Saturday, January 16, 2016

‘उलाहना’ तो प्रेरणा है, भर्त्सना नहीं


ळमा और ‘उरहन’ जैसे शब्दों में कुछ समानता नज़र आती है ? इन दोनों के बीच मारवाड़ और ब्रज के बीच की दूरी ज़रूर है पर दोनों का मूल एक ही है। दरअसल हिन्दी में जिसे उलाहना कहते हैं उसका राजस्थानी रूप ओळमा है और ब्रज, अवधी रूप उरहन या उराहन/ उराहना हैं। इसमें में शिकवा-शिकायत का भाव है या निन्दा का ? दरअसल हिन्दी के शब्दकोश तो ये दोनों ही भाव बताते हैं पर हमारा मानना कुछ और है। उपालम्भ में निन्दा करने, दोष गिनाने, शिकवा करने से ज्यादा उसे प्रेरित करने, प्रवृत्त करने, सचेत करने, समझाने, अनुभव कराने के आशय ज्यादा हैं।

उलाहना शब्द का रिश्ता संस्कृत के उपालम्भ से जोड़ा जाता है। इसका प्राकृत रूप उवालंभ है। इसका विकास ओलंभ होता है। राजस्थानी में यह ओळमा हो जाता है। उपालम्भ का अर्थ है धिक्कार, भर्त्सना, झिड़क, कोसना, घुड़की, आक्षेप, तिरस्कार, निन्दा, दुर्वचन, कुबोल, डाँट या वर्जना, निषेध, रोक, पाबंदी आदि। उपालम्भ बना है उप+आलम्भ से। हिन्दी में आलम्भ शब्द में छूने, स्पर्ष करने, अपनाने जैसे आशय हैं। इसमें ‘उप’ सर्ग जुड़ने से आशय एकदम स्पष्ट होता है।

किसी आश्रय के ज़रिये, किसी बहाने से छूना, स्पर्ष करना या अधिकार जताना-अपना बनाना। ध्यान रहे उपालम्भ के जितने भी अर्थ हमने ऊपर देखे वे सभी नकारात्मक हैं। हालाँकि उनका आशय यह लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को वास्तविकता का बोध कराने के लिए कहे गए कटुबोल दरअसल उसे अपना बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। किन्तु प्रश्न यही है कि उलाहना का अर्थ सीधे सीधे गाली या दुर्वचन नहीं है। उलाहना में हमेशा तिरस्कार, भर्त्सना या धिक्कार का भाव भी नहीं होता। अलबत्ता उसमें आक्षेप, व्यंग्य ज़रूर होता है।

हमारा मानना है कि हिन्दी के ‘उलाहना’ का विकास प्राकृत के उपलंभणा से हुआ है जिसका संस्कृत प्रतिरूप ‘उपलम्भन’ है। ध्यान रहे उपलम्भना में बोध, समझ, अनुभव के साथ ही देखना, बूझना जैसे भाव भी हैं। उलाहना इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि आप किसी को कोसना चाहते हैं, बल्कि उलाहना उसे दिया जाता है जिससे अपेक्षित प्रतिसाद न मिले, जो अपने कर्तव्य को भूल जाए। उलाहना चेतना जगाता है, जागरुक करता है, जिम्मेदारी की याद दिलाता है। उपलम्भना या उपालम्भ दोनों ही शब्दों के मूल में लभ् धातुक्रिया है जिसमें पाना, सोचना, समझना जैसे भाव हैं। ध्यान रहे ‘ल’ का रूपान्तर ‘र’ में होता है। ‘लभ्’ का अगला रूप ‘रभ्’ होता है। जिस तरह ‘लभ्’ से ‘लम्भ’ होता है उसी तरह ‘रभ्’ से ‘रम्भ’ होता है। ‘रम्भ’ से ही ‘आरम्भ’ भी बनता है जिसका अर्थ है शुरुआत। उलाहना इसी नई शुरुआत के लिए तो दिया जाता है।

तो उलाहना में दरअसल इसी शुरुआत का संकेत है, उत्प्रेरण है। उपलम्भना > उवलम्भना में ज्ञानप्राप्ति भी है और आक्षेपयुक्त प्रेरणा भी। रत्नावली का उलाहना ही तुलसी के लिए मानस-सृजन की प्रेरणा बना। इसलिए हमारा स्पष्ट मानना है कि उलाहना के मूल में उपालम्भ नहीं बल्कि उपलम्भणा है। इसकी पुष्टि हरगोविंददास त्रिकमचंद सेठ के प्राकृत कोश “पाइय सद्द महण्णवो” से भी होती है। हिन्दी के उलाहना का विकास उपलंभणा > उवलंभना > उलांभना > उलाहना के क्रम में हुआ है। राजस्थानी ओळमा भी उपलंभणा से ही उळांभणा >ओळमा के क्रम में सामने आया। ब्रज/ अवधी का उराहना भी इसी कड़ी में उपलंभणा > उराहना > उरहन से विकसित हुआ है।

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Friday, January 15, 2016

सुब्हान तेरी कुदरत यानी ‘सुभानअल्ला’



मो हतसिब तस्बीह के दाने पे ये गिनता रहा
किन ने पी, किन ने न पी, किन किन के आगे जाम था

मुमकिन है इस मशहूर शेर को पढ़ कर आप सुभानअल्ला कह उठें। ये है ही इस लायक। पर आप ‘सुभानअल्ला’ ये सुनकर भी कहेंगे कि ‘तस्बीह’ और ‘सुभान’ दोनो बहन-भाई हैं। ‘सुभानअल्ला’ को बतौर प्रशस्तिसूचक अव्यय हिन्दी में भी बरता जाता है। यूँ इसका प्रयोग विस्मयकारी आह्लाद प्रकट करने के लिए भी होता है। यह लगभग ‘क्याब्बात’, ‘अद्भुत’ या ‘ग़ज़ब’ जैसा मामला है। यूँ सुभानअल्ला में बहुत अच्छा, धन्य-धन्य अथवा वाह-वाह जैसी बात है। ऐसा भी कह सकते हैं कि सुभानअल्ला में vow factor भी है। जानते हैं सुभानअल्ला की जन्मकुण्डली।

सुभानअल्ला अरबी से बरास्ता फ़ारसी हिन्दी में आया है। यह एक शब्द नहीं बल्कि संयुक्त पद है। मूल रूप से अरबी का ‘सुब्हान’ ही हिन्दी में सुभान बन कर ढल गया। अरबी सुब्हान बना है त्रिवर्णी मूलक्रिया सबाहा ح ب س
यानी सीन-बा-हा से जिसमें परमेश्वर के गुणगान और प्रशस्ति का भाव है। इसका ही विकसित रूप है सुब्हान سبحان (सीन बा हा अलिफ़ नून) जिसका फ़ारसी रूप सोब्हान होता है और हिन्दी सुभान।

दरअसल सबाहा यानी सीन-बा-हा में जो मूल भाव है उसमें अनंत का भाव है मसलन विशाल जलराशि में तैरना, वह सब जो दृष्टिपटल के सामने है, जो नज़रों में है उसके वैभव को अनुभव करना। तैरते हुए देखने के इस भाव को हिन्दू संस्कृति में संसार को भवसागर मानने के रूपक से समझा जा सकता है। उस अनंत को निहारना, उसकी विशालता को अनुभव करते हुए उसमें बने रहने का भाव ही सबाहा का मूल है। और हासिल ? हासिल वह है जो बलदेवप्रसाद मिश्र की इस कविता के ज़रिये ज़ाहिर होता है-

जिस ओर निगाहें जाती हैं
उसके ही दर्शन पाती हैं
सम्पूर्ण दिशाएं सुख -सानी
उसका ही गौरव गाती हैं
तो सबाह से बने सुब्हान में सचमुच सुब्हान तेरी कुदरत का ही आशय है। प्रकृति से कोई पार नहीं पा सका है। प्रकृति ही ईश्वर है। जो कुछ हमने नहीं रचा, पर जो सब हमारे लिये है। ऐसी अनुभूति के बाद अगर सुभानअल्ला जैसी उक्ति ही निकलती है।

इसी सबाहा से विकसित हुआ एक और शब्द है तस्बीह यानी सुमिरनी जिसका जन्म सुमिरन से हुआ। विश्व की कई प्राचीन संस्कृतियों में नाम स्मरण की परम्परा रही है। इस्लाम में भी नाम स्मरण का रिवाज़ है। परम्परा के अनुसार सुमिरनी को हाथ में पकड़ कर उस पर एक छोटी सफेद थैली डाल ली जाती है। तर्जनी उंगली और अंगूठे की मदद से नाम स्मरण करते हुए सुमिरनी के दानों को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। सुमिरनी दरअसल एक उपकरण है जो नामस्मरण की आवृत्तियों का स्मरण भक्त को कराती है।

