Saturday, November 21, 2009

राजनीति के क्षत्रप

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भा रतीय राजनीति में भी क्षेत्र शब्द की व्याप्ति जबर्दस्त है। क्षेत्रवाद जैसे शब्द का प्रयोग अक्सर राजनीतिक संदर्भों में ही ज्यादा पढ़ने-सुनने को मिलता है। क्षत्रप भी एक ऐसा ही शब्द है जिसका इस्तेमाल राजनीति के मंजे हुए ऐसे खिलाड़ियों के लिए किया जाता है जो क्षेत्रीय अर्थात इलाकाई प्रभुत्व रखते हैं और जिनकी हैसियत किसी राजनीतिक दल या धड़े के मुखिया की है। क्षत्रप का अर्थ होता है राज्यपाल। इतिहासकारों और भाषाविदों का मानना है कि इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले ईसा से भी पहले ईरान में शुरु हुआ। पौराणिक-वैदिक संदर्भों में राज्यप्रमुख के लिए राजा, नरेश जैसे शब्दों का संदर्भ तो आता है मगर क्षत्रप का नहीं है। आपटे कोश के अनुसार क्षत्र शब्द में उपसर्ग लगने से बना है क्षत्रप जिसका अर्थ है राज्यपाल अथवा उपशासक। क्षत्र का अर्थ होता है शक्ति, सामर्थ्य, प्रभुता, अधिराज्य और क्षत्रिय जाति का पुरुष। क्षत्रिय भी इसी मूल से जन्मा है जिसका अर्थ है दूसरे वर्ण या फौजी तबके का व्यक्ति। भारत की एक क्षत्रिय जाति खत्री कहलाती है। प्राचीनकाल में इस समुदाय के लोग उत्तर पश्चिमी भारत से निकल कर पश्चिमी और पूर्वी भारत में फैले। नेपाल में छेत्री कहलाते है।

