मातृभाषा पर राजनीति
इस संदर्भ में एक तथ्य महत्वपूर्ण है। राजनीतिक कारणों से बीते दशकों में उर्दू को मातृभाषा घोषित करनेवाले मुस्लिम नागरिकों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। आज़ादी से पहले जो मुस्लिम हिन्दी या हिन्दुस्तानी को मातृभाषा लिखवाते थे, वे इसकी जगह उर्दू को यह दर्जा देने लगे। कश्मीर का मामला दिलचस्प है। वहां उर्दू को राजभाषा घोषित करने के बावजूद बहुसंख्यक लोग कश्मीरी को मातृभाषा लिखवाते हैं। मातृभाषा के क्षेत्र में राजनीतिक अध्ययन दिलचस्प साबित हो सकता है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पंजाब, तमिनाडु, आंध्रप्रदेश और बांग्लादेश जैसे
राज्यों के मुसलमानों में उर्दू को मातृभाषा लिखवाने की वृत्ति कितनी बढ़ी है, इस पर सामान्य शोध कराया जाए। इन सभी राज्यों की परिवेशगत भाषाएं वही हैं, जो इनका भौगोलिक और भाषायी नाम है। इन राज्यों में उर्दू का वैसा मज़बूत आधार नहीं है जैसा उत्तरप्रदेश, बिहार या दिल्ली में है। गुजरात का पारसी, फारसी न बोलकर ठाठ से गुजराती ही बोलता है। पर राजनीति इस अति अल्पसंख्यक तबके पर असर नहीं डालती। नेताओं के निशाने पर हमेशा मुस्लिम तबका रहा है। मातृभाषा-राष्ट्रभाषा-मातृभूमि-
मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मां शब्द प्रतीक स्वरूप हर किसी को समझ में आता है, वैसे ही मातृभाषा में भी मां का प्रतीक ही महत्वपूर्ण है। मातृभूमि, जन्मभूमि जैसे शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के विकल्प के तौर पर होता है। इनके प्रयोग पर कोई विवाद नहीं हैं बशर्त जन्मभूमि और जन्मस्थान के अर्थ में हम घालमेल न करें। इनमें फर्क है। हम चाहे तो तो दोनो शब्दों की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं, अन्यथा दोनों शब्दों में एक ही भाव है। मातृभूमि को राष्ट्र के अर्थ में भी समझा जाता है और जन्मभूमि को जन्मस्थान के संदर्भ में भी देखा जाता है। वाल्मीकि रामायण की यह प्रसिद्ध उक्ति “जननि जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” में जन्मभूमि का अभिप्राय व्यापक रूप में प्रांत, प्रदेश, राज्य, देश आदि से ही है। इन तमाम शब्दों का, आज के संदर्भ में अर्थ न लगाया जाए। आज इन शब्दों के मायने बदल गए हैं और अलग अलग प्रशासनिक-राजनीतिक विभाजनों मे इन्हें देखा जाता है। मगर इस व्याख्या में इनका अभिप्राय राष्ट्रीय पहचान से ही है। जन्मभूमि, मातृभूमि को वैश्विक संदर्भ में देखे तो भी यह साफ है। मातृभूमि का अर्थ हुआ-
1. स्वदेश, जहां के आप निवासी हैं। 2.आपके पुरखों की भूमि. 3. आपकी जातीय सांस्कृतिक पहचान वाला स्थान. 4. वह स्थान, जहां आप जन्में हैं.