संस्कृत के स्मरण से विकसित है सुमिरन। स्मरण > सुमिरण > सुमिरन के क्रम में इसका विकास हुआ। पंजाबी में इसका रूप है ‘सिमरन’ जहाँ प्रॉपर नाऊन की तरह भी इसका प्रयोग होता है। व्यक्तिनाम की तरह स्त्री या पुरुष के नाम की तरह सिमरन का प्रयोग होता है। बहुतांश हिन्दीवाले पंजाबी के ‘सिमरन’ की संस्कृत के ‘स्मरण’ से रिश्तेदारी से अनजान हैं क्योंकि सुमिरन की तरह से पंजाबी के सिमरन का प्रयोग हिन्दीवाले नहीं करते हैं बल्कि उसे सिर्फ व्यक्तिनाम के तौर पर ही जानते हैं। स्मरण शब्द बना है संस्कृत की ‘स्मर्’ धातु से। मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश के मुताबिक स्मर् में याद करना, न भूलना, कंठस्थ करना, याददाश्त जैसे भाव हैं। अंग्रेजी के मेमोरी से इसकी रिश्तेदारी है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक लैटिन के मैमॉर् अर्थात स्मृति में ‘मर्’ के स्थान पर मॉर है। संस्कृत के स्मर, स्मरण, स्मृति में स-युक्त यही मर् है।

तो जब कभी किसी अनिवर्चनीय अनुभव से गुज़रें, किसी अनोखेपन के लिए मुँह से प्रशस्तिसूचक ‘वाह’ निकले तो सुभानअल्ला कहने में गुरेज़ न करें। और हाँ, खुदा की कुदरत को भी सुब्हान कहें और “मेरे महबूब को किसने बनाया” ये पहेली खुदा को बूझने दीजिए।
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Friday, January 1, 2016

2016 के आगे क्या लिखेंगे- ‘सन्’ या ‘सन’


र नया साल बदलाव को अभिव्यक्त करने वाली इकाई भर है। एक ऐसा आँकड़ा जो पिछले वर्ष की तुलना में एक अंक ज्यादा होता है। इसे हिन्दी में ज्यादातर ‘सन्’ यानी 'न' में हलन्त लगाकर अभिव्यक्त किया जाता है। यह हैरत की बात है कि इसके सही उच्चारण और वर्तनी के मामले में हिन्दी कोशों में काफ़ी अन्तर नज़र आता है। हलन्त की वजह से अनेक लोगों को भ्रम भी होता है कि यह संस्कृत का शब्द है जबकि असल में यह अरबी आप्रवासी है और हिन्दी वालों की ज़बान पर भी चढ़ा हुआ है। सन बना है س ن ة यानी सीन-नून-हा से और यह शब्द "रास अस सनाह अल हिजरियाह" رأس السنة الهجرية पद के ज़रिये भारत में आया जिसका अर्थ होता है इस्लामी नव संवत्सर।

अरबी में सीन-नून-हा س ن ة धातुक्रिया का अर्थ होता है वर्ष, साल, अवधि, समय, काल, मौका, युग, ऋतु, वर्ष, मौसम, सुअवसर आदि। एक बड़ी खूबसूरत अर्थव्यवंजना सामने आती है। इसमें समय के बीतते जाने का भाव भी है और कायम रहने का भी। ध्यान रहे, काल व्यतीत होता जाता है फिर भी रीतता नहीं। समय जाता है और आता है, हाँ, लौटता नहीं। तो यही काल-प्रवाह है 'सन'।

'सन' में एक और सुंदर आशय निहित है- गुणवत्ता में परिवर्तन। अक्सर लोग हर नए साल पर कुछ नया करने, बदलाव लाने के प्रति खुद के साथ या किन्हीं अपनों के साथ कुछ प्रस्ताव पारित करते हैं, कुछ अनुबन्ध करते हैं, कुछ पाबन्दियाँ लगाते हैं, कुछ शपथ लेते हैं और यह सब इसलिए ताकि कुछ बदलाव आए। यह जो बदलाव है यह जीवन की बेहतरी के लिए ही तो है। बस, यही है गुणवत्ता में परिवर्तन। आप जो कल थे, बेहतर भविष्य के लिए अब खुद को बदलना चाहते हैं। यह खुद में गुणात्मक बदलाव लाना है।

हिन्दी मे 'सन' को हलन्त लगाकर सन् की तरह बरता जाता है। इसकी वजह समझ से परे है जबकि मूल अरबी की वर्तनी और उच्चार سنة (सीन-नून-हा) में हलन्त नहीं, विसर्ग है और उसका उच्चार सनः या सनह होता है। अगर बिना विसर्ग के लिखना हो तो سن सन (सीन-नून) लिखा जाएगा। गौरतलब है, ये दोनों ही प्रविष्टियाँ मुहम्मद मुस्तफ़ा खाँ ‘मद्दाह’ के कोश में भी दी गई हैं। हिन्दी कोशों में भी इसे अलग अलग ढंग से दर्ज़ किया गया है। करीब नब्बे साल पुराने हिन्दी शब्दसागर में इसे हलन्त लगाकर ही दर्ज़ किया है।

इसी तरह केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित उर्दू-हिन्दी परिचय कोश में सीताराम शास्त्री हलन्त लगाकर सन् लिखते हैं किन्त उर्दू वर्तनी में यह सन ही पढ़ा जाता है। गौरतलब है कि फ़ारसी, अरबी के विसर्गयुक्त शब्दों का उच्चार बोलचाल की भाषा में ‘आ’ स्वर के साथ होता है मसलन घर के अर्थ में 'खानः' का उच्चार 'खाना' हो जाता है, 'मुर्दः' का उच्चारण 'मुर्दा या मुरदा' हो जाता है इसी तरह सनः का उच्चार 'सना' हो जाता है जो एक लोकप्रिय स्त्रीवाची नाम भी है अलबत्ता वर्ष के अर्थ में इसका उच्चार 'सन' ही है। अरविन्दकुमार-कुसुमकुमार के हिन्दी थिसारस में भी ‘सन्’ के स्थान पर ‘सन’ ही दर्ज़ किया गया है।

मज़े की बात यह कि ज्ञानमण्डल के दो शब्दकोश इसकी अलग अलग वर्तनी बताते हैं। मुकन्दीलाल श्रीवास्तव/ कालिकाप्रसाद सम्पादित कोश में हलन्त रहित ‘सन’ है जबकि हरदेव बाहरी के कोश में सन् को हलन्त के साथ दर्ज़ किया गया है। गड़बड़झाला यही खत्म नहीं होता। एक ही सम्पादक के दो अलग-अलग कोशों में वर्तनी भी भिन्न है। रामचन्द्र वर्मा के बृहत कोश में भी सन का इन्द्राज बिना हलन्त लगाए हुआ है। दिलचस्प यह भी है कि रामचन्द्र वर्मा ही सबसे पुराने कोश “हिन्दी शब्दसागर” के सम्पादक मण्डल में भी शामिल थे जिसमें हलन्तयुक्त व्युत्पत्ति है।

मेरे संग्रह में पचास से ज्यादा कोश हैं और फ़िलहाल उन्हें पलटने का मौका नहीं मिला है। देखना चाहूँगा कि बरताव का यह अन्तर कहाँ कहाँ कायम है। ज़ाहिर है कुछ हलन्त लगा रहे होंगे और कुछ नहीं। कम से कम यह तो पता चलेगा कि बहुमत किस उच्चार/ वर्तनी के साथ है। इस सिलसिले में हम गूगल बाबा का सर्वे ज़रूर सामने रखना चाहेंगे। गूगल बिना हलन्त वाले सन की 4 लाख 48 हज़ार प्रविष्टियाँ उगलता है जबकि हलन्त वाला सन् लिखने पर पल भर में 50 करोड़ प्रविष्टियाँ उगल देता है। ज़ाहिर है, हलन्त लगा हुआ उच्चार ही हिन्दी में सर्वाधिक प्रचलित है मगर उसे अरविन्द कुमार का हिन्दी थिसारस भी मान्यता नहीं देता।

ऐसा लगता है कि हिन्दी सम्पादकों में हलन्त लगाने की सोच इसलिए बनी होगी क्योंकि हिन्दी में एकाधिक सन' हैं जैसे एक पौराणिक नाम, जूट के लिए प्रचलित सन अथवा ध्वनिसूचक सन आदि। अरबी के सन को उससे भिन्न दिखाने के लिए उसके साथ हलन्त लगा दिया गया होगा। इस सिलसिले में हमारा स्पष्ट मानना है कि वर्तनी अपनी जगह और सन्दर्भ अपनी जगह। वर्ष के अर्थ में सन का प्रयोग हमेशा अंकों के साथ ही होता है। किसी झमेले की गुंजाईश कहाँ ?

