Tuesday, September 30, 2008

प्रेमगली से खाला के घर तक...

kabir
संसार भर के संत और धर्मग्रन्थ एक बात खास तौर पर कहते आए हैं कि प्रेम से बड़ी कोई नीति नहीं मगर लोभ-लालसा छोड़कर ही प्रेममार्गी हुआ जा सकता है। यानी लालच और प्रेम साथ-साथ नहीं चल सकते। कबीरदास भी एक साखी में कहते हैं- प्रेमगली अति सांकरी, या में दुई न समाय। एक अन्य दोहे में वे कहते हैं-कबीर यहु घर प्रेम का खाला का घर नाहीं। इसी तरह हिन्दी के मशहूर कवि गीतकार कुंवर बेचैन भी अपने एक दोहे में यही कहते नज़र आते हैं कि प्रेम लोभ का साथ नहीं-
जहाँ काम है, लोभ है, और मोह की मार
वहाँ भला कैसे रहे, निर्मल पावन प्यार.

र्म और नीतिशास्त्र चाहे प्रेम की राह में लोभ - लालच की रंचमात्र भी जगह नहीं देखते हैं। गर भाषाशास्त्र के चौड़े रास्ते पर जब शब्दों का सफर शुरू होता है तो प्रेम यानी अंग्रेजी के love और संस्कृत-हिन्दी के लोभ, लालच, लालसा और लोलुपता जैसे विपरीतार्थी लफ्ज हेल-मेल करते नजर आते है। भाषाविज्ञानियों के मुताबिक संस्कृत मूल के लुभ् में ही अंग्रेजी के लव के जन्म का आधार छुपा है। लुभ् यानी यानी रिझाना, बहलाना, आकृष्ट करना, ललचाना,लालायित होना आदि। जाहिर है कि प्रेम में ये तमाम क्रियाएं शामिल हैं। मगर साथ ही इससे बने लोभ शब्द में लोलुपता, लालसा, लालच, तृष्णा, इच्छा जैसे अर्थ नज़र आते है।  लुब्ध, लुभना, लुभाना, लुभाया, लुभावना, लोभ, लोभी, लोभनीय, लोभित जैसे शब्द इसी लुभ् से बने हैं। 
लुभ् का ही एक रूप नजर आता है इंडो-यूरोपीय शब्द लुभ् यानी leubh में जिसका मतलब भी ललचाना, रिझाना, चाहना था। प्राचीन जर्मन भाषा ने इससे जो शब्द बनाया वह था lieb. प्राचीन अंग्रेजी में इससे बना lufu. बाद में इसने luba का रूप ले लिया। लैटिन में भी यह libere बनकर विराजमान है। बाद में आधुनिक अंग्रेजी में इसने love के रूप में अपनी जगह बनाई और प्रेम, स्नेह लगाव और मैत्रीभाव जैसे व्यापक अर्थ ग्रहण किए। यही नहीं, अंग्रेजी में बिलीफ और बिलीव जैसे शब्द भी इसी लुभ् की देन हैं जिनका लगातार अर्थ विस्तार होता चला गया। जाहिर है भाषा विज्ञान के आईने में कबीर की संकरी सी प्रेमगली ऐसा हाईवे नजर आता है जो सीधा खाला के घर तक जाता है।
...जहां काम है, लोभ है,और मोह की मार । वहां भला कैसे रहेनिर्मल पावन प्यार ।।
सी कड़ी में संस्कृत की एक अन्य धातु लल् भी है जिसमें अभिलाषी, इच्छुक, क्रीड़ा- विनोद का भाव आता है। जीभ लपलपाना भी इसमें ही शामिल है। लालायित शब्द इससे ही बना है जिसका मतलब होता है इच्छुक, उत्साहित आदि। हिन्दी का लार शब्द बना है संस्कृत के लाला से । प्यार और प्रेम की भावना का आर्द्रता से रिश्ता होता है। आकर्षण हो या अन्य खिंचाव , परिणति आर्द्रता ही है।
दुलार, दुलारना जैसे शब्द इसी कड़ी से बंधे हैं। दुलारा या दुलारी वही है जो स्नेहसिक्त है, जिसे प्यार किया गया है। पालन के साथ जो लालन शब्द जुड़ा है उसमें भी यही लाड़-प्यार का भाव है । जिसे प्यार किया जाता है वही है लाल । प्रिय, सुंदर, मनोहर , मधुर, आकर्षक, वैविध्यपूर्ण और क्रीड़ाप्रिय ही ललित है। देवी दुर्गा का भी एक नाम ललिता इन्ही भावों की वजह से है। लालित्य भी इससे ही बना है। आर्द्रता वाले भाव को और भी स्पष्ट करने वाला एक शब्द है लालस । यह बन है लस् धातु से जिसमें चमक , उद्दीपन, जगमग, शोभायित होना, किलोल आदि भाव शामिल हैं। हिन्दी का लालच इसी का रूप है। लालसा में एक किस्म की प्यास है। प्यास के साथ तरलता का रिश्ता है। लालसा के साथ इसीलिए तृप्त होने का संबंध है।  गौर करें कि लोभी के चेहरे पर लालच की चमक होती है। लालच के मारे लार टपकने जैसा मुहावरा भी इन्ही भावों के अंतर्संबंध को स्पष्ट कर रहा है।  
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, September 29, 2008

आप भले, जग भला...[बकलमखुद-74]

gse_multipart14460[8] ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के तेरहवें पड़ाव और बहहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं रंजना भाटिया से । कुछ मेरी कलम से  नामक ब्लाग चलाती हैं और लगभग आधा दर्जन ब्लागों पर लिखती हैं। साहित्य इनका व्यसन है। कविता लिखना शौक । इनसे हटकर एक ज़िंदगी जीतीं हैं अमृता प्रीतम के साथ...अपने ब्लाग  अमृता प्रीतम की कलम से  पर । आइये जानते हैं रंजना जी की कुछ अनकही-
जिंदगी में हर काम का एक वक्त तय होता है और वह काम उसी समय होता है ..यही हुआ शायद जो काम बचपन से करना अच्छा लगता था ,कविता करना उसका वक्त अब आया था दुनिया के सामने लाने का | घर में कम्यूटर बाबा पधार चुके थे बच्चो के कारण..पर नई है चीज और मैं इसकी ऐ -बी- सी भी नही जानती थी....इस लिए इसको हाथ सिर्फ़ डस्टिंग करने के लिए लगाती और कभी इसको चला के देखने का न दिल किया न कोशिश ..
क दिन छोटी बेटी ने मेरी डायरी से एक कविता ले कर एक साईट मैं पोस्ट कर दी ....और उसका रेस्पांस बहुत अच्छा आया , तब उसने बताया कि मेरी कविता के साथ यह कारनामा किया है | कॉमेंट्स पढ़े तो बहुत खुशी हुई कि यह तो अच्छा है ... अब तक तो जितने लेख कविताएं भेजी कभी अखबार - मेग्जिन मैं छापी गई ,कभी बेरंग लिफाफे सी वापस आ गयीं | बढ़िया तरीका है यह लोगों तक अपनी बात पहुचाने का | कम्यूटर पर काम करना सीखा और रोमन में अपनी कविताएं कई साइट्स मैं पोस्ट करनी शुरू की |
च्छी पहचान मिलने लगी | लोग अच्छे बुरे कमेंट्स देने लगे और लिखने का सीखने का होंसला बढ़ने लगा | प्रूफ़ रीडिंग और एडिटिंग के साथ साथ यह भी जोर शोर से चलने लगा लिखना साइट्स पर | एक दिन बेटी का ब्लॉग देखा और वही से अपना ब्लॉग बनाया | ब्लॉग पहले पहल तो ख़ुद बनाया ,पर बाद मैं हिंद युग्म से जुड़े गिरिराज जोशी जी ने बहुत मदद की ....और संजीत [आवारा बंजारा ] का भी मैंने कई बार सिर दर्द किया नया कुछ भी सीखने के लिए :) अभी भी गिरिराज जी , राघव जी और सागर नाहर जी से मदद ले लेती हूँ कुछ नया ब्लॉग पर करने को दिल करे तो | ऑरकुट साईट मैं अपना एक समुदाय बनाया और यही से शैलेश जी हिंद युग्म से परिचय हुआ और फ़िर लिखने के लिए कई मौके मिले | जिस में बाल उद्यान पर लिखना सबसे अधिक अच्छा लगता है | कहानी कलश पर कहानी लेखन भी शुरू हुआ | लिखने के लिए अपने ब्लॉग के साथ साथ नए आयाम मिले | डाक्टर गरिमा से भी यहीं मिलना हुआ ।
न्ही पिछले दो सालों में मेरा रुझान ,

 mail.google.com छोटी बेटी पूर्वाmail.google.com2 

बड़ी बेटी मेघा

योगा और प्राकतिक चिकित्सा और रेकी से भी हुआ | योगा की तो अब मैं क्लास भी लेती हूँ यूँ ही शौकिया रूप से :) और यही अनुभव डॉ गरिमा के साथ जुड़ कर जीवन उर्जा ब्लॉग के रूप में लिख रही हूँ | नारी ब्लॉग में भी लगा कि यहाँ यदि कुछ सार्थक लिखा जा सकता है तो लिख देती हूँ | दाल रोटी चावल ब्लॉग से कुकिंग के बारे में लिखने का शौक पूरा हो जाता है | नेट की दुनिया से जुड़ कर अच्छे बुरे तजुर्बे दोनों हुए | कई बार इस उम्र की महिला ऑरकुट पर है या ब्लागिंग करती है कह कर अजीब से कमेंट्स या स्क्रैप भी मिलते पर अधिकतर अच्छे लोग मिले | आप अच्छे तो जग अच्छा वाली बात है ..नही नही अपने मुहं मियाँ मिट्ठू नही बन रही ,यह आपके ऊपर है कि आप लोगो के सामने कैसे ख़ुद को बताते हैं वही रेस्पोंस आपको वापिस मिलता है अपवाद तो हर जगह है ....यहाँ भी है |
च्छे दोस्त मिले , कई छोटे बड़े भाई भी बने अच्छा लगा | और हैरानी कि बात तब हुई जब अभी हिंद युग्म का स्टाल बुक फेयर में लगा और वहां ऑरकुट से नियमित मेरे ब्लॉग को पढने वाले औटोग्राफ लेने आए तब लगा कि लिखना बेकार नही जा रहा है एक पहचान तो मिल ही रही है | किताब के लिए भी विचार इन्ही सब पढने वालों कि वजह से आया ..और स्वर्ण कलम विजेता की बात तो यहाँ सब जानते ही हैं |मेरी पहली किताब "'साया "" पब्लिश हो चुकी है | यह एक ड्रीम बुक है मेरे लिए ..पर इसके पब्लिश होने का सपना मेरी बेटियों ने देखा :) बेटियाँ भी अब दोनों जॉब कर रहीं हैं | और ज़िन्दगी कि उथल पुथल तो साँस चलने तक चलती है ,चलती रहनी भी चाहिए :)
लिखने का यह सफर निरंतर जारी है ....| सबसे अच्छा लगता है जब अमृता प्रीतम और बाल उद्यान पर दीदी की पाती लिखना होता है ..| "कुछ मेरी कलम से" तो आप सब पढ़ते ही रहते हैं ...| अभी हिन्दी मिडिया ब्लॉग से जुड़ कर ब्लॉग समीक्षा भी शुरू की है उसका भी रिस्पोंस अच्छा ही मिल रहा है अब तक | अच्छा लगता है जब जिनको हमने देखा तक नही है उनके साथ एक परिवार सा रिश्ता जुड़ जाता है ....प्यार मिलता है , लोग आपसे आपके बारे में जानना चाहते हैं | आप लोगो के बारे में जानते हैं , मिलते हैं उनके लिखे के जरिये और एक प्यार का एक स्नेह का बंधन सबसे जोड़ लेते हैं .आखिर इस से अधिक जिंदगी में और चाहिए भी क्या ....अभी इतना ही ..अभी जिंदगी शेष है और उस से जुड़ी यादे अनेक ...कभी फ़िर करेंगे आपको अपनी दास्तान से बोर ..अभी के लिए अलविदा ..
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, September 28, 2008

जुए का अड्डा या कुश्ती का अखाड़ा !

