Sunday, November 8, 2009

सांस्कृतिक पहचान ज़रूरी है [मातृभाषा-2]

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पिछली कड़ी में आपने पढ़ा- अक्सर मातृभाषा शब्द का अभिप्राय उस भाषा से लगाया जाता है जिसे मां बोलती है। मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। मेरी नज़र में बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है।  जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उसका मातृ-परिवेश कहलाएगा।

क दिलचस्प मिसाल। पिछली जनगणना में उत्तरप्रदेश और बिहार के करीब साठ हजार लोगों ने अपनी मातृभाषा अरबी लिखवाई। जनगणना मंत्रालय के उच्चाधिकारी भी इस तथ्य से हैरत में थे। विश्लेषण से पता चला कि ये सभी लोग उन  अति पिछड़े इलाकों के थे, जहां मदरसे चलते हैं। इन लोगों की माँओं की भाषा भोजपुरी और अवधी है। पिता भी यही बोलते हैं पीढ़ियों से। इसके बावजूद अरबी को मातृभाषा कहना मूर्खता से बढ़कर कुछ नहीं है। ऐसा उन्होंने धर्म के आधार पर किया है। अगर इतनी तादाद में मुसलमान अरबी जानते हैं तो इस्लाम की गलत व्याख्या के जरिये उन्हें कोई भी ताकत बरगला नहीं सकती। वे खुद पढ़ सकते हैं कि कुरआन और हदीस में क्या लिखा है। किसी मौलवी की मनमानी बेमानी हो जाएगी....अफ़सोसनाक बात तो यह कि ज्यादातर पढ़े-लिखे मुस्लिम भी उर्दू लिपि नहीं जानते, ऐसे में अरबी को पढ़ने-समझने की बात ही अलग है। जनगणना में कई मुसलमानों ने अपनी मातृभाषा हिन्दी भी लिखवाई है।
मातृभाषा पर राजनीति
स संदर्भ में एक तथ्य महत्वपूर्ण है। राजनीतिक कारणों से बीते दशकों में उर्दू को मातृभाषा घोषित करनेवाले मुस्लिम नागरिकों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। आज़ादी से पहले जो मुस्लिम हिन्दी या हिन्दुस्तानी को मातृभाषा लिखवाते थे, वे इसकी जगह उर्दू को यह दर्जा देने लगे। कश्मीर का मामला दिलचस्प है। वहां उर्दू को राजभाषा घोषित करने के बावजूद बहुसंख्यक लोग कश्मीरी को मातृभाषा लिखवाते हैं। मातृभाषा के क्षेत्र में राजनीतिक अध्ययन दिलचस्प साबित हो सकता है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पंजाब, तमिनाडु, आंध्रप्रदेश और बांग्लादेश जैसे assembly_childrens_day_nov20 राज्यों के मुसलमानों में उर्दू को मातृभाषा लिखवाने की वृत्ति कितनी बढ़ी है, इस पर सामान्य शोध कराया जाए।  इन सभी राज्यों की परिवेशगत भाषाएं वही हैं, जो इनका भौगोलिक और भाषायी नाम है। इन राज्यों में उर्दू का वैसा मज़बूत आधार नहीं है जैसा उत्तरप्रदेश, बिहार या दिल्ली में है। गुजरात का पारसी, फारसी न बोलकर ठाठ से गुजराती ही बोलता है। पर राजनीति इस अति अल्पसंख्यक तबके पर असर नहीं डालती। नेताओं के निशाने पर हमेशा मुस्लिम तबका रहा है।
मातृभाषा-राष्ट्रभाषा-मातृभूमि-
मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मां शब्द प्रतीक स्वरूप हर किसी को समझ में आता है, वैसे ही मातृभाषा में भी मां का प्रतीक ही महत्वपूर्ण है। मातृभूमि, जन्मभूमि जैसे शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के विकल्प के तौर पर होता है। इनके प्रयोग पर कोई विवाद नहीं हैं बशर्त जन्मभूमि और जन्मस्थान के अर्थ में हम घालमेल न करें। इनमें फर्क है। हम चाहे तो तो दोनो शब्दों की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं, अन्यथा दोनों शब्दों में एक ही भाव है। मातृभूमि को राष्ट्र के अर्थ में भी समझा जाता है और जन्मभूमि को जन्मस्थान के संदर्भ में भी देखा जाता है। वाल्मीकि रामायण की यह प्रसिद्ध उक्ति “जननि जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” में जन्मभूमि का अभिप्राय व्यापक रूप में प्रांत, प्रदेश, राज्य, देश आदि से ही है। इन तमाम शब्दों का, आज के संदर्भ में अर्थ न लगाया जाए। आज इन शब्दों के मायने बदल गए हैं और अलग अलग प्रशासनिक-राजनीतिक विभाजनों मे इन्हें देखा जाता है। मगर इस व्याख्या में इनका अभिप्राय राष्ट्रीय पहचान से ही है। जन्मभूमि, मातृभूमि को वैश्विक संदर्भ में देखे तो भी यह साफ है। मातृभूमि का अर्थ हुआ-