तो नए साल में यह भी तय कर लें कि 2016 के आगे लिखे सन के साथ हल् रखना है या नहीं। बहरहाल, सबको नया साल शुभ हो।

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शिलाओं में बसी आबादियाँ

श्चिमी एशिया का एक विश्वख्यात पर्यटन स्थल है पेट्रा। जॉर्डन की इस शिला-नगरी का प्राचीन सामी ज़बान में नाम है 'सेला' जिसका अर्थ चट्टान या शिला होता है। खासतौर पर आशय चट्टानी दरार से है। इस शहर के सभी आवास चट्टानों को तराशकर बनाए गए थे। सामान्य घर से लेकर भव्य प्रासाद तक। दरअसल यह प्राचीन सेमिटिक सभ्यता का बड़ा केन्द्र था। इसका शुमार दुनिया के सात अजूबों में भी होता है। ग्रीक में पेट्रा का अर्थ पत्थर, चट्टान, पाषाण होता है। इसी तरह भारत में पश्चिम से पूर्व तक तक्षशिला, कुरुशिला, प्रेतशिला, विक्रमशिला और धर्मशिला जैसे प्राचीन विद्याकेन्द्र मूलतः मानव बसाहटें थीं। किसी न किसी तौर पर इनका नाता पर्वतीय उपत्यका से रहा इसलिए इनके नाम के साथ शिला शब्द चस्पा हुआ।

प्राचीन मानव का पहला आश्रय चट्टानी दरारें ही बनी, बाद में इन्हें तराश कर आश्रय बनाने का हुनर भी इनसान ने सीख लिया। हिब्रू ने भी प्राचीन सेमिटिक के 'सेला' शब्द को जस का तस अपनाया जो शिला का पर्याय या प्रतिरूप था। भाषाविज्ञानियों का मानना है कि ग्रीक लोगों ने इस महान चट्टानी शहर का ‘पेट्रा’ नाम ‘सेला’ के ग्रीक प्रतिरूप ‘पेट्रा’ के बतौर चलाया। बाइबल में सेला का उल्लेख है, पेट्रा का नहीं। अरबी में सेला के कई प्रतिरूप हैं जैसे सुल्ल, सुल्ला यानी चट्टान। सेल्ले, सेल्ला या सिलात यानी पत्थर के पाट, पटिये, फलक या खण्ड। इन सब शब्दों की संस्कृत के शिला से समानता ध्यान देने योग्य है। संस्कृत में सिल, शिल जैसे शब्द भी हैं और सिला या शिला भी।

हम यही कहना चाहते हैं कि प्राचीन काल में चट्टानी आश्रयों के सहारे ही मानव बसाहटें हुईं। सेला या पेट्रा ऐसी ही प्राचीन बसाहट थी। यह पुख़्ता प्रमाण हैं कि अत्यन्त प्राचीन काल से आप्रवासन के ज़रिये भाषायी लेन-देन भी चल रहा था। वैदिक शिला के जितने सामी प्रतिरूप ऊपर देखे उतने संस्कृत या अन्य सजातीय भाषाओं में नहीं है, बस शिला, शैल या सिला ही हैं। फ्रांस का एक छोटा सा शहर है 'ला रोश्शेल' इसमें भी शेल, सेल, शिला को तलाशना आसान है। ला रोश्शेल का अर्थ है छोटी चट्टान। अंग्रेजी का Shells भी इसी कड़ी में आता है जिसका अर्थ काट-छाँट, तराशना, गोला, आवरण या पिण्ड होता है।

शिला-नगरों की परम्परा पुरानी रही है यह समरकन्द से भी साबित होता है। उज़्बेकिस्तान के इस प्राचीन शहर के नाम का रिश्ता संस्कृत के ‘अश्म’ से है। अश्म यानी पत्थर। अश्म का ईरानी रूप हुआ अस्मर। खण्ड का अर्थ होता है टुकड़ा, बस्ती, पिण्ड, समूह आदि। इसका ईरानी रूप कंद हुआ। ज़ाहिर है अस्मरकंद से ही समरकंद रूप सामने आया जिसमें पाषाण-नगर का भाव है।

पेट्रोलियम शब्द भी पेट्रा (पत्थर) के साथ ग्रीक ओलियम (तेल) जुड़ने से बना है। इसी तरह मिट्टी का तेल पेट्रोलियम का बहुत सरलीकृत रूप है, जबकि जीवाश्म ईंधन इसका सही अनुवाद है जो मूलतः पेट्रोलियम से न होकर फॉसिल ऑइल का सही अनुवाद है। फॉसिल का अर्थ होता है जीवाश्म जो जीव+अश्म से मिलकर बना है। अश्म शब्द का मतलब संस्कृत मे होता है चट्टान या पत्थर। इसका मतलब जीवधारियों के उन अवशेषों से है जो लाखों-करोड़ों वर्षों की भूगर्भीय प्रक्रिया के तहत प्रस्तरीभूत हो गए।

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मुनादी के बहाने ...

भाषा परिवारों की रिश्तेदारी के मामले में सबसे ज्यादा काम भारत-ईरानी, भारत-यूरोपीय सन्दर्भों में सामने आता रहा है। यूँ ग्रीक, लैटिन, स्पैनिश आदि भाषाओं के शब्दों की आवाजाही अरबी में खूब हुई है पर भारत-ईरानी परिवार विशेष तौर पर वैदिक काल के शब्द भी सेमिटिक परिवार की भाषाओं में ख़ासतौर पर अरबी में दाखिल होने के प्रमाण मिलते हैं, किन्तु उन पर व्यवस्थित काम नहीं हुआ। हिन्दी में 'मुनादी' शब्द का प्रयोग आम तौर पर होता है यह भी सेमिटिक मूल से ही उपजा है और इसका अर्थ है घोषणा या ऐलान करना। अरबी में नाद / नाज दो ऐसी धातुएं हैं जिनमें चीख, शोर, पुकार, कराह, रोना-पीटना जैसे भाव शामिल हैं। नाद में ‘मु’ उपसर्ग लगने से बनता है मुनादी जिसका अर्थ हुआ ऊँची आवाज के साथ बोलना अर्थात घोषणा करना। इसी तरह नाज से बने मुनाजत शब्द का मतलब होता है प्रार्थना करना। अरबी के 'ना'द और संस्कृत के 'नाद' में समानता पर गौर करें- इन सभी शब्दों में ऊँची आवाज और कोलाहल स्पष्ट हो रहा है। हिन्दी-संस्कृत का नाद बना है संस्कृत नद् से जिसमें यही सारे भाव समाए हैं। हिन्दी-उर्दू के प्रसिद्ध शायर है निदा फ़ाज़ली। उर्दू में 'निदा' का अर्थ होता है पुकार या आह्वान। यह इसी मूल से निकला शब्द है।

अरबी का नाद बना है सेमिटिक धातु नून-दा-वाव अर्थात و-د-ن से जिसकी बहुआयामी अर्थवत्ता है। एक ओर जहाँ जलवाची भाव हैं जैसे शीतलता, ठंडक, नमी, गीला, सीला आदि वहीं दयालुता, भद्रता, सज्जनता जैसे भाव भी हैं। इसी तरह इसमें ध्वनि, पुकार, शोर का भाव है तो समूह, बैठक, सभा या जमावड़े का आशय भी इससे प्रकट होता है। जहाँ तक वैदिक शब्दावली के नाद का प्रश्न है, उसमें निहित ध्वनि, कोलाहल या घोष करने जैसे आशय अरबी के नाद में भी स्पष्ट हो रहे हैं किन्तु ध्वनिपरक आशयों से हटकर जलवाची भाव भी अरबी के नाद में हैं उनका वैदिकी/ संस्कृत के नाद से क्या कोई अर्थसाम्य निकलता है? इसे समझने के लिए वैदिकी/ संस्कृत नाद के मूल नद् को देखना होगा जिसमें दरिया, महाप्रवाह जैसे आशय हैं।

नद् शब्द से ही बना है नदी शब्द जो बेहद आम है। गौर करें कि नदी यानि सलिला, सरिता, धारा, तरला, नदिया, सिंधु निर्झरिणी आदि शब्दों के में उजागर प्रवाहवाची भाव पर। सवाल उठता है नदी शब्द की उत्पत्ति नद् धातु से क्यों हुई जिसके तमाम अर्थ शोर, ध्वनि, गर्जना से जुड़ते हैं? इसका उत्तर नदी के एक और पर्यायवाची में छुपा है। नदी को शैलबाला, पर्वतसुता या पार्वती भी कहा जाता है। ज्यादातर धाराओं का प्राकृतिक उद्गम पर्वतों से ही होता है। ऊँचे पर्वतों से जब जलधाराएं नीचे की ओर यात्रा शुरु करती हैं तो चट्टानों से टकरा कर घनघोर ध्वनि के साथ नीचे गिरती हैं। यह शोर है। यही गर्जना है। यही नाद है। हिन्दी के सिंहनाद, जयनाद, हर्षनाद, आर्तनाद जैसे शब्दों में ध्वनि-आवाज़ के अर्थ में यही नाद झाँक रहा है।

गौर करें कि बड़ी नदियों के साथ भी नद शब्द जोड़ा जाता है जिसमें विशाल जलक्षेत्र अथवा समुद्र का भाव है। ब्रह्मपुत्र को विशाल जलराशि की वजह से ही नदी नहीं नद कहा जाता है। ग्लेशियर के लिए हिमनद शब्द इसी लिए गढ़ा गया। स्पष्ट है कि अरबी के नाद में शीतल, आर्द्र, नमी जैसे जलवाची आशय वैदिकी वाले नाद से ही गए हैं। यह स्पष्ट है कि अरब क्षेत्र में घर्घर करती नदियाँ नहीं है इसलिए नाद वाली जलवाची अर्थवत्ता का विकास होना वहाँ तार्किक नहीं लगता।

