Monday, November 9, 2009

सच्चाई क्या है? [मातृभाषा-3]

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पिछली कडियों में आपने पढ़ा- मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। मेरी नज़र में बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है। जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उसका मातृ-परिवेश कहलाएगा। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान कायम रखने में अगर हम सफल होते हैं तब मातृभूमि या जन्मभूमि को हम क्षेत्रीय पहचान से जोड़ कर देख सकते हैं वर्ना मातृभाषा, मातृभूमि जैसे सवालों का जवाब सिर्फ और सिर्फ हिन्दी और भारत के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। विस्तार से देखें-(मातृभाषा-1/ मातृभाषा-2)
रा ष्ट्रभाषा ज्यादा व्यापक शब्द है या मातृभाषा ? तकनीकी तौर पर तो राष्ट्रभाषा ही व्यापक शब्द है। मगर यहां भी नजरिया महत्वपूर्ण है। मध्यकाल में यूरोप में लिंगुआ फ्रांका टर्म चल पड़ी थी जिसका अर्थ सम्पर्क भाषा या सामान्य भाषा से था। मातृभाषा, राष्ट्रभाषा जैसे विशेषणों को हम केवल काग़ज़ी खानापूर्ति या बेहद ज़रूरी वर्गीकरणों के लिए सुरक्षित छोडें। यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि किसे वह मातृभाषा का दर्जा देना चाहता है। राष्ट्रभाषा तो जाहिर है, पसंद के इस दायरे से बाहर है, क्योंकि वह विधान-सम्मत तथ्य है। आज अक्सर राष्ट्रभाषा हिन्दी के भविष्य को लेकर चिंता प्रकट करते हुए अंग्रेजी को सम्पर्क भाषा के तौर पर विकसित होते जाने की बात कही जाती है। मेरा स्पष्ट मानना है कि इस देश की निर्विवाद लिंगुआ फ्रांका हिन्दी/हिन्दुस्तानी ही है। व्यापक तौर पर पाकिस्तान को भी शामिल कर लें, क्योंकि उर्दू को मैं अलग भाषा नहीं हिन्दी की शैली समझता हूं, तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की लिंगुआ फ्रांका हिन्दुस्तानी ही है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा चाहे 1950 में सांविधानिक तौर पर मिला हो, मगर इस देश की साझी संस्कृति ने हिन्दुस्तानी को सदियों पहले लिंगुआ फ्रांका मान लिया था और उदार हृदय से भारत के चारों कोनों ने इसे स्वीकार कर लिया था। यही वजह रही कि देश भर में हिन्दी के विभिन्न रूप बोले जाते हैं।
Indoeuropean language family tree
बदला है स्वरूप भी
हिन्दी आज जिस रूप में बोली जाती है, तीन सदी पहले भी इससे मिलती-जुलती भाषा बोली जा रही थी जिसे हिन्दुस्तानी  कहा जाता था क्योंकि उसमें अरबी-फारसी के शब्द भी शामिल थे। महाराष्ट्र वाले उसे हिन्दुस्तानी कहते थे तो उत्तर वाले उसे दक्कनी। उससे भी कई सदियों पहले प्राकृतों के जरिये अलग अलग सम्पर्क भाषाएं रहीं। मागधी प्राकृत से बांग्ला जन्मी मगर मराठी के विषय में विद्वान एकमत नहीं है। मोटे तौर पर तो इसका जन्म महाराष्ट्रीय प्राकृत से माना जाता रहा है। दक्षिणापथ के विशाल क्षेत्र को जानेवाले विभिन्न मानव समूह महाराष्ट्र में अलग अलग कालखंडों में बसते रहे। मराठी पर पैशाची प्राकृत का प्रभाव भी है और शौरसेनी का भी। सुदूर मगध से भी यहां जनसमूह आकर बसे हैं और पश्चिम में बृज प्रदेश से लेकर पंजाब तक से आप्रवासी आते रहे हैं। आज की मराठी इन्ही विभिन्न भाषा-भाषी समूहों के साथ सदियों से हो रहे हेलमेल से बनी है। वेदकालीन प्राकृतों के इतने वर्गीकरण नहीं थे। ये बाद में विकसित हुए हैं। विभिन्न प्राकृतों पर स्थानीय बोलियों का प्रभाव भी पड़ा ही होगा। कहने का तात्पर्य यही है कि विभिन्न कालखंडों में मातृभाषा का स्वरूप बदला है। प्राकृतों के उदाहरण से साफ है कि ज्यादातर प्रांतीय बोलियां कभी मूल प्राकृत का ही हिस्सा थीं।
