Tuesday, November 24, 2009

शुक्रिया दोस्तों,ब्लागिंग चलती रहेगी[बकलमखुद-115]

... वकील साब दिनेशराय द्विवेदी उर्फ सरदार के बकलमखुद की अन्तिम कड़ी...

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही की अन्तिम कड़ी, बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 114वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
पिछली कड़ी-सरदार की ब्लागरी शुरु
हाँ से सरदार के विदा लेने का वक्त आ गया है। यूँ तो किसी का भी समूचा लेखन बकलम खुद ही होता है। जो भी लिखता है, वह या तो खुद के बारे में या फिर दुनिया के बारे में जो कुछ वह जानता, सोचता और समझता है लिखता है। किसी का भी लिखा हुआ हर शब्द कुछ और कहे या न कहे, खुद लिखने वाले के बारे में बहुत कुछ कह देता है। वकालत के तीस बरसों में सरदार ने देखा कि झूठ बोलना कितना सहज हो सकता है और सच बोलना कितना दुष्कर? उस ने यह भी देखा कि कुछ सचाइयों को छुपाना गुनाह नहीं, पर एक झूठ के सहारे खड़ी इमारत किस वक्त गिर पड़े? कुछ नहीं कहा जा सकता। सच की रोशनी हजार पर्दों में भी नहीं छुपती वह कभी न कभी बाहर आ जाती है। लेकिन झूठ कभी भी उस का स्थान नहीं ले सकता, वह कभी न कभी झूठ सिद्ध हो जाता है। सरदार के परिचित के पुत्र ने अपनी सहपाठिन को पत्नी बनाना तय कर लिया और उसे परिवार की स्वीकृति मिल गई, इस समाचार पर कल रात सहसा मुहँ से यह टिप्पणी निकली कि ‘चलो माँ-बाप का वजन उतरा’। सुबह सवेरे पत्नी ने ‘वजन’ शब्द पर ऐतराज कर दिया और कहा कि ‘जिम्मेदारी कम हुई’ ऐसा कहना चाहिए था। सरदार को लगा कि अभी तो भाषा में सीखने को बहुत कुछ है। भाषा में ही नहीं दुनिया में उसने बहुत कम सीखा है। अभी बहुत कुछ सीखना शेष है। सीखने की प्रक्रिया जीवन भर जारी रहे तो जीवन है। जिस दिन लगे कि अब कुछ सीखना शेष नहीं, तो समझ लीजिए जीवन शेष हो चुका।
ब्लागीरी आरंभ हुई तो नए-नए लोगों से परिचय हुआ। केवल और केवल ब्लाग ने बहुत बेहतरीन लोगों को जानने का अवसर दिया। ब्लागीरी ने जो संबंध बनाए, वे कहने को आभासी भले ही रहे हों, लेकिन उन का आधार वे शब्द थे, जो टाइप-कुंजियों पर उंगलियों की पौरों के स्पर्श की ऊर्जा से उपजे थे। वे सच भी थे औऱ झूठ भी, लेकिन उन शब्दों में उन के व्यक्तित्व का अक्स था जो आइने में दिख रहे बिंब की तरह सच बोलता था। जब रिश्ते की बुनियाद ये शब्द हों तो वे रिश्ते आभासी कैसे हो सकते हैं? ये वे रिश्ते हैं, जिन में लेन-देन का हिसाब नहीं है, कोई स्वार्थ नहीं है। तीसरा खंबा पर पहली टिप्पणी ज्ञानदत्त जी पाण्डे की थी जो वजनदार भी थी। इस ने उत्साह बढ़ाया और उन रिश्तों का आरंभ हुआ जो मुद्दों पर आधारित थे। दो दिन बाद ही सीधे माथे पर आ कर लगी एक टिप्पणी ने सरदार के सिर को मथनी की तरह बिलो दिया। टिप्पणीकर्ता थीं घुघूती जी, उन्हों ने लिखा- ‘इसीलिए लोग मुकदमे नहीं करते’। बात बिलकुल सही थी। बिलोई हुई खोपड़ी तेजी से चलने लगी। न्याय-प्रणाली की दुर्दशा का मूल आधार निर्णयों में देरी और उस का कारण अदालतों की अति न्यूनता थी। अन्य कारण भी इसी एक कारण से उत्पन्न हो रहे थे, या बल प्राप्त कर रहे थे। इसी विषय को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश चिंतित थे। सरदार ने अदालतों की कमी को तीसरा खंबा का आधार बना डाला। लेकिन ब्लाग पर हरदम यही तो नहीं लिखा जा सकता। इस कारण कानूनों की सरल भाषा में प्रस्तुति और बाद में कानूनी विषयों पर सलाह आरंभ की गई, जिस ने ब्लाग को लोकप्रिय बनाया। आज तीसरा खंबा पर एग्रीगेटरों से आने वाले पाठकों के दस गुना पाठक सर्च के माध्यम से या सीधे ब्लाग पर आ रहे हैं।