मुस्लिम संगठनों का ज़िक़्र चलने पर अकसर नदवातुल उलेमा, नदवातुल इस्लाम या नदवातुल मुजाहिदीन जैसे पद सुनने को मिलते हैं। इसमें जो नदवा है वह भी इसी मूल का है। गौर करें अरबी नाद में समुच्चयवाची आशय भी हैं। वैदिक नाद के सन्दर्भ में इसे समझें तो प्रपात से गिरती घर्घर जलराशि सतह पर पहुँच कर संचित ही होती है। यह संचय, समुच्चय ही है। नदवा में एक साथ समूह और घोषणा जुड़े हुए हैं। पुराने दौर में धार्मिक, कौटुम्बिक मामले बैठकों में निपटाए जाते थे। नदवा ऐसी ही सभा है। स्वाभाविक है कि सभा में अध्यक्ष की ओर से सर्वसम्मति से घोषणाएँ भी होंगी ही। एक शब्द की बहुत सी अर्थछटाएँ होना किसी भी भाषा को समृद्ध बनाता है किन्तु इन अर्थछटाओं का विकास किन किन चरणों से गुज़रने के बाद होता है यह जानना ही शब्दों का सफ़र है।

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मालवी गमन्या और गेल्या

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मू ढ़मति, सुस्त, आलसी, बेवकूफ़, बुद्धू, जड़मति, ग़ाफ़िल या गँवार की अर्थवत्ता वाले मालवी ज़बान के दो शब्द अक्सर याद आता है गमन्या और गेल्या गौर करें मूढ़ या जड़ व्यक्ति किसी बात को देर से समझता है। मूढ़ तो बना ही मुग्ध से है। मुग्ध जिसका ध्यान कहीं ओर है, जो खोया हुआ है अर्थात जो सुध-बुध में नहीं है। ज़ाहिर है जो ठिकाने पर नहीं है, इधर-उधर है, वह चीज़ गुमशुदा ही मानी जाएगी। चूँकि दिमाग़, बुद्धि हमेशा साथ रहनी चाहिए, पर अगर वह न हो तो उसे ग़ायब दिमाग़ कहा जाता है। मूढ़ या जड़ के साथ यही होता है। दुनियादारी की जिन बातों की अपेक्षा सामान्य व्यक्ति से की जाती है मूर्ख को वह भी नहीं पता रहती क्योंकि उसका ध्यान कहीं ओर होता है।

संस्कृत में जाने, चलने, गति करने, कहीं निकल जाने के भावों के भाव गम् धातु में अभिव्यक्त होते हैं । गमन एक क्रिया है जिसका अर्थ है जाना । यह हिन्दी में भी प्रचलित है। किसी चीज़ के लापता हो जाने या गायब हो जाने के लिए फ़ारसी का गुम शब्द इसी गमन वाले गम् से सम्बन्धित है । अवेस्ता और पहलवी में भी गम् ही सुरक्षित है मगर फ़ारसी में इसका कायान्तरण गुम के रूप में हो जाता है और अर्थवत्ता में भी खो जाने, गायब हो जाने गुम हो जाने का भाव आ जाता है। जब दिमाग़ कहीं गायब हो जाता है, चला जाता है तब व्यक्ति गुम्मा हो जाता है। गुमसुम हो जाता है। दरअसल गमन्या की आमद भी इसी गम् से हो रही है जिससे फ़ारसी का गुम जुड़ता है। गमन्या का मूल गमन से माना जा सकता है। गमन्या वह है जो प्रकट रूप में आपके सामने है मगर जिसका ध्यान कहीं ओर गमन करने चला गया है। ठीक वही बात की एक ही स्थान पर बैठे हैं, न खुद का ध्यान, न दुनिया का। अब ऐसी अवस्था तो जड़ की ही होती है जो टस से मस नहीं होती। गमन्या में भी वही बात है। दीन-दुनिया से बखबर, मूढ़मति ही गमन्या है।

यही बात गेल्या के सन्दर्भ में भी लगती है। ब्रज भाषा में गैल शब्द का अर्थ होता है राह, रास्ता। गेल्या का रिश्ता इस गैल से नहीं है। गम का ही भूतकालिक रूप गत् होता है। मराठी में भी इल्ल, अल्ल प्रत्ययों के लगने से पूर्वी बोलियों की तरह ही नए शब्द बनते हैं जैसे मैथिली, भोजपुरी में गत में इल्ल लगने से गइल्ल > गेल्ल> गेल के क्रम से विकास होगा। मराठी में गईल के अर्थ में गेला शब्द बनेगा जिसका अर्थ है चला गया। मुझे लगता है मालवी का गेल्या इसी तर्ज पर गेला के “चला गया” वाले अर्थ में प्रचलित हुआ होगा। शब्द बनने की प्रक्रिया वही रही होगी जो गमन से गमन्या बनने में नज़र आ रही है।

हालाँकि ये मेरा अनुमान है। मालवी भाषा पर भाषा वैज्ञानिक नज़रिये से बहुत कम काम हुआ, जबकि राजस्थानी, मराठी, गुजराती, ब्रज, बुंदेली, निमाड़ी जैसी अनेक लोकबोलियों के जीवंत सम्पर्क से यह खूब समृद्ध रही है। पर हमारी लोकबोलियों की तरफ विद्वानों का ध्यान कम ही गया है इसीलिए इस विषय में सन्दर्भ सामग्री बहुत कम है। इच्छा है कि सेवानिवृत्ति के बाद मालवा में घूम-फिर कर इस विषय पर कुछ काम किया जाए, काम का तलाशा जाए।

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//तमाम करना, निपटाना//

हिन्दी के सर्वप्रिय शब्दों में ‘तमाम’ تمام का शुमार भी है। इसकी अनेक अर्थछटाएँ हैं साथ ही अनेक पर्याय हैं भी हैं जैसे पूरा, सम्पूर्ण, सारा, सब, समाप्त, खात्मा, अन्त आदि। ‘तमाम’ की विशेषता है उसकी मुहावरेदार अर्थवत्ता जिसकी वजह से अनेक आसान पर्यायों के बावजूद इसका प्रयोग बोलचाल की भाषा में ज्यादा सहजता से होता है। तमाम में आमतौर पर समस्त और समापन का भाव है। अरबी मूल का यह शब्द बना है त्रिवर्णी सेमिटिक धातु ता-मीम-मीम ت-م-م से जिसमें समूचा, मुकम्मल, समग्र, सर्व, समस्त, सकल, परिपूर्ण, निरा, कुल, उपसंहार, समाहार, निष्कर्ष, अंजाम, समापन, खात्मा, निपटना जैसे भाव हैं।

किसी काम को अंजाम देने, समाप्त करने के लिए तमाम का प्रयोग मुहावरे की तरह होता है मसलन तमाम करना या तमाम होना। इसमें किसी जीवन का अन्त होने या करने का भी आशय है। जो अर्थवत्ता खत्म करना या खात्मा करना में है, वही बात तमाम करना में भी है। खत्म भी अरबी का प्रवासी शब्द है। तमाम का हिब्रू रूप तामीम है। तमाम में तामील करने का भाव भी है। तामील हो जाना यानी किसी काम का उपसंहार हो जाना। किसी ज़माने में किताबों में, फिल्मों में समाप्त, उपसंहार या The end लिखा होता था। उर्दू-फ़ारसी परम्परा में इसे तमामशुद लिखा जाता रहा। सम्पूर्णता के अर्थ में तमाम से तमाम से तमामन भी बनता है पर यह हिन्दी में अप्रचलित है।

हिन्दी में “तमाम करना” की टक्कर की अगर कोई अभिव्यक्ति है तो वह है ‘निपटाना’। इस निपटाने की अर्थव्याप्ति तमाम से भी ज्यादा है। निपटना में किसी समस्या से छुटकारा पाने से लेकर दैनंदिन क्रियाओं को सम्पन्न करने का भाव है। निपटाना में किन्हीं कार्यों को सुचारू रूप से पूरा करने से लेकर किसी का खात्मा करने तक का भाव है। इधर इसका अर्थविस्तार बदला या प्रतिशोध भी हो गया है। निपटना, निपटाना की कड़ी में ‘निपटान’ भी प्रचलित हो गया है जिसका प्रयोग आमतौर पर हाज़त-फ़राग़त के लिए किया जाता है।

हिन्दी में निपटना/निपटाना क्रिया का एक और रूप है निबटना/निबटाना और यही रूप शब्दकोशों में भी दर्ज़ है मगर लिखने-बोलने में आज सर्वाधिक प्रयुक्त रूप निपटना/निपटाना ही है। दरअसल विकासक्रम में निबटना/निबटाना एक पड़ाव था जिसकी अगली कड़ी निपटना/निपटाना और यह लगभग स्थिर हो चुकी है। हिन्दी में ‘व’ का रूपान्तर कभी ‘उ’ में होता है तो कभी ‘ब’ में। इसे जीव के जीऊ/जीउ रूप से समझ सकते हैं। इसी तरह छवि से छबि> छब हो जाता है। इसी तरह ‘ब’ का रूपान्तर ‘प’ में हो जाता है जैसे बारी से पारी हो जाना। निपटना बना है ‘निर्वर्तन’ से जिसमें पूरा करने के साथ साथ तामील करने का भाव भी है। निर्वर्तन> निवट्टना> निबटन> निपटना के क्रम में हिन्दी के पास तमाम की टक्कर की या कहें उससे बढ़कर अभिव्यक्ति पहले से है। अब तमामशुद करने की इजाज़त दें।

