

हिन्दी कोश डेरा की व्युत्पत्ति को लेकर एकमत नहीं हैं। शब्दसागर में डेरा का आशय अस्थायी मुकाम, ठहराव से जोड़ते हुए इसका अर्थ मण्डली, गोल, निवास, कैम्प, छावनी आदि बताया गया है। इसकी व्युत्पत्ति ठहरना या ठहराव के ठेठ देसी उच्चारण ठैराव या ठैरना से बताई गई है। यह युक्तिसंगत नहीं है। डेरा शब्द उत्तर भारत की सभी भाषाओं में इसी रूप में प्रचलित है। डेरा में अस्थायी मुकाम, कैम्प, शामियाना, खैमा जैसे भाव ठैरना और ठैराव से अभिव्यक्त नहीं होते। दूसरी बात यह कि ये दोनों शब्द भी इन रूपों में बहुत कम व्यवहार में हैं। कुछ कोशों में डेरा का रिश्ता पर्शियन और पहलवी से बताया है। टर्नर के अनुसार पर्शियन में इसका रूप डेरा होता है जबकि पहलवी में यह डेरो है। जॉन प्लैट्स के कोश में हिन्दी देहरा का रूपान्तर देरा से होने की सम्भावना जताई गई है। हिन्दी में देहरा या देवरा शब्द देवालय का अपभ्रंश है। क्रमश ह और व को लोप से इनके देवघर > देवहर > देवरा और देवघर > देवहर > देहरा जैसे दो रूप प्राप्त होते हैं जो हिन्दी की बोलियों में प्रचलित हैं। देहरा का अर्थ है मकान, निवास, आशियाना, तम्बू अथवा देवस्थान। देवरा और देहरा उत्तर भारत में कई स्थानों के साथ जुड़ा नज़र आता है। राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल रामदेवरा और देहरादून में यह स्पष्ट है। देहरा का आशय यूँ तो देवस्थान से ही है पर देहरादून के सन्दर्भ में यह डेरा का रूपान्तर भी हो सकता है। सिखों के सातवें गुरु हरराय जी के पुत्र बाबा रामराय के 1675 में दून घाटी आने का उल्लेख है। विभिन्न सन्दर्भों से पता चलता है कि उन्होंने दून घाटी में पड़ाव डाला था तब से ही इस स्थान की पहचान देहरादून (डेरादून) हुई। देहरादून में दून का अर्थ है घाटी। यह शब्द बना है द्रोणि से जिसका अर्थ होता है पर्वतीय उपत्यका, घाटी, वैली। हिन्दी का दोना इससे ही बना है। जहाँ तक देहरादून के देहरा की व्युत्पत्ति का प्रश्न है , तमाम विकल्पों के साथ फ़ारसी के देह / दिह से भी देहरा की व्युत्पत्ति सम्भावित है । देह / दिह में गाँव, दीवार, परकोटा जैसे भाव हैं । इस तरह देहरादून का अर्थ हुआ वादी का गाँव । ग्वालियर के पास एक घाटीगाँव भी है । फ़ारसी के दहलीज में 'देह' को देखा जा सकता है । देहरा, देहरी ( देहली) भी दरवाज़े या चौखट की अर्थवत्ता रखते हैं । इस तरह देहरादून का अर्थ हुआ दर ऐ वादी अर्थात घाटी का दरवाज़ा । वह बस्ती जहाँ से द्रोणिका अर्थात दून घाटी शुरू होती है ।
प्रश्न यह है कि देहरा से डेरा को उद्भूत मानें तो शिविर, तम्बू के अर्थ में डेरा भाव का आशय इसमें स्पष्ट नहीं है। डेरा को प्रचलित शब्द मानें और सिर्फ़ देहरादून वाले देहरा का रिश्ता भी कैम्प के अर्थ में डेरा से जोड़ें तब डेरा कहाँ से आया। डेरा bedouinशब्द में सेमिटिक स्रोत से आया है, ऐसा लगता है। प्राकृतिक आश्रयों की आदिम व्यवस्था से आगे बढ़ कर जब कबीलाई घुमंतू समाज ने खेमों में बसेरा करना सीख लिया था। आदिम समाज की बसाहट छोटे छोटे समूहों में होती थी। कोई एक समूह भी एक गोल, मण्डलाकार आकार के तम्बू में रहता था। यूँ भी कोई समूह जब एक साथ होता है तो बैठने की व्यवस्था गोलाकार, मण्डलाकार ही होती है ताकि सभी एक दूसरे के सम्मुख रहें और इस समूह में किसी अन्य के प्रवेश न करने के लिए सुरक्षा-चक्र भी बन जाए। एक दूसरे के सम्मुख होने से समूह दसों दिशाओं में नज़र भी रख सकता था। मूल बात बसाहट की गोलाकार व्यवस्था है। सेमिटिक धातु d-y-r में फिरना, घूमना, मुड़ना, पलटना, वक्र होना जैसे भाव है। अरबी में इससे बना दाइरः अर्थात गोल, घेरा, परिधि, मण्डल आदि। इसके अलावा इसमें मजलिस, सभा, परिषद, परिवार का भाव भी है। यही नहीं, दायरा के दायरे में मोहल्ला, टोला, बस्ती, आश्रम, परिसर का आशय भी है।
रबी के दाइरः का हिन्दी रूप ही दायरा है। इन तमाम अर्थों में मूल बात जो उभर रही है, वह सुरक्षित आश्रय है। इस धातु का एक और रूपान्तर है d-w-r जिससे बना है दर और इसमें भी यही सारे भाव हैं अर्थात घर, मकान, परिवार, आश्रय आदि। अमेरिकन हेरिटेज डिक्शनरी के मुताबिक ये सभी भाव अरब के मूल निवासी खानाबदोश बेदुइन के रहने के ठिकानों अर्थात तम्बुओं, खेमों के लिए प्रयुक्त होते रहे जिन्हें दर, दार, दाइरः कहा जाता रहा। इंडो-ईरानी परिवार की कई लोकभाषाओं में दन्त्य का रूपान्तर मूर्धन्य में होता है। सिख विकी के मुताबिक पंजाबी का डेरा शब्द फ़ारसी के दैर का रूपान्तर है। गौरतलब है कि फ़ारसी में दैर अरबी से आया है जहाँ इसका अर्थ विहार, मठ, आश्रम, देवालय, उपासनास्थल आदि। है। इसी धातु मूल से उपजा दयार शब्द भी हिन्दी-उर्दू में प्रचलित है। दयार का अर्थ भी मकान, घर आश्रय होता है। कुछ विद्वान इन सभी शब्दों में भारोपीय dhwer की झलक भी देखते हैं। संस्कृत का द्वार, रूसी का द्वेर, फ़ारसी का दर, अंग्रेजी का डोर, फ़ारसी का दर्रा ( घाटी, दरवाज़ा ), दरवाज़ा जैसे शब्दों की रिश्तेदारी भी दर, दार, दाइर से है। 
सेमिटिक धातु d-w-r या d-y-r दिर पर गौर करें। मुझे लगता है डेरा का आदिस्त्रोत कहीं न कहीं इंडो-ईरानी परिवार की बहुप्रयुक्त आदिक्रिया वर् में निहित है जिसमें घूमने, घेरने का भाव है जिसकी व्याख्या आवरण, रक्षा कवच में होती है। कवच किसी वस्तु, स्थान या व्युक्ति को चारों ओर से सुरक्षित बनाता है। वर् से ही बनता है वार जो मनुष्यों और पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान का नाम है। लोकभाषा में बाड़ा इसका आम प्रचलित रूप है। मराठी में वाड़ा मोहल्ला है तो पाड़ा हिन्दी में मोहल्ला है। बाड़ी बांग्ला में घर है और बाड़ा पशुओं का आश्रय है। वर् से बने वृ और दिर् की समानता पर गौर करें। इसी कड़ी में सेमिटिक दैर dair की तुलना दीवार के अवेस्ता मूल देगा-वरा dega-vara से करनी चाहिए। सम्भव है। अवेस्ता के ज़रिए पश्चिमी ईरान की ओर इस शब्द का सेमिटिक रूपान्तर dair दैर हुआ हो। ऐसा लगता है कि दैर, दायरा में जो मण्डलाकार, सुरक्षा घेरे का भाव है वह इंडो-ईरानी भाषाओं के किन्हीं आदिरूपों से सेमिटिक परिवार में दाखिल हुआ होगा। ज़ाहिर है सबसे पास का उदाहरण देगा-वरा का ही नज़र आ रहा है। देगा में सुरक्षात्मक संरचना और वरा में मण्डलाकार आकार, जिसमें भी सुरक्षा का ही भाव है, स्पष्ट नज़र आ रहा है। इसकी विस्तृत चर्चा पिछली कड़ी में की जा चुकी है।
डेरा शब्द की अर्थवत्ता का भारतीय भाषाओं में विस्तार हुआ। डेरा बस्ती भी है और बसेरा भी। तम्बू भी है और घेरा भी। मन्दिर भी है, मजलिस भी। मंजिल भी है और मकाम भी। अस्थायी मुकाम की अर्थवत्ता वाले इस शब्द में स्थायित्व भी समा गया। डेरेदार, डेरेदारिन, डेरेवाली जैसे शब्द उन खानदानी तवायफ़ों के लिए कहे-सुने जाते रहे हैं जो कभी बस्ती के बाहर रहती थीं। बाद में शहर में कोई जगह लेकर धन्धा करने वाली तवायफों के लिए यह शब्द रूढ़ हो गया। वैसे डेरेवाल, डेरेदार जैसे शब्द भी हैं जो शिविरार्थी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। डेरा डालना मुहावरा भी है जिसका आशय कहीं विश्राम करना है। घर-गृहस्थी के साज़ो सामान के साथ कहीं और जा बसने के सन्दर्भ में डेरा-डण्डा उखड़ना जैसा मुहावरा भी प्रचलित है। इसमें प्राचीन घुमंतू समाज की स्मृति है। डेरा यानी तम्बू या छप्पर और डण्डा यानी उसका स्तम्भ। डेरा-डंगर भी ऐसा ही पद है। इसमें डंगर का तात्पर्य पशुओं से है। खानाबदोश समाज अपने मवेशियों के साथ ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकता फिरता था। ज़रूर देखें आश्रय शृंखला के सभी आलेख।
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Wednesday, December 7, 2011