Pehlwani घीरे धीरे कुश्ती का बाड़ा अखाड़ा कहलाने लगा और जुआघर को अखाड़ा कहने का चलन खत्म हो गया। अब तो व्यायामशाला को भी अखाड़ा कहते हैं और साधु-सन्यासियों के मठ या रुकने के स्थान को भी अखाड़ा कहा जाता है।
खाड़ा शब्द का हिन्दी में व्यापक अर्थों में प्रयोग होता है और मुहावरे के तौर पर भी इसकी अलग पहचान बन चुकी है। अखाड़ा यूं तो कुश्ती से जुडा हुआ शब्द है मगर जहां भी दांव-पेच की गुंजाइश होती है वहां इसका प्रयोग भी होता है। अखाड़ा चाहे कुश्ती से जुड़ा हो मगर इसके जन्म के साथ एक अन्य खेल का रिश्ता जुड़ा है जिसे जुआ कहा जाता है।
प्राचीनकाल में भी आज के दौर की भांति ही जुए को सामाजिक तौर पर बुरा तो माना जाता था मगर उस पर पूरी तरह रोक नहीं थी। तब भी इसे राजस्व प्राप्ति का बड़ा जरिया माना जाता था। आज की ही तरह प्राचीनकाल में भी शासन की तरफ से एक निर्धारित स्थान पर जुआ खिलाने का प्रबंध रहता था जिसे अक्षवाटः कहते थे। अक्षवाटः बना है दो शब्दों अक्ष+वाटः से मिलकर ।
क्षः के कई अर्थ है जिनमें एक अर्थ है चौसर या चौपड़, अथवा उसके पासे । वाटः का अर्थ होता है घिरा हुआ स्थान। यह बना है संस्कृत धातु वट् से जिसके तहत घेरना, गोलाकार करना आदि भाव आते हैं। इससे ही बना है उद्यान के अर्थ में वाटिका जैसा शब्द। चौपड़ या चौरस जगह के लिए बने वाड़ा जैसे शब्द के पीछे भी यही वट् धातु झांक रही है। वाड़ा या बाड़ा शब्दों से स्थानवाची कई शब्द बने हैं जैसे महाराजवाड़ा, राजवाड़ा, विजयवाड़ा, देलवाड़ा,शनिवार वाड़ा, सैय्यदवाड़ा आदि। इसी तरह वाटः का एक रूप बाड़ा भी हुआ जिसका अर्थ भी घिरा हुआ स्थान है। आमतौर पर मवेशियों को बांधकर रखने की जगह को भी बाड़ा कहा जाता है। रेलिंग से बनाई गई चौहद्दी को भी बाड़ कहते हैं । वर्ण विस्तार से कही कहीं इसे बागड़ भी बोला जाता है। इस तरह देखा जाए तो अक्षवाटः का अर्थ हुआ जहां पर पांसों का खेल खेला जाए । जाहिर है कि पांसों से खेला जानेवाला खेल जुआ ही है सो अक्षवाटः का अर्थ हुआ द्यूतगृह अर्थात जुआघर
प्राचीनकाल में जुआ मनोरंजन की चौसठ कलाओं में एक था और इसे देखने के लिए भी लोग इकट्ठा होते थे। अखाड़ा शब्द कुछ यूं बना - अक्षवाटः > अक्खाडअ > अक्खाडा > अखाड़ा । द्यूतगृह जब अखाड़ा कहलाने लगा और खेल के दांव-पेंच से ज्यादा महत्व हार-जीत का हो गया तो नियम भी बदलने लगे। अब दांव पर रकम ही नहीं , कुछ भी लगाया जाने लगा । महाभारत का द्यूत-प्रसंग सबको पता है। इसी तरह अखाड़े में वे सब शारीरिक क्रियाएं भी आ गईं जिन्हें क्रीड़ा की संज्ञा दी जा सकती थी और जिन पर दांव लगाया जा सकता था। जाहिर है प्रभावशाली लोगों के बीच आन-बान की नकली लड़ाई के लिए कुश्ती इनमें सबसे खास शगल था , सो घीरे धीरे कुश्ती का बाड़ा अखाड़ा कहलाने लगा और जुआघर को अखाड़ा कहने का चलन खत्म हो गया। अब तो व्यायामशाला को भी अखाड़ा कहते हैं और साधु-सन्यासियों के मठ या रुकने के स्थान को भी अखाड़ा कहा जाता है। कहां जुआ खेलने की जगह और कहां साधु-सन्यासियों की संगत !
वैसे अक्षः का एक अर्थ कानूनी कार्यवाही भी होता है। जाहिर सी बात है जहां कानूनी दांवपेच होंगे वह जगह अखाड़ा तो बन ही जाएगी। यूं भी अदालत को अग्रेजी में कोर्ट  ही कहते हैं जिसका मतलब घिरा हुआ स्थान ही है। खेलों के सदर्भ में भी कोर्ट शब्द का प्रयोग होता है जैसे टेनिस कोर्ट। आज के दौर में हर उस जगह को भी अखाड़ा कहा जाता है जहां लोगों का जमघट हो, दाव-पेंच लड़ाए जाते हों। अड्डे के अर्थ में भी अखाड़ा शब्द का इस्तेमाल होता है। राजनीतिक शब्दावली मे भी अखाड़ा शब्द की खासी पैठ हो चुकी है और नेताओं की पैंतरेबाजियां, चुनावी लड़ाई के संदर्भ में इस शब्द का खूब प्रयोग होता है। अखाड़ा शब्द के साथ फारसी का बाजी या बाज प्रत्यय लगने से अखाड़ेबाजी , अखाड़ेबाज सा शब्द भी बन गया ।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, September 26, 2008

धिन ! क्यूं खलोती है ? [बकलमखुद-73]

gse_multipart14460 ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के तेरहवें पड़ाव और इकहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं रंजना भाटिया से । कुछ मेरी कलम से  नामक ब्लाग चलाती हैं और लगभग आधा दर्जन ब्लागों पर लिखती हैं। साहित्य इनका व्यसन है। कविता लिखना शौक । इनसे हटकर एक ज़िंदगी जीतीं हैं अमृता प्रीतम के साथ...अपने ब्लाग  अमृता प्रीतम की कलम से  पर । आइये जानते हैं रंजना जी की कुछ अनकही-
शादी के बाद यहाँ आते ही जो बदलाव आया वह था भाषा का ..माहोल का ....वहां मेस पार्टी और आर्मी माहोल यहाँ उस से एक दम अलग ....और वहां बोलते थे हम ज्यादातर हिन्दी या इंग्लिश यहाँ मुल्तानी | वहां जिन्हें छोड़ कर आई थी , मम्मी पापा ...दो छोटी बहने , और एक प्यारा छोटा भाई जो मेरी शादी के वक्त बहुत छोटा था .और दीदी , दीदी कहते हुए शादी होते हुए पूरे समय तक मेरा दुपट्टा पकड़े रहा था | दीदी के साथ नही रह पायेगा अब वह यह बात उसको समझ में नही आ रही थी ,उसी से दूर होने का दुःख मुझे भी सबसे अधिक था |
हाँ ससुराल में दो ननदे और मम्मी पापा थे | पर माहौल बिल्कुल ही अलग था | मायके में जो दिल में आता था वही किया ..खाना बनाना आता था ,पर उतना ही जितना जरुरी था ..बहुत आजादी वहां भी नही थी .पर यह समझ में आ गया था कि अब यहाँ कोई शैतानी नही की जा सकती है ...क्यूंकि यहाँ का माहौल बहुत डरा हुआ सा और सहमा हुआ सा लगा ...शायद यही फर्क होता है ससुराल और मायके का :) शादी के अगले दिन सासू माँ बोली की ""जा धा घिन''....जी कह कर मैं दूसरे कमरे में ....फ़िर मुझे यूँ ही खडे देखा तो फ़िर बोली रंजना धा घिन ....क्यूँ खलोती हैं [ क्यूँ खड़ी हुई है इस तरह ][कुछ इसी तरह का वाक्य ] मुझे आज तक नही आई यह भाषा :) हैरान परेशान क्या करू ....मेरा मासूम दिल समझ रहा था कि वह कुछ घिन घिन कह रहीं शायद वह किसी तरह के डांस की कोई रस्म से तो जुडा नही है ....बाबा रे !! यह शादी की रस्मे क्या मुसीबत है यह .......ईश्वर ने साथ दिया राजीव [मेरे पति देव ] सामने दिखे ....पर नई नवेली बहू अब पति को कैसे बुलाए .....आँखों में पानी ....कि करूँ तो क्या करूँ ....तभी यह अन्दर आए तो मेरी जान में जान आई ..पूछा की क्या करना है इस धा घिन का .....पहले देखते रहे और फ़िर जोर से हंस के बोले कि इस का कुछ नही करना जा कर नहा लो ...तौबा !! तो इसका यह मतलब था ...
फ़िर रसोई में पहली बार कुछ बनाना होता नई बहू को ...हलवा अच्छे से सीख के आई थी .[.जो कि पिक्चर में देखा करते थे अक्सर ].पर यहाँ बोला गया कि कढी और खीर बनाओ .... और मेरी हालत जो उस वक्त हुई वह आज भी नही भूलती ..सासू माँ बहुत अच्छी थी ,समझ गई बच्ची बुद्धू राम है इस.. मामले में ..कहा मैं बनाती हूँ तुम सिर्फ़ चम्मच से हिला दो खीर और कढी को रस्म हो गई ...यहाँ एक बात और अलग थी अभी तक आर्य समाजी माहौल देखा था यहाँ मम्मी कृष्ण जी की पूजा बहुत जोर शोर से करती थी | मथुरा ,गोकुल .यहाँ से अकसर आना जाना होता था | ससुर आर्य समाज जाते हैं | पर दोनों पूजा और हवन घर में अक्सर होते हैं | यही से कृष्ण राधा प्रेम की लगन लग गई इतनी कि आज तक मेरी हर बात उनसे होती है चाहे वह लड़ाई हो या और कोई बात उनसे ही शिकायत होती है | गायत्री मन्त्र तो जो रात को बोलने की सीख नाना जी ने डाली थी वह भी आज तक है और बच्चो में डाल दी है | फ़िर कुछ समय बाद लगा कि कुछ आगे पढ़ना चाहिए ..लिखने पढने का शौक है यह पति देव जान चुके थे | उनसे वादा लिया यही मैंने कि मुझे पढने लिखने से कभी नही रोकेंगे ।

lastscan6 छोटी बहन मंजू के साथ आगरा में

lastscan2 

राजीव के साथ ताजमहल के सामने

हाँ, पिक्चर वो नही देखते तो मैंने भी वह शौक त्याग दिया ... .वैसे भी पिक्चर देखने से अच्छा मुझे कुदरत और किताबों का साथ अच्छा लगता है|..एक शौक बहुत मिलता जुलता रहा हम दोनों में वह था घुमने का ...जब तक बच्चे छोटे रहे कई जगह घूमे ...हर छ महीने के बाद दो तीन के लिए कहीं भी निकल जाते थे ..दिल्ली के आस पास .शिमला .जयपुर बहुत बार गए |और रही बात पढने की तो आज तक न कभी किताबे लेने और न कभी पढने के लिए रोका उन्होंने ..| यह जान कर कि मैं आगे पढ़ाई पत्रकारिता की दिशा में करना चाहती हूँ तो वह फॉर्म भरवा दिया | पर इकलौती बहू होने के कारण सासू माँ नही चाहती थी कि नौकरी करू और उस वक्त कोई ख़ास जरुरत भी महसूस नही हुई सो बस पढ़ाई चालू रखी ..| इस के बाद एमए हिन्दी के फॉर्म भी भरे पर पेपर नही दे पायी ...उसी वक्त पहली बिटिया आ गई और उसके तीन साल बाद दूसरी | उसके बाद का समय बस इन्ही दो बेटियों की देख रेख में गुजरने लगा | लिखना पढ़ना भी तभी कुछ कम हुआ ..| वक्त की उंच नीच साथ साथ हर जिंदगी के चलती है .|
बीच के कुछ साल बहुत ख़राब निकले ..सबसे अधिक नुक्सान हुआ जो मेरी ससुराल में सबसे बड़ी सपोर्टर रहीं मेरी सासू माँ का अचानक से चले जाना | यह माँ के जाने के बाद मेरी ज़िन्दगी का दूसरा बड़ा नुकसान रहा | फ़िर ....राजीव जी की कुछ समय तक जॉब न रहना और घर में कई परेशानी जैसे एक दम से आ गयीं ..| तब महसूस हुआ कि अब मेरी भी नौकरी करने का वक्त आ गया है | बच्चियां अभी दोनों छोटी थी ....सो अध्यापिका की नौकरी ही बेहतर रहेगी | घर और जॉब दोनों साथ साथ चल सकेंगे | उस वक्त एक छोटे से स्कूल में तो नौकरी मिल गई पर अच्छे स्कूल में नौकरी के लिए बी .एड का होना जरुरी था | स्कूल के साथ साथ उसी वक्त रोहतक यूनिवर्सिटी से पत्राचार में बी .एड भी कर लिया | कभी अपनी माँ को इस तरह बच्चो के साथ पढ़ते देखा था ..आज मैं भी वही जिंदगी की ज़ंग लड़ रही थी :) वक्त भी कैसे रंग दिखाता है | पर यह बहुत अच्छा हुआ , और उस के बाद मैंने १२ साल एक अच्छे स्कूल में पढाया | यहाँ पढाने के साथ साथ हिन्दी सिखानी थी अफगानी बच्चो को जो उस वक्त अपने वतन से उजड़ कर यहाँ आए थे ..|
ह एक मजेदार अनुभव था .. इस में २२ साल के बच्चे भी थे और उसी क्लास में १० साल के हिन्दी सीखने वाले भी | लाल गुलाल बच्चे पर अपने देश से बेहद प्यार करने वाले | उनके पास जब उनके घर की फोटी देखती थी तो हैरानी होती थी कि कितने बड़े बड़े घर यह वहां समान समेत छोड़ कर भाग आए हैं यहाँ जान बचाने के लिए | पर क्या किया जा सकता था ..वो तो हिन्दी बोलने लायक ही सीखे पर मैं उस वक्त उनकी भाषा संस्कृति से बहुत कुछ नया जान सकी | इन्ही दिनों में साथ साथ प्रूफ़ रीडिंग का काम और घर ट्यूशन पढाने का काम भी किया | इस बीच शाम को कुछ घंटे मधुबन पब्लिशिंग के साथ पार्ट टाइम जॉब करने का मौका भी मिला | यही पर प्रेमचंद के नावल "वरदान "पर भी काम करने का मौका मिला | जिंदगी बदलते अंदाज में हर पल कुछ नया सिखाती है और आगे बढती चली जाती है | मुझे लगता है कि जिंदगी का यह मुश्किल समय ही बहुत तगडे अनुभव दे जाता है | लेखन का काम मेरे मनपसंद का था ...फ़िर यही काम अच्छा लगने लगा .... और स्कूल छोड़ दिया | जारी
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