1. स्वदेश, जहां के आप निवासी हैं। 2.आपके पुरखों की भूमि. 3. आपकी जातीय सांस्कृतिक पहचान वाला स्थान. 4. वह स्थान, जहां आप जन्में हैं.
एक उदाहरण-
मातृभाषा के संदर्भ में मिसाल के तौर पर मेरा जन्म मध्यप्रदेश के सीहोर में हुआ पर मेरी स्मृति में सीहोर नहीं है। राजगढ़ (ब्यावरा) में ही बचपन से युवावस्था तक का समय बिताया। महत्व राजगढ़ का ही है, क्योंकि उसी परिवेश में, मैं बड़ा हुआ हूं, जहां की भाषा हाड़ौती से प्रभावित मालवी है। इस क्षेत्र का भौगोलिक नाम उमठवाड़ है। यहां की बोली home_langues_260 मालवी कम, उमठवाड़ी ज्यादा कहलाती है। स्पष्ट है कि इसका मेरे व्यक्तित्व पर असर भी है भाषा और संस्कार दोनों स्तरों पर। सीहोर-राजगढ़ दोनों ही मालवांचल में आते हैं, इसलिए क्षेत्रीय पहचान के तौर पर मैं खुद को मालवी कहने में ज्यादा सुविधा महसूस करता हूं। इसके बावजूद मेरा खुद को मालवी कहना मातृभूमि के सवाल का जवाब नहीं है। मैं मुख्य सवाल से बच रहा हूं, घुमा रहा हूं। उपरोक्त वर्गीकरण के तहत देखें तो सिर्फ जन्म हो जाने भर से मेरा सीहोर से कोई भावनात्मक लगाव नहीं बनता। सीहोर मेरे सपने में नहीं आता, राजगढ़ आता है क्योंकि वह मेरे परिवेश का हिस्सा था। महाराष्ट्र जहां से मेरे पुरखे आए हैं और आकर ग्वालियर में बसे, वह ज़रूर मेरी मातृभूमि हो सकती है, क्योंकि पुरखों के द्वारा बोली जाने वाली मराठी भाषा और पृथक सांस्कृतिक पहचान के साथ ही मैं राजगढ़ में बड़ा हुआ। हमे मराठी कहा जाता है। हमारा परिचय महाराष्ट्रीय समूह के तौर पर दिया जाता है, सो तार्किक रूप में मेरी मातृभूमि महाराष्ट्र है, यह मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हैं।
एकीकृत सांस्कृतिक पहचान 
किन्तु यह दृष्टिकोण तब तक ही तर्कसंगत था जब तक भारत की पहचान भारतवर्ष के रूप में थी, जिसके अलग अलग हिस्से स्वायत्त पहचान रखते थे, तब स्वदेशी पहचान का अर्थ या मातृभूमि का अर्थ वही था जिसकी विवेचना ऊपर की है। मगर आज जब भौगोलिक परिभाषाएँ बदल चुकी है, वैश्विक परिदृष्य बदल चुका है, तब व्यापक अर्थ में मेरी मातृभूमि भी भारत ही कहलाएगी, अलबत्ता जन्मभूमि सीहोर है। मेरी सांस्कृतिक पहचान भारत भूमि की एकीकृत सांस्कृतिक पहचान से जुड़ेगी। मेरा महाराष्ट्रीय होना महत्वपूर्ण तब है जब महाराष्ट्रवासी महाराष्ट्रीय बंधु उदार हृदय से मुझे मराठी मानें। वे ऐसा नहीं करते हैं। यह अनुभव मुझे हो चुका है। शायद अन्य भाषा-भाषी बधुओं को भी हुआ हो जो बरसों पहले अपनी जड़ों से उखड़ कर हिन्दी या अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों में जा बसे हैं। अलबत्ता उत्तर भारत के जिन हिस्सों में हम पले बढ़े हैं, अगर हिन्दी भाषी संस्कारों के बावजूद मेरे नाम के साथ जुड़े वडनेरकर के चलते, मुझे मराठी समझा जाता है तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि इस विशाल क्षेत्र ने मराठियों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है, उल्टे कई मामलो में सहर्ष हमारी संस्कृति को यहा सराहना मिली है। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को जब तक हम और हमारी पीढ़ियां कायम रख पाते हैं, तब तक मुझे खुद को मराठीभाषी या मराठी कहने मे कोई परेशानी नहीं है। मगर यह भी कहूंगा कि हमारी संस्कृति हिन्दी क्षेत्रों में चाहे अलग पहचानी जाती हो, मगर हमारे आचार व्यवहार अब वैसे नहीं रह गए हैं जैसे मूल महाराष्ट्रवासियों के हैं। आचार-व्यवहार का यही फर्क पुणे-नागपुर में थोड़ा सा वक्त गुजारने पर साफ समझ में आता है। ऐसे में वे भेदभाव के दोषी भी नहीं कहे जा सकते। अलबत्ता यह साफ है कि मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मातृ शब्द मूल पहचान से जुड़ा है, उस पर ही इस शब्द पर विचार करते समय गौर करना चाहिए। इस मूल पहचान का हमारे वर्तमान से कितना रिश्ता है।
-अगली कड़ी अंतिम

