Wednesday, November 18, 2009

क़स्बे का कसाई और क़स्साब [आश्रय-22]

2279944033_9cdb19c499_o पिछली कड़ियां-मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21] कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20] सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19] जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]

रि हाइश के लिए मनुष्य सबसे पहले किसी स्थान का चयन करता है। वहां कोई आश्रय बनाता है जिसमें मुख्यतः निर्माण के नाम पर चाहरदीवारी और छप्पर ही खास होता है। सभ्यता के विकास के साथ आश्रयों की निर्माण तकनीक और बसाहट में परिष्कार हुआ। सुव्यवस्थित आशियाने बनें और उनके समूह को धीरे-धीरे बस्ती का रूप मिलता गया। किसी सामूहिक रिहाइश के लिए आज बस्ती, पुर, कटरा, कस्बा, मोहल्ला, नगर, किला, मण्डी, सराय, शहर, गंज, सिटी और शहर जैसे अनेक नाम मिलते हैं। दिलचस्प यह कि ये सभी नाम किसी वक्त सिर्फ छप्पर और चहादीवारी से बनी एक आवासीय इकाई भर थे। बाद में सामूहिक बसाहटों के नाम भी इन्हीं से बनते चले गए। भारत में क़स्बा qasba एक आम शब्द है। गांव से कुछ बड़े और नगर से छोटी बसाहट को क़स्बा कहा जाता है। ज़िला या तहसील जैसी कोई प्रशासनिक परिभाषा के दायरे में क़स्बा नहीं आता यह अपने आप में एक ऐसी बसाहट होती है जिसमें नगरोन्मुखी संस्कार होता है। क़स्बा मूलतः सेमिटिक शब्द है और इसकी अर्थवत्ता व्यापक है। इसका अरबी रूप qasbah होता है।
क़स्बा बना है अरबी की क़स्ब qasb धातु से जिसमें काटना, आघात करना, जिबह करना, खोखला करना, पृथक करना, आंत, बांस, वंशी, सरकण्डा, नरकुल, पाईप, पानी का नल, नहर, एक्सल, अक्षदण्ड, आधार स्तम्भ, क़िला, कोठी जैसे अर्थ निहित हैं। इन सभी अर्थों पर गौर करें तो क़स्ब में खोखला, रिक्त या खाली स्थान का भाव उभरता है। खोखलेपन का यही भाव बांसुरी, बांस में विस्तारित हुआ। जानवरों को जिबह करने के बाद उनके आंतरिक अंगों को निकालने के बाद सिर्फ img_1233खाल की खोखल ही बचती है जिसमें भूसा भर कर मृत जीवों के वास्तविक मॉडल बनाए जाते थे। पुराने ज़माने में पशुओं की खाल से तम्बू, शामियाने बनाए जाते थे। आश्रय निर्माण की प्राचीन तकनीक पहाड़ी कोटरों को चौड़ा कर, काट छांट कर रहने योग्य बनाने की ही थी। कहने का मतलब यह कि चारों और से घिरे, सुरक्षित रिक्त स्थान का भाव ही कस्ब में मुख्यतः है जो इसे आश्रय से जोड़ता है।
यूं काटने, आघात करने जैसे भावों का विस्तार जिबह करने में हुआ। उर्दू का क़साई शब्द इसी मूल से निकला है। क़स्ब से बना क़साब Kasab या क़स्साब Qassab / Kassab जिसका मतलब है पशुओं को जिबह करनेवाला, खाल उतारनेवाला। इस वर्ग के लिए पूर्वी प्रांतों जैसे बिहार, बंगाल में बक्र-कसाब यानी बकरा जिबह करनेवाला शब्द भी है। हिन्दुओं में खटीक या खटिक जाति होती है जो अति पिछड़े और निम्न वर्ग में आती है। मूलतः ये लोग मांस का धंधा करते हैं। बक्र-कसाब की तरह इनके लिए भी हिन्दी शब्दसागर में बकर खटीक शब्द मिलता है। खटीक शब्द संस्कृत के खट्टिकः से बना है। इसमें शिकारी का भाव है। शिकार के लिए आखेट इसी मूल से आ रहा है। हिन्दी में शिकारी को अहेरी कहते हैं जो आखेटकः से बना है और आखेटकः > आखेड़क > आहेड़अ > आहेड़ा > अहेरी के क्रम में रूपांतरित हुआ।
क़स्ब धातु में निहित काटने, पृथक करने के भाव की व्याख्या कुछ विद्वान एक किले की संरचना में देखते हैं। उनके मुताबिक क़स्बा यानी किले की ऊंची दीवारे उसे शेष इलाके से काटती हैं, पृथक करती है, इसीलिए गढ़ी या दुर्ग के लिए अरबी में क़स्बा नाम पड़ा।  किले की दीवार को भी फ़सील इसलिए कहते हैं क्योंकि यह वीराने और आबादी में फ़ासला बताती है। फ़सील और फ़ासला एक ही मूल से जन्मे हैं। यह भी माना जा सकता है कि क़ला (किला) या मोहल्ला की तरह क़स्बा भी किसी ज़माने में फौजी पड़ाव रहा होगा। गढ़ी या दुर्ग के बाहर भी खेमे लगते होंगे और उन्हें भी कस्बे की अर्थवत्ता मिली होगी। बाद में जब दुर्ग-नगर को नया नाम मिला तब भी इस बस्ती की पहचान कस्बा के रूप में सुरक्षित रही। ठीक वैसे ही जैसे कई शहरों में छावनी, पड़ाव, कैंट जैसी आबादिया मिलती हैं। खेमों से कस्बा का सादृष्य क़स्ब धातु में निहित अर्थ आधार-स्तम्भ या अक्षदण्ड से उभरता है। किसी भी निर्माण के लिए आधारस्तम्भ का होना बहुत ज़रूरी है। तम्बू का आधार एक मुख्य स्तम्भ ही होता है। अरबी स्थापत्य कला में मीनारों का स्थान महत्वपूर्ण है। किसी मीनार के बीचोबीच जिस मुख्य स्तम्भ या पोले पाईप के सहारे सीढ़ियां ऊपर जाती हैं, उसे भी क़स्बा ही कहते हैं। ये सभी संदर्भ तार्किक और प्रामाणिक है। पर्वतीय गुफा को चौड़ा करते हुए भी उसमें आधार-स्तम्भ बनाना आवश्यकत होता था वर्ना छत के ढहने का खतरा था।
क़स्बा के जो प्रचलित अर्थ शब्दकोशों में मिलते हैं, जैसे गांव से बड़ी बसाहट, छोटा शहर, बड़ी बस्ती वगैरह, वह दरअसल दुर्ग-नगर वाले अर्थ का विस्तार है। क़स्बा किसी ज़माने में दुर्ग था। उससे भी पहले सिर्फ पहाड़ी आश्रय था। बाद में इसमें दुर्ग-नगर की अर्थवत्ता ग्रहण की क्योंकि यह छोटी आबादी ही होती है। प्रसिद्ध दुर्गों के नाम वाली बस्तियां बाद में उन्हीं के नामों से प्रसिद्ध हो गईं जैसे पठानकोट, सियालकोट, कोट्टायम, कोटा और दुर्ग आदि। मगर ये अब बड़े शहरों में तब्दील हो चुके हैं। जाहिर है कि दुर्ग के भीतर की बसाहट हमेशा सीमित होती है। आबादी का विस्तार परकोटे से बाहर जब होता है तब दुर्ग-नगर क़स्बा के स्थान पर नगर या शहर कहलाता है। क़स्बा का दुर्ग-नगर वाला अर्थ बाद में उन सभी छोटी आबादियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा जहां दुर्ग का अस्तित्व नहीं था। एशिया के कई शहरों में कस्बा नाम की बस्तियां हैं। मध्यप्रदेश के सीहोर में कस्बा बस्ती है। कोलकाता का एक उपनगर क़स्बा ही कहलाता है। अरब में अल-कस्बाह नाम की कई आबादियां है। मलेशिया में जॉर्जकस्बा नाम का एक पर्यटन स्थल है। स्पेन में एक जगह है अल्काज्बा या अल्काज्वा। जाहिर है यह अरबी के अल-कस्बाह का ही रूपांतर है। आज का कस्बा अपनी आबादी के लिए कम और मानसिकता के लिए अधिक जाना जाता है। कस्बे की संकुचित सीमाओं का बयान ही कस्बाई मानसिकता मुहावरे में भी झलक रहा है जिसका अर्थ होता है छोटी, संकुचित या अपरिष्कृत सोच होना।