नवरत तो ब्लाग जगत से बातचीत के माध्यम के रूप में आरंभ हुआ था। उसने भी ब्लागीरी में सरदार की पहचान बनाने में मदद की। अनेक विषयों पर उस के माध्यम से अपने विचारों को प्रेषण हुआ। वहाँ सब से बड़ी उपलब्धि ‘जनतंतर कथा’ रही, जो छत्तीस कड़ियों में जा कर समाप्त हुई।
IMG_0798  भिलाई में पाबला जी के घर पाबला जी और संजीव तिवारी के साथ
आम चुनावों के दौरान अपने को अभिव्यक्त करने की चाहत से उस का जन्म हुआ था। लेकिन आजादी के बाद के पहले चुनाव से ताजा चुनाव तक के संक्षिप्त तथ्य उस की लोकप्रियता का आधार बने। उस दौरान टिप्पणियों के माध्यम से उपजी बहसों ने भी विचारों के आदान-प्रदान को तीव्र किया। यदि वैचारिक बहस इसी तरह चले तो मतभेद होते हुए भी बहुत कुछ एक-दूसरे से सीखने को मिलता है। ब्लाग जगत की विलक्षणता भी यही है कि कुछ एक ब्लागरों को छोड़ दिया जाए तो विचारधारात्मक मतभेदों के उपरांत भी सभी को एक उस रास्ते की तलाश है, जो देश और दुनिया को उस रास्ते पर ले जाए जहाँ सभी मनुष्य एक श्रेष्ठ जीवन जी सकें। यदि किसी भी व्यक्ति में इस रास्ते की तलाश शेष हो तो तमाम दुराग्रहों के उपरांत भी वह एक इंसान हो सकता है। तलाश के इस मार्ग में वह लोगों को सुनने-गुनने और स्वयं में परिवर्तन के लिए सदैव तैयार रहे तो सरदार का विश्वास है कि ऐसे तमाम लोग मतभेदों के बावजूद लक्ष्य की ओर चल सकते हैं, लक्ष्य के निकट पहुँचते-पहुँचते सब एक ही रास्ते के राही होंगे।
ब्लागीरी ने बहुत लोगों से सरदार के आत्मीय संबंध बनाए जिन में पाबला जी, अजित वडनेरकर, संजीव तिवारी, संजीत त्रिपाठी, अनिल पुसदकर, त्र्यंबक शर्मा, अरुण अरोरा, मैथिली जी, सिरिल गुप्त, अविनाश वाचस्पति, आलोक पुराणिक, एस. करीर, विष्णु बैरागी, अजय कुमार झा, खुशदीप सहगल, राजीव तनेजा, श्रीमती संजू तनेजा, विनीत उत्पल और कार्टूनिस्ट इरफान  से उसे प्रत्यक्ष भेंट का अवसर मिला और सभी आशा के बहुत कुछ अनुरूप ही मिले।
Delhi-blogger-dwivedi-pabla दिल्ली में श्रीमती संजू तनेजा, राजीव तनेजा, कार्टूनिस्ट इरफान, दिनेशराय  द्विवेदी,  अजय कुमार झा, खुशदीप सहगल और बी.एस. पाबला
सा भी नहीं है कि प्रत्यक्ष से ही संबंध आत्मीय होते हों। जिन से कभी मिलना नहीं हुआ, और हो सकता है उन में से बहुतों का शायद कभी जीवन में प्रत्यक्ष न हो, लेकिन ब्लागीरी ने उन से भी आत्मिक संबंध बनाए हैं। इन में ज्ञानदत्त  पाण्डे, रवि रतलामी, अनूप शुक्ला, डॉ. अरविंद, अभिषेक ओझा, अफलातून, डॉक्टर अमर कुमार, अनिता कुमार व विनोद जी, अरुण कुमार झा, बेजी जैसन, जे.सी. फिलिप शास्त्री, घुघूती जी, काजल कुमार, समीर लाल, बवाल, मंसूर अली हाशमी, मीनाक्षी धन्वंतरी, नीरज रोहिल्ला, निर्मला कपिला, नितिन बागला, पल्लवी त्रिवेदी, प्रमोद सिंह, प्रशांत प्रियदर्शी, प्रियंकर, रचना सिंह, राज भाटिया, सागर नाहर, संदीप, सतीश सक्सेना, शिव मिश्रा, सुनील दीपक, विजय गौड़, अशोक कुमार पाण्डेय, उन्मुक्त, कुन्नू सिंह, गिरिजेश राव, डॉ. अनुराग, बाल सुब्रह्मण्यम, भुवनेश शर्मा, युनुस, योगेन्द्र मोदगिल, रंजू भाटिया, रक्षंदा, लावण्या दी, शरद कोकास, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, अभय तिवारी प्रमुख हैं। बहुत नाम यहाँ छूटे हैं, लेकिन सरदार के लिए सब का उल्लेख कर पाना संभव भी तो नहीं।
हिन्दी ब्लागीरी संबंधों को एक नई परिभाषा प्रदान कर रही है। आत्मिक संबंध कहाँ साक्षात के मोहताज है? चित्त में ही मूर्त होने वाले (चिन्मात्र मूर्तये) से भी लोग आजीवन संबंध बनाए लेते हैं। ब्लागीरी में कम से कम आभासी पर्दे पर तो लोग मूर्त हैं। सरदार का ब्लागीरी से संबंध अटूट और आजीवन है, सरदार जब तक है यहाँ बना रहेगा। सब के लिए बेहतर जीवन की उस की तलाश जारी रहेगी। [समाप्त]

