Tuesday, October 30, 2012

बच के रहना उस्ताद से !!

सम्बन्धित शब्द-1.गुरुघंटाल. 2.इच्छा. 3.ईंट. 4.ठग. 5.पाखंडी. 6.पालक.7.मदारी. 8.जादूगर. 9.पंडित

क्सर शब्द अपना चोला बदल लेते हैं । “हरि रूठे गुरु ठौर है । गुरु रूठे नहीं ठौर।।” जैसी उक्ति पर भरोसा करने वाले समाज ने जब गुरु की होशियारी, सूझबूझ तथा दूसरों पर भारी पड़ने जैसे गुणों का प्रयोग अभिव्यक्ति को बढ़ाने के लिए किया तो गुरु की अर्थवत्ता तो बढ़ गई मगर इसकी अवनति भी हो गई । अब चोर, ठग, जालसाज़, धंधेबाज, चालबाज सब गुरु की श्रेणी में आ गए । ‘गुरुघंटाल’ जैसा मुहावरा और “गुरु, हो जा शुरु” जैसी कहावत चल पड़ी । ‘उस्ताद’ का भी यही हाल है और गुरुपद पर पहुँचे हुए तमाम लोग उस्ताद का दर्ज़ा भी पा गए । अरबी, फ़ारसी और हिन्दुस्तानी में तो उस्ताद की महिमा कायम रही मगर हिन्दी में बहुत पहले से इस शब्द ने अपना रुतबा छोड़ दिया था, मगर इसकी रच-बस बनी रही । यूँ उस्ताद का अर्थ गुरू, शिक्षक, प्रशिक्षक, हुनरमंद, कलाकार, हरफ़नमौला होता है । उस्ताद के स्त्रीवाची ‘उस्तानी’ का जन्म हिन्दुस्तानी की कोख से हुआ है जिसमें गुरुपत्नी या गुरुआनी का भाव है ।
स्ताद’ शब्द को अरबी का समझा जाता है मगर मूलतः यह सामी परिवार का न होकर भारत-ईरानी परिवार का शब्द है । अरबी में इसका रूप ‘उस्ताध’ है और फ़ारसी में ‘ओस्ताद’। हिन्दी और भारत की अन्य बोलियों में भी उस्ताद के कई रूप प्रचलित हैं जैसे उस्ताद, उत्ताद, उस्ताज, वस्ताद ( मराठी, दक्कनी ) आदि । यूँ देखा जाए तो उस्ताद के उस्ताज रूप को गँवारू समझा जाता है और माना जाता है कि उस्ताद में यह प्रदूषण भारत आने के बाद आया होगा मगर ऐसा नहीं है । अरबी में उस्ताद का बहुवचन असातिजा(ह) होता है । उर्दू में इसे असातिजा लिखा जाता है जैसे “मदरसों में असातिजा ( शिक्षकों) की भरती।“ मज़े की बात यह कि एकवचन रूप में अरबी में उस्ताद के लिए अरबी के ‘दाल’ वर्ण का प्रयोग होता है मगर बहुवचन में इसी ‘द’ मे तब्दीली होती है और वह ‘ज़’ अर्थात ‘ज़ाल’ में बदल जाता है । इसी वजह से उस्ताद के स्थान पर उस्ताज़ कहने का चलन भी अरबी में ही शुरू हो गया था । अरबी प्रभाव में ही हिन्दुस्तानी में भी उस्ताज रूप प्रचलित हुआ । यह हमारा गँवारूपन नहीं है, ‘असातिजा’ की गवाही सामने है ।
फिक आगस्ट की (कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ इंडो-यूरोपियन लैंग्वेजेज़) में ज़ेंदावेस्ता के अइविस्ती शब्द को उस्ताद का मूल माना गया है । जिसमें शिक्षक, गुरु, संरक्षक जैसे भाव हैं । यह कोश ‘अईविस्ती’ को संस्कृत के अभिष्टि के समरूप बताता है । विल्हैम गिगर भी हैंडबुक ऑफ़ अवेस्ताप्राशे में यही बात कहते हैं । डीएन मैकेन्जी के पहलवी कोश में अइविस्ती का पहलवी रूप आस्ताद है । मैकेन्जी के मुताबिक मनिशियन पर्शियन में इसका रूप अविस्तद था । आज की फ़ारसी में इसका रूप ओस्ताद हुआ । जॉन प्लैट्स के कोश में पहलवी रूप ओस्तात और पुरानी फ़ारसी में वश्तात रूप बताया गया है । फिक आगस्ट की (कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ इंडो-यूरोपियन लैंग्वेजेज़) में अईविस्ती को संस्कृत के अभिष्टि के समरूप बताता है ।
मोनियर विलियम्स की संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी में अभिष्टि का अर्थ पालक, संरक्षक, श्रेष्ठ, विजेता आदि बताया गया है साथ ही सहायक या मददगार जैसी अर्थवत्ता भी इसमें है । अभिष्टि बना है इष्ट में अभि उपसर्ग लगने से । हिन्दी-संस्कृत में ईश्वर के अर्थ में इष्ट या इष्टदेव शब्द भी प्रचलित है । यूँ इष्ट का अर्थ होता है इच्छित, प्रिय, अभिलषित, पूज्य, आदरणीय आदि । इच्छा, इषणा यानी अभिलाषा , कामना जैसे शब्द भी इष् से ही बने हैं । वैदिक अभि उपसर्ग में मूलतः निकट, सामने, पहले, ऊपर जैसे भाव हैं । गौरतलब है कि संस्कृत के अभि उपसर्ग का ज़ेंद रूप अइवी या अइबी (aiwi, aibi ) होता है । अभिष्टि का अर्थ हुआ जो इच्छापूर्ति करे, जो कामनाओं को पूरा करे अर्थात स्वामी, पालक, गुरु, गाईड आदि । अभिष्टि का बरास्ता जेंदावेस्ता आज की फ़ारसी में रूपान्तर कुछ यूँ हुआ अभिष्टि = अइविस्ती > अविस्तद (वश्तात) > ओस्तात > ओस्ताद ( फ़ारसी) / उस्ताद (हिन्दी-उर्दू)
यूँ उस्ताद में शिक्षक, स्वामी के साथ-साथ निपुण, प्रवीण, पण्डित, गुणी, सिद्धहस्त, सुविज्ञ, होशियार, कुशल, दक्ष, विशेषज्ञ जैसे भाव भी हैं । उस्ताद की व्याप्ति दुनिया की कई भाषाओं में है जैसे अज़रबेजानी और उज्बेकी में यह उस्ता है तो स्वाहिली में स्तादी । तुर्किश में यह उस्तात है । स्पेनिश में इसका रूप उस्तेद होता है । उर्दू में सामान्य शिक्षक उस्ताद कहलाता है मगर हिन्दी में उस्ताद का दर्ज़ा वही है जो पण्डित का है अर्थात निष्णात या प्रवीण । सामान्य शिक्षक की तुलना में पण्डित का प्रयोग उपाधि और सम्मान की तरह होता है । आमतौर पर कलागुरुओं को उस्ताद कहा जाता है । संगीत के क्षेत्र में स्पष्टतः आला दर्ज़े के मुस्लिम फ़नकारों के नाम के आगे उस्ताद लगता है और गुरुपद पर पहुँचे हिन्दू कलावंतों के आगे पण्डित लगाया जाता है । गाँव-देहात का आदमी मदारी और जमूरे के खेल की मार्फ़त उस्ताद शब्द से परिचित है । गौरतलब है कि मदारी या जादूगर को उसका जमूरा उस्ताद कहता है । उसका उच्चार भी ओस्ताद की तरह होता है । मदारी जो बाजीगरी दिखाता है, लोग उससे चमत्कृत होते हैं । उस्ताद की उस्तादी यहाँ उभरती है और उस्तादी दिखाना चमत्कृत करने से जुड़ जाता है । बाद में हाथ की सफ़ाई दिखाने, दूसरों को बेवकूफ़ बनाने या ठगने जैसे कामों को भी उस्तादी कहा जाने लगा । यही हश्र कलाकार और कलाकारी शब्द का भी हुआ जैसे- “उससे बच कर रहना, बहुत बड़ा कलाकार है!!!”
राठी में उस्ताद के वस्ताद रूप को तवज्जो दी जाती है । दरअसल वस्ताद शब्द भी मराठी के साँचे में नहीं ढला बल्कि स्थानीय प्रभाव के साथ दक्कनी तुर्कों द्वारा अपनाया रूपान्तर है । यूँ मराठी में भी उस्ताद चलता है । उस्ताद, उस्तादगिरी, उस्तादी जैसे शब्द यहाँ प्रचलित हैं । इसी तर्ज़ पर वस्तादी, वस्तादगिरी भी प्रचलित हैं । उस्तादाना का अर्थ होता है उस्तादों की तरह । जिस तरह पाखंड सम्प्रदाय के साधु पाखंडी कहलाते थे पर ढकोसलों के चलते इस शब्द की अवनति हो गई और पाखंडी बदले हुए माहौल में ढोंगी और फ़र्ज़ी व्यक्ति के दर्ज़े पर पहुँच गया । यही उस्ताद के साथ भी हुआ । हिन्दी का उस्ताद धूर्त भी है और चालाक भी । वह गुरुघंटाल है और महाचालबाज है । कभी उस्ताद के पास जाने की नसीहतें देने वाला समाज ही आज कहता है कि “फलाँ से बच कर रहना, उस्ताद है !!” “उस्तादी दिखाना” आज हुनर या होशियारी से अलहदा छल या ठगी का प्रदर्शन हो गया है ।