क्षत्रप शब्द ईरान में शत्रप / खत्रप रूप में प्रसारित था जहां से यह ग्रीस तक पहुंचा। ग्रीक ग्रंथों में ईरान और भारत के क्षत्रपों का उल्लेख इसी शब्द से हुआ है। इसकी व्युत्पत्ति प्राचीन ईरानी के क्षत्रपवान से मानी जाती है जिसका अर्थ है राज्य का रक्षक। इसमें क्षत्र +पा+वान् का मेल है। क्षत्र यानी राज्य, पा यानी रक्षा करना, पालन करना और वान यानी करनेवाला। गौर करें इससे ही बना है फारसी का शहरबान शब्द जिसमें नगरपाल का भाव है। इसे मेयर समझा जा सकता है। याद रखें संस्कृत के वान प्रत्यय का ही फारसी रूप है बान जैसे निगहबान, दरबान, मेहरबान आदि। संस्कृत वान के ही वन्त या मन्त जैसे रूप भी हैं जैसे श्रीवान या श्रीमन्त। रूपवान या रूपवंत।
भारत में सबसे पहले शकों के ज़माने में क्षत्रप शब्द का प्रयोग शुरू हुआ। ईसा की पहली से तीसरी सदी तक भारत में इनका शासन रहा और गुप्त काल में इनका पतन हुआ मगर तब तक शकों ने विदेशी 00140lm चोला उतार फेंका था और इन्होंने हिन्दू आचार-विचार अपना लिए। उस समय तक्षशिला, मथुरा, उज्जयिनी और नासिक इनकी प्रमुख राजधानियां थीं। गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र भी इनके प्रभुत्व में था। इन स्थानों के प्रधान शक शासक महाक्षत्रप कहलाते थे जबकि कनिष्ठ शासक या उप शासक क्षत्रप कहलाते थे। सत्रप शब्द का प्रसार इतना था कि ऐशिया में जहां कहीं यूनानी साम्राज्य के अवशेष थे, उन स्थानों के गवर्नर या राज्यपालों का उल्लेख भी खत्रप / ख्वातवा/ शत्रप  के रूप में ही मिलता है। शक जाति के लोक संभवतः उत्तर पश्चिमी चीन के निवासी थे। वैसे जब ये भारत में आए तब तक इनका फैलाव समूचे मध्य एशिया में हो चुका था। ईरान की पहचान शकों से होती थी। दक्षिणी पूर्वी ईरान को सीस्तान कहा जाता था जिसका अर्थ था शकस्थान। संस्कृत ग्रंथों में भारत से पश्चिम में सिंध से लेकर अफ़गानिस्तान, ईरान आदि क्षेत्र को शकद्वीप कहा गया है अर्थात यहां शकों का शासन था।
संस्कृत के क्ष वर्ण में नाश, अन्तर्धान, हानि, नरसिंहावतार, क्षेत्र, भूमि, किसान और रक्षक का अर्थ छुपा है। जिसे हम लम्हा या पल कहते हैं, उसे संस्कृत में क्षण कहा जाता है। इसमें निमिष का भाव है। आप्टे कोश के मुताबिक सैकेंड के 4/5वें भाग की कालावधि क्षण कहलाती है। क्षण् की व्युत्पत्ति भी इसी क्षः से हुई है। नष्ट या अंतर्धान होने वाले अर्थों से क्षः धातु से क्षण का जन्म हुआ है। काल का चरित्र है, लगातार क्षरण होते जाना। समय लगातार नष्ट होता जाता है। जो आज है , वह कल नहीं होगा। जो अभी है, वह अगले क्षण नहीं होगा। पल-छिन जैसा समास भी हिन्दी में गढ़ा गया है।  क्षण में चाहे काल के भंगुर अर्थात नष्ट होने की प्रवृत्ति स्पष्ट होती है किन्तु किन्तु इसमें काल को पकड़ने का भाव भी है। इसका एक अर्थ होता है किसी का काम करने का वचन देना। क्षण्+क्विप से जन्मा है क्षत्र जिसके तमाम अर्थों अर्थात शक्ति, अधिराज्य, सामर्थ्य या इससे बने क्षत्रिय शब्दों पर गौर करें तो क्षण् में निहित वचन का महत्व स्पष्ट होता है। एक क्षत्रप यानी प्रजापालक, एक क्षत्रिय यानी सैनिक हमेशा ही समाज के प्रति उसकी सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिए वचनबद्ध होता है। जख्मी अथवा चोटिल के अर्थ में क्षत् या विक्षत् शब्दों के मूल में भी क्षण् धातु ही है। मैदान, भूमि, इलाका, राज्य, जन्मभूमि के अर्थ में क्षेत्रम् का जन्म भी क्ष से ही हुआ है और पृथ्वी के अर्थ में क्षिति शब्द का मूल भी यही है।
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14 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

क्षत्रप -क्षेत्र -राज्य

अति ज्ञानवर्धक..आपका आभार.

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

वाह जी वाह !! अच्छी प्रविष्टि

Devendra said...

महत्वपूर्ण जानकारी
धन्यवाद।

गिरिजेश राव said...

आचार्य रजनीश ने भगवान शब्द की मीमांसा करते उसे स्त्री पुरुष जननांग युग्म से उद्भूत माना है - भग+वान। क्या यह सही है ?

हिमांशु । Himanshu said...

बेहतर जानकारी । क्षण का बोध हुआ । आभार ।

RDS said...

इसी से जुडे कुछ अन्य शब्द जैसे क्षति, क्षत , अक्षत भी याद आ रहे हैं । पूजा के चावल के दाने टूटे हुए न हों यह विशेष ध्यान रखा जाता है और उन दानों को चावल के बजाय अक्षत ही कहा जाता है । परम्परा के पीछे मान्यता क्या रही होगी यह तो पता नहीं ।

अजित वडनेरकर said...