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खरप्रिय सर्वप्रिय

मात्रा के फ़र्क़ से ज़मीन-आसमान का फर्क़ आ जाता है। ‘खर’ यूँ तो गधा है पर जैसे ही इसमें ‘आ’ की मात्रा लगाई जाती है यह खरा हो जाता है जिसका मतलब है असली, साफ, बढ़िया, उत्तम। या तेज, तीखा, कठोर। क्या सचमुच ‘खर’ और ‘खरा’ में कोई रिश्तेदारी हो सकती है? संस्कृत में खर का अर्थ है सख़्त, कठोर, दृढ़, कड़ा, कटु, तेज, तीक्ष्ण, जड़, कर्णभेदी, प्रचंड, तप्त, रूखा, ऊँचा, नुकीला, अनघड़, उग्र, खुरदुरा, गहन, घनघोर अथवा अम्लीय आदि। हिन्दी में ‘खर’ का अर्थ गधा ही है। ज़ाहिर है गधे के उसकी कर्णभेदी, तीक्ष्ण, कटु, उग्र, और तेज आवाज़ के चलते ही खर कहा गया होगा और जड़ता के चलते मुर्ख की अर्थ स्थापना हुई होगी। मूर्ख से मित्रता करने वाला या तो खुद मूर्ख होगा या भोला। इसलिए ऐसे व्यक्ति को खरप्रिय कहा जाता है। कबूतर को भी खरप्रिय उपमा मिली हुई है। यूँ आज के ज़माने में मूर्खों इतने ऊँचे पदों पर विराजमान हैं कि खरप्रिय ही सर्वप्रिय हो गए हैं।

अब देखिए कि अश्व प्रजाति का होने के बावजूद जहाँ घोड़ा आभिजात्य का प्रतीक है वहीं गधा, घोड़े की सभी खूबियों से हीन है। अमरकोश के हवाले से बगुला, समुद्री बाज़, कौवा आदि भी खर की श्रेणी में ही आते हैं। अब ये सब तो परिंदे हैं तब एक चौपाए और इनके बीच कौन सा समानता बिन्दु हो सकता है? इन सबकी आवाज़ बेहद ऊँचे सुर में निकलती है। अब ऊँचा सुर अपनी निरन्तरता में तीक्ष्ण और कटु अनुभव देता है। गधे की आवाज़ तो ख़ैर कर्णभेदी है ही। असम सतह को खरदरा / खुरदुरा कहते हैं। कण्ठ के खुरदुरेपन या भर्रायी आवाज़ के लिए खरखराना शब्द भी प्रचलित है। गौर करें इन परिंदों के लिए खर अभिव्यक्ति इतनी लोकप्रिय नहीं हो पायी और गधा ही खर होकर रह गया। हालाँकि गधे की मूल पहचान उससे जुड़ा मूढ़ता का लक्षण है।

गौर करें मूढ़ता में एक किस्म की जड़ता, स्थिरता, अपरिवर्तनीयता होती है इन्हीं लक्षणों के चलते जड़ को अड़ियल या मूर्ख मान लिया जाता है। बुद्ध प्रतिमा के लिए बुत शब्द चल पड़ा और बुद्धमुद्रा से बुद्धू चल पड़ा। जड़ता पर गौर करें। सो खर में निहित जड़, अनघड़ और ठोस जैसे लक्षणों से गधे की मूल पहचान की पुष्टि भी होती है। खर शब्द फ़ारसी में भी चला आया। मगर यहाँ खरगोश में यह खर लक्षण के तौर पर मौजूद है। फ़ारसी में ‘गोश’ का अर्थ कान होता है। खर यानी गदहा इस तरह खरगोश का अर्थ हुआ गधे जैसे कान वाला पशु। मूर्ख व्यक्ति को खरदिमाग़ कहते हैं, यह फ़ारसी मुहावरा है। इसी तरह खर- का अर्थ है कामातुर, खिलंदड़ा, लट्ठ। एक और पद है खरवार यानी खर पर लादा गया भार।

अब बात करते हैं खर से बने खरा की जिससे हिन्दी में कई तरह की अभिव्यक्तियाँ शामिल हुई हैं जैसे खरी-खोटी सुनाना, खरी-खरी कहना, खरा माल, खरा सिक्का, खरा उतरना आदि। खरा का अर्थ उत्तम, सही, सच्चा, शुद्ध, बिना मिलावट का, ठोस, तेज़, तीक्ष्ण, कटु आदि ही है। गौर करें अपने मूल रूप में कोई भी वस्तु अनघड़ ही होती है। करेला या नीम कड़ुवेपन की वजह से खरे हैं। अगर नीम में कटुता न हो तो उसकी ओषधीय गुणता संदिग्ध होगी। खर से ही बना एक और बहुप्रयुक्त शब्द है प्रखर जिसमें तप्तता, तीक्ष्णता, प्रचंडता, तेज, तीखापन जैसे भाव हैं। मिसाल के तौर पर दोपहर में सूर्य सबसे प्रखर होता है। यहाँ एक साथ सूर्य के ताप, उग्रता, प्रचंडता, तीक्ष्णता से आशय है।

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साहेब, साहिब, साहिबा


म बोलचाल में साहब का अर्थ मान्यवर, श्रीमान या महोदय की तरह होता है। अपने से बड़े, वरिष्ठ और सम्माननीय व्यक्ति को भी साहब कहा जाता है। साहब का सायबा रूप संगी, हमजोली, सहचर को सही ढंग से अभिव्यक्त करता है। दरअसल अंग्रेजी की प्रसिद्ध टर्म फ्रैंड, फ़िलास्फर, गाइड का समन्वय है अरबी का साहिब। दरअसल स्वामी, मालिक, सर्वशक्तिमान जैसे रूढ़ अर्थों में हिन्दी में साहब शब्द का प्रयोग बहुत कम होता है। साहब वह है जो पढ़ा-लिखा है। उच्चाधिकारी है। आदरणीय है।

हिन्दी में साहिब का स्त्रीवाची साहिबा होता है जबकि मराठी में साहेबीण। फ़ारसी में साहिब का साहेब रूप प्रचलित है जबकि तुर्कीश में यह साहिप हो जाता है। मराठी ने फ़ारसी के साहेब को अपनाया। यह साहेब शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के लिए इस क़दर रूढ़ हो गया कि कई प्रगतिशील खुद को साहब कहलाना पसंद करते हैं, पर जैसे ही उन्हें साहेब कहा जाए तो बिदकते हैं। यह शब्दों का समाजशास्त्र है।

हिन्दी में संग, साथ के लिए सोहबत शब्द भी खूब इस्तेमाल होता है। अरबी/उर्दू में यह सुहबत है। सुहबत की रिश्तेदारी भी साहिब से है क्योंकि दोनों का मूल साद-हा-बा अर्थात ص/ح/ب ही है जिसमें संगत का भाव है। दुनियाभर के तमाम धर्मों में संगत का बड़ा महत्व है। ज़रूरी नहीं कि साथी कोई व्यक्ति ही हो।

संगत के आध्यात्मिक अर्थ हैं। पुस्तकों से लेकर विचारों तक का साथ मनुष्य के जीवन को उत्कर्ष की ओर ले जाता है। यह साथ पथप्रदर्शक होता है। बाइबल, गीता, कुरान अपने अपने धर्मों की पथप्रदर्शक ही हैं। सिख धर्म के प्रमुख ग्रन्थ के साथ साहिब शब्द तो सब कुछ साफ-साफ कह रहा है। ग्रन्थ ही साहिब अर्थात पथप्रदर्शक हैं। वैसे संगी का एक अर्थ जोड़ीदार भी होता है इसलिए सोहबत में संगत के साथ साथ स्त्री-पुरुष का मेल, समागम-सम्भोग जैसे भाव भी हैं।

आज से क़रीब सत्तर साल पहले तक साहब से बने दर्जनों युग्मपद हिन्दुस्तानी में प्रचलित थे जैसे साहिबे-आलम, साहिबे-दौलत, साहिबे-नसीब आदि। मद्दाह साहब के कोश में इस तरह के अस्सी से ज़्यादा युग्मपदों का इंदराज है।
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Monday, December 28, 2015

बात तफ़सील की...