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Monday, October 29, 2012

रफूगरी, रफादफा, हाजत-रफा

पिछली कड़ियाँ- 1.‘बुनना’ है जीवन.2.उम्र की इमारत.3.‘समय’ की पहचान.darn 4. दफ़ा हो जाओ 

हि न्दी की अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ाने में विदेशज शब्दों के साथ-साथ युग्मपद और मुहावरे भी है शामिल हैं । रफ़ा-दफ़ा ऐसा ही युग्मपद है जिसका बोलचाल की भाषा में मुहावरेदार प्रयोग होता है । “रफ़ा-दफ़ा करना” यानी किसी मामले को निपटाना, किसी झगड़े को सुलझाना, विवादित स्थिति को टालना, दूर करना । रफ़ा-दफ़ा में नज़र आ रहे दोनो शब्द अरबी के हैं । यहाँ ‘दफ़ा’ का अर्थ ढकेलने, दूर करने से है । इसकी विस्तृत अर्थवत्ता के बारे में पिछली कड़ी में बात की जा चुकी है । रफा ( रफ़ा ) का मूल अरबी उच्चारण रफ़्अ है । फ़ारसी में भी इसका ‘रफ़्अ’ रूप ही इस्तेमाल होता है
फ्अ शब्द की अरबी धातु रा-फ़ा-ऐन ر-ف-ع है जिसमें मूलतः उन्नत करने, सुधारने, ठेलने का भाव है । अरबी क्रियापद है रफ़ाआ जिसमें मरम्मत करना, सुधारना, सीना, ठीक करना, उन्नत करना, तब्दील करना, हटाना जैसे भाव हैं । रफ़ा-दफ़ा में यही भाव है । आमतौर पर हाज़त-रफ़ा पद का प्रयोग भी शौच जाने के अर्थ में उत्तर भारत में इस्तेमाल होता है । जैसे “उनके लिए सुबह सुबह हाजत-रफा करना बड़ा मुश्किल काम था” । इसी कड़ी में आता है ‘रफू’ या ‘रफ़ू’ शब्द । सिलेसिलाए वस्त्र में खोंच लगने पर रफ़ू किया जाता है । इसक अन्तर्गत फटे हुए स्थान की खास तरीके से मरम्मत की जाती है । इसमें बारीक सुई से, जिस कपड़े की मरम्मत होनी है, उसी के अनावश्यक टुकड़े और धागे निकाल कर फटे हुए स्थान को इस खूबी से सिला जाता है कि सिलाई का पता नहीं चलता । यह सिलाई का हुनर है कि मरम्मतशुदा हिस्सा भी कपड़े के टैक्सचर ( बुनावट ) से मेल खाता लगता है ।
रअसल फटे कपड़ों की मरम्मत से विकसित हुई सिलाई की खास तकनीक ने धीरे धीरे कला का रूप ले लिया । फ़ारस में इसका विकास हुआ और मरम्मत के सामान्य उपाय से रफ़ू एक कलाविधा बन गई । फ़ारसी में इसे रफ़ूगरी कहते हैं । रफ़ूगरी यानी रफ़ूकारी । फ़ारसी में ‘करने’ के संदर्भ में ‘गरी’ और ‘कारी’ प्रत्यय प्रचलित हैं । भारोपीय भाषाओं में ‘क’ का रूपान्तर ‘ग’ वर्ण में होता है । वैदिक क्रिया ‘कृ’ इसके मूल में है जिसमें करने का भाव है । इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में इनका प्रयोग देखने को मिलता है जैसे - कर ( बुनकर ) , कार ( कर्मकार, कलाकार, कुम्भकार ) , कारी ( कलाकारी , गुलकारी , फूलकारी ) , गार ( गुनहगार, रोज़गार ), गर ( रफ़ूगर, कारीगर, बाजीगर ) , गरी ( कारीगरी, रफ़ूगर, बाजीगरी ) आदि उदाहरण आम हैं । सो खोंच से बने छिद्र को उसी वस्त्र के टुकड़े और उसी के धागे से पूरने, भरने, बराबर करने की हुनरकारी ही रफ़ूगरी है । इस मुक़ाम पर रफ्अ में निहित सुधारने, उन्नत करने जैसे भावों को समझना आसान होगा ।
फ़ूगरी का कला के रूप में इतना विकास हुआ कि न सिर्फ़ फटे कपड़े की मरम्मत बल्कि गोटा-किनारी कशीदाकारी, फुलकारी जैसे सजावटी हुनर के रूप में भी कपड़ों को खूबसूरत बनाने में रफ़ूगरी का उपयोग होने लगा । सामान्य समस्या से निपटने की तरकीबें कैसे मूल्यवान हो जाती हैं, यह जानना दिलचस्प है । फटे कपड़े की मरम्मत थिगला लगा कर भी होती है । यह थिगला आज पैचवर्क जैसी कलाविधा के रूप में मशहूर है जो रफ़ूगरी का ही एक रूप है । रफ़ू का महत्व इतने पर ही खत्म नहीं हुआ । रफ्अ में सुधारना, उन्नत करना जैसे भावों के चलते ही रफ़ू शब्द का प्रयोग वाग्मिता या वक्तृत्व कला में भी होने लगा है । बातों के बाजीगरों को रफ़ूगरी भी आनी चाहिए । अपने तर्कों से दो असम्बद्ध बातों को मिला देना या वाक्पटुता के चलते अलग-अलग पटरी पर चल रहे वार्तलाप को सही दिशा में ले आना या विवाद को खत्म करना इसी रफ़ूगरी में आता है । ऐसे लोगो की वजह से ही ज़बानी विवाद रफ़ा-दफ़ा हो पाते हैं । कुल मिलाकर यह भी उन्नत तकनीक का मामला है ।
शब्द का इस्तेमाल एक अन्य लोकप्रिय युग्मपद में भी बखूबी नज़र आता है । रफूचक्कर या रफ़ूचक्कर भी हिन्दी का लोकप्रिय मुहावरा है जिसका अर्थ है चम्पत हो जाना, भाग जाना अथवा गायब हो जाना । रफ़ू की अर्थवत्ता समझ लेने के बाद रफ़ूचक्कर को समझना कठिन नहीं है । खोंच लगे स्थान पर रफ़ू करने के दो तरीके होते हैं । छोटा खोंच है तो उसी वस्त्र के धागे से सिलकर छिद्र को भर दिया जाता है । खोंच बड़ा है तो फटे स्थान पर उसी कपड़े का थिगला लगा कर गोलाई में रफ़ू कर दिया जाता है । माना जा सकता है कि चकरीनुमा इस थिगले से ही रफ़ूचक्कर शब्द निकला होगा । रफ़चक्कर में खोंच के गायब हो जाने के भाव का विस्तार है । इसका प्रयोग किसी भी चीज़ के देखते देखते ग़ायब हो जाने में होने लगा । चोरों और उठाईगीरों के सन्दर्भ में आज  रफ़ूचक्कर का इस्तेमाल ज्यादा होता है ।

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Saturday, October 27, 2012

‘दफा’ हो जाओ …

पिछली कड़ियाँ-kicked out1.‘बुनना’ है जीवन.2.उम्र की इमारत.3.‘समय’ की पहचान.