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22 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

ईमानदार और बेहतरीन सफर रहा वकील साहब के साथ. अति आनन्द दायक. उन्हें भरपूर उनकी कलम के माध्यम से जानने का मौका मिला.

अजित भाई, गजब का सराहनीय कदम है यह. जारी रहिये.

Arvind Mishra said...

जज्बये ब्लागिरी को सलाम ! आपकी अध्यवसायिता,समर्पण ,कठिन श्रम की आदत सभी से कुछ आतंकित तो बहुत कुछ प्रेरित भी हुआ हूँ ! खुद से परिचित कराने के इस अनुष्ठान के समापन पर मैं भावों से आप्लावित हूँ -कई तरह के ,उनमें एक तो शब्दों का सफ़र के प्रति कृतज्ञता भी है जिसने यह यग्य स्थल उपलब्ध किया है ऐसे अनुष्ठानों के लिए ...और आपके प्रति भी कई तरह के स्थायी अस्थायी भाव हैं -मगर अभी रोकते हैं उन्हें व्यक्त होने को....साथ साथ हैं हम भी डगर पर .....कभी आगे पीछे .....

गिरिजेश राव said...

@ सभी को एक उस रास्ते की तलाश है, जो देश और दुनिया को उस रास्ते पर ले जाए जहाँ सभी मनुष्य एक श्रेष्ठ जीवन जी सकें। यदि किसी भी व्यक्ति में इस रास्ते की तलाश शेष हो तो तमाम दुराग्रहों के उपरांत भी वह एक इंसान हो सकता है। तलाश के इस मार्ग में वह लोगों को सुनने-गुनने और स्वयं में परिवर्तन के लिए सदैव तैयार रहे तो सरदार का विश्वास है कि ऐसे तमाम लोग मतभेदों के बावजूद लक्ष्य की ओर चल सकते हैं, लक्ष्य के निकट पहुँचते-पहुँचते सब एक ही रास्ते के राही होंगे।

यह इस श्रृंखला का माखन है। मेरे लिए अनवरत पढ़ना या यह श्रृंखला
पढ़ना रिकॉर्ड बनाने जैसा रहता है/रहा है - बहुत बहुत कम टिप्पणी करते हैं/किए। मौन रह कर ही चले जाना अच्छा लगता है।

जनंतर कथा के लिए तो मैं ग़ैर ब्लॉगर लोगों से भी कहता रहा कि पढ़ लो। अब ये बात अलग है कि वे लोग मुझे ब्लॉगरी का एडिक्टेड समझ मुस्काते रहे :(

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

चित्रों के साथ तो ये पोस्ट वाकई में जीवन्त हो गई!

हिमांशु । Himanshu said...