हप्-हप् खाना या हड़पना ?

bullfrog

कि सी की वस्तु को जबर्दस्ती हथिया लेना, दूसरे की सम्पत्ति को जबर्दस्ती अपने स्वामित्व में लाने, चतुराई या बलप्रयोग से किसी अन्य के स्वामित्व वाली सम्पत्ति को अपना बनाने की कार्रवाई को हड़पना कहते हैं। हड़प शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर हिन्दी के प्रसिद्ध और आमफ़हम शब्दकोशों में विरोधाभासी जानकारी है जिससे भ्रम पैदा होता है। श्यामसुंदरदास सम्पादित हिन्दी शब्दसागर में हड़प प्रविष्टि को पढ़ने से लगता है मानो यह भोजन करने सम्बन्धी शब्दावली से आया है। कोश में इसे अनुकरणात्मक शब्द बताते हुए इसका अर्थ पेट में डाला हुआ, निगला हुआ बताया गया है। इन भावों का आधार लेते हुए हड़प का आशय गायब किया हुआ, अनुचित रीति या बेईमानी से ले लेना बताया गया है। वाल उठता है कि भोजन करने वाली शब्दावली में हड़प जैसा शब्द नहीं है। भोजन करते हुए भी हड़प ध्वनि का उच्चार नहीं होता। जॉन प्लैट्स अपने हिन्दुस्तानी, उर्दू, इंग्लिश कोश में इसी हप् ध्वनि से हड़प की सादृष्यता की बात कहते हैं। साथ ही वे प्राकृत के हडप्प से भी हड़प की तुलना करते हैं।
हले हप् ध्वनि की बात। भोजन करने में चबाने की क्रिया खास है। दाँत, जीभ और तालु की स्पर्शीय क्रियाओं से चप्-चप् ध्वनि निकलती है, हप् हप् नहीं। मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में हप् वाली प्रविष्टि में इसका कोई स्वतंत्र अर्थ न देते हुए इसे संस्कृत धातु ह्लप् का पाठान्तर (लैटिनः वेरिया-लैक्शिओ) बताई गई है। अर्थात मूल शब्द ह्रप् जिसका अर्थ है to speak जिसमें आवाज़ करना, उच्चार करना, बोलना आदि भाव हैं। स्पष्ट है कि मोनियर विलियम्स ने इसका रिश्ता भोजन करने की ध्वनि से नहीं जोड़ा हैं। शब्दसागर में हड़प को ध्वनिअनुकरण पर बना शब्द तो बताया है पर इसके मूल का उल्लेख नहीं है। वहीं शब्दसागर में हप का रिश्ता ध्वनिअनुकरण के आधार पर कोई वस्तु चट से मुँह में रख कर होठ बन्द करने की आवाज से जोड़ा है। जब हड़प का अर्थ निगला हुआ, पेट में डाला हुआ बताया जाता है तो इसकी मूल ध्वनि हप् बताने कोशकार कैसे भूल गए, यह समझ से परे है। हिन्दी में हप् करना, हप कर जाना जैसे मुहावरे भी हैं और मीठा मीठा हप, कड़वा कड़वा थू जैसी कहावत भी है जिसका अर्थ पसंदीदा वस्तु को अपने पास रख लेना। जॉन प्लैट्स प्राकृत के जिस हड़प्प से हड़प की तुलना का सुझाव देते हैं, उस हड़प्प का अर्थ उनकी प्रविष्टि में chest, cupboard दिया हुआ है। चेस्ट यानी सीना, छाती, वक्ष आदि। दरअसल चेस्ट एक प्रकोष्ठ होता है जहाँ दिल महफ़ूज़ रहता है। इसे हृदय-प्रकोष्ठ कहा जा सकता है। मगर यह हड़पने के मूल भाव से मेल नहीं खाता।
मेरे विचार में दो बातें हैं। जल्दी से कोई चीज़ मुँह में रखने की क्रिया में होठ बन्द करने की ध्वनि हप् है और यह वही है जिसका उल्लेख प्लैट्स भी करते हैं। मगर मोनियर विलियम्स मगर इसका रिश्ता होठों से तो क्या, खाने की क्रिया से भी नहीं जोड़ते। मेरे अपने विचार में हप् ध्वनिअनुकरणात्मक शब्द तो है, मगर भक्षण सम्बन्धी अर्थों से जोड़ने में इसका ध्वनिअनुकरणात्मक होना कम और लक्षणात्मक होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी वस्तु को सीधे अपने मुँह में लपकने की कोशिश कर के देख लीजिए, हप् की ध्वनि नहीं निकलती। हप् में निश्वास की प्रक्रिया है, आश्वास की नहीं। अब अगर आप हप् का सायास उच्चार चाहते ही हैं तो वस्तु मुँह में जाने के बाद ही हप् उच्चार पाएँगे, अन्यथा नहीं। हाँ, बिना मुँह में कुछ डाले सिर्फ़ हवा में तैरती किसी काल्पनिक चीज़ को लपकने की कोशिश करें, सौ फ़ीसद साफ़ आवाज़ में हर बार हप् हप् का उच्चार सुनाई पड़ेगा। मेरा मानना है कि यह मानवेतर जीव-जंतुओं की भोजन करने की प्रक्रिया को देखते हुए उपजा लाक्षणिक शब्द है।