मयवाची शब्दों की कड़ी में इस बार अरबी के ‘दफा’ शब्द की बात । रोजमर्रा की बोली भाषा में ‘बार-बार’ इस्तेमाल होने वाले शब्दों में ‘बार-बार’ का ‘बार’ भी शामिल है जैसे - ‘इस बार’, ‘उस बार’, ‘कई बार’, ‘हर बार’, ‘मेरी बारी’, ‘तेरी बारी’, ‘उसकी बारी’, ‘बारी-बारी’ आदि । इसी कड़ी में ‘बार’ का एक और पर्याय है ‘दफा / दफ़ा’ जिसका इस्तेमाल भी बार की तर्ज़ पर ही होता है मसलन ‘इस दफ़ा’, ‘उस दफ़ा’, ‘हर दफ़ा’, मगर ‘दफ़ा’ का इस्तेमाल और अलग अर्थों में भी होता है । किसी को चलता करने के लिए कहा जाता है “दफ़ा हो जाओ” । अगर कोई ‘दफ़ा’ होने को राज़ी न हो तो मुमकिन है कानून की ‘दफ़ा’ लगाने की नौबत आ जाए । ये सभी दफ़ा एक ही सिलसिले की कड़ियाँ हैं । दफ़ा का प्रयोग दफे की तरह भी होता है जैसे “पहली दफ़े…”।
हिन्दी में ‘दफ़ा’ शब्द का प्रयोग फ़ारसी के ज़रिए शुरू हुआ । फ़ारसी में इसकी आमद अरबी से हुई जिसमें इसका सही रूप ‘दफ्अ’ है । दफ़्अ की व्युत्पत्ति अरबी की d-f-a ( दा-फ़ा-ऐन ) त्रिअक्षरी धातु से हुई है । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि मूलतः यह अक्कादी भाषा का शब्द है । अक्कादी में ‘प’ ध्वनि  है और अरबी में ‘फ’ है , ‘प’ नहीं । अक्कादी में इसका रूप d-p-a ( दा-पे-ऐन ) है जिसमें धकेलने ( बाहर की ओर ) की बात उभरती है । अरबी में दफ़्अ में भी धकेलने ( बाहर निकालने ) का भाव है । गौरतलब है कि संस्कृत की समयवाची क्रियाओं में भी गति, शक्ति, प्रवाह के आशय निकलते हैं । संस्कृत की वा-या क्रियाओं में गतिवाची भाव है मगर इनसे समयवाची शब्द भी बने हैं ।  अरबी के दफ़ा शब्द की अर्थवत्ता के नज़रिए से काफी पेचीदा है । कहीं यह प्रवाहवाची नज़र आता है और प्रकारान्तर से कही इसी वजह से इसमें समूहवाची अर्थवत्ता उभर आती है ।
फ़्अ का हिन्दी, फ़ारसी में दफ़ा रूप प्रचलित है । हिन्दी में नुक़ता नहीं होता तो भी दफा में नुक़ता लगाया जाना चाहिए । अलसईद एम बदावी की कुरानिक डिक्शनरी के मुताबिक दा-फ़ा-ऐन में प्रवाह, झोंका, बौछार, धारा, धावा जैसे भाव हैं । इससे बने दफ्अ में धावा, हमला या चढ़ दौड़ने, टूट पड़ने के साथ-साथ बचाव करने, रोकने का आशय भी है । मराठी में भी दफा शब्द है । करीब साढ़े तीन सौ साल पहले शिवाजी ने पंडित रघुनाथ हणमंते से शासन-व्यवहार में प्रचलित अरबी-फ़ारसी शब्दों की सूची बनवाई थी ( राजव्यवहार कोश ), उसमें भी दफा शब्द का उल्लेख है । कृ.पा. कुलकर्णी के कोश के मुताबिक इसमें समय और पाली का आशय है साथ ही दफ़ा शब्द का अर्थ सेना की पंक्ति, टुकड़ी भी है । खासतौर पर घुड़सवार टुकड़ी का इसमें आशय है ।
हिन्दी-मराठी-गुजराती में दफ़ेदार एक उपनाम भी होता है जिसका रिश्ता मुग़लदौर की सैन्य शब्दावली से हैं । दफ़ा शब्द का अर्थ प्रभावी या ताक़तवर व्यक्ति भी है । फ़ैलन के कोश में इसका एक फ़ारसी रूप दफ़े  है जिसमें फौजी टुकडी, सेना का घुड़सवार दस्ता अथवा पैदल टुकड़ी का आशय है । इससे ही दफ़ेदार शब्द बना है अर्थात किसी सैन्य दल का सरदार । रियासती दौर में दफ़ेदार होना सम्मान की बात थी । जनरल से जरनैलसिंह और कर्नल से करनैलसिंह की तरह ही सैन्य जातियों में ‘दफ़ेदार’ नाम रखने की परम्परा भी रही है । गौर करें ये सभी आशय मूलतः अरबी के ‘दफ्अ’ में निहित प्रवाहवाची ( धकेलना ) अर्थ से ही विकसित हुए हैं । सेना की टुकड़ी धावा ही करती है । गति, वेग और प्रवाह को फौजी धावे के सन्दर्भ में समझा जा सकता है ।
फ़ा में निहित समय, बारी, समूह, धक्का, वेग, टुकड़ी, पिण्ड, हटाना, हमला जैसे तमाम अर्थों को देखने पर मूल दफ्अ में निहित धकेलने का आशय ही उभर कर आता है । ध्यान रहे  धकेलने की क्रिया से दबाव बनता  है । दबाव से जमाव पैदा होता है । यही बात दफ़ा में समूह, टुकड़ी, खण्ड, पिण्ड आदि की अर्थवत्ता पैदा करती है । अरबी में दफ़्अ का एक अर्थ हाथी की लीद ( पिण्ड )भी होता है । इसमें जमाव और धकेल कर बाहर निकाले जाने के भाव को समझा जाना चाहिए । फ़ौजी टुकड़ी के मुखिया को दफ़ेदार इसलिए कहा जाता है क्योंकि दफ़ा में समूह का भाव है । यह टुकड़ी दुश्मन की फोज को पीछे धकेलती है । तेजी से आगे बढ़ती है ।  छत्तीसगढ़ के कोयलांचल में मज़दूर बस्ती को दफाई कहा जाता है । यह दफाई मनुष्यों का समूह या दल ही है । स्टैंगास की अरेबिक डिक्शनरी के मुताबिक दफ़ाफ का अर्थ परिवार, बस्ती या समूह है । अरबी में जमाअत का अर्थ भी दल या समूह है । दलपति या दलनायक को जमाअतदार कहा जाता था । बाद में इसका रूपान्तर जमादार हो गया । कहने का तात्पर्य यही कि दफ़ेदार में जमादार का ही भाव है ।
फ़ा का हिन्दी-उर्दू में कालवाची अर्थ में ही ज्यादातर प्रयोग होता है । दफ़ा के समूहवाची अर्थ में ढलने की प्रक्रिया को समझने के बाद दफ़ा यानी बार-बार, बारी अर्थात turn, मौका अवसर, समय आदि भावों को समझना आसान है । समय की गति सीधी सपाट नहीं बल्कि घुमावदार है । दिन-रात 12-12 घंटों में विभाजित है और 24 घंटों बाद यही क्रम फिर शुरू होता है । सप्ताह सात दिन का और महिना तीस दिन का । एक अन्तराल के बाद फिर वही क्रम शुरू होता है । यह वृत्ताकार है । यह जो मुड़ कर लौटने की क्रिया  है, यही बारी या टर्न है । पहला क्रम खत्म होने के बाद फिर वही क्रम शुरू होने को बारी कहते हैं । इस तरह ‘बारी’ समय का वह अंश, हिस्सा या खण्ड है जिसकी पुनरावृत्ति हो रही है । ध्यान दें, पुनरावृत्ति में ‘वृत्त’ ही है जिसके मूल में वर् है । वर् में घुमाव है जिससे एक दिन के अर्थ वाला वार बन रहा है । वार का फ़ारसी रूप ही ‘बार बार’  वाला बार है । पुनरावृत्ति का वृत्त या मोड़ वही है जिसे ‘बारी’ कहते हैं, इसका आशय कालांश, कालखंड से भी लगाया जा सकता है । बार-बार के अर्थ में ही दफ्अतन  शब्द का प्रयोग भी होता है जिसमें दफ्अ या दफ़ा साफ़ पहचाना जा सकता है ।
ई समूह किसी न किसी बड़ी रचना के हिस्से होते हैं । सो दफ़ा एक टुकड़ी भी है, समूह भी है, जमाव भी है, दल भी है । कई इकाइयों से समूह बनता है और कई समूहों की स्थिति में हर समूह एक इकाई होता है । समूह के रूप में इकाई एक पिण्ड, खण्ड, अनुच्छेद, प्रभाग आदि है । दफ़ा का अर्थ अनुच्छेद, धारा, अनुभाग, भाग आदि भी होता है । न्याय व्यवस्था में दफ़ा शब्द का प्रयोग होता है । हिन्दी में जिसे धारा हैं, रियासती दौर में उसे दफ़ा कहा जाता था । आज भी यह प्रचलित है । दफ़ा 302 का आशय भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 से है । हिन्दी-उर्दू में दफ़ा ( दफ्अ ) शब्द का एक अर्थ दूर करना, चले जाने का आदेश देना । मूलतः इसमें धकेलने वाले भाव का विस्तार ही है । धकेलने की क्रिया में दूर करने का भाव है । व्यावहारिक रूप में यह तिरस्कार है । ‘दफ़ान हो जाओ,’ ‘दफ़ा हो जाओ’ वाक्यों में तिरस्कार की नाटकीय अभिव्यक्ति देखने को मिलती है । इसका प्रयोग खुद चले जाने जाने के लिए भी होता है जैसे “मैं तो दफ़ा होता हूँ”अगली कड़ी में-  ‘रफ़ा-दफ़ा’ की बात
इन्हें भी देखें-1.फसल के फ़ैसले का फ़ासला.2.सावधानी हटी, दुर्घटना घटी.3.क़िस्मत क़िसिम-क़िसिम की.4.चरैवेति-चरैवेति.5.दुर्र-ऐ-दुर्रानी.6.कमबख़्त को बख़्श दो !.7.चोरी और हमले के शुभ-मुहूर्त.8.मौसम आएंगे जाएंगे.9.बारिश में स्वयंवर और बैल.10.साल-दर-साल, बारम्बार.11.नीमहकीम और नीमपागल.12.कै घर , कै परदेस !.13.सरमायादारों की माया [माया-1] .14.‘मा’, ‘माया’, ‘सरमाया’