पकौड़ियां, पठान और कुकर

28424012_b2827136c5 मजबूती के अर्थ में रोज़मर्रा की हिन्दी में पक्का शब्द खूब इस्तेमाल होता है जिसका रिश्ता भी पक्व से ही है। ईंट को आंच पर गर्म करते हैं तो वह मज़बूत होती है, पक्की होती है। इसी तरह जठराग्नि में अन्न को पका कर शरीर मज़बूत होता है।
कौड़ी जैसी शानदार चीज़ शायद ही किसी को नापसंद हो। नाम सुनते ही मुंह में पानी आने लगता है । बारिश का मौसम तो खासतौर पर गर्मागर्म पकौड़ों के लिए जाना जाता है मगर ज्यादा खा लेने से पाचन तंत्र के खराब होने का भी खतरा है। क्या आप जानते हैं कि पकौडे और कुकर में कुछ रिश्तेदारी है ? है न अजीब बात ! पकौड़ियों की रिश्तेदारी कड़ाही से हो सकती है, तेल से हो सकती है , पाचन से हो सकती है पर कुकर से तो हरगिज़ नहीं । मगर रिश्तेदारी है । इन दोनों बल्कि तीनों शब्दों का जन्म एक ही मूल शब्द ( धातु ) से हुआ है ।
भाषा विज्ञानियो ने इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में एक धातु खोजी है pekw पेक्व जिसका अर्थ है पकना या पकाना। लैटिन में इसका रूप हुआ कोक्कुस जो कोकस होते हुए पुरानी इंग्लिश के कोक coc में ढल गया और फिर इसने कुक का रूप धारण कर लिया। कुक यानी खाना बनाना । जाहिर है कुकर उस उपकरण का नाम हुआ जिसमें खाना जल्दी पकता है। पेक्व की सादृश्यता संस्कृत शब्द पक्व से गौरतलब है जिसका अर्थ पकाया हुआ होता है। पक्व शब्द बना है पच् धातु से जिसमें गर्म करना, भूनना, पूर्णता तक पहुंचाना या विकसित होना जैसे भाव शामिल हैं। पक्व क्रिया में भोजन का बनना भी शामिल है और उसे पचाना भी। पच् धातु से पाचक, पाचन, सुपाच्य जैसे शब्द बने हैं जिनका रिश्ता पके हुए भोजन से है। क्योंकि अगर भोजन पका हुआ नहीं है तो वह पचेगा नहीं।
काना अगर एक क्रिया है तो उसकी सम्पूर्णता उसके पचने में निहित है। पकौड़ी शब्द बना है पक्व+वटी > पक्कउडी > पकौड़ीवटी शब्द उसी वट् से बना है जिसमें गोल गोल बनाना, घेरना आदि भाव शामिल हैं और जिससे भारत के प्रमुख खाद्य पदार्थ जैसे भाजी बड़ा, वड़ापाव, आलू बड़ा (बोंडा) आदि बने हैं। पकवान शब्द भी पक्व+अन्न से बना है जिसका अर्थ तरह तरह के , घी में तले हुए अथवा भूने हुए भोज्य पदार्थ होता है। मजबूती के अर्थ में रोज़मर्रा की हिन्दी में पक्का शब्द खूब इस्तेमाल होता है जिसका रिश्ता भी पक्व से ही है। ईंट को आंच पर गर्म करते हैं तो वह मज़बूत होती है, पक्की होती है। इसी तरह जठराग्नि में अन्न को पका कर शरीर मज़बूत होता है। पुकाना शब्द का मुहावरों में खूब प्रयोग होता है जैसे खिचड़ी पकाना यानी गुप्त मंत्रणा करना, गोपनीयता बरतना। कान पकाना यानी किसी बात का जरूरत से ज्यादा दोहरा। 
फारसी का एक शब्द है पुख्ता । आमतौर पर इसका इस्तेमाल भी उर्दू-हिन्दी में खूब होता है। पुख्ता यानी मज़बूत, पका हुआ, टिकाऊ, पायेदार आदि। पुख्ता शब्द बना है फारसी के पुख्तः से जिसका मूल अवेस्ता की पच धातु ही है जिसमें पकाना, पकना का भाव शामिल है। फारसी पुख्त में पकना-पकाना जैसे भाव भी शामिल हैं। दमपुख्त एक ऐसी ही क्रिया है जो आमतौर पर मीट को कुकरनुमा बर्तन में भाप की गर्मी से पकाने के लिए कही जाती है। कुकर का उदाहरण यहां मौजूद है जो भाप की गर्मी से ही भोज्य पदार्थ को जल्दी पकाता है।
Paunk na Bhajiyaफ़गानिस्तान की भाषा पश्तो या पुख्तो कहलाती है। उस इलाके को पुख्तोनिस्तान या पख्तूनिस्तान भी कहते हैं। यहां के निवासी पख्तून या पश्तून कहलाते हैं। संस्कृत की एक धातु है पश् जिसका अर्थ है सुदृढ़, मज़बूत, ऊंचा , बुलंद । ध्यान दें कि जिस इलाके को पख्तूनिस्तान कहा जा रहा है वह समूचा पहाड़ी इलाका है। यहां पश् धातु में पहाड़ की मज़बूती और बुलंदी का भाव प्रमुख है। पश् को पष् मानें तो बनता है पाषाण अर्थात पहाड़ यानी बुलंद, मज़बूत, विराट, पुख्ता । फारसी में इसी मूल से निकला एक और शब्द है पज़ जिसका मतलब पका हुआ भी होता है और मज़बूत भी जो पष् का ही रूप है। हिन्दी उर्दू में मवाद के लिए जो पस शब्द का प्रयोग होता है उसका रिश्ता फोड़े के पकने से ही है। पख्तून का देशज रूप हुआ पठान जो हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। पहाड़ का एक रूप होता है पठार जो इसी शब्द समूह का हिस्सा है। यानी पकौड़ों की रिश्तेदारी न सिर्फ कुकर से बल्कि काबुलीवाला यानी पठान से भी है जिसके पास आमतौर पर हम किशमिश बादाम की उम्मीद कर सकते हैं , पकौड़ों की तो हरगिज़ नहीं।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, September 25, 2008

फर्स्ट क्रश- कपिलदेव [बकलमखुद-72]

diu 137 ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के तेरहवें पड़ाव और सत्तरवें सोपान पर मिलते हैं रंजना भाटिया से । कुछ मेरी कलम से  नामक ब्लाग चलाती हैं और लगभग आधा दर्जन ब्लागों पर लिखती हैं। साहित्य इनका व्यसन है। कविता लिखना शौक । इनसे हटकर एक ज़िंदगी जीतीं हैं अमृता प्रीतम के साथ...अपने ब्लाग  अमृता प्रीतम की कलम से  पर । आइये जानते हैं रंजना जी की कुछ अनकही-
रारतों भरे दिन बीत रहे थे | उन दिनों क्रिकेट का जोर बहुत था | जिसको देखो वही इसकी बात करता रहता था | शायद पहले वर्ल्ड कप की बात है यह .हर कोई कपिलदेव का दीवाना था | मुझे यूँ मैच देखने का कोई शौक नही था ,पर कपिल देव को देखे बगैर चैन नही पड़ता था :) आज की जनरेशन इसको फर्स्ट क्रश भी कह सकती है :) उस वक्त इन बातों की कोई अक्ल नही थी बस यह लगता था की कोई लड़की उसका नाम न ले :) सब हँसते थे मेरी इस बात पर ....कई महीनों तक उसका फितूर चढा रहा :) बाद में उसकी शादी जब भाटिया कास्ट की लड़की से ही हुई तो सबने बहुत तंग किया मुझे :) मैंने कहा आख़िर शादी तो उसने भाटिया से ही करी है न :) फ़िर वह फितूर उतर गया |
आर्मी का फितूर 
ब इसके बाद जो फितूर चढा वह आर्मी में शामिल होने का :) पहले पापा यहाँ दिल्ली केंट में और हिंडन आदि जगह पर पोस्टेड थे तो इतना आर्मी लाइफ के बारे में पता नही था | और उम्र भी इतनी नही थी कि सब समझ पाते ..पर जब जम्मू में उनको वो बॉर्डर एरिया मिले जहाँ परिवार को साथ नही रख सकते हैं ,पर कभी कभी हम वहां उनसे मिलने चले जाते थे | तभी आर्मी लाइफ को बहुत करीब से देखने का मौका भी मिला |
मुश्किल है फौजी की जिंदगी
तनी मुश्किल ज़िन्दगी में भी उन लोगों का मुस्कराता चेहरा और जोश देख कर एक प्रेरणा मिलती और १८ १९ साल कि उम्र वैसे भी सपनों कि दुनिया होती है ..कुछ पता नही होता कि आगे ज़िन्दगी न कहाँ ले जाना है ..बस सपने सजने लगते हैं और कुछ कर गुजरने का जोश ,कुछ बनने का जोश दिल में खूब उन्छाले मारने लगता है ...बस जब लगातार नौशेरा ,राजौरी .जैसे बॉर्डर से और पकिस्तान से लगती जगह देखती तो या तो या तो उस पार क्या है ? हमारे जैसी ही दुनिया है न वो ..फ़िर क्यूँ यहाँ इतना बिगडा हुआ माहौल रहता है ..यह देखने का ,जानने का जुनून चढ़ जाता या फ़िर किसी तरह से पापा मान जाए और कोई ऐसा आसान तरीका मिल जाए कि मैं भी इन फोजियों के साथ यहाँ कंधे से कंधे मिला कर यहाँ इस जगह खड़ी हो सकूँ यह बात दिल में आती | सच में सलाम है इन देश के बहादुर सिपाहियों को जो इतनी मुश्किलों का सामना हँसते हँसते करते हैं ..यहाँ बैठ कर बातें करना आसान है पर जिस तरह से वह और उनके परिवार वाले सब झेलते हैं वह ..सब के बस का काम नही है|
भूतों का शग़ल
ह समय कब बीता पता ही नही चला पर बहुत अच्छा बीता | हमारा शैतान ग्रुप जितने समय साथ रहा कुछ न कुछ शरारत लगातार जारी रहती | कालेज छोटी छोटी बात पर बंद हो जाया करता था | क्यूंकि वहां हालात तब भी यही थे जो आज हैं ...यानी की छोटी सी बात पर भी हड़ताल और बंद ... | जम्मू में जो घर था वहां आंटी [मकान मालकिन ] जब अच्छे मूड में होती तो अक्सर दूर बॉर्डर एरिया में पढने वाले गांव में भूतों के किस्से सुनाती | इन्ही दिनों में अपनी जासूसी का किस्सा भी मैंने काफ़ी विद कुछ में बताया था :) बहने उनकी बातों में आ जाती .भाई तो बहुत ही छोटा था , पर मैं उनकी इन भूत वाली बातों सुन सुन कर नित्य नई शरारतों को अंजाम देती थी | शुरू से बहुत सुबह उठ कर पढने की आदत थी उस से पहले नहाने की भी और आंटी जी भी जल्दी उठ जाती थी ,बस तभी कोई न कोई ऐसी बात कर देती थी .जैसे लम्बी चाद्दर ओढ़ के एक दम से उनके सामने सुबह ४ बजे आ जाना :) कभी बाथरूम की लाईट बंद खोल कर देना जब वह नहाने जाती आदि आदि मेरे डराने के उस वक्त उन्हें प्रिय शगल होते |  और वह किस्से फ़िर यूँ कहानी बना बना कर सुनाना की उन्हें विश्वास हो जाए की सच में कोई भूत ही था जो यह सब करता है |
रिश्ते की बात
स तरह देखते देखते फाइनल इयर भी आ गया अभी पेपर शुरू ही हुए थे कि पहला रिश्ता आ गया | राजीव मेरे  पतिदेव के मामा जी वही रहते थे.. उनका हमारे घर में अक्सर आना जाना था उन्होंने जब अपने भांजे के लिए पापा से मेरे रिश्ते की बात की तो पापा को जो अब तक मैं एक नन्ही सी शैतान बच्ची नज़र आती थी ,यह रिश्ता आते ही यकायक मैं उन्हें बहुत बड़ी नज़र आने लगी | सब सपने, सब जोश ,आर्मी का माहौल सब बदल गया | संयोग शायद इसी का नाम है और पेपर देते ही सगाई ही गई और अभी रिजल्ट भी नही आया था की शादी | सब एक सपने सा हुआ ....होश तब आया जब ससुराल पहुँची :)  जारी
Picture 001
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, September 24, 2008

फ़िरंगी का फ़ीका रंग गाढ़े पर भारी...

 गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी  दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थीSuperStock_1746-369 

दिल्ली की गलियों में 1857 की क्रांति  के दौरान यह आम नज़ारा था। इतिहास की किताबों में इसे सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है फोटो सौजन्य-http://www.superstock.com/

ज़ादी के क़िस्से कहानियों में अक्सर अंग्रेजों के लिए फ़िरंगी शब्द पढ़ने - सुनने को मिलता रहा है. यह एक ऐसा शब्द है जो अंग्रेजों की एक खास छवि पेश करता है यानी जबरिया घुसपैठ कर आए विदेशी की। इसमें नापसंदगी का भाव समाया हुआ है । रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि पद्माकर भट्ट की निम्नलिखित पंक्तियां अत्यंत प्रसिद्ध हैं -
बांका तृप दौलत अलीजा महाराज कबौ, सजि दल पकरि फिरंगिन दबावैगो. दिल्ली दहपट्टि पटना हू को झपट्ट करि, कबहूंक लत्ता कलकत्ता को उड़ावैगो ..
सुंदरलाल की पुस्तक 'भारत में अंग्रेजी राज' में अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा 8 जून 1857 जारी एलान का उद्धरण मिलता है जिसमें भारतीयों का आह्वान करते हुए कहा गया है-
'हिंदुस्तान के हिंदुओं और मुसलमानों उठो. भाइयों, उठो! खुदा ने जितनी बरकतें इनसान को अता की हैं, उनमें सबसे कीमती बरकत 'आजादी' है. क्या वह जालिम नाकस, जिसने धोखा दे - देकर यह बरकत हमसे छीन ली है, हमेशा के लिए हमें उससे महरूम रख सकेगा? ... नहीं, नहीं. फिरंगियों ने इतने जुल्म किए हैं कि उनके गुनाहों का प्याला लबरेज हो चुका है'
भारत में फिरंगी शब्द का प्रयोग चाहे अंग्रेजो के लिए नस्ली आधार पर किया जाता रहा हो मगर यह तथ्य भी दिलचस्प है कि अंग्रेजों से पहले ही भारत में इस शब्द की आमद हो चुकी थी। बरास्ता अरबी-फारसी , फिरंगी शब्द भारत में जिन लोगों के साथ दाखिल हुआ वे खुद भी सदियों तक भारत में विदेशी ही समझे जाते रहें मगर यह शब्द जुड़ा अंग्रेजों से। फिरंगी मूलतः अरबी भाषा का माना जाता है मगर अरबी में इसकी आमद मिस्र से हुई है। फिरंगी शब्द अरबों और यूरोपीयों के बीच चले क्रूसेड यानी धर्मयुद्ध की देन है जब ईसाइयों ने ग्यारहवीं सदी में यरूशलम पर पुनः कब्जे के लिए अरबों के साथ खूनी संघर्ष किया। मिस्र के रास्ते ही ज्यादातर आक्रमण हुए। क्रूसेड से पहले भी फ्रांस वाले मिस्र में विदेशियों के तौर पर जाने जाते थे।
यूरोप के विभिन्न इलाकों के लड़ाकों की शिनाख्त मिस्री समाज ने फ्रैंक यानी फ्रांसीसियों के रूप में ही की । फ्रैंक का उच्चारण मिस्री में हुआ फिरंज और अरबी में यह हो गया फिरंग । इसके फिरंगिया अथवा फिरंजिया रूप भी हैं।  अरबी से यह फारसी में भी चला आया। शुरूआत में अरब में फिरंग शब्द यूरोपीयों के लिए प्रयुक्त होता रहा मगर बाद में व्यापक रूप से इसमें विदेशी का भाव समा गया। पूर्वी एशियाई देशों में भी जहां जहां पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेजी उपनिवेश बसे वहां विदेशी के तौर पर फिरंगी शब्द का चलन बढ़ता चला गया। थाईलैंड, मलेशिया, श्रीलंका आदि तमाम देशों में यह प्रचलित है। श्रीलंका में फिरंगी को परंजियर बोला जाता है क्योंकि तमिल भाषा में का लोप हो जाता है। मज़ेदार बात यह है कि मलेशिया में यूरोपीयों के साथ साथ अफ्रीकियों को भी फिरंग ही कहा जाता है अर्थात फिरंगी का विदेशी के अर्थ में सही सही इस्तेमाल होता है।
फिरंगी की एक और रोचक उत्पत्ति बताई जाती है । चूंकि यूरोपीयों का रंग एशियाई लोगो के गाढ़े रंग की तुलना में हल्का होता है सो फारसी में उन्हें ‘फीका रंग’ कहा गया जो फिरंग में बदल गया ।  जो भी हो, अभिप्राय तब भी यूरोपीयो और ऐशियाइयों के बीच नस्ली फर्क महसूस करने का ही था। फीके रंग वाला यह मामला ठीक वैसा ही है जैसा अग्रेजों के लिए हिन्दी में गोरा शब्द चल पड़ना। खास बात यह कि फीके रंग वाले फिरंगियों का रंग गाढ़े रंग वाले हिन्दुस्तानियों पर कुछ ऐसा चढ़ा है कि उनसे पीछा छुड़ाने के बावजूद बोली,खाना और बाना पर उनका असर अब भी सिर चढ़ कर बोल रहा है।भारत में रंग के आधार पर नाम रखने का रिवाज़ रहा है। गोरे रंग के प्रति ललक तो खास देखी जाती है। पुराने ज़माने में जिन बच्चों का उजला रंग होता था उनका नाम भी फिरंगीमल या फिरंगीलाल भी रखा जाता रहा है। इलाकों और इमारतों के नामों के साथ भी यह शब्द जुड़ा रहा जैसे फिरंगी चाल, फिरंगी छावनी या फिरंगी महल आदि। अब नामों पर जोर नहीं रहा वर्ना किसी मायने में हम फिरंगियों से कम हैं ?
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, September 23, 2008

नींबू, अमरूद का पेड़ और मुर्गियां...[बकलमखुद71]

diu 137 ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के तेरहवें पड़ाव और उनहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं रंजना भाटिया से । कुछ मेरी कलम से  नामक ब्लाग चलाती हैं और लगभग आधा दर्जन ब्लागों पर लिखती हैं। साहित्य इनका व्यसन है। कविता लिखना शौक । इनसे हटकर एक ज़िंदगी जीतीं हैं अमृता प्रीतम के साथ...अपने ब्लाग  अमृता प्रीतम की कलम से  पर । आइये जानते हैं रंजना जी की कुछ अनकही-
चपन यूँ तो बीत जाता है पर उसकी मधुर यादे साथ ही रह जाती है ..घर से अलग होने का यह मेरे लिए पहला मौका था | यहाँ दो भाई थे कजन ,पर दोनी बहुत ही छोटे | तिलक नगर का स्कूल और वहां पर पहली सखी बनी ""अनु "' अनुराधा और इसी ने मेरे कविता लिखने के शौक को हवा दी |
जो बीत गई , सो बात गई......
जब बड़ी माँ थी तो वह कई बार हमें "हरिवंश राय बच्चन "की कविता का वह अंश लोरी के रूप मे सुनाती थी "जो बीत गई वह बात गई ..जीवन मे एक सितारा था ..माना वह बेहद प्यारा था " ..वह कविता अब समझ मे आने लगी थी और जो लिखती थी वह भी लफ्ज अब अर्थ देने लगे थे .. ..मम्मी के बुक शेल्फ मे प्रेमचंद और गुरुदत्त को पढ़ा था ...मीना कुमारी की फिल्मों से जो उनकी बेपनाह मोहब्बत देखी थी ...इतनी की उनके मरने पर घर मे खाना नही बना था ...वह सब अब धीरे धीरे समझ मे आने लगा | अनु [अनुराधा ] शिवानी और अमृता प्रीतम की ढेरों किताबों मे गुम रहती थी ....उस से पहली किताब शिवानी की "केंजा" ले कर पढ़ी और फ़िर अमृता की उस के बाद जो नशा हुआ पढने का वह अब तक नही उतरा ..फ़िर उसी ने मेरी लिखी कविता पहली बार स्कूल मेग्जिन मे दी | वहां से निरंतर लिखने का सिलसिला चल पड़ा |
वीरवार का खट्टा-मीठा इंतजार...
देखते देखते दो साल गुजर गए और स्कूल शिक्षा समाप्त हो गई | पर मम्मी पापा भाई बहन से अलग रहना और दिल्ली से जम्मू अकेले जाने का जो आत्मविश्वास ख़ुद में पैदा हुआ , वह दो साल की यह जिंदगी बहुत कुछ सिखा गई | १२ वी क्लास के पेपर देते ही मैं जम्मू चली गई और रिजल्ट आने  पर वही वूमेन कॉलेज में दाखिला ले लिया | जम्मू में हमारा घर गांधी नगर ,स्वर्ण सिनेमा हाल के पास था | साथ ही पीर बाबा की मजार जहाँ हर वीरवार मत्था टेकने जाते थे | पीर बाबा पर मत्था टेकना तो ख़ास लगता ही था पर उसी दिन वहां आलू की चाट और भेल पूरी वाला खड़ा होता था..वह खाने का बहुत चस्का लगा था तब .:) सो वीरवार का इन्तजार बहुत खट्टा मीठा सा लगता था उन दिनों घर छोटा सा था| मकान मालिक भी साथ ही एक तरफ़ रहते थे और एक तरफ़ हम |
जो कभी नहीं सुधरेंगे...
र में नीम्बू - अमरुद के पेड़ और एक छोटा सा मुर्गी घर भी था | मकान मालिक जिन्हें हम दब्बू जी कहते थे ,उनका लगाव अपने बच्चो से ज्यादा इन पेड और मुर्गियों की तरफ़ ज्यादा रहता था ,ख़ास कर मेरे वहां आने से क्यों की कोई अमरुद नीम्बू पेड पर सुरक्षित नही रहा था और मुर्गी घर का दरवाजा जो पहले बंद रहता था ,उन्हें अब अक्सर खुला मिलता और जब वह मुर्गी पकड़ने उनके पीछे भगाते तो वह मुझे देखने में जो खुशी मिलती थी उसका वर्णन करना बहुत मुश्किल है ..| निम्बू तोड़ने में मेरे पूरे बाजू तक छिल जाते थे पर मजाल है कि एक भी निम्बू पेड़ पर मिल जाए उन्हें ..इस लिए उस परिवार को बहुत पसंद नही थी मैं | :) मेरी बहने दोनों बहुत शराफत से पेश आती थी पर हम तो वो थे , "'जो कभी नही सुधरेंगे" पर यकीन करते हैं |
जम्मू में कॉलेज के दिन... 
कॉलेज की अपनी मस्ती थी वूमेन कॉलेज था बहुत सख्ती रहती थी | सफ़ेद सलवार लम्बी सी कमीज और उस पर सही से पिन किया दुप्पटा | बहुत गुस्सा आता था कि कॉलेज से बंक नही मार सकते इसी ड्रेस कोड के कारण पर रोज़ रोज़ क्या पहने के झंझट से बहुत आराम भी था | जिस दिन कोई मौका होता कि आज यूनीफोर्म में नही जाना तो उस दिन "बागे-बहु तवी नदी के किनारे एक पुराना किला और देवी माँ का मन्दिर है वहां भाग जाते या हरिसिंह पैलेस ..जो तवी नदी के दूसरे किनारे पर था | पता नही वहां के लोग उसको शहर क्यूँ कहते थे ? जबकि शहर तो इस तरफ़ भी था .. कॉलेज की पढ़ाई भी यहाँ उस वक्त स्कूल की तरह थी | हमारा ग्रुप अपना अलग ही था , और मैं अपने लंबे कद के कारण मैं अलग से पहचान में आ जाती थी .... नॉवल पढने और लिखने का शौक यहाँ और अधिक बढ गया ... कई बार कॉलेज फंक्शन में भाग लिया ,अपनी लम्बाई से परेशान हो कर कविता तो अब याद नही पर एक लेख लिखा था लम्बाई वरदान या अभिशाप, वह सबने बहुत पसंद किया था ..इसी लम्बाई के कारण बास्केट बाल खेल में कॉलेज स्तर पर कई बार हिस्सा लिया | माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए तो हर २० या २५ दिन में भाग जाते थे ,कभी कोई रिश्तेदार आया उसके साथ नही तो एक हमारे ग्रुप की लड़की कटरा की रहने वाली थी , जब वह सप्ताहांत में घर जाती तो उसके साथ पूरा ग्रुप हो लेता | क्या दिन थे वह ....
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, September 22, 2008

बालटी किसकी ? हिन्दी या पुर्तगाली की .[बरतन-1]..