एक उदाहरण-
मातृभाषा के संदर्भ में मिसाल के तौर पर मेरा जन्म मध्यप्रदेश के सीहोर में हुआ पर मेरी स्मृति में सीहोर नहीं है। राजगढ़ (ब्यावरा) में ही बचपन से युवावस्था तक का समय बिताया। महत्व राजगढ़ का ही है, क्योंकि उसी परिवेश में, मैं बड़ा हुआ हूं, जहां की भाषा हाड़ौती से प्रभावित मालवी है। इस क्षेत्र का भौगोलिक नाम उमठवाड़ है। यहां की बोली
मालवी कम, उमठवाड़ी ज्यादा कहलाती है। स्पष्ट है कि इसका मेरे व्यक्तित्व पर असर भी है भाषा और संस्कार दोनों स्तरों पर। सीहोर-राजगढ़ दोनों ही मालवांचल में आते हैं, इसलिए क्षेत्रीय पहचान के तौर पर मैं खुद को मालवी कहने में ज्यादा सुविधा महसूस करता हूं। इसके बावजूद मेरा खुद को मालवी कहना मातृभूमि के सवाल का जवाब नहीं है। मैं मुख्य सवाल से बच रहा हूं, घुमा रहा हूं। उपरोक्त वर्गीकरण के तहत देखें तो सिर्फ जन्म हो जाने भर से मेरा सीहोर से कोई भावनात्मक लगाव नहीं बनता। सीहोर मेरे सपने में नहीं आता, राजगढ़ आता है क्योंकि वह मेरे परिवेश का हिस्सा था। महाराष्ट्र जहां से मेरे पुरखे आए हैं और आकर ग्वालियर में बसे, वह ज़रूर मेरी मातृभूमि हो सकती है, क्योंकि पुरखों के द्वारा बोली जाने वाली मराठी भाषा और पृथक सांस्कृतिक पहचान के साथ ही मैं राजगढ़ में बड़ा हुआ। हमे मराठी कहा जाता है। हमारा परिचय महाराष्ट्रीय समूह के तौर पर दिया जाता है, सो तार्किक रूप में मेरी मातृभूमि महाराष्ट्र है, यह मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हैं। एकीकृत सांस्कृतिक पहचान
किन्तु यह दृष्टिकोण तब तक ही तर्कसंगत था जब तक भारत की पहचान भारतवर्ष के रूप में थी, जिसके अलग अलग हिस्से स्वायत्त पहचान रखते थे, तब स्वदेशी पहचान का अर्थ या मातृभूमि का अर्थ वही था जिसकी विवेचना ऊपर की है। मगर आज जब भौगोलिक परिभाषाएँ बदल चुकी है, वैश्विक परिदृष्य बदल चुका है, तब व्यापक अर्थ में मेरी मातृभूमि भी भारत ही कहलाएगी, अलबत्ता जन्मभूमि सीहोर है। मेरी सांस्कृतिक पहचान भारत भूमि की एकीकृत सांस्कृतिक पहचान से जुड़ेगी। मेरा महाराष्ट्रीय होना महत्वपूर्ण तब है जब महाराष्ट्रवासी महाराष्ट्रीय बंधु उदार हृदय से मुझे मराठी मानें। वे ऐसा नहीं करते हैं। यह अनुभव मुझे हो चुका है। शायद अन्य भाषा-भाषी बधुओं को भी हुआ हो जो बरसों पहले अपनी जड़ों से उखड़ कर हिन्दी या अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों में जा बसे हैं। अलबत्ता उत्तर भारत के जिन हिस्सों में हम पले बढ़े हैं, अगर हिन्दी भाषी संस्कारों के बावजूद मेरे नाम के साथ जुड़े वडनेरकर के चलते, मुझे मराठी समझा जाता है तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि इस विशाल क्षेत्र ने मराठियों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है, उल्टे कई मामलो में सहर्ष हमारी संस्कृति को यहा सराहना मिली है। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को जब तक हम और हमारी पीढ़ियां कायम रख पाते हैं, तब तक मुझे खुद को मराठीभाषी या मराठी कहने मे कोई परेशानी नहीं है। मगर यह भी कहूंगा कि हमारी संस्कृति हिन्दी क्षेत्रों में चाहे अलग पहचानी जाती हो, मगर हमारे आचार व्यवहार अब वैसे नहीं रह गए हैं जैसे मूल महाराष्ट्रवासियों के हैं। आचार-व्यवहार का यही फर्क पुणे-नागपुर में थोड़ा सा वक्त गुजारने पर साफ समझ में आता है। ऐसे में वे भेदभाव के दोषी भी नहीं कहे जा सकते। अलबत्ता यह साफ है कि मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मातृ शब्द मूल पहचान से जुड़ा है, उस पर ही इस शब्द पर विचार करते समय गौर करना चाहिए। इस मूल पहचान का हमारे वर्तमान से कितना रिश्ता है।
-अगली कड़ी अंतिम
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