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Tuesday, November 17, 2009

मांझे की सुताई

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मांझा की मज़बूती के बिना न तो पतंग ऊंची उड़ेगी और न ही तगड़े पेच लड़ेंगे।
कि सी कार्य में सिद्धहस्त और निष्णात व्यक्ति को मंजा हुआ कहा जाता है। किसी कला में पारंगत होने के लिए  व्यक्ति को अभ्यास के जरिये उसे मांजना पड़ता है। जिस मांजना शब्द का मुहावरेदार प्रयोग यहां हो रहा है उसका प्रयोग ही बर्तन मांजने में भी होता है। दरअसल अभ्यास, परिष्कार के संदर्भ में मांजना शब्द का मूल अर्थ है चमकाना या निखारना। संस्कृत के मार्जः शब्द से हिन्दी में कई शब्द बने हैं जिन्हें हम आए दिन इन्हीं अर्थों में प्रयोग करते हैं।  मार्जः बना है मृज् धातु से जिसमें धोना, पोंछना, साफ करना, बुहारना जैसे भाव निहित हैं। आप्टे कोश के मुताबिक मार्जः का अर्थ स्वच्छ करना, निर्मल करना है। विष्णु का एक विशेषण भी मार्जः है। सुबह उठकर दांतों को साफ़ करने की क्रिया को दांत मांजना या मंजन करना कहते हैं। यह मार्जन से बना है जिसमें शरीर पर उबटन लगाना, रगड़ कर पोंछना के साथ साथ बुहारना भी शामिल है। टूथपेस्ट और टूथपाऊडर को मंजन कहा जाता है अर्थात दांत साफ करने की ओषधि। किसी कला, क्रिया अथवा व्यवहार में परिष्करण के अर्थ में परिमार्जन शब्द का हिन्दी में खूब प्रयोग होता है जो इसी मूल से आ रहा है।
मार्जः से एक और शब्द भी बना है मांझा जो हिन्दी के सभी रूपों और शैलियों में एक समान जाना जाता है। पतंग जिस सहारे पर आसमान में उड़ती है वह जाहिर है डोर होती है। यह डोर सामान्य डोर न होकर खास किस्म के अवलेह यानी लेई से आवेष्टित या लिपटी रहती है। सूखने पर यह लेई डोर को मज़बूती प्रदान करती है। इसी डोर को मांझा कहा जाता है। डोर की विशेष किस्म के लेपन से सुताई होती है अर्थात उसकी मंझाई होती है ताकि वह मज़बूत हो सके। यह manjhaमांझना शब्द भी मार्जः शब्द से ही आ रहा है। इसका अभिप्राय भी वही है जो ऊपर उल्लेखित मांजना का है अर्थात रगड़ना, चिकना करना आदि। सूतना यानी सूत्रण अर्थात धागा अथवा सूत बनाना। जाहिर है सूतना क्रिया किसी रस्सी की बटाई और उसे मज़बूती देने की क्रिया के अर्थ में इस्तेमाल हो रहा है। पतंग के पेच लड़ाने में मांझे की मज़बूती बहुत ज़रूरी है। ये सभी अर्थ यहां सिद्ध हो रहे हैं।

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Monday, November 16, 2009

भरी जवानी, मांझा ढीला [मध्यस्थ-4]