BALDE आज जिस आकार की बालटियां भारत में प्रचलित हैं उस आकार के बरतनों का अतीत में संदर्भ नहीं मिलता जबकि बटलोई या घड़ेनुमा बरतन ही भारत में जल संग्रहण के लिए प्रचलित रहे हैं। पुर्तगाली बाल्डे का आकार वैसा ही होता है जैसी आमतौर पर बालटी होती है।
रोज़मर्रा के कामकाम में कई तरह के उपकरणों का हम प्रयोग करते हैं जिनके नामों के बारे में हम कभी इस नज़रिये से नहीं सोचते कि कौन सा शब्द देशी है या कौन सा विदेशी। यहां तक कि विदेशी मूल के शब्द की ध्वनि और उच्चारण से यह तक आभास नहीं होता कि वह कितनी दूर का सफर तय कर के हिन्दीभवन में दाखिल हुआ है। सीधी सी बात है , जो एक बार हिन्दी का हो गया , हमेशा के लिए हो गया।
बाल्टी भी एक ऐसा ही शब्द है । बाल्टी या बालटी का मतलब होता है पीतल, लोहे या अन्य किसी धातु की बनी डोलची या डोल जिसमें पानी भरा जाता है । बालटी रसोई घर और स्नानगृह दोनों ही स्थानों पर ज़रूरी है। रसोई की बालटी आमतौर पर स्टील की होती है। पुराने ज़माने में तांबे और पीतल की बालटियों का चलन था । नहाने का पानी रखने के लिए आमतौर पर लोहे की बालटियां काम में ली जाती हैं । यूं साफ-सुथरी लोहे की बालटियों में भी पीने का पानी रखा जाता है। बालटी शब्द मूलतः हिन्दी का नहीं बल्कि पुर्तगाली ज़बान का है। इसकी आमद भारत में तब हुई जब सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाल के तटवर्ती इलाकों में पुर्तगालियों ने कोठियां बनाई। पुर्तगाली भाषा में बकेट के लिए बाल्डे [balde] शब्द है । बांग्ला में इसका उच्चारण बालटी हुआ । वहीं से यह हिन्दी में भी चला आया । कुछ संदर्भो में इसे बाटी अर्थात कटोरी से उत्पन्न भी बताया जाता हैं। गौरतलब है कि मालवा, राजस्थान और उप्र के कुछ हिस्सों में देगची या घड़े के लिए बटलोई शब्द भी बोला जाता है। बटलोई का विकासक्रम यूं रहा है- वर्त+लोहिका > वट्टलोईआ > बटलोई । वर्त यानी गोल और लोहिका यनी लोहे का पात्र । पंजाब में भी कटोरी या देग के लिए बट्टी या बाटी शब्द का प्रयोग किया जाता है। इन बरतनों के पेंदे भारी होते हैं ताकि पकाते समय पदार्थ जल न जाए।  संभव है कि बाल्टी शब्द का जन्म इससे ही हुआ हो। मगर पानी भरने वाली बालटी के अर्थ में तो पुर्तगाली बाल्डे से ही व्युत्पत्ति ज्यादा सही लग रही है। मराठी में भी कटोरी के लिए वाटी शब्द का प्रचलन है। दूसरी बात यह कि आज जिस आकार की बालटियां भारत में प्रचलित हैं उस आकार baltiके बरतनों का अतीत में संदर्भ नहीं मिलता जबकि बटलोई या घड़ेनुमा बरतन ही भारत में जल संग्रहण या खाना बनाने के लिए प्रचलित रहे हैं। पुर्तगाली बाल्डे का आकार वैसा ही होता है जैसी आमतौर पर बालटी होती है।
रहदी इलाकों, जम्मू-कश्मीर पंजाब और पाकिस्तान में बाल्टी चिकन और बाल्टी मीट भी  खास किस्म के ज़ायके हैं जिनका रिश्ता बाल्टिस्तान से है। बाल्टीस्तान अब पाक अधिकृत कश्मीर का हिस्सा है । किसी ज़माने में यह जम्मू-कश्मीर के तहत आता था । मीट पकाने की यहां की जो तरकीबें हैं वे चीन और तिब्बती रसोई से मिलती-जुलती हैं और इनका ज़ायका भी कुछ अलग है। अंगरेजों ने इसे बाल्टी मीट , बाल्टी गोश्त , बाल्टी मुर्ग़ जैसे नाम दिये। पंजाब में यही चीज़ें कड़ाही मीट के नाम से जानी जाती हैं जबकि बाल्टिस्तान में कुछ मिलते जुलते अंदाज़ वाली भारी पेंदे वाली कड़ाही में यह मीट पकाया जाता हैं। अंगरेजों ने इसे बाल्टीपैन नाम दिया जिसे गोश्त पकाने वाली बाल्टी के तौर पर लिया जाने लगा। यूं बाल्टिस्तान का पुर्तगालियों के लाए इस शब्द से कोई लेना देना नहीं है। संभव है तवे या कड़ाही के लिए प्रचलित बाल्टी शब्द की व्युत्पत्ति वर्तलोहिका वाली बटलोई , बाटी, बट्टी शब्द श्रंखला से हुई हो।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, September 21, 2008

डॉक्टर हर्षदेव की कलम और कैंची

HARSHDEV कहीं संपादक के तो कहीं मालिक के खट्टे-मीठे, कडुवे सस्मरण मिले हैं। बहुत से तो बड़े रोचक और मनोरंजक हैं, तो कुछ गाली और अवमानना की वजह बन सकते हैं। अब इस उम्र में कोशिश करूँगा कि फजीहत से बचते हुए जो जितना हो सके, ब्लॉग के जरिये शेयर कर सकूँ।
दोस्तों, आज शब्दों के सफर में एक ऐसी शख्सियत से मिलवाने जा रहा हूं जिन्होंने हाल ही में ब्लागजगत में दाखिला लिया है। ये हैं डॉ हर्षदेव । जितने भी पत्रकार ब्लागर हैं उनमें से कई तो इनसे परिचित होंगे, कई ने इनकी बाबत सुना होगा। शब्दों के सफर में इन्हें लाने का मक़सद उन सभी लोगो से इनका तआरुफ़ कराना है जो मीडिया से वाबस्ता नहीं हैं और लिखने-पढ़ने से साबका रखते हैं।
 डॉ हर्षदेव आगरा निवासी है। मुझसे उनकी कई स्तरों पर रिश्तेदारी है। 1985 मे जयपुर से नवभारत टाइम्स की शुरूआती टीम में हम लोग साथ-साथ थे। कहां 1970 में सैनिक जैसे ऐतिहासिक अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले तपेतपाए पत्रकार और कहां 1985 में नभाटा से पत्रकार जीवन की शुरूआत करनेवाला मैं ट्रेनी जर्नलिस्ट। वे मेरे मित्र भी है , बड़े भाई भी हैं , लड़ियाने के रिश्ते से वे डैड भी हैं । हालांकि ये उनकी मर्जी है कि रिश्तों के इन सभी स्तरों को वे नकार  सकते हैं। डॉक्टर साब का पत्रकारिता का विलक्षण अनुभव उनके सामने होने पर बोलता है। जनसंचार पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। दो दशको तक नवभारत टाइम्स दिल्ली में काम करने के बाद अब स्वैच्छिक निवृत्ति लेकर आगरा आ बसे हैं । कहते हैं कि कई लोगो के ब्लाग देखकर ईर्ष्यावश ब्लाग बना डाला। अब देखते हैं कि इस ब्लाग धमाचौकड़ी में उनके सुदीर्घ पत्रकार-जीवन के अनुभवों का जो खजाना हमें उनके ब्लाग कलम और कैंची में मिलनेवाला है उसे हम कितना सहेज पाते हैं। मुझे विश्वास है कि कलम और कैंची की धार खासतौर पर नये और युवा पत्रकारों को ज़रूर प्रेरित कर सकेगी।
स्वागत है डॉक्टर साहब का.....
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

सुनें रंजना भाटिया की...[बकलमखुद-70]

diu 137 ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के तेरहवें पड़ाव और अढ़सठवें सोपान पर मिलते हैं रंजना भाटिया से । कुछ मेरी कलम से  नामक ब्लाग चलाती हैं और लगभग आधा दर्जन ब्लागों पर लिखती हैं। साहित्य इनका व्यसन है। कविता लिखना शौक । इनसे हटकर एक ज़िंदगी जीतीं हैं अमृता प्रीतम के साथ...अपने ब्लाग  अमृता प्रीतम की कलम से  पर । आइये जानते हैं रंजना जी की कुछ अनकही-
मेरे बारे मे वैसे तो काफ़ी विद कुश मे बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पर अजित जी का जब मेल आया तो मैं यह न्योता ठुकरा न सकी , सोचा चलो एक बार फ़िर सही अपने जीवन के यादों के गलियारे मे फ़िर से घूम के आते हैं | बहुत सी यादे बचपन की दिलो दिमाग पर हमेशा स्वर रहती हैं और आज भी बच्चो को सुनाती रहती हूँ |
रियाणा के एक कस्बे कलानौर जिला रोहतक .पहली संतान के रूप मे मेरा जन्म हुआ १४ अप्रैल १९६३ ....दादा जी का घर .....कच्ची मिटटी की कोठरी...... वही पर हमारा आगमन हुआ माँ पापा ने नाम दिया रंजू | पहली संतान होने के कारण मम्मी पापा की बहुत लाडली थी | और बुआ बताती है कि बहुत शैतान भी | जितना याद आता है कि पापा कि ट्रान्सफर वाली नौकरी थी सो जब कुछ होश आया तो कुछ बहुत धुंधली सी यादे बांदा , झाँसी और तालबेहट की हैं ...मेरे बाद मेरी दो छोटी बहने और हुई और फ़िर पापा जो पहले रेलवे में थे उन्होंने ने मिलट्री इंजनियर सर्विस ज्वाइन कर ली | वह शायद उस वक्त हिंडन मे जॉब करते थे और मम्मी आगे जॉब करना चाहती थी सो वह नाना नानी के पास रह कर बी एड की तैयारी मे लग गई | दोनों छोटी बहने तो दादी जी के पास रही पर मैं मम्मी पापा से कभी अलग नही रही|
सख्त माहौल में शरारतों की गुंजाईश...
र मे पढ़ाई का बहुत सख्त माहौल था | होना ही था जहाँ नाना , नानी प्रिंसिपल दादा जी गणित के सख्त अध्यापक हो वहां गर्मी की छुट्टियों मे भी पढ़ाई से मोहलत नही मिलती थी| साथ ही दोनों तरफ़ आर्य समाज माहोल होने के कारण उठते ही हवन और गायत्री मन्त्र बोलना हर बच्चे के लिए जरुरी था | सारे कजन मिल कर गर्मी की छुट्टियों मे मिल कर खूब धामा चोकडी मचाते और नित्य नए शरारत के ढंग सोचते जिस मे पतंग उडाने से ले कर नानी की रसोई मे नमकीन बिस्किट चोरी करना और दादा जी के घर मे वहां पर बाग़ से फल चोरी करना शामिल होता| शुरू की पढ़ाई वहीँ रोहतक मे हुई पर मम्मी की पढ़ाई पुरी होते ही हमारा तीन जगह बिखरा परिवार पापा के पास हिंडन आ गया | यहाँ आर्मी स्कूल मे पढ़ाई शुरू की| बहुत सख्त था यहाँ स्कूल का माहौल| पर घर आते ही वहां के खुले घर मे जो शरारत शुरू होती वह पापा के आफिस के वापस आने के बाद ही बंद होती |
एक चिड़िया की अंत्येष्टि...
दोपहर में जब बड़े सो जाते तो हम बच्चो को टोली चुपके से बाहर निकल आती और फ़िर शुरू होता तितली पकड़ना चिडिया के घोंसले में झांकना ....यूँ ही एक बार हमारे घर की परछती पर रहने वाली एक चिडिया पंखे से टकरा मर गई उसको हमारी पूरी टोली ने बाकयदा एक कापी के गत्ते कोपूरी सजा धजा के साथ घर के बगीचे में उसका अन्तिम संस्कार किया था और मन्त्र के नाम पर जिसको जो बाल कविता आती थी वह बोली थी बारी बारी ..:)मैंने बोली थी..चूँ चूँ करती आई चिडिया स्वाहा ..दाल का दाना लायी चिडिया स्वाहा.:) सब विषय मे पढ़ाई मे अच्छी थी सिर्फ़ गणित को छोड़ कर .पापा से इस के लिए मार खा जाती थी पर मम्मी से मैं कभी नही पिटी... हाँ दोनी बहने कई बार पीट जाती थी ..| मम्मी को सरस्वती शिशु बाल मन्दिर मे स्कूल मे नौकरी मिल गई और पापा भी पालम आ गए और हम सब नारायणा मे रहने लगे |
जिंदगी की कुछ हकीक़तें...
कुछ कुछ याद आता है तब लड़ाई के दिन थे शायद ब्लेक आउट होता था और हम सब खेलते खेलते घर के पास बने खड्डों मे छिप जाते थे | या घर की तरफ़ भागते थे | फ़िर जनकपुरी पंखा रोड पर हमने अपना घर लिया | शिफ्ट करते ही हम अमृतसर और माता के दर्शन के लिए गए थे पहली बार | मम्मी तब तक स्कूल की प्रिसिपल बन चुकी थी और पढ़ाई का माहौल घर मे हर वक्त रहता था | अभी घर अच्छे से सेट भी नही होने पाया था की एक दिन मम्मी के पेट मे अचानक दर्द उठा और देखते ही देखते वह हमें छोड़ कर चली गई | जिंदगी उस वक्त कैसे एक शून्य पर आ कर खड़ी हो गई थी वह लम्हा मैं आज भी नही भूल पाती हूँ | जिंदगी धीरे धीरे चलने लगी .हम तीनों बहने ही बहुत छोटी थी .और पापा की जॉब सख्त ..| कुछ समय बीता और हमारी नई माँ आ गई | वह आई तो घर कुछ संभला और गाड़ी जिंदगी की चलनी शुरू हुई | छोटा सा प्यारा भाई मिला और साथ ही आ गई पापा की जम्मू मे ट्रान्सफर ...पर कुछ एडमिशन की गडबडी होने के कारण मुझे अपने चाचा जी के पास दो साल रहना पड़ा और बाकी सब जम्मू चले गए ..और जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ ... [जारी]
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, September 20, 2008