दिकाल से मनुष्य ने मगरमच्छों, अजगरों, साँपों, सारसों, छिपकलियों, मेंढकों और नाना अन्य प्राणियों को इसी अंदाज़ में अन्य जंतुओं को चट-पट, झपाटे में अपना आहार बनाते देखा है। इस क्रिया की त्वरता, तीव्रता, शीघ्रता, विचित्रता, भीषणता और भयानकता को उसने वर्षों अनुभव किया है। इसके अनुकरण के प्रयास में यह हप् ध्वनि हाथ लगी है, अन्यथा न तो frog-_1837515bजानवर हप् की ध्वनि करते हैं और न ही मनुष्य। मेरे इस विचार की पुष्टि भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक कोश में रॉल्फ़ लिली टर्नर की प्रविष्टि से भी होती है। टर्नर हप् को हप्प लिखते हैं। हप का हप्प रूप भी प्रचलित है जैसे गप का गप्प। गल्प से जैसे गप्प बनता है वैसे ही ह्लप् से हप्प बनेगा। टर्नर ने हप्प का जो पहला आशय लिखा है- sudden movement, वो महत्वपूर्ण है। सडन मूवमेन्ट यानी अप्रत्याशित या आकस्मिक हरकत या क्रिया। टर्नर इसके बाद अन्य आर्य भाषाओं में इससे विकसित शब्दों के अर्थ बताते हैं जैसे कुमाऊँनी में हपकाउणो यानी भकोसना, नेपाली में हप्खानूँ यानी निगलना, हिन्दी मे हप यानी झपट्टा, हपकाना यानी भकोसना, हापर यानी पेटू. हपराना यानी चबर-चबर खाते रहना, मराठी में हप्का यानी झपाटेदार लहर, हपाटणे (अपटणे) यानी पछाड़ देना, झपाटे का विलोम, चित्त करना आदि। स्पष्ट है कि संस्कृत के मूल हप या हप्प का प्रमुख अर्थ टर्नर की निगाह में भी आकस्मिक हरकत ही है। आहार या भोजन की क्रिया के सम्बन्ध में भी आकस्मिकता इसके दायरे में आती है, न कि यह इसका प्रमुख अर्थ है।
ध्यान देने की बात है कि हप्प या हप के सन्दर्भ में जीवभक्षियों की त्वरित क्रिया का अनुकरण मनुष्य ने करने का प्रयास किया तो हप् ध्वनि निकली। दरअसल यह किसी क्रिया का आदिम रीक्रिएशन जैसा था। नाटक का जन्म अनुकरण से ही हुआ है। यह जो हप् है, नाटकीय रूपान्तर ही है। ध्यान रहे, मोनियर विलियम्स लैटिन की टर्म वेरिया-लैक्शिओ यानी पाठान्तर का प्रयोग कर रहे हैं, न कि ह्रप् को ह्लप् का रूपान्तर या क्रमिक विकास बता रहे हैं। गौरतलब है कि प्राचीन ग्रन्थों के विभिन्न भाष्यों में पाठान्तर इसलिए होता रहा क्योंकि हस्तलिखित प्रतियाँ टीकाकार पण्डित खुद भी बनाते थे और पेशेवर नक़लनवीस भी। इसलिए किन्हीं अक्षरों को समझने में भूल-चूक भी होती थी और श्रुतलेखन के दौरान उच्चारणभेद नहीं हो पाता था। इसीलिए दो पाठान्तर मिलने से मोनियर विलियम्स ने यहाँ इसीलिए ह्रप या ह्लप से उत्पन्न हप का रिश्ता भोजन सम्बन्धी क्रिया से नहीं जोड़ते हुए सिर्फ़ उच्चार से जोड़ा है। यही सावधानी टर्नर ने भी बरती है और वे भी हप्प को सिर्फ़ त्वरित, शीघ्रतापूर्ण, आकस्मिक क्रिया ही मानते हैं।
ड़प शब्द का जन्मसूत्र हप् से नहीं है, यह स्पष्ट है। यह भी लगता है कि हप् से हड़प नहीं बल्कि हड़पने की क्रिया में जो व्यापक आशय हैं, उससे हप् में निहित भावार्थ और भी पुष्ट हुए और धीरे धीरे कोशकार बजाय हप् को हड़प से सम्बद्ध करने के, हड़प के हप् से व्युत्पन्न होने की सम्भावना जताने लगे। विभिन्न सन्दर्भों को टटोलने के बाद मेरी यह स्पष्ट मान्यता है कि हड़प के मूल में वही हृ धातु है जिसमें मुग्ध करना, आकृष्ट करना, लेना, अधीन करना, वशीभूत, कब्जा करना, दबोचना, चुराना, डाका डालना, छीन लेना, हथियाना, ले जाना, स्वामित्व जताना, मालिक बनना, इच्छा जताना, अधिकार जताना जैसे भाव हैं। टर्नर कोश से इसकी पुष्टि होती है। टर्नर बताते हैं कि भारोपीय वैदिक हृत् हड़प के मूल में है। हृत् की धातु हृ है। हृत् का पाली रूप हटा है, प्राकृत रूप हड़ा है। दर्दी ज़बान में यह हूढ़ो है। पश्चिमी पहलवी में इसका एक रूप हड़ है। टर्नर सम्भावना जताते हैं कि इसका आशय बाढ़ से हो सकता है। गौरतलब है कि बाढ़ में भी हड़पने की लीला है।
हृ से ही हर, हरण, हारना, हराना जैसे शब्द बने हैं जिनमें पराभव, खोना, गँवाना, अधीन होना-करना जैसे भाव हैं। माला के अर्थ में हार भी इसी मूल से बना है। हार में जो अनुशासन है वह एक सूत्रता का है। इस सूत्र के अधीन होने के लिए विभिन्न वस्तुओं को अपनी निजता खोनी पड़ती है। एक रूपाकार में होकर ही वे माला में पिरोए जा सकते हैं। हार में पिरोए जाने के बाद बहुत सी चीज़ें आसानी से इधर-उधर ले जाई जा सकती हैं।