वि वरण या विस्तार के अर्थ में हिन्दी में तफ़सील تفصيل शब्द का इस्तेमाल भी खूब होता है जो फ़ारसी से हिन्दी में आया ज़रूर पर है अरबी शब्द। मराठी में तफ़सील का रूप तपशील होता है। तफ़सील में सीमा, हद या विभाजन का भाव है। लिखित अथवा कही गई बात या चर्चा की व्याख्या-विश्लेषण भी इसके दायरे में आता है। एक मुहावरा है-तफ़सीलवार अर्थात किसी बात को तोड़ तोड़ कर बताना। अलग-अलग कर बताना। दरअअसल यही विवरण देना यानी तफ़सीलवार बताना हुआ। उर्दू में तफ़्सील लिखा जाता है। इस कड़ी के कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे फ़स्ल (फसल), फ़ैसला, फ़ासला, फ़सील, तफ़सील और मुफ़स्सिल।

तफ़सील को थोड़ा तफ़सील से समझा जाए। तफ़सील का रिश्ता यूँ तो अरबी शब्द फ़साला से है जो फ़ा-साद-लाम (फ-स-ल) अर्थात ف- ص- ل से है जिसमें विभाजन, अलग करना, किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच का अन्तराल या दूरी, घेरा या बाड़ा, अवरोध या सीमा, पृथक, विवरण, विस्तार, निर्णय आदि है, किन्तु मूल सेमिटिक धातु है P-S-L अर्थात पू-सादे-लम्द। ध्यान रहे प्राचीन सेमिटिक लिपियों में ‘फ’ ध्वनि नहीं थी। मज़े की बात यह कि आज अरबी लिपि में ‘प’ ध्वनि के लिए कोई चिह्न नहीं है।

P-S-L का अर्थ था पत्थर को तराशना। बात यह है कि इसका सम्बन्ध प्राचीन अरबी समाज में प्रचलित सनमपरस्ती अर्थात मूर्तिपूजा से था यानी बुत तराशना। गौर करें, प्रतिमा निर्माण के लिए पत्थर को धीरे धीरे विभाजित किया जाता है। अनघड़ पत्थर को तोड़ कर, तराशकर जो रूपाकार निर्मित होता है उस भाव का विस्तार बाद में अरबी के फ़ा-साद-लाम में मूलतः विभाजन हुआ इस कड़ी के कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे फ़स्ल (फसल), फ़ैसला, फ़ासला, फ़सील, तफ़सील और मुफ़स्सिल।

फस्ल का मूलार्थ है अंतर, दूरी या अंतराल। दो ऋतुओं के बीच स्पष्ट अंतराल होता है। अर्थात काल, समय या वक्त का भाव भी फस्ल में है। फस्ले बहार या फस्ले गुल का अर्थ वसंत ऋतु और फस्ले खिज़ां यानी पतझड़। फ़स्ल यानी मौसम और हर मौसम की पैदावार को मिल गया फसल का नाम। इसी तरह किसी पुस्तक के अलग-अलग अध्यायों को भी फस्ल ही कहते हैं। किसी ज़माने में दो फसलों के बीच के अंतराल में कोई भी मामला सुलझा लिया जाता था इसलिए उसे फ़ैसला कहा गया। फ़ैसला किसी उलझी बात का सुलझा हुआ, उससे अलग किया गया अंश ही होता है। अंतराल या दूरी के अर्थ में फ़स्ल से ही बना है फासला। दो फसलों के बीच का वक्त ही फासला कहलाता था। प्राचीन बस्तियां परकोटों से घिरी होती थीं जिन्हें फ़सील कहते थे। शहर और वीराने का फासला जो बताए, वही है फ़सील।

इस विवरण के बाद तफ़सील की तफ़सील स्पष्ट हुई होगी। तफ़सील में किसी कविता, कहानी पर टीक या टिप्पणी लिखना भी शामिल है। कोई फ़ेहरिस्त भी तफ़सील हो सकती है। स्पष्ट करने वाली हर क्रिया तफ़सील के दायरे में आती है। कोई भी विवरण तफ़सील या ब्योरा है। ये सारे भाव विकसित हुए हैं विभाजन करने से जो फ़साला मूलभाव है। किसी चीज़ का विभाजन दरअसल विस्तार की पहली शर्त है। यह ब्रह्माण्ड एक पिण्ड के विभाजन का परिणाम है। अन्तरिक्ष में ये पिण्ड लगातार फैल रहे हैं। विस्तार हो रहा है। यह विभाजन का परिणाम है। लिखित विवरण तब ज्यादा समझ में आते हैं जब उन्हें अलग अलग अध्यायों में समझाया जाए। गौर करें समझाना भी विस्तार का ही एक नाम है। अध्याय टुकड़ा या खण्ड ही है, जो किसी मूल पिण्ड का विभाजित हिस्सा है।

इसी तरह पश्चिमी उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में मुफ़स्सल शब्द के अनेक रूप प्रचलित हैं मसलन मुफस्सिल (यूपी-बिहार), मोफस्सल (बंगाल) और मुफशील (मराठी) इन सभी भाषाओं में मुफ़स्सल का अभिप्राय भी अन्तराल, जुड़ा हुआ, सटा हुआ या अलग किया हुआ, दूर का, विस्तार ही होता है। मुफ़स्सिल का प्रयोग आमतौर पर भौगोलिक तौर पर दूर के क्षेत्रो के लिए होता है। इसका एक अर्थ देहात भी होता है जो शहर से सटा भी हो सकता है और दूरस्थ भी। मुफ़स्सिल अदालतें यानी दूर की या शहर की परिधि से बाहर के न्यायालय। मुफ़स्सिल संवाददाता यानी देहात के रिपोर्टर या ग्रामीण संवाददाता।
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Sunday, November 29, 2015

खब्ती की खब्त


हिन्दी की लोकप्रिय शब्दावली में ख़ब्त, ख़ब्ती जैसे शब्द भी प्रचलित है। अरबी की त्रिवर्णी धातु खा-बा-ता خ ب ط से इस शब्द का विकास हुआ है। ख़ब्त का रूढ़ अर्थ अब आमतौर पर धुन, सनक या झक से होता हुआ मूर्खता, उन्माद,प्रमाद और भ्रम तक पहुँचता है। इसी तरह ख़ब्ती का अर्थ हुआ सनकी, धुनी, झक्की, प्रमादी, ग़ाफ़िल, उन्मादी, भ्रमित या मूर्ख। जानते है ख़ब्त की जन्मकुण्डली। पहले देखते हैं सेमिटिक धातु खा-बा-ता में कौन कौन सी अभिव्यक्तियाँ छुपी हैं। प्राचीन ग्रामीण एवं पशुपालक समाज के क्रियाकलापों से निकली शब्दावली से ही हमारी आज की भाषा का विकास हुआ है। इसे किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा के अध्ययन से समझा जा सकता है। ऐसे अनेक शब्द पशुचारी समाज की देन हैं। पशुओं को चराने, घुमाने, हाँकने, आखेट करने, तलाशने आदि से निकले हैं। खा-बा-ता में तोड़ना, कूटना, फेरना, ठोकना जैसे भावों के साथ-साथ भटकना, घूमना, भ्रमण करना जैसे आशय भी हैं। इसी के साथ दागना, निशान लगाना, छाप लगाना जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हुआ।

गौर करें प्राचीन अरब के बद्दूजन (बेदुइन) कबाइली घुमक्कड़ ही थे। पशुओं और खुद की आहारचर्या की खातिर निरन्तर भटकन ही जीवन। पशुओं के अनेक समूहों में अपने रेवड़ की सुरक्षा, देखरेख तभी बेहतर हो सकती है जब उन पर निशान लगाया जाए। अक्सर पहचान के लिए चिह्नित करने का आसान तरीका था, इन पशुओं की पीठ या पुट्ठों पर तपती छड़ से दाग देना। भेड़, बकरी, ऊँट जैसे पशु ही बद्दुओं की सम्पत्ति थे। इनमें ऊँट के बिना तो रेगिस्तान से पार नहीं जाया जा सकता था। ऊँट बद्दुओं के लिए दुनिया की सबसे सुन्दर चीज़ था। अरबी में ‘ग’ और ‘ज’ आपस में बदलते हैं। अरबी में ऊँट को ‘गमाल’ कहते हैं। ‘क’ और ‘ग’ एक ही वर्णक्रम में आते हैं। इसी ‘गमाल’ से अंग्रेजी में ‘कैमल’ बना। ‘जमाल’ का अर्थ ऊँट भी होता है और यह अनायास नहीं कि इसका अर्थ सौन्दर्य भी होता है। रेगिस्तान में घास नहीं होती, कँटीली झाड़ियाँ होती हैं। अल सईद, एम बदावी के कुरानिक कोश को मुताबिक खा-बा-ता में निहित तोड़ना, कूटना, ठोकना जैसे भावों के अलावा दोनों पैरो से रौंदने का भाव भी निहित है। ध्यान रहे पशुओं के लिए ऊँची झाड़ियों से पत्तियाँ तोड़ने और उन्हें दोनों पैरों से रौंद कर टहनियों से मुक्त करने का आशय है। जॉन रिचर्ड्सन के अरबी-फ़ारसी कोश में इसके अलावा इसमें चीज़ों को एक दूसरे में मिलाने, ऊँट की रानों में निशान लगाने और ऊँट द्वारा अपने चारों खुरों से ज़मीन को खुरचने, कुरेदने जैसे भावों का स्पष्ट उल्लेख भी सिद्ध करता है कि यह मूलतः पशुचारी सभ्यता से विकसित हुआ शब्द है। ख़ब्त के अन्दर मूल भाव है सब कुछ गड्डमड्ड हो जाना, आपस में मिला देना, अव्यवस्था फैलना, उथल-पुथल फैलना
 