बहीखातों का अंबार यानी दफ्तर

ED001528 आज के वातानुकूलित और कम्प्यूटरों वाले आफिस भी दफ्तर ही कहलाते हैं जहां किसी खाते , रजिस्टर या बही का नामोनिशां नहीं है।
जीवन-यापन के लिए इस दुनिया में सभी को कुछ न कुछ काम करना पड़ता । अब कमाई करने के भी अलग अलग अंदाज़ हैं। ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग आराम से बैठकर काम करते हैं क्योंकि वे दिमागी मेहनत ज्यादा करते हैं। अनपढ़ या कम शिक्षित लोगों को आराम का काम नसीब नहीं क्योंकि उन्हें शारीरिक मेहनत करनी होती है। बहरहाल बैठकर काम करने की जगह को हिन्दी में कार्यालय , उर्दू में दफ्तर और अंग्रेजी में ऑफिस कहते हैं। दफ्तर का मूल अरबी में अर्थ है बही खाता, मोटी किताब, उधार खाता या जिल्द आदि। काग़ज़ों का पुलिंदा और फाइलों का ढेर भी इसके अंतर्गत आता है। दफ्तर शब्द की हिन्दी में आमद बरास्ता फारसी-उर्दू हुई है। मुस्लिम शासन के शुरूआती दौर में ही यह शब्द भारत आ गया था।
यूं दफ्तर सेमेटिक मूल का शब्द है और अरबी भाषा का माना जाता है। हिब्रू में दफ्तर को दिफ्तर कहा जाता है जिसका अर्थ भी नोटबुक या खाताबही से ही है। हिब्रू में एक शब्द है दफ़ जिसका मतलब होता है पृष्ठ । संभव है इसका रिश्ता दिफ्तर या दफ्तर से हो मगर भाषाशास्त्री इसे दफ्तर शब्द को ग्रीक से अरबी में आया मानते हैं। ग्रीक भाषा का एक शब्द है डिप्थेरा [diphthera] जिसका मतलब है पतली महीन झिल्ली, चमड़ा। इसका अरबी रूपांतरण दफ्तर और हिब्रू रूप दिफ्तर हुआ। गले के रोग डिप्थीरिया का नामकरण भी इससे ही हुआ है । इस रोग से कंठ में एक अदृश्य झिल्ली उत्पन्न हो जाती है। पुराने ज़माने में अरब में चमड़े की महीन परतों पर लिखा जाता था और उन्हें मोटे तार में पिरोकर एक साथ रखा देते थे । इन्हें ही दफ्तर कहते थे। अंग्रेजी के लैटर [letter] यानी पत्र उद्गम भी इसी diphtheria से माना जाता है जो लैटिन के littera का बदला हुआ रूप है। यहां इसका मतलब है चिह्न, अंकित, या अक्षर। लैटर का मतलब पत्र-चिट्ठी होता है और हिन्दी मे भी इस्तेमाल किया जाता है मगर लैटर अक्षर को भी कहते हैं।
फ्तर के कई रूप अन्य भाषाओं में भी नज़र आते हैं मसलन बल्गारी में दफ्तर को तेफ्तेर, किरग़ीज़ी में देप्तेर, पर्शियन में दफ्तर, स्वाहिली में दफ्त्तारी, ताजिक और उज्बेकी में दफ्तार तथा तुर्की में देफ्तेर कहते हैं। तो स्पष्ट है कि बहीखाते या लिखने की बही , दस्तावेज या ग्रंथालय के अर्थ में दफ्तर शब्द प्रचलित हुआ। बाद में उस स्थान को ही दफ्तर कहा जाने लगा जहां सरकारी दस्तावेजों में लिखत-पढ़त का काम किया जाता था और फिर सरकारी कार्यालय दफ्तर कहलाने लगे । आज के वातानुकूलित और कम्प्यूटरों वाले आफिस भी दफ्तर ही कहलाते हैं जहां किसी खाते , रजिस्टर या बही का नामोनिशां नहीं है। दफ्तर से हिन्दी-उर्दू में दफ्तरी जैसा शब्द भी बना जिसका मतलब था दफ्तर के रजिस्टर , खाता बही आदि में खाने और लकीरें बनानेवाला, एंट्री करने वाला।
आपकी चिट्ठियां
सफर के पिछले पड़ावों- समूह से समझदारी की उम्मीदें...,आबादी को अब्रे-मेहरबां की तलाश...[चमक-ऊष्मा-प्रकाश... ,एक मातृभाषा की मौत और विधवा-बेवा-विडो पर कई साथियों की चिट्ठियां मिलीं । आप सबका आभार...सर्वश्री Anil Pusadkar Shastri ई-गुरु राजीव chandrashekhar hada डॉ .अनुरग सचिन मिश्रा manisha bhalla अनामदास Gyandutt Pandey सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी Mrs. Asha Joglekar सोनू डॉ .अनुराग रंजना [रंजू भाटिया] Udan Tashtari डा. अमर कुमार sidheshwer Sanjay अनूप शुक्ल प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi pallavi trivedi Arvind Mishra Swati डा. अमर कुमार अनूप शुक्ल प्रेमचंद गांधी Prem Chand GandhiDr. Chandra Kumar Jain दिनेशराय द्विवेदी pallavi trivedi Arvind Mishra अभिषेक ओझा Swati लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्`बने रहें सफर में ।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, September 19, 2008

विधवा-बेवा-विडो

q5_sadness_zoomed भारतीय समाज में खासतौर पर हिन्दी क्षेत्र में जिस महिला के पति का निधन हो जाए उसका उल्लेख अखबारों और सरकारी दस्तावेजों में बेहद शर्मनाक तरीके से किया जाता है
क्या आप जानते हैं कि बोलचाल की हिन्दी के कुछ शब्द ऐसे हैं जिनके इस्तेमाल के तरीके पर आपत्ति जताते हुए इन पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सभी राज्य सरकारों को निर्देश दे चुका है। ये शब्द हैं विधवा, बेवा और विडो । विधवा हिन्दी-संस्कृत का है, बेवा उर्दू-फारसी का और विडो अंग्रेजी का , मगर तीनों ही शब्द हिन्दी में इस्तेमाल होते हैं। दिलचस्प यह भी कि इन तीनों में रिश्तेदारी है और ये एक ही मूल से जन्मे हैं।
भारतीय समाज में खासतौर पर हिन्दी क्षेत्र में जिस महिला के पति का निधन हो जाए उसका उल्लेख अखबारों और सरकारी दस्तावेजों में बेहद शर्मनाक तरीके से किया जाता है मसलन अमर शहीद....की विधवा या बेवा , जो बहुत आपत्तिजनक है। एक संस्कारी समाज द्वारा किसी विधवा स्त्री के लिए इस तरह का उल्लेख अच्छा नहीं कहा जा सकता । हद से हद यह कहा जा सकता है कि अमर शहीद ...की पत्नी....मानवाधिकार आयोग ने उक्त उदाहरणों पर ही आपत्ति जताई थी । संस्कृत में एक शब्द है धवः जिसका मतलब होता पति, परमेश्वर, मालिक आदि। धवः बना है संस्कृत धातु धू या धु ले जिसमें छोड़ा हुआ , परित्यक्त , एकांतिक, अकेला आदि। गौरतलब है जिसे त्याग दिया जाए वह अकेला ही होगा। हालांकि पति, मालिक या परमेश्वर के अर्थ में इसकी व्याख्या अकेले से न होकर एकमात्र के रूप में होगी। ईश्वर , पति या स्वामी एक ही होता है दो नहीं। महाभारत के पांच पतियों वाला प्रसंग अपवाद है। आप्टे के संस्कृत कोश के मुताबिक विधवा यानी-विगतो धवो यस्याः सा जिसका अर्थ हुआ जिसने अपने पति को खो दिया है । है।
भाषाविज्ञानियों ने अंग्रेजी के विडो के मूल में भी यही शब्द माना है। रूसी में इसका रूप है व्दोवा, ग्रीक में इदेओस, लैटिन में विदु, अवेस्ता में विथवा और फारसी में बेवा के रूप में यह मौजूद है। जिसकी पत्नी जीवित न हो उसके लिए हिन्दी में विधुर भी शब्द प्रचलित है जो इसी मूल से जन्मा है। यूं आपटे कोश में इसके कुछ अन्य भाव भी बताए गए है जैसे जिससे प्रेम करनेवाला कोई न हो, वंचित, विरह पीड़ा भोगनेवाला या वाली आदि। हिन्दी का अवधू या अवधूत भी इसी मूल का है। यह शब्द बना है धूत से जिसका मतलब भी परित्यक्त , त्यागा हुआ ही होता है अर्थात वह सन्यासी जिसने सांसारिक बंधनों तथा विषयवासनाओं का त्याग कर दिया हो ।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, September 17, 2008