हिन्दुस्तानी के सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित होने के क्रम में ही देश के विभिन्न भाषा-भाषी समूहों ने हिन्दुस्तानी सीखनी शुरू की। मराठी और बांग्ला लेखकों के लिए हिन्दी ज्ञान बेहद ज़रूरी था। जो मराठी ब्राह्मण दक्षिणा कमाने उत्तर के राजघरानों के यहां उत्सवों-पर्वों पर जाते थे, उन्हें हिन्दुस्तानी सीखनी अनिवार्य थी। इन्ही में से कुछ समूह उत्तरभारत में ही बस गए। धीरे-धीरे हिन्दुस्तानी उनकी सम्पर्क भाषा से बढ़कर हो गई। परिवार में चाहे मराठी का जोर रहा हो मगर परिजनों के बीच भी हिन्दी का व्यवहार बढ़ा।  मातृभाषा दरअसल वह है, जिसके जरिये व्यक्ति शैशवकाल में बाहरी दुनिया को समझता है। मेरे बचपन की बात बताऊं। मुझे याद नहीं आता कि दुनिया को समझने के लिए, मुझे अपनी कामचलाऊ मराठी के किसी शब्द का हिन्दी विकल्प अपने परिजनों से पूछना पड़ा हो। इसके ठीक उलट आज तक मैं हिन्दी शब्दों के मराठी विकल्प पूछता हूं। पर मुझे विशाल और समृद्ध मराठी समाज-संस्कृति से जुड़े होने का भाव सुहाता है, सो अपनी मातृभाषा मराठी ही बताता हूं, मगर सरकारी दस्तावेजों में, जनसंख्या विवरणों में अपनी मातृभाषा हिन्दी ही दर्ज कराई है। तमाम उदाहरणों से जाहिर है, व्यवहारतः मेरी मातृभाषा भी हिन्दी है और सम्पर्क भाषा भी और मुझे इससे एतराज भी नहीं है।  अपने बारे में आप लोग खुद तय करें। jioहां, मातृभाषा का वैवाहिक स्थिति से भी कोई रिश्ता नहीं है, भौगोलिक स्थिति से भी नहीं और जन्मदायिनी से भी नहीं।
 निष्कर्ष-
कुछ मिसालें देखें-
1.ऐसी संतान की मातृभाषा क्या होगी, जिसकी मां गूंगी हो? 2.मां पंजाबी, पिता तमिल... बच्चे की मातृभाषा क्या होगी? 3. अंग्रेजी बोलनेवाले दो विभिन्न भाषा-भाषियों की संतान किसे मातृभाषा कहेगी? 4. जन्मते ही माँ को खो चुकी संतान की मातृभाषा क्या होगी? 5.अनाथाश्रम में पलनवाले वे बच्चे जो माँ-बाप का नाम नहीं जानते, किसे मातृभाषा कहेंगे ?
ऐसे अनेक दिलचस्प उदाहरण लिये जा सकते हैं जो मातृभाषा की रिश्ता अंततः परिवेश से ही स्थापित करते हैं।
...और अंत में
व्यक्ति जिस भाषा में अपने सुख-दुख, आश्चर्य या अन्य भावों को व्यक्त करने में सक्षम हो...वही उसकी मातृभाषा है। चोट लगने पर मेरे मुंह से कभी मराठी में अगं आई नहीं निकलता अर्थात मां याद नहीं आती। आप जिस भाषा में सपने देखते हैं, वही आपकी मातृभाषा है। यहां अकबर बीरबल के बुद्धिविलास के उस प्रसंग को याद करें जब अकबर ने एक गुमनाम मगर बहुभाषी व्यक्ति की असली भाषा जानने का काम बीरबल को सौपा। बीरबल ने उस व्यक्ति पर ठंडा पानी तब डाला जब वह गहरी नींद में था...वह आदमी चौंक कर कुछ बड़बड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ। अगले दिन बीरबल ने बादशाह को बताया कि उस व्यक्ति की भाषा गुजराती है। पूछने पर बीरबल ने भी भाव सम्प्रेषण वाली उक्त बात ही कही थी।
भाषाएं लगातार परिवर्तनशील रही हैं। यह जनसमूहों पर छोड़ दिया जाए कि वे अपने लिए कौन सी भाषा चुनते हैं। भाषा स्वतः विकसित होती चलती है। मानकीकरण जैसा कोई भी अनुशासन भाषा को विकसित होने से रोकता है। अलबत्ता साहित्य की भाषा में व्याकरण का अनुशासन जरूरी है। बोलचाल की भाषा प्रवहमान रहे इसके लिए तमाम दुराग्रहों को छोडना होगा। भाषाओं के मिटने की बात पर भी अक्सर चिंता जताई जाती है, वह भी बेमानी है। किन्ही सौ लोगों के समूह में बोली जानेवाली भाषा दो साल बाद नहीं रहेगी ...इस पर सियापा करने का कोई अर्थ नहीं है। सृष्टि में बनने-बिगड़ने का क्रम जारी है। यह सामान्य गति से होता रहे। हम इसकी वजह न बनें। पहले भी कई भाषाएं थीं, जो आज नहीं हैं।
समाप्त