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ती र्थंकर, ऋषि या सन्त के अर्थ में मुनि शब्द हिन्दी के प्रचलित शब्दों में शुमार है। मुनि का अर्थ होता है महात्मा, सन्त, महर्षि, सन्यासी आदि। मुनि शब्द बना है मन् धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है और इसका प्रसार भारोपीय परिवार की कई भाषाओं में हुआ है। उसकी चर्चा फिर कभी, फिलहाल मुनि की बात जिसमें धर्मपुरुष, चिन्तक, विचारक के भाव भी निहित हैं। मन् का अर्थ होता है सोच-विचार करना, पूजा-आराधना करना, विश्वास, कामना, चिन्तन, देखना, आदर आदि करना। चित्त, हृदय के अर्थ में हिन्दी का मन शब्द भी इसी मूल का है। इस तरह प्रकारांतर से मुनि शब्द में विचारक, चिन्तक, दार्शनिक, ध्यानी, तपस्वी जैसे अर्थ भी स्थापित हुए। यह भी समझा जाता है कि मुनि का रिश्ता मौन शब्द से है। यह इसी मूल का शब्द है। मन् में निहित विचार, चिन्तन जैसे भावों से स्पष्ट है कि व्यक्ति जब चुप रहता है तभी सोचता है, सो मौन से मुनि का रिश्ता सही है। मुनि अपनी तपश्चर्या करते हुए अधिकांश समय मौन-साधना में ही व्यतीत करते है। संस्कृत में मौनिन् शब्द है जिसका अर्थ हुआ चुप रहने की साधना पर अडिग सन्यासी। मुनि अथवा साधु। आप्टेकोश में मौन की व्युत्पत्ति मुनेर्भावः बताई गई है। मुनि से बने शब्दों में मुनिवर, मुनीश, मुनीश्वर जैसे शब्द भी हैं।
alhbdblog 019न् धातु से ही बना है मध्य शब्द जिसका प्रचलित अर्थ है बीच का। यह बीच दरअसल किन्ही दो बिन्दुओं के दरमियान होता है इसलिए इसमें अंदर वाला भाव भी शामिल है। मन अर्थात चित्त की स्थिति शरीर के भीतर समझी जाती है। वैसे भी मन की सत्ता भौतिक कम, आध्यात्मिक अधिक है। जो कुछ भी गूढ़, अबूझ है वह सब आभ्यंतर का विषय है। स्थूल, दृष्यमान और ज्ञात की स्थिति बाह्य मानी जाती है। सो मन, अंदर का विषय है इसलिए इससे बने मध्य में भीतर का भाव भी निहित है। संस्कृत के मध्य का अर्थ बीच का, मध्यवर्ती होता है। मध्यस्थ का अर्थ हुआ जो मध्य में स्थित हो। व्यक्ति या पदनाम के अर्थ में मध्यस्थ निश्चित तौर पर न्यायकर्ता, पंच या प्रधान की जगह पर विराजमान नज़र आता है। तराजू पर गौर करें। उसका संतुलन भी मध्य में ही स्थित होता है। शरीर का आधार मुख्यत पैर हैं, पर संतुलन कमर से ही कायम होता है। इसीलिए उसे मांझा कहा जाता है। मध्यस्थ बिचौलिया भी है। दलाल भी है और ब्रोकर भी। नाविक भी नाव का मुखिया होता है, इसलिए उसे मांझी कहा जाता है।
प्राकृत में मध्य (मध्यम) से मज्झम, मज्झियम, मज्झिम जैसे रूप बनते हैं जिनसे हिन्दी में माँझा, मँझा जैसे शब्द बने। नदी के कछार, तटवर्ती या दोआब का रेतीला इलाका। पंजाब के एक क्षेत्र को माझा कहा जाता है। पंजाब नाम से जाहिर है, Punjabdoabs यह पज+आब अर्थात पांच नदियों रावी, चनाब, सतलुज, व्यास और झेलम का क्षेत्र है, इसीलिए इसे प्राचीन काल में पंचनद कहा जाता था। नदियों के बीच पड़नेवाले क्षेत्र को मांझा (माझा) कहा जाता है। पंजाब में  व्यास और सतलज के बीच का क्षेत्र माझा कहलाता है। मध्य में कटिप्रदेश यानी कमर का हिस्सा, पेट, नितंब, कूल्हा आदि भी होता है। मांझा शब्द में कटि प्रदेश का अर्थ भरी जवानी, ढीला मांझा वाली कहावत से स्पष्ट होता है। यहां मांझा का अर्थ पतली कमर से है। गौरतलब है पतली कमर पर अक्सर वस्त्र ढीले ही रह जाते हैं मांझा ढीला रहता है। बीच की संतान को मंझला या मंझली कहा जाता है। माध्यमिक यानी मध्यम दर्जे का, किसी विकल्प या जरिया के लिए माध्यम, बीच की उंगली के लिए मध्यमा जैसे शब्द इसी मूल से उपजे हैं। दोपहर को सूर्य ठीक सिर के ऊपर यानी आसमान के बीचोंबीच होता है इसलिए परिनिष्ठित हिन्दी में दोपहर के लिए मध्याह्न शब्द चलता है।

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Sunday, November 15, 2009

मियां बराक, ब्रोकर और डीलर [मध्यस्थ-3]

barack_obama_cartoon पिछली कड़ियां-1.मियां करे दलाली, ऊपर से दलील!![मध्यस्थ-2]2.मियांगीरी मत करो मियां [मध्यस्थ-1]