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Thursday, October 25, 2012

‘समय’ की पहचान

time

क्त अपने साथ ताक़त और रफ़्तार दोनो लेकर चलता है । यह साबित होता है हिन्दी के उन कई कालसूचक शब्दों से जो गतिवाची, मार्गवाची क्रियाओं से बने हैं । कहने की ज़रूरत नही कि गति का स्वाभाविक सम्बन्ध शक्ति से है । गति, प्रवाह, वेग दरअसल शक्ति को ही दर्शाते हैं । देवनागरी का ‘इ’ वर्ण संस्कृत में क्रिया भी है जिसमें मूलतः गति का भाव है, जाना, बिखरना, फैलना, समा जाना, प्रविष्ट होना आदि ‘इ’ क्रिया का का विशिष्ट रूप अय् है और इसमें भी गति है । अय् में सम् उपसर्ग लगने से बनता है समय । ‘सम’ यानी साथ-साथ ‘अय’ यानी जाना यानी साथ-साथ चलना, जाना । दरअसल हमारे आसपास का गतिमान परिवेश ही समय है अर्थात समूची सृष्टि, ब्रह्माण्ड, प्रकृति जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य हमारे इर्दगिर्द गतिमान है, वह सब काल के दायरे में है । जो कुछ घट रहा है, वह काल है । मनुष्य के लिए उससे तादात्म्य बिठाना ही समय है । बिहारी ने कहा है- समै समै सुंदर सबै, रूप कुरुप न कोय । मन की रुचि जैति जितै, तित तैति रुचि होय ।।
प्रकृति की लय में लीन हो जाना ही जीवन है । मोनियर विलियम्स के कोश में सम + इ के मेल से समय बनता है । ‘इ’ का समरूप अय् इसमें निहित है । जिसमें समागम, मिलन, एक होना, व्यवस्थित होना जैसे भाव इसमें हैं । इसके अलावा मौसम, अवधि, युग, काल, ऋतु, अवसर, सीमा, परिधि, संकेत, अवकाश, अन्तराल जैसे भाव भी इसमें हैं । समयोचित और सामयिक जैसे शब्दों में समय पहचाना जा रहा है समय में गति है इसीलिए हम कहते हैं कि वक्त बीत रहा है या बीत गया । समय का सम्बन्ध परिवेश में होने वाले बदलावों से है । “समय को पहचानों” का तात्पर्य संसार को पहचानने से है । “समय बदल रहा है” में दुनिया की रफ़्तार से रफ़्तार मिलाने की नसीहत है । स्पष्ट है कि समय में परिवेश का भाव प्रमुख है । जो घट रहा है, जो बीत रहा है के संदर्भ में ‘दुनिया मेरे आगे” ही समय है । संस्कृत के वीत में जाने का भाव है । इससे बना एक शब्द है वीतराग अर्थात सौम्य, शान्त, सादा, निरावेश । राग का अर्थ कामना, इच्छा, रंग, भावना होता है । वीतराग वह है जिसने सब कुछ त्याग दिया हो । एक पौराणिक ऋषि का नाम भी वीतराग था। वीतरागी वह है जो संसार से निर्लिप्त रहता है ।
सी कड़ी में आता है चरैवेति जो चर + वेति का मेल है । चर यानी चलना, आगे बढ़ना । वेति में ढकेलना, उकसाना, ठेलना ( सभी में शक्ति ), पास आना, ले जाना, प्रेरित करना, प्रोत्साहित करना, बढ़ाना, भड़काना, उठाना जैसे अर्थों को चरैवेति के सकारात्मक भाव से जोड़ कर देखना चाहिए ।सभी धर्मों में, संस्कृतियों में काल की गति को सर्वोपरि माना गया है मगर इसके साथ जीवन को, मनुष्यता को लगातार उच्चतम स्तर पर ले जाने की अपेक्षा भी कही गई है । चलना एक सामान्य क्रिया है । चर के साथ वेति अर्थात प्रेरणा ( ठेलना, ढकेलना ) का भाव सौद्धेश्य है । प्रेरित व्यक्ति एक दिशा में चलता है । उच्चता के स्तर पर मनुष्य लगातार अनुभवों से गुज़रते रहने पर ही पहुँचता है । “चरैवेति-चरैवेति” की सीख भी यही कह रही है कि निरंतर गतिमान रहो । ज्ञानमार्गी बनो । ज्ञान एक मार्ग है जिस पर निरंतर गतिमान रहना है । अनुभव के हर सोपान पर, हर अध्याय पर मनुष्य कुछ और शिक्षित होता है, गतिमान होता है, कुछ पाठ पढ़ता है ।
देवनागरी के ‘व’ वर्ण में ही गति का भाव है । इससे बनी ‘वा’ क्रिया में प्रवाह, गति का आशय है । हिन्दी की तत्सम शब्दावली का वेग इसी कड़ी में है । मार्गवाची शब्दों के निर्माण में भी ‘व’ की भूमिका है । वर्त्मन यानी राह । बाट इसी वर्त्मन का देशज रूप है । अंग्रेजी का वे way को देखें जिसका अर्थ पथ, रास्ता, मार्ग है । यह भारोपीय मूल की ‘वे’ wegh से बना है जिसका समरूप विज् है जिससे संस्कृत का वेग बना है । राह कहीं ले जाती है । लिथुआनी के वेजू में ले जाने का आशय । रूसी में भी यह वेग और वेगात ( भागना ) है । संस्कृत वात ( फ़ारसी बाद ) यानी वायु , वह् से हवा आदि । वीत में जाना और आना दोनों हैं । वीथि यानी रास्ता इससे ही बनता है । रामविलास शर्मा संस्कृत की ‘वा’ के समानान्तर ‘या’ क्रिया का उल्लेख करते हैं । इनमें गति के साथ जलवाची अर्थवत्ता भी है । जल के साथ हमेशा ही गतिबोध जुड़ता है । मोनियर विलियम्स के कोश से इसकी पुष्टि होती है । संस्कृत का वारि जलवाची है तो रूसी के वोद ( वोदका ) का अर्थ पानी है । तमिल में नदी के लिए यारू शब्द है । ‘या’ में जाना, चलना, गति करना निहित है साथ ही इसमें खोज, अन्वेषण भी है । चलने पर ही कुछ मिलता है । चलने की क्रिया मानसिक भी हो सकती है । ‘या’ में ध्यान का भाव भी है । ‘आया’, ‘गया’ में इस गति सूचक ‘या’ को पहचानिए ।
संस्कृत में यान का एक अर्थ मार्ग तो दूसरा वाहन भी है । हीनयान, महायान, वज्रयान, सहजयान में रीति, प्रणाली की अर्थवत्ता है । किन्हीं व्याख्याओं में वाहन के प्रतीक को भी उठाया गया है । दोनों में ही ले जाने का भाव है । तमिल में इसके प्रतिरूप यानई और आनई हैं । कभी इनका अर्थ वाहन रहा होगा, अब ये हाथी के अर्थ में रूढ़ हैं । एक शब्द है याम जिसमें भी मार्ग के साथ वाहन का भाव है । याम में कालवाची भाव भी है अर्थात रात का एक पहर यानी तीन घण्टे की अवधी याम है । महादेवी वर्मा ने यामा का प्रयोग रात के अर्थ में किया है । दक्ष की एक पुत्री, और एक अप्सरा का नाम भी यामा, यामी, यामि मिलता है । इसी तरह यव का अर्थ द्रुत गति के अलावा महिने का पहला पखवाड़ा भी है । इसी कड़ी में आयाम भी है । आयाम अब  पहलू के अर्थ में रूढ़ हो गया है । इसका अर्थ है समय के अर्थ  में विस्तार । किसी चीज़ की लम्बाई या चौड़ाई । किसी  विषय के आयाम का आशय उस विषय के विस्तार से है ।
फिर समय पर लौटते हैं । समय के अय् में गमन, गति का भाव है, जिसकी व्याख्या ऊपर हो चुकी है । इस अय से अयन बनता है । अयन यानी रास्ता, मार्ग, वीथि, बाट, जाने की क्रिया आदि । इसका अर्थ आधे साल की अवधि भी है । दक्षिणायन और उत्तरायण में अवधि का संकेत है । दक्षिणायन में सूर्य के दक्षिण जाने की अवधि और गति का आशय है जिसके ज़रिये सर्दियों का आग़ाज़ होता । तब सूर्य कर्क रेखा से दक्षिण की ओर मकर रेखा की ओर बढ़ता है । सूर्य की उत्तरायण अवस्था इसके उलट होती है । इससे गर्मियों का आग़ाज़ होता है । संस्कृत का वेला, तमिल का वरई, कन्नड़ वरि, हिन्दी का बेला, मराठी का वेळ ये तमाम शब्द भी इसी कड़ी में हैं और समय सूचक हैं । संझाबेला, सांझबेला जैसे शब्द कालवाची ही हैं ।
काल यानी समय अपने आप में गति का पर्याय है। दार्शनिक अर्थों में चाहे समय को स्थिर साबित किया जा सकता है पर लौकिक अर्थो में तो समय गतिशील है। हर गुज़रता पल हमें अनुभवों से भर रहा है। हर अनुभव हमें ज्ञान प्रदान कर रहा है, हर लम्हा हमें कुछ सिखा रहा है । आज के प्रतिस्पर्धा के युग में हम अनुभवों की तेज रफ्तारी से गुज़र रहे हैं। आज से ढाई हजार साल पहले भी इसी ज्ञान की खातिर भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को यही सीख दी थी– चरत्थ भिक्खवे चारिकम । बहुजन हिताय , बहुजन सुखाय । हे भिक्षुओं, सबके सुख और हित के लिए चलते रहो….।