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Monday, December 5, 2011

दिलो-दिमाग़ की बातें

पिछली कड़ी-आखिर क्या है सौहार्द्र?Heart

फ़ा रसी ने कुछ ऐसे नायाब शब्द हिन्दी को दिए हैं कि जिनके बिना दिल की बात ज़ुबाँ पर आनी मुश्किल होती है। अब देखिए, इस दिल को ही लीजिए, दिल यानी हृदय। दिल से जुड़ी कितनी ही बातें मुहावरों की शक्ल में आज विभिन्न भाषाओं में समायी हैं। मराठी के दिलगीर शब्द से हिन्दी वाले अपरिचित हैं, मगर मूलतः मराठी में इसकी आमद फ़ारसी से ही हुई है। दिलगीर यानी दुखी, शोकाकूल, शोक-संतप्त आदि। दिलगीर का एक अन्य अर्थ खेद प्रकट करने वाला या पश्चाताप जताने वाला भी होता है। दिलफ़रेब, दिलरुबा, दिलबर, दिलकश, दिलेर, दिलावर, दिलवाला, दिलदार, दिलखुश, दिलचस्प जैसे न जाने कितने शब्दों का रोज़ बोलचाल में इस्तेमाल होता है। दिल से जो अभिव्यक्ति और लालित्य पैदा होता है, वह बात हृदय से नहीं आती। हिन्दी में आमतौर पर हृदय शब्द का प्रयोग अब शरीर के अंग की तरह चिकित्सकीय आशय में होता है। इस सन्दर्भ में हृदय-रोग, हृदय-रोगी आम शब्द हैं। यही हाल अंग्रेजी के हार्ट शब्द का है। हार्ट-प्रॉब्लम, हार्ट-पेशेन्ट जैसे शब्द आमतौर पर हिन्दी में प्रचलित हैं। दूसरी ओर दिल की अर्थवत्ता व्यापक है। शरीरांग के रूप में भी दिल शब्द का प्रयोग होता है, जैसे-दिल में छेद होना। मगर किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है। किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है।
संस्कृत हृदय के मूल में हृद् है जिसका अर्थ है दिल और इसके लिए भाषा वैज्ञानिकों ने मूल इंडो-यूरोपीय धातु कर्द kerd तलाश की है जिसका आधार ग्रीक का कार्दिया kardia है। हृदय का संबंध सोच-विचार करने से है। मलयालम में यह करुतु है जिसका साम्य कॉर्ड से जोड़ा जा सकता है। करुतु का अर्थ है सोचना, विचारना, कल्पना करना आदि। वैसे ख्यात भाषवाविद् डॉ रामविलास शर्मा द्वारा बरो और एमेनो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश से संग्रहित शब्दों में मलयालम के करिळ का उल्लेख है जिसे उन्होंने इसी शब्द शृंखला का हिस्सा बताया है। द्रविड़ परिवार की ही कोत भाषा में यह कर्ल है। वे इन शब्दों की ग्रीक कॉर्दिया से तुलना करते हैं- कर्द > कर्ल। हिन्दी का शृद्धा शब्द भी इसी परिवार का है जिसका अर्थ है आस्था, निष्ठा, भरोसा जिनका रिश्ता दिल से है। इसके अलावा मन की स्वस्थता और हृदय की शान्ति जैसे भाव भी इसमें हैं। हालाँकि इसका अर्थ थोड़ा भिन्न है मगर रामविलास शर्मा बड़ी आसानी से इसकी हृदय से रिश्तेदारी साबित करते हैं। उनके अनुसार शृद्धा का शृद् और हृदय का हृद दरअसल एक ही हैं। लिथुआनी का सिर्डिस और रूसी का सर्डेस / सेर्द्त्से इस सिलसिले में गौरतलब है जिसका उच्चारण शृद्धा से मिलता-जुलता है।
इंडो-ईरानी भाषा परिवार का दिल भी भारोपीय धातु कर्द kerd से ही तैयार हुआ है। यह दिलचस्प है कि इस धातु के पहले वर्ण का उच्चार पूर्व से पश्चिम तक अलग अलग होता रहा है। ये सभी ध्वनियाँ कण्ठ्य, तालव्य, दन्त्य और दन्त्यमूलीय हैं। इसी तरह इनकी प्रकृति भी कण्ठ्य, स्पर्श और स्पर्श संघर्षी रही है। इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए ध्वनियों की प्रकृति कण्ठ्य से तालव्य और फिर दन्त्य में तब्दील हुई है। पंचनद, उत्तरी ईरान, कुर्दिश, आर्मीनियाई और फिर जर्मन। चाहें तो इस क्रम को ठीक उलटा भी मान सकते हैं। संस्कृत के हृद् में मूल ध्वनि   है जो कण्ठ्य संघर्षी है। इससे हृदय शब्द बनता है। अवेस्ता में इस का रूपान्तर ज़ / झ़ में होता है और वहाँ हृदय के लिए ज़रेदा शब्द मिलता है। कुर्दिश में यह ज़ार है और बलूची में ज़ेर्दे तो आर्मीनियाई में ज़ का बदलाव में होता है जो दन्त्यमूलीय ध्वनि है। यहाँ हृदय के लिए सिर्त शब्द है। रूसी में यह सर्डेस या सेर्द्स्ते है। जर्मन में यह हर्ज़ है मगर प्रोटो जर्मन में यह ख़ैर्तन था। बहरहाल, अवेस्ता के ज़रेदा zereda से पहलवी के दील और फिर फ़ारसी के दिल, देल का विकास हुआ है।
हृदय से दिल का विकास विस्यमकारी सा लगता है मगर जिस तरह हम सूक्ष्मतम एक कोशिकीय जीव-विभाजन के सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए तमाम जीवधारियों के विकसित होने की कल्पना को स्वीकार कर  लेते हैं, भाषा और शब्दों के विकास का सफ़र उतना दुरूह और असम्भव नहीं है। समूचे तुर्क-ईरान क्षेत्र में अवेस्ताई ज़रेदा के कई रूपान्तर हुए हैं जैसे ताज़िकिस्तान के पामीर और बदख्शाँ क्षेत्र की क़बाइली भाषा इशकाशिमी में यह ज़िल है तो पूर्वी तुर्की में बोली जाने वाली जज़ाकी में यह ज़ेर्री है। पामीर क्षेत्र की ही एक अन्य भाषा सारीगुल में इसका रूप झाँर्द है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक पार्थियाई भाषा में इसका एक रूप ज़िर्द रहा होगा। जॉर्जिया की एक बोली ओसेटिक में इसका रूप झ़िर्द मिलता है। डॉ शर्मा की बात तार्किक लगती है कि जैसे लैटिन कोर्द का रूप कोर हुआ, वैसे ही ज़िर्द ( ज़रेदा का एक रूप ) का रूपान्तर ज़िर हुआ होगा। ज़िर > जिर > दिर के बाद अगला रूपान्तर दिल हुआ होगा। गौर तलब है कि बदख्शाँ की इशकाशिमी भाषा में ज़िर का रूप ज़िल है।
दिल के साथ अक्सर दिमाग़ का ज़िक्र भी होता है। सयानों का कहना है कि “दिल की नहीं, दिमाग़ की बात सुननी चाहिए”। मगर जो लोग दिल से बोलते हैं, वे सुनते भी दिल की ही हैं। दिल की तरह दिमाग़ भारोपीय भाषा परिवार का न होकर सेमिटिक कुनबे का शब्द है। कुछ सेमिटिक भाषाओं में दिमाग़ का उच्चारण दिमाह की तरह होता है जैसे इथियोपिया की ग़ीज़ भाषा में। अरबी में दिमाग़ का अर्थ होता है मस्तिष्क, ब्रेन। इसका अर्थ होता है सिर, सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा, शिखर आदि। दिमाग़ के अन्तिम दो वर्णों से भारोपीय मस्ज्, मग्ज़, मज़्ग याद आते हैं जिनसे हिन्दी में प्रयोग होने वाले कुछ ख़ास शब्द बने हैं। मगज और भेजा इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द हैं जबकि दिमाग अरबी मूल से आया है। संस्कृत में इसकी मूल धातु है मज्ज्।
यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी में मगज शब्द जहाँ फारसी से आया है वहीं भेजा शब्द इसके मूल तत्सम का तद्भव रूप है। मगज शब्द का मूल फारसी रूप मग्ज़ है। यह अवेस्ता के मज्ग mazga से बना है। इसका संस्कृत रूप है मस्ज् जिसका अर्थ है सार, तरल, रस आदि। इससे ही बना है संस्कृत और हिन्दी का मज्जा शब्द जिसका अर्थ है अस्थियों के भीतर का द्रव (बोनमेरो bonemarrow), वसा, चर्बी, पौधों का रस आदि। मुमकिन है अवेस्ता के मज़्ग से यह अरबी में आयात हुआ हो जहाँ इसका अरबीकरण दिमाग़ के रूप में हुआ हो। वैसे भी अन्य सेमिटिक भाषाओं में यह शब्द अरबी से ही गया है। यूँ भी अरबी और फ़ारसी में भाषायी लेन-देन रहा है। हिन्दी का भेजा शब्द मज्ज से बना है। संस्कृत के तद्भव रूपों में प ध्वनि का चरित्र भ में बदलता है। यहाँ मज्ज> मज्जस् > भज्जअ> भेजा के जरिये यह तैयार हुआ है। अक्सर दिलवाले दिल लिया दिया करते हैं, दिल से दिल लगाया करते हैं। बेवकूफ़ किस्म के लोग हमेशा दूसरों का दिमाग़ चाटते या दिमाग़ खाते हैं। व्यर्थ की बकवाद करने के अर्थ “भेजा खाना” या “भेजा चाटना” मुहावरा भी हिन्दी में प्रचलित है।
-जारी

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Sunday, December 4, 2011

आखिर क्या है ये ‘सौहार्द्र’ ?