ध्यस्थ के लिए प्रचलित दलाल के लिए अंग्रेजी में ब्रोकर शब्द है। इससे ही मिलता जुलता शब्द है डीलर। गौर करें कि हिन्दी के मध्यस्थ और फारसी के मियांजी शब्दों को अगर छोड़ दिया जाए तो दलाल, बिचौलिया, डीलर, ब्रोकर जैसे तमाम शब्दों का रिश्ता कारोबार या सौदेबाजी से ही जुड़ रहा है। अंग्रेजी के ब्रोकर और डीलर शब्द भी भारतीय भाषाओं में बोले-समझे जाते हैं। डीलर, डीलिंग, डील, स्टॉकडीलर, डीलरशिप, शेयरब्रोकर, स्टॉकब्रोकर, स्टॉक एक्सचेंज, स्टॉकिस्ट, स्टॉक मार्केट जैसे शब्दों का प्रयोग बोलचाल की हिन्दी में खूब होता है। समानार्थी शब्दों पर गौर करें तो पता चलता है कि शब्द निर्माण की प्रवृत्ति अलग-अलग भाषाओं में भी एक सी ही रहती है। दलाल शब्द में छोटे दुकानदार, रिटेलर, खुदरा व्यापारी का जो भाव है वही भाव अंग्रेजी के डीलर और ब्रोकर में भी है। हालांकि इन सभी शब्दों का अर्थ मोटे तौर पर कमीशन एजेंट ही है। इन सभी शब्दों की मूल धातु पर अगर गौर करें तो पता चलता है कि इनमें अंश, टुकड़ा, काटना, विस्तारित करना जैसे भाव समाहित है। खुदरा व्यापारी या फुटकर दुकानदार थोक में सामग्री खरीदता है और फिर उसे कई हिस्सों में बांटता है। विभाजित करने की यह प्रक्रिया एक तरह से उस वस्तु का विस्तार ही है। खुदरा शब्द हिन्दी में फारसी से आया। मूलतः यह संस्कृत के क्षुद्र का रूपांतर है जिसका अर्थ होता है अत्यंत छोटा अंश, कम, तुच्छ यानी छोटी वस्तु, लघु इकाई, टुकड़ा आदि। क्षुद्र से फारसी में बना खुर्द जिसमें यही सारे भाव हैं। गौर करें खुर्दबीन यानी सूक्ष्मदर्शी पर। फारसी के खुर्द का हिन्दी में वर्ण विपर्यय हुआ और बन गया खुदरा। खुदरा व्यापारी का अर्थ हुआ छोटा किरानी, फुटकर सामान बेचनेवाला।
ब्रोकर शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में अलग-अलग मत हैं।  ब्रोकर broker एंग्लो-नार्मन brocour या abrocour शब्द का रूपांतर है जिसका अर्थ होता है छोटा व्यापारी, रिटेलर, किरानी, दुकानदार आदि। मूलतः यह वल्गर लैटिन के brocca से रूपांतरित हुआ है जिसका अर्थ होता है नुकीली सलाई, सलाख, छेदना, टुकड़े करना आदि। एक अन्य मत के अनुसार ब्रोकर शब्द स्पैनिश के alboroque का रूपांतर है। अमेरिकन हैरिटेज डिक्शनरी के
dealerअंग्रेजी का ब्रोकर शब्द मूलतः अरबी मूल का है जहां से वह स्पैनी भाषा में पहुंचा
अनुसार इसका अर्थ किसी व्यावसायिक सौदे के सम्पन्न होने की खुशी में होने वाला जलसा या इस मौके पर सौदे के निमित्त दिया जाने वाला उपहार है। इसमें एक मध्यस्थ नज़र आ रहा है, जो सौदा कराने की एवज में उपहार या पारितोषिक प्राप्त करता है। यह दलाल या ब्रोकर है। यूरोप में ब्रोकर शब्द के साथ एक पारम्परिक रस्म यूं ही नहीं जुड़ गई। इस शब्द के अरबी मूल में शुभप्रसंग और मंगलकामना का भाव पहले से विद्यमान है।
स्पैनिश का alboroque दरअसल मूल अरबी शब्द है। गौरतलब है कि मध्यकाल में अरबों ने समूचे भूमध्यसागरीय क्षेत्र पर अपना दबदबा कायम किया था और तब की महाशक्ति स्पेन का एक बड़ा हिस्सा अरबी उपनिवेश था। स्पेन की भाषा-संस्कृति पर अरबों का बहुत गहरा असर है। अरबी शब्द al-baraka (या al-barack) का बना है सेमिटिक धातु b-r-k (बा-रा-काफ) से जिसका अर्थ होता है आशीर्वाद देना, प्रशंसा करना, उपकृत करना, धन्य करना आदि। अरबी के अलावा हिब्रू में भी यह धातु है। al-baraka में भी यही भाव हैं। समृद्धि, वृद्धि या खुशहाली के अर्थ में हिन्दी में इसी मूल से बना बरक्कत शब्द प्रचलित है। मांगलिक अवसरों पर शुभकामना देने के लिए अक्सर मुबारकबाद दी जाती है। यह मुबारक भी इसी मूल से आ रहा है और बराक में मु उपसर्ग लगने से बना है। जाहिर है बराक का अर्थ हुआ शक्तिशाली, विशिष्ट, मांगलिक, समृद्ध आदि। अमेरिका के राष्ट्रपति के नाम के पहले चरण में जो बराक शब्द है वह इसी मूल का है। इस नाम के महत्व को विश्व में इस महाशक्ति की विशिष्ट भूमिका के संदर्भ में देखें तो अल-बराक शब्द से रूपांतरित ब्रोकर शब्द और भी अर्थवान नज़र आता है। दुनियाभर के इस स्वयंभू पंच की सौदागरी को ध्यान में रख कर आप मध्यस्थ, दलाल, ब्रोकर या डीलर क्या कहना चाहेंगे? चाहें तो अंकल सैम की तर्ज पर अमेरिका के लिए मियां सैम विशेषण भी चला सकते हैं।
ब आते हैं डीलर शब्द पर। यह प्रोटो-इंडो यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है और अंग्रेजी के डील से बना है। इसका मतलब है सौदा, हिस्सा, अंश, मात्रा या परिमाण जिनमें अंततः बंटवारा, विभाजन का ही भाव है। इसके अलावा इसमें न्याय करने का भाव भी है। किसी भी किस्म का बंटवारा या विभाजन एक सुलझाव है। इसे न्याय कहना भी तार्किक है। जाहिर है डीलर शब्द का अर्थ हुआ छोटा दुकानदार, सौदेबाज, कमीशन एजेंट आदि। यह बना है पोस्ट जर्मनिक के डैलाज़ dailaz से। लिथुआनी में इसका रूप होता है dalis, डच में यह deel के रूप में उपस्थित है। मूलतः ये सभी शब्द dal जर्मनिक धातु dailiz से निकले हैं। प्रख्यात भाषाविद् जूलियस पकोर्नी के मुताबिक इसकी रिश्तेदारी भारोपीय धातु दा (?) से है। हमारा मानना है कि यह संस्कृत की दल् धातु से मिलती-जुलती होनी चाहिए जिसमें विभक्त होना, विस्तारित होना, फैलना, तोड़ना, ढेर बनाना आदि भाव हैं।  हिस्सा, अंश या विभाजन के रूप में डील की तुलना संस्कृत के दलम् शब्द से करें। दल में बंटवारे का भाव स्पष्ट है। किसी वस्तु को महीन करना, खण्ड खण्ड करना, तोड़ना, पीसना, जैसे भाव दल में हैं। दल से हिन्दी के कई शब्द बने हैं। दलित, दलन, दलना, दलिया, दलगत, दलीय, दल-बदल आदि। राजनीतिक पार्टी के लिए दल शब्द बहुचर्चित है। दलपत एक व्यक्तिनाम है। इसका मूल रूप है दलपति अर्थात किसी समूह या धड़े का स्वामी। अरबी के दलाल में, फारसी के मियांजी में और जर्मनिक के dailiz में समाए न्यायकर्ता के भाव से दलपति की अर्थवत्ता का मिलान करना दिलचस्प होगा। अंग्रेजी के डीलर और अरबी के दलाल शब्द को हिन्दी के दल शब्द की छाया में तौल कर देखें तो एकरूपता दिखाई पड़ती है। ऐसा लगता है सेमिटिक परिवार के दलाल शब्द का रिश्ता भी सस्कृत के दल शब्द से निकले किन्ही शब्दरूपों से रहा होगा।  -जारी
ये कड़ियां ज़रूर देखें- 