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Tuesday, October 23, 2012

उम्र की इमारत

stoneAgeपिछली कड़ी-‘बुनना’ है जीवन

यु के लिए हिन्दी का सबसे लोकप्रिय शब्द उम्र है । इसके अलावा अंग्रेजी का एज शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है । इसके उमर, उमिर, उमरिया जैसे रूप भी हिन्दी की विभिन्न शैलियों में प्रचलित हैं । उम्र मूलतः सेमिटिक परिवार की अरबी भाषा का शब्द है और बरास्ता फ़ारसी इसकी आमद हिन्दी में हुई है । हिन्दी में सर्वाधिक बोले जाने शब्दों में यह भी एक है । गौर करें कि किन किन सन्दर्भों में हम सुबह से शाम तक उम्र / उमर शब्द का प्रयोग करते हैं । अरबी में उम्र का अर्थ जीवन, जीवनकाल है । प्रायः सभी भाषाओं में जीवन, ज़िंदगी के साथ निर्माण या रचना जैसे शब्दों का प्रयोग होता है । “ज़िंदगी बनाना”, “ज़िंदगी बनना”, “जीवन सँवारना”, “जीवननिर्माण” आदि वाक्यों से यह स्पष्ट हो रहा है । वय शब्द में बुनावट वाले भाव का आशय जिस तरह से जीवन को सँवारने से जुड़ रहा है वही बात उम्र की मूल सेमिटिक धातु अम्र में भी है जिसमें निर्माण का भाव प्रमुख है ।
रबी में उम्र का आशय जीवन या जीवनकाल से है । जीवनकाल यानी व्यतीत किया हुआ जीवन । बिताई गई आयु । अन्द्रास रज्की के मुताबिक फ़ारसी में इसका उच्चारण ओम्र की तरह है तो अज़रबैजानी और तुर्की में ऊमूर, हिन्दी यह उमर या उम्र है तो स्वाहिली में उम्री, उज़्बेकी में यह उम्र है और तातारी में गोमेर । अल सईद एम बदावी की अरेबिक इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ कुरानिक यूसेज़ के मुताबिक । अम्र से ही अमारा बनता है जिसका अर्थ है बसना, बसाना, सभ्य होना, शिष्ट होना, सुधारना आदि । गौर करें, आदिम युग से ही तमाम मानव समूहों की ये आरम्भिक क्रियाएँ रही हैं । जन्म लेना भर जीवन नहीं है । जन्म लेने के बाद का शारीरिक विकास ही जीवन नहीं है । बीहड़ इलाके को रहने योग्य बनाना, फिर भोजन के लिए बंजर भूमि को खेती योग्य बनाना, फिर समूह में रहते हुए रीति-नीति का विकास जिससे सभ्यता और संस्कृति का निर्माण होता है । यह है अमारा का मूल भाव । सिर्फ़ जी भर लेने से उम्र नहीं गिनी जाती बल्कि युग की तरह जीवन का निर्माण करने में उम्र की सार्थकता है । इसीलिए महान व्यक्तियों के जीवनकाल को युग कहा जाता है क्योंकि वे जीवन जीते नही हैं , बल्कि निर्माण करते हैं । अंग्रेजी के एज  age शब्द में जहाँ उम्र की अर्थवत्ता है वहीं युग और काल का आशय भी है ।
रबी के  तामीर और इमारत शब्दों का हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है । तामीर यानी निर्माण, पुनर्निर्माण, रचना, सृजन आदि । यह तामीर भी इसी मूल से उपजा शब्द है । अपना जीवन अपने काम आने के साथ साथ औरों के काम आए, उसे ऐसा गढ़ना पड़ता है । जीवन को जीने लायक बनाने का भाव ही उम्र में है । तामीर अच्छी होगी तो इमारत भी बुलंद होगी । इल्म, हुनर, लियाक़त और क़ाबिलियत से ज़िंदगी को बेहतरीन बनाना ही असल बात है । यूँ अमारा में आवास और जीवन दोनो है । मूलतः आवास पहले, जीवन बाद में । मकान, भवन के अर्थ वाला इमारत शब्द इसी मूल से निकला है । ज़िंदगी की इमारत सिर्फ़ दीर्घायु (उम्रे-दराज़ ) से बुलंद नहीं होती क्योंकि उम्रे-दराज़ का जीवन की कठिनाइयों ( उम्रे-परीशाँ ) से गहरा रिश्ता है । जीवन के हर कालखण्ड का निर्माण करना पड़ता है । इसे ही ज़िंदगी बनाना कहते हैं । आजकल लोग इसमें “लाइफ़ बनना” देखते हैं ।
ब आते हैं आयु पर । उम्र के अर्थ में आयु शब्द का प्रयोग भी खूब होता है । मराठी में उम्र के लिए वय शब्द का प्रयोग अधिक होता है ठीक उसी तरह हिन्दी में आयु का । हिन्दी में उम्र के अर्थ में अकेले वय का प्रयोग दुर्लभ है अलबत्ता वयःसंधि, अल्पवय, मध्यवय, किशोरवय जैसे युग्मपदों का प्रयोग ज्यादा होता है । कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी कोश के मुताबिक आयु की व्युत्पत्ति आयुस् से है जिसका अर्थ है जीवनीशक्ति, जीवनकाल । वाशि आप्टे आयुस की व्युत्पत्ति आ + इ + उस से बताते हैं जिसमें जीवनावधि, जीवनदायक शक्ति जैसे भाव हैं । गौरतलब है कि संस्कृत की ‘इ’ धातु में मूलतः गति का भाव है, जाना, बिखरना, फैलना, समा जाना, प्रविष्ट होना आदि । मोनियर विलियम्स के मुताबिक ‘इ’ का विशिष्ट रूप अय् से भी व्यक्त होता है जिसमें भी गति का भाव है । ध्यान रहे, जीवन का मूल लक्षण गति ही है । अय का रिश्ता ‘या’ धातु से भी है जिसमें भी जाने, गति करने का भाव है । यान, यात्री जैसे शब्द इसी कड़ी से निकले हैं । 
स ‘अय’ की व्याप्ति हिन्दी के कई शब्दों में है जैसे अयन् जिसका संस्कृत रूप है अयनम् या अयणम् जिसमें जाने, हिलने, गति करने का भाव है । अयनम् का अर्थ रास्ता, मार्ग, पगडण्डी, पथ आदि भी होता है । अवधि या संधिकाल जैसे भाव भी इसमें निहित हैं । अयनम् बना है अय् धातु से । इसमें फलने-फूलने, निकलने का भाव है जो गतिवाचक हैं । जाहिर है अयनम् में निहित गति, राह, बाट का आशय तार्किक है । रामायण या कृष्णायन पर गौर करें जिसमें राम की राह पर चलने या कृष्ण की बाट जाने का भाव है । कुल मिला कर आयु का अर्थ जीवन के फलने-फूलने, उसे सभ्य-संस्कारी बनाने से है । वही भाव, जो उम्र में व्यक्त हो रहा है । चिरायु, शतायु, दीर्घायु जैसे अन्य कई शब्दों से यह ज़ाहिर है । भारोपीय भाषाओं में और आपस में रूपान्तरित होते हैं । भाषाविदों ने भारोपीय भाषा परिवार में एक धातु अयु aiw की कल्पना की है जो संस्कृत आयु की समरूप है । का रूपान्तर में होने से अंग्रेजी का एज age इसी से बनता है जिसमें परिपक्वता, प्रौढ़ता, जीवनकाल जैसे भाव हैं । एज में काल और युग जैसी अर्थवत्ता भी है ।