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ब्दों की गहराई तक गए बिना उसे इस्तेमाल की बढ़ती प्रवृत्ति के दौर में हिन्दी पत्रकारिता भला इस बुराई से कैसे बची रह सकती है। आए दिन सद्भाव के संदर्भों में सौहार्द्र शब्द का प्रयोग हम पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर देखते-सुनते हैं। अब यह जानने-समझने की ज़रूरत नहीं रह गई है कि सौहार्द्र या सौहार्द्रता शब्द ग़लत है, इसका सही उच्चारण और वर्तनी है सौहार्द जिसका रिश्ता हार्दिकता से जुड़ता है। सौहार्द्र में ‘आर्द्रता’ का जो स्पर्श है उससे सौहार्द में निहित भाव प्रकट नहीं होता। सौहार्द्र जैसा कोई शब्द किसी कोश में नहीं मिलेगा, मगर यह शब्द चल पड़ा है। भाषा खुद अपना रास्ता चुनती है, मगर सौहार्द का सौहार्द्र हो जाना भाखा बहता नीर वाला उदाहरण नहीं है, क्योंकि सौहार्द्र की तुलना में सौहार्द उच्चारण कहीं सहज और आसान है। यह विशुद्ध भाषा के प्रति असावधानी और अगंभीर नज़रिये का परिणाम है।
सौहार्द में जो हार्दिकता का भाव है वह हृदय से आ रही है। हृदय भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की हृ धातु से हुई है जिसमें मुग्ध करना, आकृष्ट करना, लेना, अधीन करना, वशीभूत करना जैसे भाव हैं। इससे ही बना है हृद जिसका अर्थ है मन या दिल। हृ में समाविष्ट तमाम भाव मन से जुड़े हैं। हृदयम् शब्द भी इससे ही बना है। हृदयम की व्याप्ति द्रविड़ भाषा परिवार में भी हुई है और वहाँ इसका रूप है इरुतयम् irtayam. हिन्दी के हार्दिक शब्द का अर्थ होता है दिल से, मन से हृदय से जिसका रिश्ता है इसी मूल से बने हार्दम् से जिसमें स्नेह, प्रेम, कृपा, अभिप्राय जेसे भाव शामिल हैं। बोलचाल में हृदय से बने देसी रूप भी चलन में हैं जैसे हिया, हिरदय, हिय आदि। इसके अलावा सहृदय, हार्दिक आदि। हृद में सु उपसर्ग लगने से बनता है सुहृद अर्थात अच्छे हृदय से या अच्छे हृदयवाला। आपटे कोश के मुताबिक सुहृद में अण् प्रत्यय लगने से बना है सौहार्दः या सौहार्दम् जिसका अर्थ है हृदय की सरलता, स्नेह, सद्भाव या मैत्रीभाव। यही है सौहार्द का मूल जिसे हम सौहार्द्र पढ़ने के अभ्यस्त हो चुके हैं। हृद की व्याप्ति यूरोप की कई भाषाओं में है। अंग्रेजी के हार्ट heart का हृद से गहरा रिश्ता है। हार्दिकता के हार्द और अंग्रेजी के हार्ट की तुलना कर ध्वनिसाम्य और अर्थसाम्य पर विचार करें।
हृदय के लिए भाषा वैज्ञानिकों ने मूल इंडो-यूरोपीय धातु कर्द kerd  तलाश की है जिसका आधार ग्रीक का कार्दिया kardia,

love_ljssqwvk... दिल पर दर्ज़ इबारतें जब काग़ज़ पर उतरती हैं तो साहित्य रचा जाता है।  लिथुआनी का रिकॉर्दारी शब्द ही अंग्रेजी के रिकॉर्ड के मूल में है। ...

लैटिन का कोर cor, लिथुआनी का सिर्डिस sirdis या रूसी का सर्डेस serdce शामिल है। इसी तरह जर्मन में हर्ज़ herz, पुरानी स्पैनी में हार्ता hearta और पुरानी इंग्लिश में होर्टे heorte होता हुआ यह अंग्रेजी में हार्ट heart हो गया। लैटिन का कोर शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि इंडो-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में और ध्वनियों में भी रूपान्तर होता है। हृद की तरह ही लैटिन कोर की मूल धातु कॉर्द cord है। इस कोर्द से ही बना है अंग्रेजी का कोर core जिसका अर्थ है किसी वस्तु का आंतरिक हिस्सा, भीतरी भाग, केंद्र आदि। हृदय की शरीर में केंद्रीय स्थिति है और यह शरीर के भीतर होता है। इस अर्थ में कोर यानी हृदय। कोर शब्द से हिन्दी वाले भी परिचित हैं और कोर कमेटी या कोर ग्रुप जैसे शब्द खूब लिखे-बोले जाते हैं। इससे ही बना है cordial जिसे अंग्रेजी उच्चारण में कॉर्जल और हिन्दी में कॉर्डियल कहा जाता है। इसमें ठीक वही भाव है जो हार्दिकता या सौहार्द में है। लिथुआनी में इसी कॉर्द में उपसर्ग और प्रत्यय लगने से बनता है रिकॉर्दारी recordari जिसमें किसी तथ्य को दिल में जगह देने, मन में बिठाने का भाव  है। बाद में इसकी अर्थवत्ता का विस्तार हुआ और दर्ज करना, याद रखना, किसी रजिस्टर में इन्द्राज करना जैसे अर्थ भी विकसित हुए। अंग्रेजी का रिकॉर्ड इसी से निकला है। रिकॉर्ड शब्द अंग्रेजी से हिन्दी मे आए उन सैकड़ों शब्दों में शुमार है जिनका इस्तेमाल सुबह से रात तक आम हिन्दी भाषी खूब करता है। दिल पर दर्ज़ इबारतें जब काग़ज़ पर उतरती हैं तो साहित्य रचा जाता है। कॉन्कर्ड, डिस्कॉर्ड जैसे कितने ही शब्दों के साथ इस सिलसिले में दिल की बीमारी के लिए सुने जानेवाले चिकित्सा विज्ञान के पारिभाषिक शब्दों को भी याद किया जा सकता है।
अगली कड़ी में दिलो-दिमाग़ की बातें

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Saturday, December 3, 2011

भेद की दीवारें, दीवारों के भेद

wal
रिनिष्ठित हो या बोलचाल की हिन्दी, दो कमरों को विभाजित करने वाली रचना के लिए आपको कितने शब्द याद आते हैं? किसी कक्ष को चारों और से सुरक्षित बनाने वाली वह रचना जिस पर छत टिकी होती है उसे तत्काल आप क्या कहेंगे? यक़ीनन दीवार ही इस आशय को अभिव्यक्त करने वाला वह शब्द है जो लगभग सभी के दिमाग़ में कौंधता है। बोली भाषा में भीत शब्द चल सकता है, मगर ज़रूरी नहीं कि हर हिन्दी भाषी इसका इस्तेमाल करना चाहे। दीवार रोजमर्रा की बोली में सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में शुमार है। दीवार शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है। एक तरफ़ जहाँ इसमें विभाजन, अलगाव या दुराव वाला भाव है तो दूसरी और सुरक्षा और मज़बूती प्रदान करने का भाव भी खास है। “हम दोनों के बीच वह दीवार बन गया” में जहाँ अलगाव और विभाजनकर्ता का भाव है वहीं, “ उन दिनों वे दीवार की तरह मज़बूती से हर मुश्किल के सामने खड़े नज़र आए” इस वाक्य में सकारात्मक है।