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20 कमेंट्स:

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल said...

मातृ्भाषा से संबन्धित जानकारी/विशलेषण के लिये शुक्रिया.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत विचारोत्तेजक है, यह। इस बहुभाषी देश में मातृभाषा के नाम पर बहुत राजनीति हुई है और हो रही है। वह मार्ग तलाशा जाना चाहिए जिस से यह राजनीति बंद हो।

खुशदीप सहगल said...

अजित जी,
सारी समस्याएं ही सुलझ जाएंगी, अगर हम खुद को प्रांतीयता, बोली, जात, धर्म आदि से ऊपर उठ कर खुद के भारतीय होने पर गर्व करने लगें...

जय हिंद...

RDS said...

चलो पुख्ता हुआ यह कि बाल्यकाल की मधुरता भी इसीलिये विस्मृत नही होती कि उस दौर की गंध सदैव नथुनों में महसूस होती रह्ती है । कभी विलग नही होती, मातृ स्मृति की भांति । मक्सिम गोर्की की कालजयी रचना 'दि मदर' भी इसी अनुभूति के इर्द गिर्द घूमती है । हम कही भी हों किसी भी दशा में हों, बाल्यकाल की भूमि, गंध और संस्कार हमारे अवचेतन को सुख देते हैं । दरअसल, जो सुरक्षा का अहसास उस दौर में हम पाते हैं, बाद में जीवन पर्यंत नहीं मिलता । यही स्नेह और सुरक्षा से उपजा लगाव हमें मातृत्व की अनुभूति देता है। मातृ-भूमि और मातृ-भाषा के पीछे भी कमोबेश इसी मनःस्थिति की भूमिका रहती हो ।

इसीलिये माना जाता है कि मातृ-भूमि, मातृ-भाषा और अपनी माँ को भुलाने नकारने से बडी कोई कृतध्नता नहीं ।

सादर,

- RDS

अनूप शुक्ल said...