@गिरिजेशराव
भगवान की व्युत्पत्ति तो सही है मगर व्याख्या वह नहीं जैसी रजनीश के हवाले से बताई है। चमत्कृत करने के लिए उसे, जैसा कि आप कह रहे हैं-स्त्री पुरुष जननांग युग्म से उद्भूत माना है - भग+वान, जैसे सरलार्थ सामने लाए जाते रहे हैं। यह विशद विवेचना का विषय है। भग का एक अर्थ स्त्री की योनि भी होता है। इसकी दार्शनिक व्याख्या भी अद्भुत है। योनि अर्थात जन्मस्थान । गौर करें विश्व की सभी सभ्यताओं में सृष्टि का जन्म एक विशाल पिंड से माना जाता रहा है। जिस योनि अर्थात भग से समूची सृष्टि का निर्माण हुआ है उसे धारण करनेवाला परमब्रह्म ही भगवान है। एक अन्य व्याख्या यह भी हो सकती है, जो अध्यात्म दर्शन के साथ विज्ञान सम्मत भी है। भज् धातु में बांटने, विभक्त करने का भाव है। ब्रह्मांड के निर्माण की एक थ्योरी बिगबैंग यानी महाविस्फोट की भी है। विस्फोट के बाद वह पिंड अनंत पिंडों में विभक्त हुआ। भग यदि योनि है तो भी गर्भाशय में जीवन के निर्माण की प्रक्रिया कोशिकाओं के विभक्त होने से जुड़ी हैं। सृष्टि में लगाता विस्तार हो रहा है। सूक्ष्म एक कोशिकीय जीव लगातार विभाजन से अस्तित्व की समृद्धि पाते हैं। विभाजन ही जीवन-सृजन का आधार है। सृजन की इस शक्ति के भग नाम में परम सार्थकता है। पौराणिक काल के एक राजा का नाम भगदत्त था जिसका अर्थ हुआ [भग] देवता से प्राप्त। कोई भी माता पिता अपने पुत्र के नाम की व्यंजना 'योनि से उत्पन्न' के रूप में नहीं करना चाहेंगे। जाहिर है भग का स्त्री अंग के रूप में वह अर्थ नहीं है जैसा अज्ञानी समझते हैं। भगदत्त नाम भी अल्लाबख्श या रामबख्श जैसा ही है।

सफर में भगवान पर लिखी पांच-छह कड़ियां ज़रूर देखें। पहली कड़ी का लिंक है-http://shabdavali.blogspot.com/2008/09/1.html

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

क्षत्रप तो सब खेत रहे . अब तो क्षत्रिय कहने में अपने को हिचक होती है . और राजनीती तो एक मशीन है जो नोट बनती है .

अजित वडनेरकर said...

@RDS
सही है रमेशभाई। इनका उल्लेख दरअसल पिछली कड़ी-शहर का सपना और शहर में खेत रहना [आश्रय-23] में हो चुका था, इसीलिए इस बार नहीं किया। हमेशा दोष-विकार रहित पदार्थों से ही ईश्वर का अभिषेक किया जाता है। अपना सर्वोत्तम उन्हें अर्पित करने का भाव रहता है। चावल का दाना नाज़ुक होता है, जल्दी टूटता है। पूजा-कर्म के निमित्त चावल का दाना भी निर्दोष, अक्षत ही होना चाहिए। सो अक्षत का अर्थ ही पूजा के निमित्त प्रयोग होने वाला चावल रूढ़ हो गया। इसका उच्चारण अक्षदा भी है, खासकर मराठी में।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ज्ञान के किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञ को भी उस क्षेत्र का क्षत्रप कहा जा सकता है। जैसे ब्लागीरी में शब्दों के क्षत्रप अजित वडनेरकर जी हैं।

ज्ञानदत्त G.D. Pandey said...

क्षत्रप अपनी सरहदें संकुचित कर स्वयंको स्वयंभू मानने का भ्रम पालते हैं। :-)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वाह...!
आखिर क्षत्रप का भेद खोल ही दिया आपने!

प्रकाश पाखी said...

भगवान् की व्यख्या बोनस में मिली,वैसे क्षेत्र और क्षेत्री का प्रयोग गीता में भी हुआ है...क्या उसको स्पष्ट किया जा सकता है?

खुशदीप सहगल said...

अजित जी,
हिंदी पत्रकारिता से जुड़े हर शख्स के लिए आपका ब्लॉग पढ़ना अनिवार्य कर देना चाहिए...आज जब मैं अंग्रेज़ी स्कूलों से हिंदी अखबारों या न्यूज़ चैनलों में आए नई उम्र के होनहारों को थर्टी सिक्स या एटी नाइन को हिंदी में कैसे लिखते हैं, पूछते देखता हूं तो पता चलता है कि हिंदी को उन्हें स्कूल-कॉलेज में कैसे पढ़ाया गया है...मैं तो खैर इस उम्र में भी आपके ब्लॉग से रोज़ कुछ न कुछ नया सीख रहा हूं...

जय हिंद...

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