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13 कमेंट्स:

RAJ SINH said...

अजित जी ,
मुग्ध और आनंदित हूँ इस कड़ी पर और आगे का इन्तेज़ार है .बंटते बाँटते हम ,काश ये बातें समझ सकते.
मेरा जन्म ,यू पी में ,बाल्यकाल और जवानी मुंबई में और आगे की पढ़ाई जमशेदपुर में हुयी जहां बंगला प्रचुर थी ,शरत को ओरिजिनल पढने के लिए बंगला सीखी ,लिखना पढना भी .

मुंबई के खालसा कालेज का विद्यार्थी हुआ तो साथियों के साथ पंजाबी भी आ गए काफी कुछ.

उर्दू, जैसा आपने कहा हिन्दी की ही शैली ही है .लेकिन ज्यादा जानने के लिए लिपि (अरबी ) भी सीखी.मुंबई जब द्विभासिक 'बॉम्बे' प्रान्त का अंग था , जानबूझकर , गुजराती को द्वितीय भाषा के रूप में चुना मेट्रिक के लिए , यद्यपि मराठी चुनना व्यावहारिक होता , क्योंकि मराठी मैंने सीखी नहीं , होश संभालने के साथ खुद को बोलता हुआ पाया. बाद में लिखना पढना और मराठी नाट्य जगत से जुड़ 'मंचीय' भी हुआ .मुंबई से लेकर 'मंडल' के नाटकों में ,अमेरिका और कनाडा तक.
और सब का सब सिर्फ आनंद ही आनंद रहा.
न्यूयार्क के दीर्घ निवास के दौरान कामचलाऊ स्पेनिश भी सीख डाली.(मेरा ख्याल है की अंगरेजी भी जानता हूँ :) )

भाषा तो ,हर एक भाषा , जननी ही है .और हर भाषा ,एक माता ही की तरह ,बस स्नेह,प्रेम और संवाद का आनंद ही है.
आपका दर्शाया व्रिक्क्ष अपने आप में क्या नहीं कह जाता ?

राजनीती और कुटिलता के चलते इस प्रेम,स्नेह , संवाद को गन्दा और नष्ट करने की कोशिशें दहला देती हैं . पर किया क्या जाये ?

आपके ' शब्दों का सफ़र ' एक प्रवाहित सरिता का आनंद देता है .
आपका आभार !

हिमांशु । Himanshu said...

लब्बोलुआब - व्यक्ति जिस भाषा में अपने सुख-दुख, आश्चर्य या अन्य भावों को व्यक्त करने में सक्षम हो...वही उसकी मातृभाषा है।

राज जी के इस कथन पर मेरी भी मुहर -आपके ' शब्दों का सफ़र ' एक प्रवाहित सरिता का आनंद देता है .

vinay vaidya said...

दुर्भाग्यवश मैं पिछली दो पोस्ट नहीं पढ़ पाया, समय की कमी की वजह से . वास्तव में 'निष्कर्ष' सराहनीय है .'भाषा' अर्थात 'वाणी' वस्तुत: एक 'चेतन-तत्त्व' है, सरिता की भाँति, जल की भाँति, और हमारे यहाँ तो सम्पूर्ण अस्तित्व को ही 'चेतन' या 'चैतन्य' ब्रह्म कहा गया है. इसलिए इसके व्यक्त स्वरुप में निरंतर परिवर्तन तो अपेक्षित ही है . अत: उदार दृष्टि से देखें, तो किसी भाषा-विशेष को श्रेष्ठ कहना शायद अनुचित है . हाँ जिस भाषा का प्रचलन है, अर्थात 'हिंदी' या हिन्दुस्तानी' वही सर्वाधिक प्रचलित है, और इसे स्वीकारने में हिचक कैसी ? यह हम सबको जोड़ती है . और दूसरी ओर सवाल व्यावहारिकता का भी है, किसी भी भाषा को बलपूर्वक थोपा जाना संभव ही नहीं है . जयहिंद !