क्लिक कर दियें हैं वहां जहां बताये हैं आप।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मातृ-भाषा का सुन्दर विश्लेषण है।
"चर्चा हिन्दी चिट्ठों की" में आपकी कल की पोस्ट की चर्चा भी है!
बधाई!

महफूज़ अली said...

भैया.......


सादर नमस्कार.....

बहुत ही अच्छा लगा यह लेखः... काफी knowledge अपडेट हो जाती है आपके लेख से........

धन्यवाद............

गिरिजेश राव said...

हमेशा की तरह प्रकाश दिखाता लेख।

@ नेताओं के निशाने पर हमेशा मुस्लिम तबका रहा है।
एक अडेंडम। मुस्लिम तबके (या नेतृत्त्व?) के निशाने पर हमेशा नेता और राजनीति रहे हैं। अरबी मातृभाषा लिखवाना इस तथ्य की पुष्टि करता है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या वाकई मुस्लिम तबके का कोई नेतृत्त्व अस्तित्त्व में है? मुझे तो लगता है कि सभी भारतवासी नेतृत्त्वविहीन हैं।

हिमांशु । Himanshu said...

इस राजनीति से कितना कुछ गड्ड-मड्ड हो गया है इस देश में ।

सहमत हूँ गिरिजेश जी की बात से - "सभी भारतवासी नेतृत्वविहीन हैं ।"

अल्पना वर्मा said...

संग्रहणीय सीरीज़ .
abhaar.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मातृ भाषा का सीधा अर्थ माँ द्वारा बोली जा रही भाषा से ही लगाता हूँ मैं . कहाँ तक ठीक हूँ बताये

शोभना चौरे said...

bahut hi sar grbhit vishleshan .aapke is aalekh se aapke udarvavadi drshtikon ke roop me ak sachhe bhartvasi ki chabi alokit hoti hai jo ki mumbai me rhkar maine vhan ke logo me yh bhvna kabhi nhi pai .
abhar

अफ़लातून said...

अरबी वाले उदाहरण जैसी परिघटना पंजाब में भी हुई थी । आर्य समाज की पहल पर वहाँ पंजाबीभाषी हिन्दुओं ने अपनी मातृभाषा हिन्दी लिखवाई थी , जबकि उनके घरों में पंजाबी बोली जाती थी ।

Mrs. Asha Joglekar said...

मध्यप्रदेश में मराठी को एक सम्मानजनक स्थान मिलने का कारण है कि वह राज्य कर्ताओं की भाषा रही है (शिंदे, होलकर ) और ग्वालीयर जैसे शहर में जब हम बडे हो रहै थे लगभग चालीस प्रतिशत मराठी लोग रहते थे । पर पुणें और मुंबई की मराठी से बृहन्महारष्ट्रीय लोगों का लहजा हमेसा अलग ही रहा है क्यूं कि उसपर स्थानीय भाषा और परिवेश का असर होता ही है जैसे हिंदी के ही कितने रूप (डायलेक्टस्) देखने को मिल जाते हैं । बहुत दिलचस्प चर्चा आगे की कडी की प्रतीक्षा में ।

Anonymous said...

You talked of a large number of Muslims recording their mother tongue as Arabic in the recent census and condemn them.These people are illiterate, but do you know the educated Hindus of the Punjab have en bloc been recording theie mother tongue as Hindi instead of Punjabi in various census conducted in the past.This tendency of mixing religion with mother tongue played havoc with Punjab. The result was that Punjab was the last state to be carved as linguistic state and that too after a prolonged agitation.Even now a very big portion comprising Punjabi speaking areas remain in adjoining states.Try to study why Chandigarh, a predominantly Punjabi speaking city is not transferred to Punjab.Separatist Khalistan movement was partly a result of this anomaly.-Baljit Basi

अजित वडनेरकर said...