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  • पामीर खुर्द से चीन कलां तक...[क्षुद्र-5]
  • बाटला खुर्द से देहली खुर्द तक...[क्षुद्र-4]
  • बेईमानी-साजिश की बू है खुर्दबुर्द में [क्षुद्र-3]
  • छुटकू की खुर्दबीन और खुदाई [क्षुद्र-2]
  • खुदरा बेचो, खुदरा खरीदो [क्षुद्र-1]

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    Saturday, November 14, 2009

    मियां करे दलाली, ऊपर से दलील!![मध्यस्थ-2]

    broker1 …मध्यस्थता की कीमत अगर कोई वसूलता है तब वह परोपकारी नहीं बल्कि दलाल ही कहलाता है…
    पिछली कड़ी-मियांगीरी मत करो मियां [मध्यस्थ-1]
    ध्यस्थ व्यक्ति के लिए समाज में हमेशा से सम्मान का भाव रहा है। मध्यस्थ की भूमिका पथप्रदर्शक, रहनुमा की होती है। गुरु, स्वामी, पीर आदि आध्यात्मिक पुरुष सामान्यजन के लिए ईश्वर प्राप्ति का जरिया होते हैं अर्थात वे मध्यस्थ का किरदार निभाते हैं। हिन्दी में मध्यस्थ के लिए बिचौलिया जैसा शब्द भी प्रचलित है जिसका इस्तेमाल नकारात्मक अर्थ में होता है। आमतौर पर बिचौलिया से अभिप्राय दलाल से है। दलाल यानी ब्रोकर। दो लोगों के बीच सौदा कराने की एवज में अर्थलाभ पाने वाला व्यक्ति। फारसी में मियां या मियांजी का अर्थ भी मध्यस्थ ही होता है। इसका जन्म भी इंडो-ईरानी परिवार की भाषा अवेस्ता के मदिया (संस्कृत में मध्य) शब्द से हुआ है। ध्यान दें कि मियां जी का रुतबा इसीलिए है क्योंकि वे बिना किसी स्वार्थ के समाज के बीच जाकर लोगों की परेशानियां दूर कर रहे हैं। समाज में प्रभावशाली व्यक्तियों, संतों, नेताओं, अधिकारियों, बुजुर्गों, वरिष्ठों से हमेशा निष्पक्ष और निस्वार्थ सेवा की उम्मीद की जाती है। अगर इसमें स्वार्थ का तत्व पनपता है तो वह व्यक्ति मियां यानी आदरणीय से दलाल की श्रेणी में आ जाता है।
    लाल शब्द अरबी का है और इसकी व्युत्पत्ति सेमिटिक धातु द-ल-ल (d-l-l) से हुई है। इस धातु की बहुआयामी अर्थवत्ता है मगर मुख्यत मध्यस्थ का ही भाव है। दलाल का मतलब होता है छोटा कारोबारी, दुकानदार, खोमचा-थड़ीवाला। रिटेलर या खुदरा व्यवसायी दरअसल उत्पादनकर्ता और उपभोक्ता के बीच की कड़ी ही होता है। कमीशन एजेंट के रूप में दलाल शब्द की व्याप्ति हिन्दी में ज्यादा है। अरबी में नीलामकर्ता को भी दलाल कहा जाता है क्योंकि नीलामी की एवज में वह धन प्राप्त करता है। किसी भी किस्म के व्यापारिक सौदे कराने में दलाल की भूमिका महत्वपूर्ण  होती है। मोटे तौर पर दलाल एक एजेंट होता है जो विक्रेता या खरीददार की ओर से सौदा सम्पन्न कराता है। सौदे का दायरा राजनीतिक सीमाओं को भी छूता है । बाजार का दलाल खुलेआम काम करता है जबकि राजनीति का दलाल करता दलाली है पर खुद को दलाल कहलवाना नहीं चाहता। दलाल शब्द का प्रयोग भारतीय राजनीति में बीते कुछ दशकों से खूब होने लगा है और यह राजनीतिक प्रदूषण का प्रतीक भी बन गया है। दो व्यक्तियों या समूहों के बीच मामला तय कराना vic1ही दलाल कर्म है जिसके बदले उसे कुछ लाभ प्राप्त होता है जो आर्थिक भी हो सकता है और किसी अन्य रूप में भी। इसे ही दलाली कहा जाता है। व्यापारिक कर्म होने से गुजरात के एक वैश्य समुदाय में दलाल उपनाम प्रचलित है। हरियाणा के जाटों में भी दलाल सरनेम मिलता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे पारसियों में व्यवसाय आधारित उपनाम होते हैं जैसे मर्चेंट। गुजराती के एक प्रसिद्ध लेखक हुए हैं-गुलाबदास ब्रोकर। जाहिर है इनके पुरखों का व्यवसाय दलाली रहा होगा, जिसकी वजह से इनके कुटुम्ब में ब्रोकर नाम प्रचलित हुआ।