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Monday, October 22, 2012

‘बुनना’ है जीवन

bayaज़रूर देखें-1. चादर. 2.प्रवीण.3. तन्तु.4. धागा. 5.बाँस.6.कातना.7. सूत 

जी वन का बुनाई से गहरा रिश्ता है । “झीनी झीनी बीनी चदरिया” वाली कबीर की जगप्रसिद्ध उक्ति में चादर ज़िंदगी का प्रतीक है । परमात्मा ने जीवनरूपी चादर को जितनी शिद्धत और मेहनत से महीन अंदाज़ में बुना था उसे सुर-नर-मुनि ने ओढ़ कर मैला कर दिया । कबीर बड़े समझदार हैं, उन्हें ज़िंदगी की कीमत पता है, सो इस चादर को उन्होंने इतने जतन से ओढ़ा कि खुद के साथ साथ पूरे ज़माने को संवार दिया । “दास कबीर जतन से ओढ़िन, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया”। कबीर जुलाहे थे, बुनकारी जानते थे । इसीलिए उन्होंने ज़िंदगी के लिए चादर जैसा सहज प्रतीक चुना । जन्म लेने के बाद हम सब महीन की बजाय मोटा कातते हैं, महीन की बजया  मोटो बुना जाता है । नतीजतन सुख नहीं मिलता । सुख की उधेड़बून में चादर मैली और जर्जर हो जाती है । इसलिए जिंदगी को सलीके से, महीन बुना जाना चाहिए । हि्न्दी के ‘वय’ शब्द का बुनाई से गहरा रिश्ता है ।
म्र या आयु के लिए हिन्दी में ‘वय’ शब्द भी प्रचलित है । मराठी में उम्र, आयु की तुलना में वय शब्द ज्यादा प्रचलित है । संस्कृत कोशों के अनुसार ‘व’ वर्ण में गति (वह > वहन > बहना या वेग), घर ( वास > आवास, निवास ), कपड़ा ( वस् > वस्त्र ) और बुनना (वयन) जैसे भाव हैं । इसके अतिरिक्त भुजा जो भार उठाती है ( वाह > बांह ) भी इसका अर्थ है । संस्कृत की ‘वे’ धातु में गूँथने, बुनने, बटने और बांधने का भाव प्रमुख है । वे का एक अर्थ पक्षी भी होता है क्योंकि वे चुन-चुन कर तिनकों को गूँथते हैं और अपना आवास बनाते हैं । ‘वे’ से ही बनता है वयन जिससे बयन > बउन > बुन > बुनन > बुनना जैसे रूप बने हैं । इससे ही बुनाई, बुनावट, बुनकर शब्दों का विकास हुआ । वस्त्र के अर्थ में बाना शब्द भी इसी कड़ी में आता है ।
मोनियर विलियम्स के अनुसार ‘वे’ धातु से ही बना है संस्कृत का वय शब्द जिसका अर्थ है वह जो बुनता है अर्थात जुलाहा, बुनकर । तन्तुवाय भी तत्सम शब्दावली में आता है जिसका अर्थ है तन्तुओं को बुनने वाला अर्थात जुलाहा । तन्तु से ही ताँत बना है जिसका मतलब होता है धागा और ताँती बुनकरों की एक जाति है । इसी तरह वय में आयु, उम्र का भाव भी है । वय की अगली कड़ी है वयस् आता है जिसका अर्थ है एक विशेष चिड़िया, कोई भी पक्षी, यौवन, आयु की कोई भी अवस्था, शारीरिक ऊर्जा, शक्ति, बल आदि । वय के जुलाहा और वयस के विशिष्ट चिड़िया वाले वाले अर्थ पर गौर करें । एक विशेष चिडिया को बया कहते हैं जो बेहद करीने और सुथरेपन के साथ तिनकों से अपना घोसला बनाती है मानो कलाकृति हो । बया को कारीगर चिड़िया अथवा जुलाहा की संज्ञा भी दी जाती है । बया, वय से ही बना है । घरोंदा किसी भी प्राणी के लिए जीवन को बचाए रखने का ठिकाना होता है । प्रत्येक को घर में ही शरण मिलती है । जीव कोख में पलता है । पैदा होने के बाद भी आश्रय में ही हम जीवन बुनते है । आयु की सार्थकता बीत जाने में नहीं, बुने जाने में है ।
वे में निहित गूँथना, बुनना, बटना जैसे भावों पर गौर करें । इससे ही बना है संस्कृत का वेन् शब्द । इसका एक अन्य रूप है वेण जिसका अर्थ है बाँस का सामान बनाने वाला कारीगर, संगीतकार । वेण से वेणी याद आती है ? वेणी अर्थात लम्बे बालों को गूँथकर बनाई गई शिखरिणी या चोटी । गूँथना भी बुनकारी है । इसी तरह बाँसो की खपच्चियों को भी गूँथकर, बुनकर डलिया, चटाई आदि बनाई जाती हैं । वंशकार जाति के लोग यह काम करते हैं । वेणु यानी बाँस, लम्बी घास की एक प्रजाति, सरकंडा । वेणु का एक अर्थ बाँसुरी भी होता है और चोटी भी । कृष्ण चोटियाँ बांधते थे इसलिए उनका नाम वेणुमाधव या वेणीमाधव भी है । इसका देशी रूप बेनीमाधव हो गया जो घटते घटते सिर्फ ‘बेनी’ रह गया और उधर माधव दुबला होकर ‘माधो’ बन गया । वेणि जहाँ चोटी है वहीं वेणी में चोटी के साथ धारा, नदी का अर्थ भी है । तीन धाराओं को त्रिवेणी कहते हैं ।
सी कड़ी में चर्चा कर लेते है वीणा शब्द की । आपटे कोश में के अनुसार वीणा का अर्थ सारंगी जैसा वाद्य, बीना, बताया गया है और इसकी व्युत्पत्ति ‘वी’ से बताई गई है । इसके अलावा इसका एक अन्य अर्थ विद्युत भी है। संस्कृत की ‘वी’ धातु में जाना, हिलना-डुलना, व्याप्त होना, पहुँचना जैसे भाव हैं। बिजली की तेज गति, चारों और व्याप्ति से भी वी में निहित अर्थ स्पष्ट है। विद्युत की व्युत्पत्ति भी वी+द्युति से बताई जाती है । ‘वी’ अर्थात व्याप्ति और द्युति यानी चमक, कांति, प्रकाश आदि । संस्कृत में वेण् या वेन् शब्द भी मिलते हैं जिनका अर्थ है जाना, हिलना-डुलना या बाजा बजाना । इसी क्रम में वेण् से बने वेण का अर्थ होता है गायक जाति का एक पुरुष । वेन में निहित एँठना, बटना जैसे भावों पर एक वाद्य के संदर्भ में विचार करने से स्पष्ट होता है कि यहाँ आशय तारों को कसने से ही है । प्रायः सभी तन्त्रीवाद्यों के तार घुण्डियों से बंधे रहते हैं जिने घुमा कर, एँठ कर तारों को कसा जाता है जिससे उनमें स्वरान्दोलन होता है ।
भारतीय भाषाओं में ‘न’ का ‘ण’ रूप भी सामान्य सी बात है । जल के अर्थ में पानी को मराठी, मालवी, राजस्थानी में पाणी कहा जाता है । इसी तरह वेन् का ही एक रूप वेण भी प्राचीनकाल में ही प्रचलित रहा होगा । वेन रूप से बीन, बीना जैसे रूप बने होंगे और वेण रूप से वीणा । मूलतः किसी ज़माने में वीणा बाँस से ही बनाई जाती रही होगी । आज भी उसमें बाँस का काफ़ी प्रयोग होता है । बाँस से वेणु अर्थात बाँसुरी भी बनती है । बाँस शब्द से ही बाँसुरी भी बना है और वेणु का अर्थ भी बाँस ही होता है । सो वेणु का एक अर्थ बाँसुरी भी हुआ । इसका रूपान्तर बीन हुआ । गौर करें बाँसुरी की तरह बीन सुषिर वाद्य है । निश्चित ही बाँस से बाँसुरी का आविष्कार आदिम समाजों में बहुत पहले हो गया था । बाँस के लम्बे पोले टुकड़े को जब तन्त्रीवाद्य का रूप दिया गया तो उसे भी इसी शृंखला में वीन्, वीण्, वीणा नाम मिला । वेणु यानी बंसी तो पहले से प्रचलित थी ही । संस्कृत धातु ‘वे’ की अर्थगर्भिता महत्वपूर्ण है जिसमें गति और बुनावट  की अर्थवत्ता है और इन दोनों का मेल ही जीवन है ।

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Thursday, October 18, 2012

पग-पग पैग़म्बर

pag
सं देश के अर्थ में फ़ारसी का पैग़ाम शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है ।  पैग़म्बर का रिश्ता भी पैग़ाम से ही है यानी वो जो पैग़ाम लाए । पैग़ाम का ही दूसरा रूप पयाम payam भी होता है । पैग़म्बर की तरह ही इससे पयम्बर बनता है । यह उर्दू में अधिक प्रचलित है । संवाद से जुड़े विभिन्न शब्द दरअसल किसी भी भाषा की आरम्भिक और मूलभूत शब्दावली का हिस्सा होते हैं । भाषा का जन्म ही संवाद माध्यम बनने के लिए हुआ है । पुराने ज़माने में पदयात्रियों के भरोसे ही सूचनाएँ सफ़र करती थीं । बाद में इस काम के लिए हरकारे रखे जाने लगे । ये दौड़ कर या तेज चाल से संदेश पहुँचाते थे । आगे चलकर घुड़सवार दस्तों ने संदेशवाहकों की ज़िम्मेदारी सम्भाली । इसके बावजूद शुरुआती दौर से लेकर आज तक पैदल चल कर संदेश पहुँचाने वालों का महत्व बना हुआ है । हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी के शब्दकोशों में पैग़ाम के बारे में व्युत्पत्तिमूलक जानकारी नहीं मिलती ।