@Baljit Basi
इसके पीछे भी राजनीति ही रही है। नेहरू के वक्त से ही पंजाब में हिन्दी और पंजाबी का विवाद शुरु हो गया था जो आखिरकार हिन्दी भाषी हरियाणा और पंजाबी भाषी पंजाब के पुनर्गठन पर जाकर खत्म हुआ। संघ, आर्यसमाज और स्वतःप्रेरणा से बाद में पंजाब के कई हिन्दुओं ने भी अपनी मातृभाषा को हिन्दी लिखवाना शुरु किया तो इसमें ग़लत क्या है। इसकी तुलना पूर्वी क्षेत्रों के मुसलमानों द्वारा अरबी को मातृभाषा लिखवाने से नहीं की जा सकती। अरबी विदेशी भाषा है जबकि पंजाब के हिन्दू अगर पंजाबी के आगे राष्ट्रभाषा को तरजीह देते हैं तो यह ग़लत नहीं है।

Baljit Basi said...

A strange thesis of yours.This cannot at all be accepted.Punjabi Hindus on the persuasion, of Sangh & Arya Samaj are justified in declaring Hindi as theier mother tongue even though they speak Punjabi while Muslims of India owning Arabic are wrong. Borders of countries change because of political and even religious reasons.Most of the Punjabi speaking Punjab is in Pakistan.Question is, what is the objective criteria for a language to be the mother tongue of a people? Punjabi Hindus declaring Hindi and UP Bihari Muslims declaring Arabic as their respectve mother tongues are equally wrong and doing so under communal propaganda.This situation ultimately leads to disaster as was seen in Punjab

अजित वडनेरकर said...

@बलजीत बासी
इस विषय पर विवाद की गुंजाईश कम ही है। मैं पहले ही इसे राजनीति कह चुका हूं। मातृभाषा के मामले में मेरा साफ नज़रिया परिवेश की भाषा को प्राथमिकता देना है। परिवेश क्या है, यह व्यक्ति खुद तय करे।

ऐतराज अरबी के उदाहरण की तुलना हिन्दी से करने पर है। राष्ट्रभाषा हिन्दी का परिवेश एक उत्तर भारतीय राज्य, जिसमें हिन्दुस्तानी को कई लोग उर्दू लिपि के जरिये समझते हैं, अगर कई लोग मातृभाषा के रूप में स्वीकार कर रहे हैं तो इसमें ग़लत क्या है? पंजाब में उर्दू धड़ल्ले से बोली जाती है जो हिन्दी की ही शैली है।

आपका मंतव्य समझ रहा हूं। क्या आप पूर्वी भारत के कुछ लोगों द्वारा अरबी को मातृभाषा घोषित करने को सही ठहरा रहे हैं? पंजाब के कुछ हिन्दुओं ने अगर हिन्दी को मातृभाषा लिख दिया तो यह उससे बड़ा झूठ हो गया जब एक बेपढ़ा पूरबी बोली वाला मुसलमान अरबी को अपनी मातृभाषा घोषित कर बोल रहा है?

Baljit Basi said...

Please read once again what I have written,"Punjabi Hindus declaring Hindi and UP Bihari Muslims declaring Arabic as their respectve mother tongues are equally wrong and doing so under communal propaganda."What is my motive behind this statement?I am sying both are wrong.Let me further elaborate, the same Hindus have to some extent realised their mistake and declaring Punjabi as their mother tongue, even in Haryana,H.P. and Delhi. Should we say that their mother tongue changed overnight?The point is that the question of mother tongue cannot be left to the whims of people.The linguists like you should adopt some objective approach otherwise dilution here and there can lead to serious poliytical repercussions.Please dont misunderstand me, I continue to enjoy your posts.Let us close this discussion here.

चंदन कुमार मिश्र said...

तीसरी किस्त कहाँ है ?

एक सवाल है कि कोई शब्द स्त्रीलिंग या पुल्लिंग बना तो उसके पीछे वजह क्या है ? जैसे बात शब्द स्त्रीलिंग कैसे माना गया ? उम्मीद है जिज्ञासा शांत करेंगे!

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