"आत्मिक संबंध कहाँ साक्षात के मोहताज है? चित्त में ही मूर्त होने वाले (चिन्मात्र मूर्तये) से भी लोग आजीवन संबंध बनाए लेते हैं। ब्लागीरी में कम से कम आभासी पर्दे पर तो लोग मूर्त हैं। सरदार का ब्लागीरी से संबंध अटूट और आजीवन है, सरदार जब तक है यहाँ बना रहेगा। सब के लिए बेहतर जीवन की उस की तलाश जारी रहेगी।"

आपकी इन पंक्तियों से ब्लॉगरी से जुड़े आपके सरोकार अभिव्यक्त हुए । अंतिम पंक्ति ने तो विभोर कर दिया मुझे - "सब के लिये बेहतर जीवन की तलाश !"
ब्लॉगरी के लिये यदि कह रहे हैं आप, तो सच्ची भारतीय मनीषा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । विचार के माध्यम से जीवन की सच्चाई का अन्वेषण । सच्चे बुद्धिजीवी का कार्य है ही क्या सिवाय इसके ? जीवन की समस्या और उसकी बेहतरी की अदम्य इच्छा, जीवन के मूल्यों को समाज-सापेक्षया परिभाषित करते रहने की चाह, अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक आदि का विवेकार्जन ! यही न !

ब्लॉगरी से बेहतर जीवन की तलाश का उदात्त लक्ष्य आपको ऐसे व्यक्तित्व की गरिमा देता है जो ’जो है’ का अवलोकन तो करता ही है, ’जो होना चाहिए” उसका विचार भी करता है ।

यह संवहन है critical consciousness का !

उन्मुक्त said...

सफर जीवन्त रहा।

बी एस पाबला said...

रोचक श्रंखला का भाव-विभोर कर देने वाला समापन।

जनतंतर एक अनूठी, सारगर्भित श्रंखला रही है। इसे एक पुस्तिका का रूप देना बेहतर होगा।

यह सच है कि ब्लॉगिंग ने हमें बहुत कुछ दिया है। यहाँ भी, मतभेद होते हुए बहुत कुछ एक-दूसरे से सीखने को मिलता है और मतभेदों के बावजूद हम बेहतर जीवन के लक्ष्य की ओर चल सकते हैं।

जो भी हो, हम साथ-साथ हैं।

बी एस पाबला

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

आदरणीय द्विवेदी जी ,
आपका लेखन मजेदार तो था ही जीवन के कई अद्भुत अनुभव भी देगया जो सभी के काम आएंगे /आपने एक बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा जो उठा दिया कि जो सम्बन्ध शब्दों पर आधारित हों वे आभासी कैसे हो सकते हैं ?आपने आनंदित किया ,गुदगुदाया और सिखाया भी ,जाते जाते आप कि भावनापूर्ण प्रस्तुति के लिए हम सभी हिंदी ब्लोग्गेर्स का हार्दिक आभार ,धन्यवाद आपको भी और भाई जी को भी क्योंकि इस प्रस्तुति का श्रेया उन्हें भी जाता है /बकलम खुद अब आपकी जिंदगी का एक दस्तावेज हो गया है ,आप चाहें तो इस पर आत्मकथा की इमारत खडी हो सकती है /आपके सम्रद्ध ,सुखी ,स्वस्थ जीवन की अनंत मंगल कामनाएं ,आदर ,स्नेह /आपका ही ,
डॉ.भूपेन्द्र रीवा

Mansoor Ali said...

एक अ-सरदार को ''सरदार'' साबित करती...असरदार लेखनी, जीवन की सच्चाइयों की रोचक प्रस्तुति, ब्लोगिंग के क्षेत्र को नए आयाम देती हुई, साहित्यिक रस से भरपूर आत्म-कथा, संघर्षरत एक आम आदर्श भारतीय चरित्र का दर्शन करवाती शब्दों के सफ़र में ''बाकलम खुद'' की अंतिम कड़ी तक पहुंचाते हुए दिनेशराय जी द्विवेदी भाव-विभोर कर गए है, धन्यवाद आपको और अजित जी को भी एक उम्दा प्लेटफोर्म उपलब्ध करवाने के लिए.

खुशदीप सहगल said...

बस यही दुआ है...हिंदी ब्लॉगिंग को सरदार की सरपरस्ती यूंही हमेशा मिलती रहे...ये द्विवेदी सर का बिना किसी लाग-लपेट सीधी सच्ची बात कहना और प्यार बांटना ही है जिसने सबको उनका मुरीद बना रखा है...