    लाली को समाज में आमतौर पर सम्मानजनक नहीं समझा जाता, मगर आज की कारोबारी व्यवस्था में यह बहुत अनिवार्य है। अरबी में भी दलाल शब्द को अच्छा नहीं माना जाता और किन्हीं संदर्भों में स्त्री या पुरुष की एक दूसरे से वासनामय ठिठोली भी इस शब्द के दायरे में आती है। दलाल से बना दल्ला शब्द हिन्दी में बेहद असम्मानजनक संबोधन है। अरबी में दल्ला का अर्थ तरबूज़ भी होता है। दल्ला वह है जो स्त्रियों के देहव्यापार में लिप्त है। रूपजीवाओं की आय पर गुजारा करनेवाले को भी दल्ला कहा जाता है। मुस्लिम शासनकाल में जब धनाढ्यों के विलास के लिए खूबसूरती के बाजार में बड़े बड़े सौदे तय होते थे, यह शब्द तब प्रचलित हुआ । दलालत, दलाला या दलाली कमीशन के लिए प्रचलित शब्द थे। हिन्दी में दल्लाल शब्द भी आम है। इस कर्म में लिप्त महिला के लिए दल्लाला सम्बोधन है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक दलाल वह व्यक्ति है जो स्त्री-पुरुष में किसी द्रव्य की एवज में अनुचित संयोग कराता है। साक्ष्य या सबूत के लिए हिन्दी–उर्दू में दलील शब्द का खूब इस्तेमाल होता है जो इसी धातुमूल से निकला है। दलील का अर्थ हिन्दी में तर्क भी होता है। जाहिर है, तर्क भी वाक् शक्ति से जन्मा साक्ष्य ही है। मध्यस्थ शब्द में निहित सात्विक भाव यहां स्पष्ट होते हैं। मध्यस्थ की भूमिका न्यायकर्ता की होती है। साक्ष्य या सबूत के अभाव में सुलझाव कभी सम्भव नहीं। इसी धातु से संबंधित एक अन्य धातु है द-ल-य (d-l-y) इससे बने दल्ला का मतलब एक गाईड, मार्गदर्शक या परामर्शदाता है। दलील अपने आप में मार्गदर्शक तत्व है। यह एक ऐसा बोधवाक्य होता है जिसके प्रकाश में तथ्य की सही पड़ताल हो जाती है। इस अर्थ में दलील देने वाला भी दलाल है। दलीलों से न्याय की राह दिखानेवाला वकील दरअसल मध्यस्थ और मार्गदर्शक ही है।  
    broker मध्यस्थ की महिमा पर संदेह नहीं। मध्यस्थ तो कृष्ण भी थे जो निस्वार्थ कर्मयोग की बात कहते थे। अब दलालों का बोलबाला है।
    ध्यस्थ के लिए दलाल की तरह ही एक अन्य अशोभनीय संबोधन है बिचौलिया। लगभग दलाल जैसी ही अर्थवत्ता इसकी है। यह व्यक्ति भी दो पक्षों के बीच कारोबारी हित साधने में मददगार होता है और बदले में कुछ नफा हासिल करता है। बड़ी देनदारियों की वसूली के लिए भी बिचौलिये अपना हुनर दिखाते हैं जिससे ऋणदाता को मूलधन वापस मिल जाता हैं। आधुनिक भारत में दलाली प्रथा को अंग्रेजों ने बहुत बढ़ावा दिया। अंग्रेज व्यापारिक बुद्धि के थे। कम्पनी सरकार ने किसानों को भू-स्वामित्व से वंचित कर ज़मींदारी व्यवस्था शुरु की। ज़मींदार वर्ग मूलतः अंग्रेजों का दलाल ही था। बाद में नए तौर-तरीकों वाले दलाल पैदा होने लगे। मुंबई-कोलकाता में मारवाड़ी इस व्यवसाय से खूब पनपे और आज देश के शीर्षस्थ उद्योगपतियों में इनका शुमार है।
    बिचौलिया शब्द बना है हिन्दी के बीच शब्द (मध्य ) में औलिया प्रत्यय जुड़ने से। जॉन प्लैट्स के शब्दकोश के मुताबिक बीच शब्द बना है संस्कृत के व्यचस् से जिसका अर्थ है विस्तार, भाग अथवा हिस्सा। स्वतंत्र रूप में यह शब्द हमें वाशि आप्टे के संस्कृत-हिन्दी कोश में नहीं मिला। मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में इसका उल्लेख ज़रूर है।  आप्टे और मोनियर के कोश में इससे संबंधित व्यच् धातु है। आप्टे इसका अर्थ ठगना, धोखा देना और चाल चलना बताते हैं जबकि मोनियर विलियम्स ने इसके मायने  विस्तार करना बताया है। दोनों ही अर्थ जॉन प्लैट्स द्वारा बताए अर्थ में समाहित हैं। आप्टे कोश में व्यचस् की धातु विच्  है जिसमें विभक्त करना, बांटना, काटना जैसे भाव हैं। याद करें बंदर और दो बिल्लियों की कहानी। रोटी  को लेकर बंदर बिल्लियों के बीच मध्यस्थता करने बैठा और चालाकी से सारी रोटी खुद खा गया। इसमें विभक्त करने वाली बात भी सिद्ध हो रही है और धोखा देने की भी। यह भी तथ्य है कि बिचौलिया रिश्तों को जोड़ता नहीं बांटता ही है। किसी वस्तु को बांटने में मूलतः मध्य से दो भाग करने का भाव ही होता है। हिन्दी का बीच और पंजाबी का विच इसी व्यच् से जन्मे हैं। हिन्दी के बीच में औलिया प्रत्यय लगने से बना बिचौलिया। शब्दकोशों में मध्यस्थ के अर्थ में बिचली, बिचौली, बिचवैय्या, विचवैया, बिचवैत जैसे शब्द भी हैं। मालवी में तीन संतानों के बीच की संतान को बिचौट कहते हैं। जबर्दस्ती बीच में पड़नेवाले को बिचला/बिचली कहा जाता है। – कुछ  और दिलचस्प विवरणों के साथ अगली कड़ी में भी जारी। 
    जरूर पढ़ें-दम्भ का महाकुम्भ (चर्चा कुम्भनगर की)