दीवार इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की इंडो-ईरानी शाखा का शब्द है और भारतीय भाषाओं में इसकी आमद फ़ारसी से हुई है। यह अवेस्ता के एक सामासिक पद से बना है देगा-वरा [dega-vara]। पकोर्नी द्वारा खोजी गई प्रोटो भारोपीय धातुओं में dheigh ( -धिघ, मोनियर विलियम्स) से बना है अवेस्ता का देगा जिसका अर्थ है मिट्टी, काया अथवा लेपन। इसके अन्य रूप हैं दिज़, देज़, दाएज़ा जिनका अर्थ है किला या दीवार। संस्कृत की दिह् धातु का अर्थ भी लीपना, सानना, पोतना होता है। दिह् से ही बना है देह शब्द जिसका अर्थ काया, शरीर होता है मगर इसका मूलार्थ है आवरण। गौर करें दिह् में निहित लेपन के अर्थ पर। किसी वस्तु पर लेपन उसे सुरक्षित बनाने के लिए ही किया जाता है। देह एक तरह से शरीर के भीतरी अंगों का सुरक्षा कवच है। मोनियर विलियम्स के कोश के अनुसार देह का अर्थ है आवरण, लेपन, मिट्टी, ढांचा, साँचा, गूँथना, ढालना आदि। दार्शनिक अर्थों में देह को मिट्टी से निर्मित भी कहा जाता है और इसे किले की उपमा भी दी जाती है। गौरतलब है कि अंग्रेजी का डो dough भी इसी धिघ् dheigh से बना है जो इसके पोस्ट जर्मनिक रूप daigaz से तैयार हुआ। अंग्रेजी का लेडी शब्द भी हिन्दी में खूब प्रयोग होता है, जो इसी मूल का है। कबीर ने मनुष्य को माटी का पुतला यूँ ही नहीं कहा। देह, दिह्, दिज़् शब्दों के भावार्थों पर जाएँ तो माटी के पुतले के निर्माण की सारी क्रियाएँ स्पष्ट होती है यानी मिट्टी को पीटना, सानना, राँधना, गूँथना, साँचा बनाना और फिर पुतला बनाना।
वेस्ता का दिज़ शब्द इसी मूल का है और जिसका अर्थ किला ही होता है। कुल मिला कर दिघ्, दिह्, दिज़, देगा, दाएज़ा में परिधि, कोट, किला और सुरक्षित स्थान का भाव विकसित होता चला गया। इस दाएज़ा से पूर्व जब अवेस्ता का उपसर्ग पइरी लगता है तो बनता है पइरी-दाएज़ा। गौरतलब है कि भारोपीय भाषा परिवार में पर per / peri जैसी धातुएँ उपसर्ग की तरह प्रयुक्त होती हैं। इसमें चारों ओर, आस-पास, इर्दगिर्द, घेरा जैसे भाव हैं। संस्कृत का परि उपसर्ग इसी से व्युत्पन्न है जिससे बने दर्जनों शब्द हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं जैसे परिवार, परिवहन, परिचर, परिधान आदि। इसका ही अवेस्ता रूप पइरी होता है। दाएज़ा से जुड़ कर बने पइरीदाएज़ा (pairidaeza) में ऐसे स्थान का आशय है जिसके चारों ओर सुरक्षित परकोटा है। इसका अर्थ हुआ सुरम्य वाटिका, आरामग़ाह। एटिमऑनलाइन के मुताबिक ग्रीक में इसका रूप हुआ paradeisos, लैटिन में यह पैराडिसस हुआ तो पुरानी फ्रैंच में यह पैरादिस और अंग्रेजी में इसका रूप पैराडाइज़ हुआ। इन तमाम रूपान्तरों में स्वर्ग, बहिश्त, वैकुण्ठ, जन्नत, ईडेनगार्डन जैसे अर्थ स्थिर हुए। बाद में अवेस्ता के पइरीदाएज़ा का बरास्ता पहलवी होते हुए फ़ारसी रूप बना फ़िर्दौस (हिन्दी में फ़िरदौस) अर्थवत्ता कायम रही। फ़ारसी के प्रसिद्ध कवि फ़िर्दौसी के नाम का अर्थ फ़िर्दौस नाम की जगह का बाशिंदा ही होता है। बाद में अरबी में भी यह फ़िर्दौस पहुँचा।
फिर से लौटते हैं अवेस्ता के देगा-वरा पर। प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार की धातु वर् wer में घुमाना, दोहरा करना, लपेटना जैसे भाव हैं। इससे मिलती जुलती संस्कृत धातु है वृ जिसमें और साफ नजर आ रहे हैं जिसका अर्थ है घेरना, लपेटना, ढकना, छुपाना और गुप्त रखना। इससे बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं। गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है। गोलाई दरअसल घुमाने, लपेटने की क्रिया का ही विस्तार है। वृत्त, वृत्ताकार जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं। छुपाने और गुप्त रखने के भाव पर गौर करें। किसी केन्द्र के इर्दगिर्द डाला हुआ घेरा, केन्द्र को सुरक्षित करता है, उसे छुपाता है, गुप्त रखता है। अर्थात वर् धातु में सुरक्षा का भाव भी प्रमुख है। इस तरह देगा-वरा का फ़ारसी रूप दीवार तैयार होता है जिसके हिन्दी में दीवाल, दिवार जैसे रूप बने। मराठी में इसे दिवाल, दिवार या दिवाळ लिखा जाता है। दिवाळ-शिकन्दर मराठी का सामासिक पद है जिसका आशय है सिकन्दर द्वारा बनाई गई मज़बूत दीवार।
दीवार के अर्थ में हिन्दी में अल्प प्रचलित किन्तु लोक बोलियों में खूब चलने वाला दूसरा शब्द है भीत जो बना है संस्कृत के भित्ति से। भित्ति में भी मूल रूप से विभाजित करने का भाव है। यह बना है संस्कृत धातु भिद् से जिसमें दरार, बाँटना, फाड़ना, विभाजित करने जैसे भाव हैं। कोई भी दीवार दरअसल किसी स्थान को दो हिस्सों में बाँटती है। एक समूचे मकान की दीवारें विभिन्न प्रकोष्ठों का निर्माण करती हैं। भित्ति से मराठी में भिन्त शब्द बनता है। प्राचीनकाल में विशाल चट्टानों पर चित्र बनाए जाते थे जिन्हें शैल-चित्र कहते हैं क्योंकि आदि मानव का निवास स्थान शैलाश्रयों में ही होता था। बाद में जब मनुष्य नें मकान बनाना सीख लिया तो उसकी दीवारें ही कैनवास बनीं। ऐसे चित्रों को भित्ति-चित्र कहा जाता है। भेद, भेदन, भेदना जैसे शब्द भी भिद् से तैयार हुए हैं। रहस्य के अर्थ में जो भेद है उसमें दरअसल आन्तरिक हिस्से में स्थित किसी महत्वपूर्ण बात का संकते है जो उजागर नहीं है। ज़ाहिर है इस बात को रहस्य की तरह माना गया, इसलिए भेद का एक अर्थ गुप्त या रहस्य की बात भी है। भेद को उजागर करने के लिए उस स्थान पर भेदने की क्रिया ज़रूरी है, तभी वह गुप्त बात सामने आएगी। भेदिया शब्द भी इसी धातु से तैयार हुआ है जिसका अर्थ है जासूस, भेदने वाला। कई बार प्रकार, अन्तर, फर्क आदि के अर्थ में भी भेद शब्द का प्रयोग होता है। बात वही विभाजन की है। किसी चीज़ के जितने विभाजन होंगे, उसे ही भेद कहेंगे जैसे नायिका-भेद यानी नायिकाओं के प्रकार। फूट डालने के अर्थ मे भेद ड़ालना मुहावरा भी प्रचलित है। “दीवारों के भी कान होते” हैं जैसी कहावत में दीवारों के पीछे छुपने वाले और वहाँ बसने वाले भेदों का ही तो संकेत मिलता है। -जारी
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Friday, December 2, 2011