पैग़ाम शब्द की रिश्तेदारी निश्चित रूप से संदेशवाहन की पैदल प्रणाली से होनी चाहिए । जॉन प्लैट्स के फ़ारसी, हिन्दुस्तानी, इंग्लिश कोश में पैग़ाम paigham शब्द को संस्कृत के प्रतिगम्  pratigam शब्द का सगोत्रीय बताया गया है जिसमें किसी की ओर जाना, मिलने जाना, वापसी जैसे भाव हैं । संस्कृत की बहन अवेस्ता में प्रति उपसर्ग का समरूप पैति है । डॉ अली नूराई द्वारा बनाए गए इंडो-यूरोपीय भाषाओं के रूटचार्ट में पैति-गम शब्द मिलता है मगर उन्होंने इसका रिश्ता न तो संस्कृत के प्रतिगम् से और न ही फ़ारसी के पैग़ाम जोड़ा, अलबत्ता एक अलग प्रविष्टि में पयाम ज़रूर दिया है । नूराई पैतिगम का अर्थ बताते हैं- निकलना ( संदेश के साथ ) ।  स्पष्ट है कि यह फ़ारसी पैग़ाम से पैतिगम का संदेशवाची रिश्ता जोड़ने का प्रयास है मगर  इससे कुछ पता नहीं चलता । यह ध्वनिसाम्य पर आधारित व्युत्पत्ति है । भारोपीय भाषाओं में पैर के लिए पेड ped तथा इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में इसका रूप पद् होता है । पद् से ही संस्कृत में पद, पदम्, पदकम् जैसे शब्द बनते हैं । अवेस्ता में भी पद का अर्थ पैर है । इसका एक अर्थ चतुर्थांश भी होता है । अंग्रेजी के फुट foot, ped, गोथिक के फोटस fotus, लैटिन के pes जैसे शब्दों में ये धातुरूप नज़र आते हैं । भारोपीय धातु पेड ped से बनने वाले शब्दों की लम्बी शृंखला है । गौर करें कि प्रतिगम में सिर्फ़ गति उभर रही है, साधन गौण है जबकि संदेशवाहक मूलतः सेवक है और इस आशय वाले शब्दों के मूल में पैदल चलना एक आवश्यक लक्षण है ।  प्यादा, हरकारा, प्यून, धावक, अनुचर, परिचर आदि शब्दों में चलना (पैदल) एक अनिवार्य ज़िम्मेदारी है ।
संस्कृत में पैदल चलने वाले को पादातिक / पदातिक कहते हैं । मूलतः इसमें अनुचर, सिपाही या संदेशवाहक का आशय है । हिन्दी की तत्सम शब्दावली में पदातिक रूप प्रचलित है । संस्कृत में इसका अन्य रूप पायिक भी होता है । मोनियर विलियम्स इसका अर्थ a footman , foot-soldier , peon बताते हैं । वे पायिक को पादातिक का ही संक्षिप्त रूप भी बताते हैं । पद में पैर और कदम दोनो भाव हैं । इससे बने पदक, पदकम् का अर्थ कदम, डग, एक पैर द्वारा चली गई दूरी है । पदक का प्राकृत रूप पअक  है जिससे इसका अगला रूप पग बनता है । हिन्दी की बोलियों में में पग-पग, पगे-पगे या पैग-पैग जैसे रूप भी चलते हैं । मीरां कहती हैं- “कोस कोस पर पहरा बैठ्या पैग पैग  बटमार।”  इसी तरह मलिक मुहम्मद जायसी लिखते हैं – “पैग पैग पर कुआँ बावरी । साजी बैठक और पाँवरी ।” हमारा मानना है कि पैगाम में यही पैग उभर रहा है । निश्चित ही फ़ारसी के पूर्व रूपों में भी पदक से पैग रूपान्तर हुआ होगा ।
बसे पहले पादातिक का पायिक रूप संस्कृत में ही तैयार हो गया था । मैकेन्जी के पहलवी कोश के मुताबिक फ़ारसी के पूर्वरूप पहलवी में यह पैग payg है । पायिक की तर्ज़ पर इसे पायिग भी उच्चारा जा सकता है, मगर पहलवी में यह पैग ही हुआ है । पायिक से बने पायक का अर्थ हिन्दी में  पैदल सैनिक, या हरकारा होता है । इसी ‘पैग’ से संदेश के अर्थ वाला पैगाम शब्द तैयार होता है । कोशों में पैगाम और नुक़ते वाला पैग़ाम दोनो रूप मिलते हैं । मद्दाह के कोश में नुक़ते वाला पैग़ाम है । गौर करें कि अवधी का पैग, फ़ारसी में पैक के रूप में मौजूद है जिसका अर्थ है चिट्टीरसाँ, दूत, पत्रवाहक, डाकिया, हरकारा, प्यादा या एलची । पैग, फ़ारसी में सिर्फ़ पै रह जाता है जिसका अर्थ पदचिह्न या पैर है । फ़ारसी में पै के साथ ‘पा’ भी है जैसे पापोश, पाए-तख्त या पाए-जामा (पाजामा), पाए-दान (पायदान) आदि ।
पैगाम से ही ईश्वरदूत की अर्थवत्ता वाला पैग़म्बर शब्द बनता है । आमतौर पर पैग़म्बर नाम से इस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद का बोध होता है । इंडो-ईरानी भाषाएँ बोलनेवाले समूहों में ईश्वरदूत, मुक्तिदाता के अर्थ में मुहम्मद के लिए पैग़म्बर शब्द रूढ़ हो गया । यूँ मूलतः इसमें संदेश लाने वाले का भाव ही है । दरअसल पैग़म्बर में वही अर्थवत्ता है जो हिन्दी के विभूति शब्द में है । दुनियseभर में जितनी भी विभूतियाँ पैदा हुई हैं, उनका दर्ज़ा ईश्वरदूत का ही रहा है । ग़लत राह पर चलते हुए कष्ट पाते मनुष्य को मुक्ति दिलाने के लिए समय समय पर ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने मानवता को राह दिखाई है । दुनिया ने ऐसे लोगों को ईश्वर का संदेश लाने वाले के तौर पैगम्बर माना । कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, मुहम्मद सब ईश्वरदूत, पथप्रदर्शक या धर्मप्रवर्तक थे । पैगम्बर शब्द बना है पैग़ाम में फ़ारसी का ‘बर’ उपसर्ग लगने से । मूलतः पैग़ाम में संदेश भिजवाने का भाव है । संदेश भिजवाने की अत्यन्य प्राचीन तकनीक पग-पग या पैग-पैग ही थी सो पैग़ाम में संदेश की अर्थवत्ता पग-पग चल कर गन्तव्य तक मन्तव्य पहुँचाने की क्रिया से उभर रही है ।
भारोपीय धातु इंडो-यूरोपीय धातु bher से जिसमें बोझ उठाना, या ढोना जैसे भाव हैं । संस्कृत में एक धातु है ‘भृ’ जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है मगर मोटे तौर पर उसमें संभालने, ले जाने, भार उठाने आदि का भाव है । इससे ही बना है भार शब्द जिसका अर्थ होता है वज़न, बोझ आदि । भार का एक रूप भर  है । यह वज़न की इकाई भी है । फ़ारसी में यह बर है जिसका आशय उठाना, ले जाना है । बर अपने आप में प्रत्यय है । पैग़ाम के साथ जुड़ कर इसमें “ले जाने वाला” का आशय पैदा हो जाता है । इस तरह पैग़ाम के साथ बर लगने से बनता है पैग़ाम-बर अर्थात संदेश ले जाने वाला । पैगामबर का ही रूप पैगंबर या पैगम्बर हुआ । पैग़म्बरी का अर्थ है पैग़म्बर होने का भाव या उसके जैसे काम । पैग़म्बरी यानी एक मुहिम जो इन्सानियत के रास्ते पर चलने को प्रेरित करे । इन्सानियत पर चलना ही ईश्वर प्राप्ति है । पैगम्बर भी डगर-डगर चल कर औरों के लिए राह बनाता है । सो पैगम्बर सिर्फ़ पैग़ाम लाने वाला नहीं बल्कि पैग-पैग चलाने वाला, पार उतारने वाला भी है । संदेशवाहक के लिए पैग़ामगुजार शब्द भी है ।
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5.
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Sunday, October 14, 2012

फिकिर का फाका

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चि न्ता या फ़िक्र जैसे शब्द बोलचाल की भाषा में सर्वाधिक इस्तेमाल होते हैं जिनके बिना अभिव्यक्ति अधूरी सी लगती है । इसमें चिन्ता हिन्दी की तत्सम शब्दावली का हिस्सा है जबकि फ़िक्र हिन्दी शब्द-सम्पदा के उस विदेशज भण्डार का मोती है जिसके फिकर, फिकिर जैसे रूप बोलचाल में प्रचलित हैं मगर परिनिष्ठित भाषा में फ़िक्र का ही प्रयोग ज्यादा होता है । आमतौर पर चिन्ता के अर्थ में फ़िक्र और फ़िक्र के अर्थ में चिन्ता शब्द का प्रयोग किया जाता है । जिस तरह चिन्ता को चिता समान कहा जाता है । वहीं कबीर कहते हैं कि फिकर आपको खा जाए, उससे पहले आप बेफ़िक्र हो जाइये- फिकिर सबको खा फिकिर सबका पीर । फिकिर का फाका करे, वाको नाम कबीर ।।
ममतौर पर फिक्र को चिन्ता का पर्याय समझा जाता है । किसी बात को लेकर मन की उत्कंठा, व्यग्रता, व्याकुलता, शोक या सोच-विचार की स्थिति को आमतौर पर फ़िक्र से अभिव्यक्त किया जाता है । फिक्र के हिन्दी रूप फिकर में आमतौर पर चिन्ता, व्यग्रता और आकुलता का भाव है । फिक्र मूलतः सामी धातु p-k-r (पे-काफ़-रा) से बना है । गौरतलब है कि सेमिटिक परिवार से जन्मी अरबी में ‘प’ ध्वनि नहीं है इसलिए अरबी की त्रिअक्षरी धातु में सेमिटिक ‘पे’ के स्थान पर अरेबिक का ‘फा’ है । सेमिटिक p-k-r या अरेबिक f-k-r में चिन्तन, विचार, ज्ञान, ध्यान, खयाल जैसे भाव हैं । इससे बने फ़क्कारा में चिन्तन-मनन का भाव है । फ़िक्र में उक्त तमाम आशय समाविष्ट हैं ।
वैसे चिन्ता के अतिरिक्त फ़िक्र की अर्थवत्ता काफ़ी व्यापक है । फिक्र में परवरिश का भाव है जैसे “उसे इन बेसहारा बच्चों की भी फ़िक्र करनी थी”, फ़िक्र यानी परवाह जैसे “सबकी देनदारी चुक जाए तो किसी चीज़ की फ़िक्र नहीं” आदि । फ़िक्र से कुछ अन्य शब्द भी बने हैं जैसे फ़ारसी का बे उपसर्ग जिसमें रहित का भाव है, लगने से बेफ़िक्र बनता है जिसका अर्थ है निश्चिन्त, स्थिर, शांत । बेफ़िक्र उस व्यक्ति को भी कहते हैं जिसे किसी किस्म की चिन्ता न हो या जो लापरवाह हो । बेफ़िक्री यानी निश्चिन्तता या बेपरवाही । इसका एक रूप बेफिकर भी है । चलती भाषा में में लापरवाह व्यक्ति को बेफिकरा भी कहा जाता है ।
फ़िक्र करना एक मुहावरा है जिसका अर्थ है ध्यान रखना, परवरिश करना, पालना, समाधान निकालना या ज़िम्मेदारी निभाना आदि । फ़ारसी का मन्द प्रत्यय लगने से फ़िक्रमन्द शब्द बनता है जिसका सामान्य अर्थ तो चिन्तित व्यक्ति से है मगर इसमें भी मुहावरेदार अर्थवत्ता है । फ़िक्रमन्द इन्सान वह भी है जिसे अपने दायित्वों का एहसास है, जो विचारशील है । इसके अलावा फ़िक्र में रहना यानी सोच-विचार में रहना । इसका रूढ़ अर्थ चिन्ता करना है । फ़िक्र में पड़ना का रूढ़ अर्थ भी चिन्तित हो जाना है, जिसमें अनिष्ट की आशंका या खटका होता है । फ़्रिक्र में पड़ना में उलझन में पड़ना, सोच-विचार में पड़ जाना भी है जिसमें किसी अनिष्ट की आशंका नहीं, मगर उलझाव ज़रूर है ।