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    Thursday, November 12, 2009

    मियांगीरी मत करो मियां [मध्यस्थ-1]

    ज़रूर पढ़े-1.बावला मन… करे पिया मिलन2.औलिया की सीख, मुल्ला की दहशत3.बिलैती मेम, बिलैती शराब और विलायत

    मि यां एक ऐसा संबोधन है जिसे
    ‘देख हमारे माथे पर ये, दश्ते-तलब की धूल मियां, हम से है तेरा दर्द का नाता देख हमें मत भूल मियां
    मुस्लिम संस्कृति का समझा जाता है मगर इसका इस्तेमाल बड़ी बेबाकी के साथ किसी के साथ भी कर लिया जाता है। यह एक आदरसूचक शब्द है और फारसी लफ्ज है, जो इंडो-ईरानी मूल से जन्मा है। भाषाशास्त्रियों नें इसे प्रोटो इंडो-यूरोपीय मूल का शब्द माना है तथा इसकी रिश्तेदारी कई यूरोपीय भाषाओं के शब्दों में खोजी है। श्रीमान या मान्यवर के अर्थ में आमतौर पर इसका इस्तेमाल होता है, जैसे क्यों मियां! इसे आदरसूचक के तौर पर किसी भी नाम के साथ उपसर्ग या प्रत्यय के रूप में लगाया जाता है जैसे मियां शम्सुद्दीन या अली मियां। मियां शब्द के मुहावरेदार प्रयोग भी दिलचस्प  हैं और हिन्दी उर्दू में खूब प्रचलित हैं जैसे बड़े मियां यानी बुजुर्ग, गुरु, अधिष्ठाता, अधिकारी और छोटे मियां यानी कनिष्ठ, बच्चा या सहायक। जैसे को तैसा के अर्थ में मियां की जूती, मियां के सिर कहावत भी प्रचलित है। बड़ों की देखादेखी छोटों के उल्लेखनीय बर्ताव के लिए बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुब्हानअल्लाह भी खूब सुना, कहा जाता है।
    मियां की व्युत्पत्ति अवेस्ता के मदिया से मानी जाती है। इसका संस्कृत रूप है मध्य। मियां में जो अनुनासिकता आ रही है वह मध्य के मध्यं रूप से है। मध्यं >मज्झम>मंझा या मांझा। समझा जा सकता है कि यह रूपांतर मदिया > मइया> मियां के क्रम में हुआ होगा। गौरतलब है कि संस्कृत के मध्य का अर्थ बीच का होता है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की एक धातु मध्यो medhyo से ही संस्कृत के मध्य, अवेस्ता के मदिया की रिश्तेदारी है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी का मिडिल middle, ग्रीक का मैसो messos, लैटिन का मिडियस medius, गोथिक का मिडिस midjis और आरमीनियाई का मेज mej भी इसी मूल से जन्मे हैं।
    ध्य के संदर्भ में मियां शब्द का मतलब है untitledप्रतिष्ठित व्यक्ति, न्यायकर्ता, पंच, हाकिम, वली आदि। उपरोक्त सभी विशेषणों के लिए फारसी में मियांजी शब्द प्रचलित है। गौरतलब है सभा में प्रतिष्ठित व्यक्ति सबके बीच बैठता है। पंचायत में सरपंच की जगह सबके बीच होती है। किसी भी सभा, गोष्ठी या महफिल में अध्यक्ष या सदर बीचोंबीच ही विराजते हैं। दूसरे अर्थ में मध्य यानी मध्यस्थ या मिडिएटर। यहां भी पंच की मिसाल दी जा सकती है। आमतौर पर पंच या प्रमुख व्यक्ति आदरणीय ही होता है और वह लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनता है, झगड़ों में बीचबचाव करता है और उन्हें सुलझाता है। किसी मामले में अनचाही दखलंदाजी के लिए भी जबर्दस्ती पंच बनना जैसा मुहावरेदार वाक्य बोला जाता है। जाहिर है पंच का काम मध्यस्थता ही है। स्वामी, पीर, औलिया आदि प्रसिद्व व्यक्तियों के नामों के साथ भी मियां शब्द जोड़ा जाता रहा है। दरअसल आध्यात्मिक गुरु सामान्य मनुष्य और ईश्वर के बीच मध्यस्थ माना जाता है। उसे ईश्वरीय दूत समझा जाता है। जाहिर है दूत की भूमिका दो बिन्दुओं के बीच मध्यस्थ की ही होती है, इसीलिए उसमें आदर निहित है। फारसी का बहुप्रचलित प्रत्यय गीर है जो हिन्दी में भी खूब प्रचलित है। इसका मतलब होता है रखना, धारण करना, संभालना। इससे बने दादागिरी, बाबूगिरी, गांधीगिरी, नेतागिरी जैसे शब्द खूब चलते हैं। ये अलग बात है कि गीर प्रत्यय का हिन्दी में अज्ञानतावश गलत प्रयोग होता है। इसका सही रूप है गीर या गीरी। फारसी में एक मुहावरा है मियांगीरी करदन अर्थात मियांगीरी करना। इसका एक रूप मियांजीगरी भी मिलता है। मतलब साफ है- पंच या मध्यस्थ बनने की कोशिश करना। जाहिर है मियां का बड़ा रुतबा भी इसमें नज़र आ रहा है। miyan इसमें भाव प्रमुख, प्रतिष्ठित व्यक्ति का ही रहा। फारसी उर्दू में निरपेक्ष भाव से मियां का प्रयोग ईश्वर, अल्लाह के लिए भी होता है जैसे अल्लाह मियां। उर्दू के प्रसिद्ध शायर इब्ने इंशा की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल का काफिया ही मियां है जिसमें अल्लाहताला  की ओर ही संकेत हैं- देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां / हम से है तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियां
    मियां शब्द में जो मध्य या बीच का भाव है वह फारसी के दरमियां (दरमियान, दरम्यान, दर्म्यान) में भी स्पष्ट हो रहा है। फारसी के दर उपसर्ग में ‘ के भीतर’, ‘अन्दर’, ‘शामिल’ जैसे भाव हैं। दर–मियान में सापेक्ष भाव है जिसका अर्थ हुआ ‘के बीच में’, इसके अलावा इसमें मध्यम, मंझौला, औसत जैसा भाव भी शामिल है जैसे दरमियाना क़द। किन्ही दो बिन्दुओं के बीच की स्थिति बताने के लिए दरमियान शब्द का प्रयोग होता है। मियान में बीच का भाव पोले, चौड़े और खाली स्थान के अर्थ में और खुला। इसमें कोश, भंडार, गोदाम का भाव शामिल हो गया। पुरानी शैली के मकानों में दो मंजिलों के बीच एक छुपा हुआ कक्ष भी बनाया जाता था जिसे मियानी कहते थे। दरअसल फारसी के मियांसरा शब्द से मियानी निकला है। मियांसरा का अर्थ होता है महल (सरा, सराय) के बीचोंबीच का स्थान। सलवार या पायजामा जैसे वस्त्रों में दोनों पाँयचों को जोड़ने वाले कपड़े को भी मियानी ही कहते हैं क्योंकि इसकी स्थिति बीचोंबीच रहती है। तलवार रखने की जगह म्यान कहलाती है जो इसी मूल से उपजा शब्द है।
    -जारी

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    Wednesday, November 11, 2009

    मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21]

    Dharavi_Slum_in_Mumbai पिछली कड़ियां-कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20] सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19] जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]