उपन्यास की नवलकथा…

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हि न्दी में अंग्रेजी के नॉवेल novel के लिए कोई पर्यायी शब्द नहीं है। उपन्यास शब्द इस अर्थ में बीते क़रीब डेढ़ सौ साल से हिन्दी में है मगर यह बांग्ला भाषा से आयात किया गया था। हिन्दीभाषियों ने इस शब्द को खुशी-खुशी अपनाया है। उपन्यास जैसी विधा का प्रचलन दुनिया की किसी भी साहित्यिक परम्परा में बहुत प्राचीन नहीं है क्योंकि पुराने ज़माने में अधिकांश साहित्यिक अभिव्यक्ति का आधार गद्य नहीं, पद्य ही था। अपने आधुनिक पुस्तकाकार रूप में अंग्रेजी में सत्रहवीं सदी में नॉवेल दुनिया के सामने आया। जिस तरह से संस्कृत साहित्य में चम्पू विधा गद्य और पद्य का मिला जुला रूप है उसी तरह नॉवेल के भी पूर्वरूप ग्यारहवी-बारहवीं सदी में नज़र आने लगे थे। बहरहाल, भारत में अंग्रेजी नॉवेल की तर्ज़ पर ही सबसे पहले मराठी और बांग्ला भाषा में विशिष्ट कथा-लेखन शुरू हुआ इसे गद्य शैली में वृहदाकार कथा-आख्यान कहा जा सकता है। खास बात यह कि मराठी, बांग्ला और गुजराती भाषियों ने इस नई और तेज़ी से लोकप्रिय होती साहित्य विधा को सबसे पहले अपनाया और इसे उनकी मातृभाषा में मौलिक पहचान मिले इसके लिए बौद्धिक कसरत भी शुरू हुई। हिन्दीभाषियों ने सदा की तरह उदार रुख अपनाते हुए नॉवेल के लिए बांग्ला भाषा के ‘उपन्यास’ को अपना लिया।
बसे पहले ‘उपन्यास’ की बात। बांग्ला भाषा में अंग्रेजी के प्रभाव मे उन्नीसवीं सदी के मध्य से ही नॉवेल के कलेवर वाला कथा साहित्य रचा जाने लगा था। बांग्ला मध्यमवर्ग, बाबू समाज, औपनिवेशिक काल के परिवर्तनों को आधार बना कर कथानक लिखे जा रहे थे। अधिकांश विद्वान बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय लिखित ‘दुर्गेशनन्दिनी’ (1865) से बांग्ला उपन्यास की शुरुआत मानते हैं। बंकिमबाबू ने अपनी रचनाओं को उपन्यास कहा तो इस विधा के लिए यह नाम लोकप्रिय हो गया। हालाँकि आज भी कई लोग इस तथ्य को जान कर कसमसाते हैं कि ‘उपन्यास’ शब्द हिन्दी का अपना नहीं है। उपन्यास बना है उप+न्यास से। संस्कृत - हिन्दी का ‘न्यास’ बना है संस्कृत के न्यासः से जिसकी व्युत्पत्ति आप्टे कोश के मुताबिक नि+अस् में घञ् प्रत्यय लगने से हुई है। न्यास का अर्थ है रखना, आरोपण करना, स्थापित करना आदि। इसमें ‘उप’ उपसर्ग लगने से बनता है उपन्यास जिसका अर्थ निकट रखना, अगल-बगल रखना, वक्तव्य, सुझाव, प्रस्ताव, भूमिका या प्रस्तावना आदि है। अमरकोश में तमाम अर्थों का सार बताते हुए उपन्यास का अर्थ बातचीत प्रारम्भ करना बताया गया है जिसका अर्थ है भूमिका या प्रस्तावना। इस अर्थ में अमरकोश में उपन्यास के अतिरिक्त ‘वाङ्मुखम’ शब्द भी है जिसमें इसी अर्थ का द्योतन होता है। बाणभट्ट रचित ‘कादम्बरी’ को कई विद्वान उपन्यास विधा का प्रथम ग्रन्थ मानते हैं। कादम्बरी को चम्पू-ग्रन्थ कहा जाता है अर्थात गद्यपद्य का मिश्रित रूप। इसके बावजूद यह संस्कृत की काव्यकृति के तौर पर ही साहित्य जगत में स्थापित है। इतना ज़रूर है कि प्रचलित काव्य प्रवृत्तियों से हट कर इसमें विवरणात्मकता अधिक है और इसीलिए इसे गद्य प्रभाव माना गया।
राठीभाषियों का स्वभाव है कि वे अन्य भाषाओं के तकनीकी शब्दों को जस का तस स्वीकार नहीं करते। इसलिए उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब नॉवेल के लिए बांग्ला में ‘उपन्यास’ शब्द सामने आया तो मराठी में इसे क्या नाम दिया जाए, इस सवाल पर मराठी विद्वानों में विचार-मन्थन चल रहा था। शुरुआत में कल्पना के घोड़े अंग्रेजी के नॉवेल के आस-पास ही दौड़ रहे थे। इस आधार पर घड़े गए कुछ दिलचस्प नाम देखिए-नाव्हेल, नॉवल, नावेल, नाविल, नांवलु, नवलम्, नावले वगैरह वगैरह। इनमें से एक दो शब्दों को अन्य भाषाओं में अपनाया भी गया जैसे गुजराती में नवल-कथा। नवल, नवलम् में सुंदरता होने के बावजूद इसमें साहित्य सम्बन्धी अर्थ-बोध नहीं था। ऐसे में विद्वज्जनों को संस्कृत के उद्भट विद्वान की बाणभट्ट द्वारा सातवीं सदी में रची प्रसिद्ध

saraswat... आप्टे और मोनियर विलियम्स कोश में कादम्बरी का एक अर्थ सरस्वती भी मिलता है। दरअसल यह विद्या की देवी की एक उपाधि है। कदम्ब के वृक्ष के नीचे प्राचीन काल में ऋषि-मुनि विद्यादान किया करते थे। पुरानी तस्वीरों में सरस्वती की वीणावादिनी मुद्रा की पृष्ठभूमि में एक वृक्ष दिखाया जाता रहा है, शायद यह कदम्ब वृक्ष ही है। ...