एक मातृभाषा की मौत

इस साल की शुरुआत में अमेरिका के सुदूर अलास्का प्रांत में एक भाषा की मौत हो गई। उस अमेरिका में जो खुद को दुनियाभर में मानवाधिकारों का सबसे बड़ा पैरोकार समझता है, वहां घुटती-सिमटती और काल के गाल में समाती भाषा को बचाने की फिक्र कहीं नज़र नहीं आई। भाषा , जो मनुश्य के होने का सुबूत है...एक समूदाय के अस्तित्व का पुख्ता सुबूत...मगर जिसे खत्म हो जाने दिया गया....इस दुखद घटना पर कादम्बिनी की संपादक मृणाल पांडे ने पत्रिका के अप्रैल माह के अंक में एक विचारोत्तेजक संपादकीय लिखा। हालांकि यह खबर उससे भी काफी पहले समाचार एजेंसियों पर आ चुकी थी। मैने भी उसे पढ़ा और शायद छापा भी।  मृणालजी का यह लेख आप तक पहुंचाने की इच्छा थी , सो कम्प्यूटर में सहेज लिया । ये अलग बात है कि ऐसा करने के बाद मैं इसे भूल भी गया। आज अचानक उस फाइल पर नज़र पड़ी । पेश है शब्दशः वह संपादकीय-
250px-Mrinal_Pande भाषा विशेषज्ञों के अनुसार इंटरनेट, शहरी पलायन और ग्लोबल बाजारों के बढ़ते दबाव तले अगली सदी तक हमारे वक्त की कुछ नहीं तो पचास फीसदी भाषाएं गायब हो चुकी होंगी। इन भाषाओं के साथ जाने कितने करोड़ मानव परिवारों के राग-विराग , उनके सदियों पुराने इतिहास, उनकी मान्यताएं, विश्वास और रीति-रिवाज भी मानो हवा में घुल जाएंगे।
हने को मैरी स्मिथ नौ बच्चों की मां थी, लेकिन जब उसने अपने बच्चों को अपने मायके अलास्का के मूलवासियों की एक लुप्तप्राय भाषा ‘एयाक’ सिखाने की कोशिश की, तो उसके ओरेगनवासी अमेरिकी पति और संतानों ने अंग्रेजी के साथ एक मिट चली प्रजाति की धुंधलाती भाषा को सीखने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। होते-होते मैरी की मातृभाषा घर तक और घर के भीतर भी स्वयं उसी तक सिमट कर रह गई और बच्चों की झोली में उसके सिर्फ इक्के- दुक्के ही शब्द पड़े। 1990 में मैरी की इकलौती बड़ी बहन के स्वर्गवास के बाद मैरी दुनिया में अलास्का के मूलवासियों की इस भाषा की इकलौती जानकार बनकर रह गई। 1993 तक यों भी दुनिया में इस भाषा में बातचीत करने वाले सिर्फ 38 लोग बचे थे और चूकिं मैरी समेत उन सभी को रिकार्डिंग मशीनें और माइक लेकर मंडराने वाले शोधकर्मी अंग्रेजीभाषी गोरों में काई रुचि नहीं थी, इस भाषा की जानकारी चिंताजनक रूप से क्षीण होती गई। अंतत: 21 जनवरी 2008 को 89 वर्षीया मैरी की मौत के साथ ही ‘एयाक’ भाषा इतिहास की चीज बनकर रह गई।
पाणिनी ने कहा है कि शब्द बातचीत से बनते हैं (आख्यातजानि) और कोई भी भाषा उसे बोलने वालों के परिवेश और जीवनशैली की खराद पर गढ़ी जाती है। अलास्का में ज्यों-ज्यों गोरे लोगों की पैठ बढ़ी और वहां के मूलवासियों (एस्कीमो और तिलगिंत) ने पूंजीवादी ढर्रे की अमेरिकी जीवनशैली अपना ली, त्यों-त्यों ग्रामीण मछुआरों की ‘एयाक’भाषा की उल्टी गिनती शुरू हो गई। वह भाषा जो इस हिमजड़ित प्रदेश में नौका खेते हुए विशेष तरह के जाल से मछली पकड़ने वालों की बोलचाल की भाषा थी; वह भाषा, जिसमें दिशा ज्ञान-सूचक शब्द नदी के प्रवाह से निकले थे ; वह भाषा जिसमें इलाके ‘स्प्रूस’ वृक्ष की फुनगी से लेकर जड़ों तक के अंग-प्रत्यंग तथा उनसे मिलने वाले उत्पादों के बारे में दर्जनों अलग-अलग शब्द थे; वह भाषा जिसमें ताजा बर्फ, जमी हुई बर्फ के विभिन्न प्रकारों, यहां तक कि बर्फ पिघलने पर जूतों पर लिपटने वाले चिपचिपे कीचड़ के लिए भी खास संज्ञाएं थीं, समय प्रवाह के साथ विस्मृति की कोख में समाने लगीं।
मैरी के परिवार के ‘एयाक’ भाषाभाषी लोग मूलत: आइसलैंड के मछुआरे थे। बताया जाता है कि हजारों साल पहले उनके पुरखे बेरिंग खाड़ी में अपनी नावें खेते हुए कनाडा के उत्तर में अलास्का आ पहुंचे थे। मैरी के पिता भी, चूंकि एक कुशल मछुआरे थे और मां एक सामान्य गृहिणी, मैरी ने अपना बचपन और किशोरावस्था घर के भीतर पारंपरिक कहानी-किस्सों और एस्कीमों विश्वासों -परंपराओं के बीच बिताए। उसके स्कूल में तब तक पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी हो चुकी थी और बच्चों द्वारा ‘एयाक’ बोलने पर कड़ी रोक थी। होते-होते कई मध्यवर्गीय शहरी भारतीय बच्चों की तरह मैरी का मन अपनी मातृभाषा से उचट-सा गया और बाद में जब उसने ओरेगन प्रांत के एक गोरे अमेरिकी से शादी कर ली और DSC00122उसके बच्चों ने ‘एयाक’ सीखने में खास रुचि नहीं दिखाई तो उसने भी उनको जबरन अपनी मातृभाषा सिखाने की कोशिश नहीं की, लेकिन मातृभाषा और परंपरा हर मनुष्य की आत्मा का अभिन्न हिस्सा होते हैं। इसीलिए यौवन के उफान में भुलाई पुरखों की यादें बुढ़ापे में हर व्यक्ति को ‘हांट’ करने चली आया करती हैं।
  मैरी भी अपवाद न थी। बड़ी बहन की मृत्यु के बाद उसे अचानक लगा कि वह अपनी भाषा ही नहीं, उस भाषा में कैद जातीय स्मृति-धरोहर की भी इकलौती वारिस है। लिहाजा गम गलत करने को उसने बेतरह शराब-सिगरेट पीना शुरू कर दिया और ‘एयाक’ के बारे में जानकारी बटोरने आये अकादमिक शोधकर्ताओं को डपटकर बाहर खदेड़ती रही पर जब उसे लगने लगा कि इस विरासत को सहेजने और आगे की पीढ़ियों के लिए छोड़ जाने का उत्तरदायित्व उसी का है तो मैरी ने मरने से पहले अपनी भाषा, जातीय दंतकथाओं और परंपराओं से जुड़ी अनमोल जानकारी का खजाना अलास्का विश्वविद्यालय के भाषाविद् माइकल क्रॉस और ‘न्यूयार्कर’ पत्रिका की पत्रकार एलिजाबेथ कोलबर्ट को थमा दिया। मित्रों के अनुसार मरने से पहले मैरी को पक्का यकीन हो चला था कि आने वाली सदियों में शायद उसकी मातृभाषा एक बार फिर जी उठेगी। क्या मैरी की ही तरह हमारे लिए भी अभी इस पर तनिक ठहर कर इन्हें बचाने के लिए अपने उत्तरदायित्व पर सोचना उचित नहीं होगा? पंजाबी सिंधी, गुजराती, मराठी द्रविड़ , उड़िया , बंगाली, विंध्य-हिमाचल तक प्रवाहित भाषाओं के बिना क्या हम विराट भारत भाग्य विधाता की कल्पना साकार कर सकेंगे?
 [कादम्बिनी से साभार]
[मृणालजी के इस आलेख को मैने स्वयं कीइन किया है। सावधानी के बावजूद अगर भाषा संबंधी कोई ग़लती नज़र आए तो ज़रूर ध्यान दिला दें , ताकि उसे सुधारा जा सके।  ]
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, September 16, 2008

आबादी को अब्रे-मेहरबां की तलाश...[चमक-ऊष्मा-प्रकाश]

AF397~Drop-of-Water-Posters जल के अर्थ में अगर सबसे ज्यादा कोई शब्द बोला जाता है तो वह है पानी। हिन्दी का पानी शब्द आया है संस्कृत के पानीयम् से जिसने हिन्दी समेत कई भारतीय भाषाओं में पानी के रूप में अपनी जगह पक्की कर ली।
रीर को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश आदि पंचतत्वों से निर्मित कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सबकी उत्पत्ति तेजस् अथवा दिव्यज्योति जिसे परमब्रह्म समझ सकते हैं , से हुई है। इनमें जल अथवा पानी की उत्त्पत्ति सबसे अंत मे हुई बताई जाती है। पानी का गुण शीतलता है , मगर पारदर्शी होने के बावजूद उसमें चमक का गुण भी है जो प्रकाश की मौजूदगी में नुमायां होता है।
 संस्कृत में एक धातु है पा जिसका अर्थ है पीना,एक ही सांस में चढ़ाना। इसी तरह संस्कृत में वर्ण का अर्थ भी पीने से ही जुड़ा है। बहना और धारा संबंधी अर्थ भी इसमें शामिल हैं। इससे ही बना है संस्कृत का लफ़्ज़ अप् का अर्थ भी जल है। संस्कृत की या पा धातुओं का विस्तार पश्चिमी देशो तक हुआ और यहां भी इंडो-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में ऐसे कई शब्द बने हैं जिनसे पानी, बादल, तरल, पेय और धारा संबंधी अर्थ निकलते हैं अलबत्ता कहीं-कहीं ये समीपवर्ती वर्णों में बदल गये हैं मसलन- या में । पुरानी फारसी का अफ्शः , आइरिश का अब , लात्वियाई और लिथुआनियाई के उपे जैसे शब्द भी नदी या जल-धारा का अर्थ बतलाते हैं ।
न सभी शब्दो की संस्कृत के अप् से समानता पर गौर करें। पानी के अर्थ वाला संस्कृत का अप् फारसी में आब बनकर मौजूद है । आब का एक अर्थ चमक भी होता है, ज़ाहिर है प्रकाश के सम्पर्क में आने पर पानी में पैदा होने वाली कान्ति से आब में चमक वाला अर्थ भी समा गया। आब का एक अर्थ इज्जत भी होता है जिसे आबरू कहते हैं। इसका एक रूप  आबरुख भी है जिसका मतलब हुआ चेहरे की चमक । माना जा सकता है यहां चेहरे पर चरित्र की चमक से अभिप्राय है। वैसे हिन्दी में बेइज्जती के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली कहावत में भी चरित्र का संबंध पानी से जुड़ रहा है। प्राचीनकाल से ही जलस्रोतों के नज़दीक मानव का आवास हुआ सो जनशून्य जलस्रोतों के निकट जब लोग बसे तो वे आबाद कहलाए।  जाहिर है इसी बसाहट को आबादी कहा गया जो बाद में जनसंख्या के अर्थ मे हिन्दी में रूढ़ हो गया।
संस्कृत में द वर्ण का अर्थ है कुछ देना या उत्पादन करना । चूंकि पृथ्वी पर पानी बादल लेकर आते हैं इसलिए अप् + द मिलकर बना अब्द यानी पानी देने वाला। उर्दू फ़ारसी में यह अब्र बनकर मौजूद है- कभी तो खुल के बरस अब्रे-Hindi Dayमेहरबां की तरह... यही नहीं,जानकारो के मुताबिक पानी के लिए लैटिन का अक्वा और अंग्रेजी का एक्वा शब्द भी अप् से रिश्ता रखते हैं। जर्मन में नदी के लिए एख्वो शब्द है।
ज जल के अर्थ में अगर सबसे ज्यादा कोई शब्द बोला जाता है तो वह है पानी । हिन्दी का पानी शब्द आया है संस्कृत के पानीयम् से जिसने हिन्दी समेत कई भारतीय भाषाओं में पानी के रूप में अपनी जगह पक्की कर ली। यही नहीं, द्रविड़ परिवार की तमिल में पनि शब्द का मतलब है बहना। इसी तरह तमिल का ही एक शब्द है पुनई (नदी , जल ) जिसके बारे में भाषा-विशेषज्ञों का कहना है कि यह भी संस्कृत मूल से ही जन्मा है। संस्कृत में पान अर्थात (पीना) , पयस् ( जल) , पयोधि (समुद्र) , और हिन्दी में पानी , प्यास , प्याऊ , परनाला, प्यासा, पिपासा , पनीला,पनघट, पनिहारिन,जलपान वगैरह कई शब्दों की पीछे संस्कृत की या पा धातुएं ही हैं।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, September 14, 2008

समूह से समझदारी की उम्मीदें...