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Thursday, October 11, 2012

सचमुच घनचक्कर था मेघदूत

cloudburst

नि दा फ़ाज़ली ने बरसात के बादल को उसकी आवारा सिफ़त के मद्देनज़र सिर्फ़ दीवाना क़रार देते हुए बरी कर दिया, शायद इसलिए कि वह नहीं जानता, "किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है ।" मगर कालीदास का मेघदूत तो यक़ीनन घनचक्कर ही था । ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि उसके अनेक नामों में एक घनचक्र से ज़ाहिर हो रहा है । बोलचाल की भाषा में इधर-उधर भटकने वाले, निठल्ले, आवारा मनुष्य को घनचक्कर की संज्ञा दी जाती है । इसकी अर्थवत्ता में बेकार, सुस्त, आलसी, बेवकूफ़, मूर्ख जैसे आशय भी शामिल हो गए । घनचक्कर में दरअसल मुहावरेदार अर्थवत्ता है । यह तो तय है कि इसका पहला पद तत्सम घन है और दूसरा पद चक्कर, तद्भव है जो तत्सम चक्र से बना है । ज़ाहिर है मूल रूप में यह घनचक्र है । हिन्दी कोशों में घनचक्र का रिश्ता घनचक्कर से तो जोड़ा गया है मगर इसकी व्युत्पत्तिक व्याख्या नहीं मिलती कि हिन्दी वाङ्मय में घनचक्र का क्या सन्दर्भ है । जॉन प्लैट्स जैसे हिन्दी के यूरोपीय अध्येताओं नें घन शब्द के अन्तर्गत घनचक्कर को तो रखा है मगर इसके व्यावहारिक प्रयोग के उदाहरण उनके यहाँ नहीं मिलते साथ ही वे घनचक्कर का रिश्ता घनचक्र से भी स्थापित नहीं करते । उसकी जगह वे घनचक्कर का अर्थ घूमते हुए आकार (A revolving body), चकरीनुमा यन्त्र (a Catherine-wheel) अथवा इसके रूढ़ अर्थ मंदमति, बुद्धू आदि बताते हैं । हिन्दी शब्दसागर में इसका अर्थ एक किस्म की आतिशबाजी भी मिलता है, मगर यह प्लैट्स के शब्दकोश से जस का तस ले लिया गया लगता है । शब्दों का सफ़र में देखते हैं घनचक्कर की घुमक्कड़ी ।
समें कोई संदेह नहीं कि घनचक्कर का मूल घनचक्र है मगर आज हिन्दी से घनचक्र गायब हो चुका है और इसकी जगह मुहावरेदार अर्थवत्ता वाला रूपान्तर घनचक्कर विराजमान है जिसका अर्थ मूर्ख, आवारा, गावदी, निठल्ला आदि है मुश्किल ये है कि यह अर्थवत्ता स्थापित कैसे हुई । हिन्दी की तुलना में घनचक्र शब्द का मराठी वाङ्मय संदर्भ मिलता है । घनचक्र का घणचक्र रूप भी मराठी में है जबकि घनचकर रूप मराठी के अतिरिक्त पंजाबी में भी है । यही नहीं, महाराष्ट्र में घनचकर उपनाम भी मिलता है । घनचक्र का संदर्भ सीधे सीधे बादलों की उमड़-घुमड़ से जुड़ता है । सोलहवीं सदी में श्रीधर स्वामी लिखित “शिवलीलामृत” में “होत युद्धाचे घनचक्र” में इसका संदर्भ आया है जिसका अर्थ है युद्ध के बादल । घनचक्कर में भटकन, यायावरी की अर्थवत्ता पहले स्थापित हुई । इसका घनचक्र अर्थात बादल से रिश्ता ही घुमक्कड़ी, भटकन और यायावरी से इसे जोड़ता है । बादल का प्रतीक सतत भटकन का आदि प्रतीक है । मेघदूत की मज़बूत मिसाल सामने है । आवारा बादल जैसे विशेषण बहुत आम हो चुके हैं । स्पष्ट है कि घनचक्र दरअसल बादल ही है न कि कोई मशीनी संरचना । चक्र का अर्थ किसी यान्त्रिक चक्र से नहीं बल्कि बादलों के वर्तुल से है । भटकन जब बिलावजह हो तो बेनतीजा रहती है । समाज में यूँ भी अकारण फिरने वाले को आवारा ही कहा जाता है । बादल इसीलिए आवारा कहलाते हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि कहाँ से गुज़रना है और कहाँ बरसना है । यानी अस्थिरता ही आवारा का मूल चरित्र है । जिसकी बुद्धि स्थिर न हो, वही घनचक्कर ।
नचक्कर शब्द कभी भी आतिशबाजी के अर्थ में हिन्दी में प्रचलित नहीं रहा । जॉन प्लैट्स के कोश में इसका एक अर्थ स्पष्ट रूप से कैथराईन व्हील दिया हुआ है । मध्यकाल में यूरोप में कैथराइन व्हील दुर्दान्त सज़ा देने वाला चकरीनुमा यन्त्र था । बाद के दौर में आतिशबाजी का जब विकास हुआ तो चकरीनुमा आतिबाजी को यूरोप में कैथराईन व्हील नाम दिया गया । भारत में भी जब यूरोपीय ढंग की आतिशबाजी आई तो कैथराइन व्हील को यहाँ चकरी के नाम से लोकप्रियता मिली । भरपूर तलाशने के बावजूद मुझे चकरीनुमा आतिशबाजी के लिए घनचक्कर पर्याय नहीं मिला । इंटरनेट पर जितने भी सन्दर्भ हैं, वे उन शब्दकोशों तक पहुँचाते हैं जिनकी सामग्री हिन्दी शब्दसागर से जस की तस ले ली गई है । ज़ाहिर है, जॉन प्लैट्स के कोश से जो सन्दर्भ शब्दसागर के सम्पादकों ने उठाया, उसका प्रसार अन्य शब्दकोशों तक हुआ मगर उसकी पुष्टि भारतीय वाङ्मय में नहीं की गई । घनचक्र में घन का आशय बादल से है न कि मशीनी घन से । घने काले श्यमवर्णी, एक दूसरे में समाते हुए , लगातार वर्तुल चक्रों में उमड़ते –घुमड़ते, और ज्यादा सघन होते, अपने भीतर के वाष्पकणों से संतृप्त  बरसने को आतुर बादल ही घनचक्र कहलाते हैं ।
नचक्र में बादलों की उमड़-घुमड़ साबित करने वाले अनेक तथ्य मराठी में मिलते हैं । इसके अतिरिक्त संस्कृत, हिन्दी में घन शब्द में भी बादल, मेघ का आशय प्रमुखता से है । बादलों के प्रतीक से ही घनचक्र में प्रचण्ड युद्ध, कठिन संघर्ष या भीषण टकराव का भाव भी उभरता है । कुल मिला कर घन चक्र में भीषण गर्जना के साथ मूसलाधार बारिश लाने वाले बादलों की चक्रगतियों का स्पष्ट संकेत है । संस्कृत के घन शब्द की व्युत्पत्ति हन् से मानी गई है जिसमें आघात, प्रहार, चोट जैसे भाव हैं । हन् से बने घन का अर्थ है ठोस, कठोर, मज़बूत, स्थिर, अटल, चुस्त, सुगठित जैसे भाव है । सघन, सघनता, घनत्व, घनता जैसे शब्द इसी घन से बने हैं । घन का अर्थ हथौड़ा या बेहद मज़बूत शिलाखण्ड से भी है जिसका उपयोग आक्रमण के लिए किया जाए । घनत्व के भाव को उजागर करने वाला शब्द घनघोर है । जैसे घनघोर जंगल, घनघोर अंधेरा, घनघोर बारिश, घनघोर पाप आदि । घनश्याम श्रीकृष्ण का लोकप्रिय नाम है जिसमें उनके मेघवर्णी रूप का संकेत है अर्थात ऐसा काला रंग जैसे कि बरसाती बादल होते हैं । बादलों का संकेत चातक, पपीहा जैसे पक्षी के घनताल नाम से भी मिलता है । पपीहा को घनतोल भी कहते हैं क्योंकि उसे बारिश का अंदाज़ हो जाता है । सबसे निकट का, पास का के अर्थ में घन से बने घनिष्ठ का प्रयोग भी हिन्दी में खूब होता है ।

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