प्रश्न उठता है खब्त में निहित उक्त सारी अभिव्यक्तियों में उन्माद, पागलपन, धुन, सनक या झख जैसे आशय कैसे शामिल हुए ! बात दरअसल ये है कि शब्दों का अर्थान्तर, अर्थविकास, अर्थावनति, अर्थोपकर्ष जैसी स्थितियाँ भी सामाजिक विकास के साथ-साथ अभिव्यक्ति का दायरा बढ़ने से होती चलती हैं। रिचर्ड्सन एक और महत्वपूर्ण अर्थ बताते हैं- किसी भी स्थान पर पर बैठ कर सुस्ता लेना या सो जाना। यह भी गड़रिया समाज का गुण है। जब चरने-विचरने की जगह मिल जाती है तब मवेशी चरते रहते हैं और गोपाल सुस्ताते रहते हैं। कई बार इसी गफ़लत में पशुओं के रेवड़ एक दूसरे में मिल जाते हैं। गौर करें पशुओं पर निशान इसीलिए लगाया जाता है ताकि उन्हें पहचाना जा सके। इसका दूसरा अर्थ यह है कि सारे पशु एक समान दिखते हैं। उन्हें किसी निशान के आधार पर ही पहचाना जा सकता है अन्यथा भ्रम की स्थिति बनी रह सकती है। पशुओं की अदला-बदली, फिर उन्हें सही समूह तक पहुँचाना, उससे उपजने वाले झगड़ों आदि के चलते निशान देने की क्रिया को भी खबाता नाम मिला। खब्ती के लिए भ्रमित शब्द की अर्थवत्ता का एक कारण यह भी है कि भ्रम शब्द ही भ्रमण से बना है अर्थात जिसका दिमाग घूमा हुआ हो।

सो, खब्त का मूलभाव खबाता में निहित मिलावट से ही आ रहा है। वह चाहे मवेशियों का आपस में मिलना हो या उनके लिए दाना-रातिब को आपस में मिलाना हो। आगे चल कर यह भाव सब भ्रमित होने के सन्दर्भ में रूढ़ हुआ। ख़ब्त यानी सब कुछ गड़बड़ कर देना। मद्दाह इसे बुद्धि में पागलपन की मिलावट कहते हैं अर्थात बुद्धि विकार। ख़ब्ती या ख़ब्तुल-हवास यानी विकृतबुद्धि, पागल, मिराक़ी, विकृतमस्तिष्क, दूषितबुद्धि। यूँ देखा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ ख़ब्त तो होती ही है। चलते-चलते अकबर इलाहाबादी साहब के शेर से बात ख़त्म करते हैं-
हम ऐसी कुल किताबें काबिले जब्ती समझते हैं
जिन्हें पढ़कर के लड़के बाप को खब्ती समझते हैं

महत्वपूर्ण कड़ी- रेगिस्तानी हुस्नो-जमाल 
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Thursday, November 19, 2015

पत्थर के सनम...



बॉलीवुड के फिल्मी गीतों ने भी आम आदमी के शब्दज्ञान को बढ़ाया है। ‘सनम’ भी ऐसा ही एक शब्द है जिसका साबका आम आदमी से किसी न किसी फिल्मी गीत के ज़रिये ही हुआ है जिनमें आमतौर पर इसका अर्थ प्यारा, प्रिय, प्रियतम के अर्थ में ही प्रयोग होता आया है मसलन “ओ मेरे सनम, ओ मेरे सनम” या “आजा सनम मधुर चान्दनी में हम”। मगर सनम का इसका मूल अर्थ है बुत या प्रतिमा। हालाँकि “पत्थर के सनम...तुझे हमने मुहब्बत का खुदा माना...” जैसे गीतों में बुत के अर्थ में भी इसका प्रयोग देखने को मिलता है। सनम फ़ारसी के रास्ते हिन्दी में आया मगर है अरबी ज़बान का।

सेमिटिक मूल का ‘सनम’ صنم बनता है साद-नून-मीम ص ن م से मिलकर। इस्लाम से पहले सामी संस्कृति मूर्तिपूजक थी। अगर यूँ कहे कि मनुष्य का धार्मिक रुझान बुतपरस्ती के ज़रिये ही उजागर होता आया है तो भी ग़लत न होगा। प्रतीक, प्रतिमा, सनम या बुत तब तक निर्गुण-निराकारवादियों को नहीं खटकते जब तक वे धर्म के सर्वोच्च प्रतीक के तौर पर पूजित न हों। सनम का सन्दर्भ भी प्रतिमा के ऐसे ही रूप का है। कुरान की टीकाओं व अरबी कोशों भी सनम को “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” के तौर पर ही व्याख्यायित करते हैं। हालाँकि अरबी सन्दर्भ सनम को किसी विदेशी भाषा से आयातित शब्द बताते हैं पर उस ज़बान का हवाला नहीं देते।

अनेक सन्दर्भों से पता चलता है कि सनम का व्युत्पत्तिक आधार हिब्रू भाषा का है और वहाँ से अरबी में दाखिल हुआ। हिब्रू में यह स-ल-म अर्थात salem है जिसमें बिम्ब, छाया अथवा प्रतिमा का आशय है। इस्लाम से पहले काबा में पूजी जाने वाली प्रतिमाओं के लिए भी सनम शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। चूँकि “ईश्वर के अलावा पूजित वस्तु” इस्लाम की मूल भावना के विरुद्ध है इसलिए सनम, सनमक़दा और सनमपरस्ती का उल्लेख इस्लामी के परवर्ती सन्दर्भों में तिरस्कार के नज़रिये से ही आता रहा है।

प्राचीन सेमिटिक भाषाओं में अक्कद प्रमुख है जिसकी रिश्तेदारी हिब्रू और अरबी से रही है। उत्तर पश्चिमी अक्कद और उत्तरी अरबी के शिलालेखों में भी सनम का ‘स-ल-म’ रूप मिलता है। दरअसल न और ल में बदलाव भारतीय आर्यभाषाओं में भी होता रहा है। मिसाल के तौर पर पश्चिमी बोलियों में लूण ऊत्तर-पूर्वी बोलियों में नून, नोन हो जाता है। इसी तरह नील, नीला जैसे उत्तर-पूर्वी उच्चार पश्चिम की राजस्थानी या मराठी में जाकर लील, लीलो हो जाते हैं। नीलाम का मराठी रूप लिलाँव है। यही बात सलम के सनम रूपान्तर में सामने आ रही है।

इस सन्दर्भ में s-l-m से यह भ्रम हो सकता है कि इस्लाम की मूल क्रिया धातु s-l-m और सनम वाला s-l-m भी एक है। दरअसल इस्लाम वाले स-ल-म में सीन-लाम-मीम س ل م‎ है जिसमें सर्वव्यापी, सुरक्षित और अखंड जैसे भाव हैं। जाहिर है ये वही तत्व हैं जिनसे शांति उपजती है। जबकि प्रतिमा के अर्थ वाले स-ल-म का मूल साद-लाम-मीम है। ख़ास बात यह कि प्राचीन सामी सभ्यता में देवी पूजा का बोलबाला था। लात, मनात, उज्जा जैसी देवियों की प्रतिमाओं की पूजा प्रचलित थी। इसलिए बतौर सनम अनेक बार इन देवियों की प्रतिमाओं का आशय रहा। बाद के दौर में सनम प्रतिमा के अर्थ में रूढ़ हो गया।

इस सिलसिले की दिलचस्प बात ये है कि जहाँ बुत, मूर्ति या प्रतिमा जैसे शब्दों का प्रयोग ‘प्रियतम’ के अर्थ में नहीं होता मगर प्रतिमा के अर्थाधार से उठे शब्द में किस तरह प्रियतम का भाव भी समा गया। यहाँ समझने की बात यह है कि भारतीय संस्कृति में ईश्वर आराधना की प्रमुख दो शैलियाँ रही हैं- पहली है सगुण साकार और दूसरी है निर्गुण निराकार। सगुण साकार पन्थ में ईश्वर की उपासना करने वाले समूह में भी प्रतिमा, परमशक्ति का रूप नहीं है। जिस प्रतीक को परमशक्ति माना गया, उसकी प्रतिमा को ईश्वर की तरह पूजा जाता है। सनम में प्रियतम की अर्थस्थापना का सम्बन्ध दरअसल इस्लाम की प्रेममार्गी रहस्यवादी विचारधारा के विकास से है। इस धारा के प्रवर्तक सूफी थे। खासबात है कि सूफ़ीमत का जन्म सामी ज़मीन पर नहीं हुआ बल्कि गैरइस्लामी और बुतपरस्त इलाक़ों में हुआ। सूफ़ियों की इबादत के दो प्रमुख सोपान थे इश्क़ मजाज़ी और इश्क़ हक़ीक़ी।

लौकिक प्रेम को ही आध्यात्मिक प्रेम की सीढ़ी मानने वाले सूफ़ियों के भीतर ईश्वरप्राप्ति की अन्तर्धारा तो सनमपरस्ती की ही बह रही थी। इस्लाम के पैग़ाम को आमजन तक पहुँचाने में सूफ़ियों ने गीत-संगीत का मार्ग चुना और इस्लाम को स्वीकारने की राह खुल गई। अरब में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के लिए प्रचलित सनम शब्द तो उनके ख़ज़ाने में पहले से था। इश्क के ‘मजाज़ी’ पड़ाव पर जो सनम प्रियतम की तरह दिलो-दिमाग़ पर असर करता था, ‘हकीक़ी’ पड़ाव पर वही सनम रुहानी बन जाता। फ़ारसी और हिन्दुस्तानी में इस तरह सनम शब्द का प्रवेश हुआ। कहना न होगा कि बॉलीवुड के लोकप्रिय गीतकारों में पंजाब के शायरों का बड़ा योगदान रहा है जिनकी रूह में सूफ़ियाना शायरी थी। ‘सनम’ का हासिल मुकाम ‘प्रियतम’ ही था।

 

जासूस की जासूसी    हैलो हाय प्रणाम नमस्ते    सलामत रहे अदब ऐ सलाम  जासूस की जासूसी

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Wednesday, November 18, 2015

'रमना' में कोई रमे तो कैसे !!


हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अनेक स्थानों के नाम ‘रमना’ हैं। इनमें गाँव-बस्ती भी है और अरण्य-वाटिका भी। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, हरियाणा और पंजाब में रमना नामधारी अनेक स्थान या बस्तियाँ हैं। 'रमना' बना है रमण से जिसका अर्थ है सुन्दर, सुखद, रमणीय, मनोरम। ध्यान रहे संस्कृत की धातुक्रिया रम् में सुख, आनंद, तुष्टि, चमक, केलि जैसे भाव हैं। इससे ही रमण, रमणी, आराम, विराम, राम जैसे शब्द बने हैं जिनमें मूलतः सौन्दर्य, सुख, आनंद, हर्ष, प्रसन्नता, विलास जैसे भाव हैं।

'रमना' हिन्दी की लोकअभिव्यक्ति है। आशय घूमना-फिरना, टहलना, चलना, भोग-विलास और मज़े करना है।  पहले गाँव के आसपास की वह भूमि जिसे पशुओं के चरने के लिए सुरक्षित कर दिया जाता था 'रमना' कहलाती थीं अर्थात जहाँ पशु रमते हों, रमण करते हों। "छुट्टा घूमना" मुहावरे से भाव ग्रहण करें। जहाँ पशु उन्मुक्त विचरण करते हों वह उनकी रमण-भूमि ही तो कहलाएगी न! बाद में उस गोचर भूमि पर भी आबादी काबिज हो गई और बस्ती को भी रमना पहचान ही मिली।

आरा में एक रमना बाग है। देखना होगा कि वह किसी ज़माने में वह भूखण्ड सम्भवतः गोचर भूमि की तरह सुरक्षित रखी गई होगी बाद में शहर बढ़ कर वहाँ तक पहुँचा हो और वह सार्वजनिक मैदान बन गया हो जिसे रमना मैदान ही नाम मिला। इसी तरह ‘रमनाबाग’ या ‘रमना फ़ॉरेस्ट’ जैसे नामों से ही स्पष्ट है कि यहाँ आशय उस स्थान के रमणीक होने से है। ढाका के बाहरी हिस्से मे एक जमाने मे बीहड जंगल था और वहां संन्यासियों को समाधि दी जाती थी। उसे भी रमना के जंगल कहते थे। 1971 युद्ध के बाद वहा जंगल साफ कर शहीद स्मारक बनवाया गया। इस रमना का मूल जितना खूबसूरत है, ज़्यादातर ‘रमना’ बस्तियों की हक़ीक़त उसके उलट है। वाराणसी में गंगा किनारे किसी ज़माने में गोचरभूमि रहा रमना क्षेत्र अब आबादी के दबाव से घिरा ब्लॉक है। विसंगति यह कि आज इस स्थान पर शहरभर का कचरा डाला जाता है। यहाँ सॉलिड वेस्ट प्लान्ट है जो शायद ही कभी ठीक से चलता हो।

जहाँ तक ‘रमना’ नाम से जुड़े ‘गोचर’ शब्द का सवाल है, उसका प्रमुख अर्थ पशुओं के लिए छोड़ी गई भूमि से ही है। बाकी वैदिक शब्दावली में ‘ग’ ध्वनि का आशय गमन से है। गम् धातुक्रिया का अर्थ गमन करना ही है। गति का ग भी यही कहता है। इसलिए ‘गो’ का अर्थ सिर्फ़ धेनु अथवा गाय नहीं बल्कि पशु मात्र से भी है, क्योंकि वह चलता है, गति करता है। यूँ कहें कि प्राचीन मनीषियों ने हर उस पदार्थ को ‘गो’ के दायरे में रखा जो गतिशील है। इसीलिए पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, तारे ये भी 'गो' ही हैं। मन की गतियाँ भी 'गो' हैं। स्वाभाविक है तब इन्द्रियगतियाँ इसके दायरे से बाहर कैसे रहतीं? आँखों से जितना दिख रहा है वह भी गोचर और पैरों से जितना नापा जा सके वह भी गोचर। यहाँ पशुओं और मनुष्यों में फ़र्क़ न करें। पशुओं के पैर भी इन्द्री ही हैं सो कोई पशु जहाँ विचरण करे वह गोचर भूमि है। इसीलिए कहा जाता है “सबै भूमि गोपाल की”।

पशुओं का घूमना यानी ‘चरना’ किस लिए? ज़ाहिर है उदरपूर्ति के लिए सो जिन चरणों की गति को ‘चरना’ कहा जाता है, वही क्रिया आहार कहलाई। चरने यानी चलने का साध्य हुआ ‘चारा’। ‘चरना’ का कारक हुए ‘चरण’ अर्थात इन्द्री। कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘चरना’ और ‘चलना’ एक ही हैं। दुनियाभर की अनेक भाषाओं में भी यही अर्थस्थापन प्रक्रिया है। अर्थात गतिशील को ही पशु कहा जाता है।
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Saturday, October 24, 2015

'उत्कण्ठ' यानी सर्वाइकल कॉलर



पिछले कुछ दिनों से गले में cervical collar पड़ा हुआ है जिसकी वजह से गर्दन तनी रहती है। सर्वाईकल कॉलर गर्दन को सीधी रखता है ताकि उससे सिर ऊँचा रहे। गौरतलब है सिर का ऊँचा होना या ऊँचा उठाना गर्दन के बिना सम्भव नहीं। गर्दन का लचीलापन ही है जिसकी वजह से बिना खड़े हुए भी गर्दन को थोड़ा ऊँचा करने से हम दूर तक देख पाते हैं। दूर तक देखने के लिए “सिर ऊँचा कर देखना” या “सिर उठा कर देखना” जैसे वाक्य आमतौर पर प्रयोग होते हैं। इस सन्दर्भ में “उत्कण्ठा” शब्द याद आया। हिन्दी की तत्सम शब्दावली के इस शब्द का प्रयोग संस्कारी भाषा बोलने वाले खूब करते हैं और जब ऐसी भाषा बोली जाती है तो सुनने में भी भली लगती है।

बहरहाल, उत्कण्ठा / उत्कंठा का आशय है जानने की इच्छा, उतावली, बेकली, जल्दबाजी, लालसा, बेताबी, छटपटाहट, आतुरता, अधीरता, बेताबी आदि। गौर करें इन सारी अर्थछटाओं में मूल बात जिज्ञासा है। जानने की इच्छा, देखने की उतावली, पाने की लालसा। यह सब जिज्ञासा के शमन से होगा। यह जिज्ञासा एक स्थान पर स्थिर नहीं बैठने देती। जानने की छटपटाहट आपकी चेष्टाओं से उजागर होती है। जानने का काम आँख, नाक, कान और मुँह के ज़रिये हो सकता है लिहाज़ा सिर को ही उठाया जाता है क्योंकि ये इन्द्रियाँ सिर का हिस्सा हैं।

संस्कृत में ‘उद्’ धातु है जिसका प्रयोग उपसर्ग की तरह भी होता है। इसमें ऊपर उठने का भाव है। उत्> उद् > उड् ऐसे रूप मिलते हैं। उत्कर्ष, उत्थान, उत्प्रेरण, उत्तम, उत्तर में इन्हें समझा जा सकता है। उड़ना, उड़ान, उड़ी, उड़ाका, उड़न जैसे शब्दों में उड् पहचाना जा रहा है। उड़ान में ऊपर उठने का भाव है। उड्डयन से स्पष्ट है। हिन्दी में डैना, पंख को कहते हैं जिसके सहारे उड़ान सम्भव होती है। यह डैना इसी मूल से आ रहा है। सम्भवतः उड्डीन से बना है। मराठी में फ्लाईओवर को उड्डाणपुल कहते हैं।

तो इसी तर्ज़ पर उद्+कण्ठ से बने उत्कण्ठा को देखें। मूलतः इसमें गर्दन ऊपर करने, प्रकारान्तर से सिर उठाने का भाव है। कण्ठ वाकयन्त्र भी है और गला भी। कण्ठा यानी हार, गले का पट्टा आदि। कण्ठ का अर्थ नाल या नली भी होता है। मूलतः गला एक नली ही है। सो नदी जिस नाल से होकर बहती है उसे काँठा कहत हैं। इस तरह काँठा का अर्थ किनारा हो जाता है। साबरकाँठा या बनासकाँठा जैसी बस्तियों के नाम यह उजागर करते हैं कि ये साबरमती नदी और बनास नदी के तट पर बसे हैं।

उत्कण्ठा में निहित भाव ऊपर स्पष्ट किए जा चुके हैं। इसी कड़ी में आता है ‘उत्कण्ठ’ जिसका अर्थ है “वह जो गर्दन को ऊपर उठाए”। सर्वाइकल कॉलर का मक़सद गले को सहारा देने के लिए है ताकि सिर ऊपर उठा रहे। अब हम यह तो नहीं कहना चाहेंगे कि सर्वाइकल कॉलर के लिए हिन्दी में उतकण्ठ शब्द चलाया जाए पर इतना तय है कि उपयोग के आधार पर यह नाम सटीक है। वैसे इसके लिए गलपट्टा, कण्ठा, गरदनी, हँसली जैसे नाम भी हिन्दी में चलाए जा सकते हैं।
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