गिरिजेश राव said...

आज मैं स्तब्ध हूँ, मसखरी दिमाग से फरार है।
इतनी स्पष्ट दृष्टि ! भाऊ क़ोट करने लगूँ तो पूरा लेख ही टिप्पणी में लिख जाऊँगा।
लोग छोटों को कहते हैं लेकिन मैं एक बड़े को कह रहा हूँ - जीय बबुआ जीय।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अच्छी गवेषणा के साथ विस्तार से लिख हुआ लेख!

अजित वडनेरकर said...

@राजसिंह
"मराठी मैंने सीखी नहीं , होश संभालने के साथ खुद को बोलता हुआ पाया."
आपकी यह अभिव्यक्ति बहुत कुछ कह देती है राज जी। आप सही कह रहे हैं, भाषाएं एक दूसरे की जन्मदायिनी भी होती हैं। यह तो बहता नीर है। जहां से गुज़रता है, वहां के असर के साथ इसमें और रवांनी आती है।
@विनय वैद्य
जब भी फुर्सत मिले, बाकी दोनों कड़ियों पर भी नज़र डाल लें। आपका नज़रिया जानना चाहूंगा। शुक्रिया
@गिरिजेश राव
अच्छा...बहुत सदमें में हूं। तो श्रीमान, अभी तक सारी टिप्पणियां मसखरी में चल रही थीं:(

अर्शिया said...

जिंदगी के विभिन्न पहलुओं की सच्चाई इसी तरह बयां करते रहिए।
------------------
और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।

शोभना चौरे said...

निष्कर्ष बहुत अच्छा रहा |मात्रभाषा का सफ़र भी मात्र सुख ही दे गया|
वट व्रक्ष मन मोह गया और यह संग्रहनीय हो गया |
व्यक्ति जिस भाषा में अपने सुख-दुख, आश्चर्य या अन्य भावों को व्यक्त करने में सक्षम हो...वही उसकी मातृभाषा है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

रूप रंग भेष भाषा सारे अनेक है
हिंद देश के निवासी सभी जन एक है

अनुराग अन्वेषी said...

सच्चाई, सच + आई = सचाई है। :-) वैसे शब्दों के सफर में भाषा पर गंभीर चिंतन बहुत ही सार्थक और सशक्त लगा।

RDS said...

"मातृभाषा दरअसल वह है, जिसके जरिये व्यक्ति शैशवकाल में बाहरी दुनिया को समझता है। " धन्यवाद !

तीन किश्तों के समाहित आपका विस्तृत शोध- आलेख बहुत ज्ञानवर्षा कर गया और साथ ही, भाषावृक्ष को समझने की चाह और उत्सुकता भी बढा गया । प्यास बुझाएंगें ?

कुछ अवधि सफर के सानिध्य से वंचित रहने का मलाल अभी तक है । थोडा थोडा करके पिछले पन्ने भी बांच रहा हूं । कम्प्यूटर रह रह कर विध्न डाल देता है । बदल जाये तो आपके साथ चैन से सफ़र करें ।

सादर ,

- RDS

अक्षय-मन said...

बहुत ही अच्छी पोस्ट है मै आपकी बात से सहमत हूं लेकिन यहाँ तो धर्म को लेकर विवाद तो होते थे लेकिन भाषा को लेकर भी विवाद होते हैं.....ये आजाद देश है किसी पर कोई रोक नहीं.....

माफ़ी चाहूंगा स्वास्थ्य ठीक ना रहने के कारण काफी समय से आपसे अलग रहा

अक्षय-मन "मन दर्पण" से

अजित वडनेरकर said...

@rds
ज़रूर रमेश भाई, शब्दों का सफर अपना एक विशद पड़ाव पूरा कर चुका है। अब थोड़ा इत्मीनान है। जाहिर है कि भाषा परिवारों के बारे में कुछ बातें आत्मसात करने का प्रयास करता हूं ताकि सहजता से शब्दों का सफ़र पर उसे साझा किया जा सके।

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