रचना ‘कादम्बरी’ ने राह दिखाई। चर्चा चल पड़ी कि इस नई विधा को क्यों न कादम्बरी कहा जाए। यह बात भी सामने आई कि कादम्बरी तो इस आख्यान की नायिका है, उससे अभिप्राय कैसे सिद्ध होगा? पर ऐसा माना गया कि यह सर्वमान्य नहीं तो भी बहुमान्य अंग्रेजी के नॉवेल की तर्ज़ वाली कृति है, इसीलिए इसे नॉवेल का पर्याय बनाया जा सकता है।
संस्कृत का कादम्बरी शब्द कदम्ब से निकला है जो एक प्रसिद्ध वृक्ष का नाम है। कदम्ब का पेड़ यूँ तो समूचे भारत में है मगर दक्षिण भारत में बहुतायत में है। अक्सर नदियों के कछारों और नम इलाकों में यह होता है। संस्कृत में ‘अम्ब’ का अर्थ पानी होता है। ‘कदम्ब’ में निहित ‘अम्ब’ भी इस पेड़ के नामकरण के साथ इसी वजह से चस्पा है। ‘कादम्ब’ का अर्थ भी कदम्ब ही है और साथ ही इसका एक अर्थ है ‘बाण’। अब भला बाणभट्ट की प्रिय कृति का नाम तो कादम्बरी क्यों नहीं होना था? कादम्बरी का एक अन्य अर्थ है कदम्ब के फूलों से निर्मित शराब। मगर यह अर्थ उपन्यास के आशय से मेल नहीं खाता। मोनियर विलियम्स के अनुसार कादम्बरी पौराणिक पात्र चित्ररथ की पुत्री का नाम भी है। महामहोपाध्याय सिद्धेश्वरशास्त्री चित्राव के कोश के मुताबिक वैदिक युग से लेकर महाभारत काल तक चित्ररथ नाम के 15 पौराणिक पात्र मिलते हैं। कादम्बरी का एक अर्थ कोयल भी है। बहरहाल, कादम्बरी नाम का सही सन्दर्भ इससे भी पता नहीं चलता। आप्टे और मोनियर विलियम्स कोश में कादम्बरी का एक अर्थ सरस्वती भी मिलता है। दरअसल यह विद्या की देवी की एक उपाधि है। कदम्ब के वृक्ष के नीचे प्राचीन काल में ऋषि-मुनि विद्यादान किया करते थे। पुरानी तस्वीरों में सरस्वती की वीणावादिनी मुद्रा की पृष्ठभूमि में एक वृक्ष दिखाया जाता रहा है, शायद यह कदम्ब वृक्ष ही है। जो भी हो, कादम्बरी शब्द में विद्या, सरस्वती की अर्थस्थापना से नॉवेल का कादम्बरी नामान्तरण तार्किक लगता है। मराठी में और भारतीय भाषाओं में पहले उपन्यास का श्रेय भी विधवाओं के जीवन की दुर्दशा पर आधारित मराठी उपन्यास यमुना पर्यटन को दिया जाता है जिसे 1857 में बाबा पद्मजी ने लिखा था।
गुजराती में उपन्यास के लिए नवलकथा शब्द प्रचलित है। यह शब्द उन्हीं दिनों गुजराती में अपना लिया गया था, जब सवा सौ साल पहले मराठी में उपन्यास का पर्याय खोजने की बौद्धिक कवायद चल रही थी। दरअसल इस नवलकथा में नई कहानी का भाव न होकर नई गद्य विधा का भाव था। साथ ही यह उसी मूल से बनाया गया था जिस मूल से खुद नॉवेल शब्द उपजा है। नॉवल भारोपीय भाषा का शब्द है और अंग्रेजी में लैटिन के novella से आया जिसमें नया, नवल का ही भाव था। इस नवल और नॉवेल के बीच जो रिश्तेदारी है वह नएपन की ही है। इससे पहले यूरोप में उपन्यास के लिए रॉमाँ शब्द का प्रचलन था और अब भी है। यह फ्रैंच भाषा में पहले से परिचित है। उपन्यास की रंजकता, रुमानियत जैसे गुणों की वजह से एक विशिष्ट कथाशैली के लिए यह नाम रूढ़ हुआ। जर्मन में यह रोमान है और रूसी में रॉमान। आज यूरोपीय भाषाओं में इतालवी में उपन्यास के लिए रोमान्ज़ो, स्पैनी में नोविला, फ्रैंच में रॉमाँ, जर्मन् में रोमान, बास्क में एल्बेरी-नोबेला, वैनिशियन में रोमेन्सो और वेल्श में नोफेल है। आज हर विषय पर उपन्यास लिखे जा रहे हैं। उपन्यास नाम की विधा के मूल में चाहे रुमानियत भरी शुरुआत रही हो, मगर नॉवेल में जो नएपन की खुश्बू है, उसी वजह से देखते देखते सिर्फ़ डेढ़सौ बरसों में उपन्यास-लेखन साहित्य की सबसे पसंदीदा विधा बन गई है।

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Wednesday, November 30, 2011

हिन्दी में सिमट गई ‘वारदात’

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का मयाब घुसपैठिया कौन है? ज़ाहिर है जो मनचाही जगह में प्रवेश भी कर जाए और किसी को कानोकान ख़बर न हो। साथ ही उसका कुछ नुक़सान भी न हो। मगर समझदार घुसपैठिया इस कामयाबी के लिए बिना ज्यादा बोझ उठाए दूसरे की हद लांघता है। बहुत सारे बोझ के साथ घुसपैठ करने में कामयाबी नहीं मिलती। कई बार शक्ल भी बदलनी पड़ती है, बहुरूपिया बनना पड़ता है। एक भाषा से दूसरी भाषा में शब्दों की आवाजाही भी कुछ इसी अन्दाज़ में होती है। नई भाषा में घुसपैठ करने वाले शब्द की अर्थवत्ता कई बार वह नहीं रह जाती जो उसकी मूल भाषा में थी। वारदात भी ऐसा ही एक शब्द है। कुछ घटिन होने के सन्दर्भ में हिन्दी में आमतौर पर वारदात का प्रयोग होता है। वारदात के अरबी निहितार्थ कुछ और थे मगर हिन्दी में इस शब्द में अर्थसंकोच हुआ है।
वारदात सेमिटिक मूल का शब्द है और अरबी भाषा से फ़ारसी में होते हुए हिन्दी में आ समाया है। अरबी में वारदात की अर्थवत्ता व्यापक है मगर हिन्दी में इसे सीमित अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है। वारदात घटना है, मगर इस शब्द का प्रयोग सामान्य घटना के तौर पर नहीं होता। वारदात शब्द का प्रयोग हिन्दी में आमतौर पर आपराधिक गतिविधि के सन्दर्भ में होता है। जैसे चोरी, डकैती, हत्याकाण्ड, लूटमार, गिरफ्तारी आदि। चुनावी सभा में नेता का मंच से गिर जाना वारदात नहीं है, मगर इसी सभा में नेता पर हमले की घटना वारदात की श्रेणी में आती है। वारदात सेमिटिक धातु व-र-द से बना है। बदावी और हलीम की अरेबिक-इंग्लिश कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक इसमें व्याप्त होने, जाने, आने, गति करने, फूल का खिलना, फूलना, विकसित होना, पुष्पगुच्छ, नुमांया होना जैसे भाव भी हैं। इसके अलावा इसमें समूह, झुण्ड, एकत्रित होने, प्रविष्ट होने जैसे आशय भी हैं। कुल मिला कर व-र-द एक समूह वाची धातु भी है। किसी भी घटना में ज़ाहिर है, यही क्रियाएँ होती हैं। अरबी में इससे वारिद शब्द बनता है जिसका बहुवचन है वारिदा या वरादा। हिन्दी-फ़ारसी में इसका रूपान्तर वारिदात या वारदात होता है।
सेमिटिक धातु व-र-द में जो व्याप्त होने, आने और गति का जो भाव है उससे बने वारिदा / वरादा का अर्थ है घटना, प्रवेश या आमद। व-र-द के समूहवाची आशय पर ध्यान देते हुए बतौर घटना, इसकी अर्थवत्ता और स्पष्ट होती है। किसी घटना में बहुत सी चीज़ें एक साथ होती हैं और वहाँ क्रिया और प्रतिक्रिया दोनो नज़र आते हैं। उल्कापात सिर्फ़ उल्का का गिरना नहीं है, बल्कि उसके गिरने से उत्पन्न स्थितियाँ उसे घटना बनाती हैं। अरबी में यह वारिदा है, मगर हिन्दी में यह बड़ी घटना ही होगी, न कि वारदात। अलबत्ता वारदात में समूहवाची सारी बाते हैं। लोगों का आना-जाना, समूह का होना, किसी परिस्थिति का निर्माण होना जैसी बातें ही घटना होती हैं। दुर्घटना में भी यही सारी स्थितियाँ होती हैं। हाँ, संयोग-दुर्योग जैसी बातें भी वारदात में शामिल हैं मगर इन अर्थों में भी इसका प्रयोग हिन्दी में नहीं होता।कुल मिलाकर अरबी की व्यापक अर्थवत्ता वाली वरादा क्रिया हिन्दी में वारदात बनकर सिमट गया। हिन्दी में वारदात का अर्थ सिर्फ़ आपराधिक घटना है और यह पुलिस रोज़नामचे और अख़बारों में इसे ख़ास रुतबा मिला हुआ है।

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