Oak Trees, early fall पेड़ों ने भी अब बोलना बंद कर दिया है, क्योंकि उनके समूह बचे कहा ? मगर संवादहीनता का अंत हमेशा पश्चाताप ही होता है , इस कठोर सच्चाई का भयावह रूप अभी समाज को देखना बाकी है।
लोगों की भीड़, वस्तुओं का संग्रह , जानवरों का रेवड़ तथा इसी तरह के अन्य जमाव या समष्टिबोधक शब्दों के लिए हिन्दी का एक आम शब्द है समूह । सभा, गोष्ठियों या अन्य किसी जमावड़े के संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग होता है। इस तरह एक समूह गोष्ठी भी  है और परिवार भी। फौज भी है और राष्ट्र भी । तारामंडल भी है और देवगण भी।
न-समूह एक ऐसा शब्द है जो अक्सर चुनावी रैलियों में लोगों की संख्या का आकलन करते समय कहा-सुना जाता है। समूह बना है संस्कृत की ऊह धातु से जिसमें चर्चा, तर्क-वितर्क, अटकलबाजी आदि भाव शामिल हैं। गौर करें कि भीड़ का स्वभाव होता है हलचल करना। यह हलचल शारीरिक भी होती है और वाचिक भी । अगर कहीं भी चंद लोग इकट्ठा है तो यह तय है कि किसी भी विषय पर वार्तालाप या बहस शुरू होगी ही। चर्चा, तर्क-वितर्क-कुतर्क सब कुछ होगा। विचार-विमर्श भी होगा और परामर्श भी। समूह के साथ चाहे सोच-विचार , चर्चा जैसे शब्द जुड़े हैं मगर हर समूह समझदार  हो ,यह ज़रूरी नहीं। खासतौर पर लोकतंत्र जो खुद समूहवाची है , उसके अस्तित्व के लिए समूह से हमेशा समझदारी की उम्मीद होनी चाहिए।
किसी भी मुद्दे पर अटकलबाजी से लेकर रायशुमारी का दौर तक चल सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि समूह का चरित्र ही यह है। हालांकि समूह शब्द में यह बात आवश्यक नहीं है कि समुच्चय सिर्फ मनुश्यों का ही हो। जड़ वस्तुओं का समूह भी हो सकता है और और पशु-पक्षियों का भी । मगर चर्चा, शब्द आदि वहां भी होते हैं। बर्तनों के समूह के लिए मनुश्य ने खुद ही मुहावरा गढ़ लिया कि जहां चार बर्तन होंगे तो खड़खड़ाएंगे ही । यानी बरतन भी बातें करते हैं। वृक्ष-समूह में भी चर्चाएं होती हैं। आम के पेड़ों का समूह अमराई कहलाता है। अक्सर अमराई में पंचायत हो जाती है, चौपाल सजती है और दुनिया जहान की चर्चा होती है। यूं भी वृक्ष-समूह में पंछियों के कलरव से गुंजार होता है। और रात्रि में सचमुच वृक्ष आपस में बातें करते हैं और हवा उन्हें वाणी देती है। ये अलग बात है कि मानव-मन में बैठा दुभाषिया जो पहले वृक्ष-वाणी समझता था, अब उसका अनुवाद करना भूल चुका है । पेड़ों ने भी अब बोलना बंद कर दिया है, क्योंकि उनके समूह बचे कहा ? मगर संवादहीनता की परिणति हमेशा पश्चाताप ही  है , इस कठोर सच्चाई का भयावह रूप अभी समाज को देखना बाकी है।
संस्कृत की ऊह् धातु में शामिल विचार-विमर्श, चिन्तन, अनुमान लगाना आदि भाव सीधे-सीधे लोगों के आपसी संवाद को जाहिर कर रहे हैं। संवाद किन्हीं दो या उससे ज्यादा व्यक्तियों में होता है इसलिए यहां समूह या समष्टि का अर्थ भी निहित है। ऊह में सम उपसर्ग लगने से बना समूह । हिन्दी का एक और आम शब्द है ऊहापोह जो ऊह+अपोहः से बना है। अपोह का अर्थ होता है तार्किक आधार पर समस्या का निराकरण। ऊहापोह का हिन्दीवाले अक्सर गलत प्रयोग करते हैं। आमतौर पर इसका प्रयोग असमंजस, अधरझूल या निष्कर्ष तक न पहुंचने की स्थिति से लगाया जाता है Hindi Dayजबकि इसका सही अर्थ है किसी विषय पर सम्यक तार्किक चर्चा । ऊहापोह का मुहावरे की तरह जब प्रयोग होता है तो उसका अभिप्राय यही होता है कि सोच-विचार में पड़ना।
ह शब्द से बना एक और महत्वपूर्ण शब्द है व्यूह । इस कड़ी का चक्रव्यूह शब्द व्यूह की तुलना में हिन्दी में कही अधिक प्रयोग होता है। ऊह में वि उपसर्ग लगने से बनता है व्यूह जिसका अर्थ है युद्ध के मद्देनजर सैन्य-रचना। कोई भी योजना अथवा व्यूह रचना बिन तार्किक आधार और चिंतन मनन के नहीं बनाई जाती । ऊह् मे निहित ये अर्थ व्यूह में स्पष्ट हैं। फौज, टुकड़ी, सैन्यदल को भी व्यूह कहा जाता है और शरीर, संरचना, निर्माण भी व्यूह ही कहा जाता है। यहां भी भाव समुच्चय से ही है। सेना भी फौजियों का समूह है और शरीर इन्द्रियों-अंगों का समूह है। चक्रव्यूह प्राचीनकाल का बेहद महत्वपूर्ण सैन्यविन्यास था जिसे भेदना मुश्किल होता था। आज इस शब्द का अर्थ भी मुहावरे के तौर पर होता है जिसका मतलब विरोधी पक्ष की मारक रणनीति से है।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, September 13, 2008

रुआबदार अफसर था कभी जमादार...

 jemadar अंग्रेजो के ज़माने में ही मेहतरों / सफाईकर्मियों के काम की निगरानी करनेवाले को भी जमादार कहा जाने लगा था और गांवों में यह शब्द इसी अर्थ में अभी भी सुनाई पड़ता है .
भारत में मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव में जो शब्द प्रचलित हुए और हिन्दी समेत तमाम हिन्दुस्तानी भाषाओं में ऐसे तमाम लफ्ज चल-फिर रहे है। जमादार भी ऐसा ही शब्द हैं। पहले मुस्लिम राज और फिर अंग्रेजी राज में सरकारी कर्मचारी होने के कारण जमादार का खासा रसूख था।
मादार शब्द बना है अरबी धातु ज-म से जिसका मतलब जिसमें समूह, इकट्ठा होने या भीड़ का भाव है। इसी से निकले हैं जमा या जमाव जैसे शब्द जिनका मतलब है समूह, जत्था, अड़चन आदि। जमा का मतलब बचत की राशि होता है। इससे ही बने शब्द जमाखर्च का मतलब रुपए-पैसे का हिसाब और जमाजथा का अर्थ धनसंपत्ति भी होता है। महाजनी पद्धति में हिसाब-किताब के बही-खाते के आमदनी वाले कॉलम को भी जमा ही कहा जाता है। यहां भी एकत्रित होने या समूह का भाव प्रमुख है। इसके बावजूद इस जमा से जमादार शब्द नहीं बना। जांच, तलाशी आदि को भी हिन्दी में जमातलाशी कहा जाता है। मगर इसका जमा से कोई लेना-देना नहीं है। सही रूप में यह जामा-तलाशी है जिसका मतलब है परिधान की तलाशी। पकड़े जाने पर सबसे पहले चोर या जेब कतरे की जामातलाशी ही होती है। 
रबी धातु जम से बना जमाअत जिसे हिन्दी में जमात भी कहा जाता है। इसका मतलब होता है कतार या पंक्ति । मदरसों में लगने वाली कक्षाओं को भी जमाअत या जमात ही कहते हैं। इसी धातु से बना है जामिया शब्द जिसका मतलब भी समूह, सभा, कान्फ्रेंस आदि ही  होता है। जामिया-मिल्लिया विश्वविद्यालय के नाम में इसका अर्थ स्पष्ट है। वर्ग या तबके के अर्थ में भी जमाअत शब्द का इस्तेमाल होता है जैसे  । मुसलमानों के धार्मिक समागम में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के जत्थे भी जमात ( तब्लीगी जमाअत ) ही कहलाते हैं और फौज की टुकड़ी को भी जमात कहते हैं। कुल मिलाकर वही समूह वाला भाव उभर रहा है। 
Hindi Dayमाअत शब्द में फारसी प्रत्यय दार जुड़कर बना जमाअतदार । अर्थात किसी जत्थे, समूह का मुखिया। मुस्लिम शासन में जमाअतदार सरकारी सेवक ही रहा । आमतौर पर जमाअतदार फौजी अफसर रहा मगर राजस्व वसूली करने वाला प्रमुख कारिंदा भी जमादार कहलाता रहा। गौरतलब है कि वसूली की क्रिया में जमा करने का भाव भी है इसीलिए लगान को जमा भी कहा जाता था। फौज में जिस अफसर के मातहत एक टुकड़ी या जमात रहती उसे जमाअतदार कहा जाता। अंग्रेजी राज में भी जमाअतदार ब्रिटिश फौज के उस हिन्दुस्तानी अफसर को कहा जाता था जिसके मातहत सिपाहियों की एक कंपनी रहती । इसे सेकंड लेफ्टिनेंट कहा जा सकता है। बोलचाल में यह शब्द जमादार में तब्दील हो गया। बाद में दूसरे महकमों में भी मुखिया पद के लिए यह शब्द चल पड़ा। अंग्रेजो के ज़माने में ही मेहतरों / सफाईकर्मियों के काम की निगरानी करनेवाले को भी जमादार कहा जाने लगा था और गांवों में यह शब्द इसी अर्थ में अभी भी सुनाई पड़ता है .।   [संशोधित पुनर्प्रस्तुति]
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, September 12, 2008

होम करते हाथ न जलाइये [चमक-प्रकाश-ऊष्मा-2]

turkish_hamam_bath_165x हिब्रू में गर्म के लिए होम और हम शब्द भी हैं। हम्म के ही एक अन्य धातुरूप हाम् का अर्थ हिब्रू में काला , सियाह होता है। गौर करें आग की भेंट चढ़ने के बाद वस्तु काली पड़ जाती है
लाई के काम में नुकसान उठा लेने वाली स्थिति को होम करते हाथ जलाना कहते हैं। यूं भी नुकसान उठाने, सब कुछ गंवा देने को होम करना कहते हैं। मोटे तौर पर होम का मतलब होता है यज्ञ करना मगर इसके मूल में आहुति देने का भाव है।
होम बना है संस्कृत की हु धातु से जिसका अर्थ है देवता के सम्मान में भेंट प्रस्तुत करना। वृहत्तर भारत के प्राचीन अग्निपूजक समाज में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञकुंड में ही अग्नि के माध्यम से भेंट समर्पित करने की परंपरा थी। आस्था कहती थी कि अग्नि के माध्यम से वह सामग्री देवताओं तक पहुंच जाएगी। इस तरह हु धातु का एक अर्थ यज्ञ करना भी हुआ। इससे ही बना हुत शब्द जिसका अर्थ है अग्नि में डाला हुआ मगर भाव दाह, ताप और अग्नि का ही है क्योकि ऐसा करने से अग्नि ही प्रज्जवलित होती है। हुत में उपसर्ग लगने से बना आहुति शब्द जिसका अर्थ भी यज्ञ कुंड में हवन सामग्री डालना है। हवन बना है हवः से जिसका मूल भी हु से है। इसी तरह होम शब्द भी इसी कड़ी में आता है जिसमें यज्ञाग्नि, आहुति देना, आदि शामिल है।
गौर करें तो इन तमाम शब्दों का अर्थ एक खास दायरे में सीमित है और सभी का रिश्ता अग्नि और ताप से जुड़ रहा है। प्राचीन भारतीय भाषा परिवार का रिश्ता सेमेटिक भाषा परिवार से भी था। अरबी और हिब्रू भाषाओं में भारतीय मूल के शब्दों और भारतीय भाषाओं में सामी मूल के शब्दों की आवाजाही दोनों देशों के समाजों में व्यापारिक गतिविधियों की वजह से होती रहती थी। होम शब्द में निहित अग्नि, ताप जैसे भाव सामी मूल के शब्दों में नज़र आते हैं। अरबी, फारसी का एक शब्द है हम्म जिसका मतलब होता है बुखार। इसके अलावा इसमें दुख, रंज , खेद आदि भाव भी शामिल हैं। गौर करें कि ये सभी भाव मानसिक संताप ( ताप ) से जुड़े हुए हैं।
एक हमाम में सब नंगे
सार्वजनिक स्नानागार, गुस्लख़ाना को अरबी-फारसी में हम्माम कहा जाता है। यह अरबी भाषा का शब्द है और उर्दू- फारसी-हिन्दी में हमाम के रूप में भी प्रचलित है। इसका मतलब होता है गर्म पानी पानी के प्रसाधनों से युक्त Hindi Dayस्नानागार। यह बना है हिब्रू भाषा की धातु हम्म से जिसका मतलब होता है गर्म, ऊष्ण, तप्त। बुखार के अर्थ वाले अरबी के हम्म शब्द का मूल भी यही धातु है। हिब्रू में ही गर्म के लिए होम और हम शब्द भी हैं। हम्म के ही एक अन्य धातुरूप हाम् का अर्थ हिब्रू में काला , सियाह होता है। गौर करें आग की भेंट चढ़ने के बाद वस्तु काली पड़ जाती है।  हम्माम की परंपरा प्राचीन सुमेरी सभ्यता से चली आ रही है। पत्थर की शिलाओं को तेज आंच में तपा कर उन पर पानी छोड़ा जाता था जिनसे उत्पन्न वाष्प से ये स्नानागार गर्म रहते थे। बाद में यह प्रणाली समूचे पश्चिम में फैल गई । अंग्रेजों ने तुर्की का टर्किश बाथ और फिनलैंड का सौना बाथ दुनियाभर में लोकप्रिय बना दिया है। इन सार्वजनिक स्नानागारों में जाहिर है एक साथ लोग वाष्प स्नान का लुत्फ लेते हैं। इसी वजह से सामूहिक निर्लज्जता या अनैतिकता को अभिव्यक्त करने के लिए एक हमाम में सब नंगे जैसी कहावत ने जन्म लिया ।
PICTURES HAVE BEEN USED FOR EDUCATIONAL AND NON PROFIT ACTIVIES. IF ANY COPYRIGHT IS VIOLATED, KINDLY INFORM AND WE WILL PROMPTLY REMOVE THE PICTURE.
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Blog Widget by LinkWithin