जय हिंद...

राजीव तनेजा said...

ब्लॉगिंग की आभासी दुनिया से निकल कर जब दिनेश राय द्विवेदी जी को अपने समक्ष रुबरू पाया...उनकी बातें सुनी... तो पाया कि वो विभिन्न मुद्दों पे गहरी पकड़ रखते हुए तथ्यजनक ढंग से अपनी बात रखते हैँ...


आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा

सुलभ सतरंगी said...

द्विवेदी सर ने एक श्रेष्ट राह बनायी है, वे बहुतों के प्रेरणा स्रोत भी है. इस सफ़र के मुसाफिर और भी कई लोग हैं. यहाँ सबसे महत्वपूर्ण और सुखद यही है की हम ऐसे संबंधों को पुरखुलुशी से जी रहे हैं.

जीवंत सफ़र चलता रहे.

Anil Pusadkar said...

आदरणीय द्विवेदी जी आपको प्रणाम करता हूं।आप सरदार ऐसे ही नही है,आप ब्लाग परिवार के भी सरदार हैं।आपकी ब्लागिंग का सफ़र ज़ारी रहे अनवरत।

Nirmla Kapila said...

सफर जीवन्त रहा मैं तो दिवेदी जी की प्रतिभा कर्मनिष्ठा से बहुत प्रभावित हूँ इस के साथ साथ उनकी सुहृदयता भी सब को बान्ध लेती है ।ये ब्लागिरी शायद सब के लिये वरदान साबित होगी। शुभकामनायें और धन्यवाद्

पंकज said...

अंतिम कड़ी शब्द देख, थोड़ा दु:ख हुआ फिर लगा हर बात का समापन तो होता ही है. प्रतीक्षा रहेगी एक और प्रारम्भ की.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

एक रोचक ,प्रेरणादायक सफ़र था सरदार के साथ हमारा . बकलमखुद को एक ऊचाई जो आपने दी है आने वाले लोगो के लिए प्रेरित करती रहेगी

अभिषेक ओझा said...

हम तो आपके फैन कब से हैं :) इस श्रृंखला से बहुत करीब से जानने का अवसर मिला.

संजय करीर said...

इस पड़ाव के दौरान कई सीख मिलीं, अनुभवों के छन्‍ने से निकली ऐसी सीख जो जिंदगी में लगातार काम आती रहेंगी। सरदार का आभार और भविष्‍य के लिए शुभकामनाएं।

अजित वडनेरकर said...

शब्दों का सफर पर बकलमखुद की पहल सिर्फ इसलिए की गई थी ताकि आभासी दुनिया के लोग, एक दो ईमेल के पत्राचार के बाद एक दूसरे के मित्र तो बन जाते हैं, पर पूरी तरह जान नहीं पाते। सिर्फ आभासी बने रहने का आग्रह हमें खुलने नहीं देता। जब तक इस आभासी आवरण को न हटाया जाए, तब तक बात नहीं बनती।

अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े ब्लागर साथियों के निजी अनुभवों से कुछ सीखने, प्रेरित होने की चाह लिए यह स्तम्भ शुरु किया गया था। आज बीते डेढ़ साल में यह उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां द्विवेदी जी जैसे अनुभव से तपे लोग अपनी अनकही से हमें प्रेरित कर रहे हैं। शुक्रिया साहेब और शुभकामनाएं।

मैं देख रहा हूं, हिन्दी समाज जैसा ही हिन्दी ब्लागजगत भी है। बिना आत्मीय हुए यहां हम जैसों का निर्वाह नहीं, सो रिश्ते भी बन रहे हैं और आत्मीय साझेदारियां बढ़ रही हैं। शब्दों का सफर के सभी साथियों का आभार...

शरद कोकास said...

हमे तो लग रहा था कि अभी बहुत से मोड़ बाकी है इस सफर मे .. ।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

अनवरत श्रृंखला यहां समाप्त हुई सी लगती है...
ब्लॉगिंग चलती रहेगी दोस्तों...अनवरत...

बीच की चैन की सांसों में हम भी शामिल हैं...

आलोक मिश्र said...

द्विवेदी जी के इस आत्मकथात्मक आलेख ने आरंभ से अंत तक बांधे रखा। हार्दिक धन्यवाद।

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