    दिम मानव ने आश्रय की तलाश से पहले समूह में रहना सीखा। यानी समूह अपने-आप में आश्रय है। महल्ला mahallaभी एक समूहवाची शब्द है जिसमें आश्रय का भाव है। यूं इस शब्द का इस्तेमाल बसाहट के एक हिस्से के लिए होता है। हिन्दूवादी सोच के तहत महल या मोहल्ला की व्युत्पत्ति महालय से बताई जाती है। महा+आलय से बना है महालय। संस्कृत में महा यानी विशाल या बड़ा और आलय यानी निवास। आशय हुआ विशाल भवन। जाहिर है कि ध्वनिसाम्य और अर्थ साम्य के आधार पर महल या मोहल्ले की व्युत्पत्ति महालय से हो सकती है। मगर इन दोनों शब्दों का धातु मूल अलग है। महल और मोहल्ला सेमिटिक मूल के शब्द हैं जबकि महालय संस्कृत का है। इनके धातुमूल भी अलग अलग हैं इसलिए महालय से महल का जन्म एक दिलचस्प विचार भर है। मोहल्ला शब्द की रिश्तेदारी बंगाल और पूर्वी भारत में प्रचलित मोहाल, पंजाब के मोहाली से भी है। इसी तरह सिखों के एक प्रसिद्ध पर्व होला-मोहल्ला का नामकरण भी इसी मूल से हुआ है।  सिख संदर्भ मा (खुद)-हल्ला (आक्रमण) का अर्थ आगे बढ़कर हमला करना बताते हैं। बताया जाता है सिख गुरु गोविंदसिंह आमतौर पर बैसाखी के मौके पर अपने शिष्यों को युद्धाभ्यास कराते थे।
    29_08_2009-XTi_0958 मोहल्ला शब्द में घिरे हुए स्थान का भाव है। यह मूल रूप से सेमिटिक मूल का है और अरबी ज़बान के जरिये दुनियाभर की भाषाओं में इसका प्रसार हुआ। मूलतः इसकी धातु है mahl यानी मह्ल। अरबी में इसका मूल रूप मा-हल्ला ma-halla है। अरबी hall एक समूहवाची धातु है। इससे बने हल्ला शब्द में लोगों का समूह, विरासत गौर करें विरासत में गति का भाव है अर्थात यह लगातार चलती रहती है। गति का यही भाव हल्ला शब्द के अचानक धावा बोलनेवाले अर्थ से उजागर हो रहा है। किसी समूह द्वारा कहीं आक्रमण या चढ़ाई करने को हल्ला कहा जाता है। हिन्दी में हल्ला बोलना मुहावरा यहीं से आ रहा है। जाहिर है इस हल्ला में शोर-शराबा वाला अर्थ समूह की चारित्रिक विशेषता होती है कोलाहल या शोर करना। यूं इसका असली अर्थ समूह ही है। हल्ला में मा जुड़ने से बनता है मा-हल्ला। अरबी में इसका उच्चारण महल्ला है जबकि हिन्दी-उर्दू में यह मोहल्ला या मुहल्ला है। सिखों के पर्व होला मोहल्ला में सिखलोग सैनिक वेश में जुलूस निकालते हैं। राजभवन, सरकारी निवास के लिए महल शब्द आम है जो इसी मूल से बना है। क्योंकि महल शब्द में मूलतः डेरा, पड़ाव या कहीं बसेरा करने का भाव है। ताजमहल का उल्लेख इस संदर्भ में इतना ही कि इस प्रसिद्ध मक़बरे के साथ महल शब्द के जुड़ने के पीछे शाहजहां की पत्नी मुमताज महल का नाम भी बताया जाता है जिसकी याद में बादशाह ने इसकी तामीर करवाई थी।
    एटिमऑनलाईन के मुताबिक महल दरअसल अरबी शब्द hall से बना है जिसमें आश्रय, बसेरा, झोपड़ी, कुटिया, रिहाइश का भाव है। मगर वहां इसकी कोई व्याख्या नहीं मिलती। ऐसा लगता है अरबी hall में रिहाइश का भाव दरअसल इसे आश्रय के व्यापक आधारों से जोड़ता है। विशाल प्रकोष्ठ के अर्थ में अंग्रेजी का में हॉल है। अंग्रेजी का हॉल hall, सेल cell, होल hole और हॉलो hollow जैसे शब्द संस्कृत के शाल्(धर्मशाला, पाठशाला, अश्वशाला) की कड़ी में आते हैं। इन सभी शब्दों के मूल में प्राचीन भारोपीय धातु केल kel है जिसमें आश्रय, घिरा हुआ और निर्माण के ही भाव हैं। अंग्रेजी के सेल cell पर गौर करें। शाल का देशी रूप साल अंग्रेजी के सेल को और करीब ले आता है। हॉल के मूल में भी सेल ही है। सेल बना है पोस्ट जर्मनिक धातु khallo से जिसका अर्थ होता है घिरा हुआ, ढका हुआ, विस्तारित, बड़ा प्रकोष्ठ, खाली स्थान आदि। भारोपीय परिवार की भाषा पोस्ट जर्मनिक के khallo और सेमिटिक परिवार की अरबी के ख़ल्क़ khalq या ख़ला khala की समानता पर गौर करें। ख़ल्क का अर्थ 2378123902_72feaf58fb भी निम्राण, सृजन,  घेरा हुआ, विशाल, विस्तारित, अंतरिक्ष आदि ही होता है। इसी श्रंखला में अरबी के hall का विस्तार भी आश्रय के अर्थ में हुआ हो तो आश्चर्य नहीं।
    किसी निश्चित रिहाइश या स्थानीय आबादी के लिए मोहल्ला शब्द हिन्दी में इतना आम है कि इसके अलावा कोई अन्य शब्द नहीं मिलता। वैसे मोहल्ला शब्द में हाता (अहाता), गली, पुरा, टोला, पोल, वाड़ा, बाड़ा, पेठ के भाव समाहित हैं। हालांकि अरबी महल्ला के मायने मध्यएशिया में बहुत व्यापक है। महल्ला शब्द का मूल अर्थ था किसी जन-समूह का ठहराव, टिकाव, पड़ाव, डेरा या विश्राम करना। बाद में इसका अर्थ हुआ किसी भी शहर का चतुर्थांश। गौर करें, यह शब्द फौजी या सैन्य ठहराव के लिए बनाए जाने वाले कैम्प के संदर्भ में प्रचलित हुआ होगा क्योंकि किसी भी प्राचीन बसाहट या शहर को चार हिस्सों में बांटना व्यावहारिक नहीं है। अलबत्ता नया शहर बसाते वक्त बसाहट के चार विभिन्न हिस्सों की परिकल्पना करना आसान है। जाहिर है, फौजी पड़ाव के दौरान खेमों-तम्बुओं का जो शहर बसता था उसे चार हिस्सों में बांटा जाता रहा होगा, जिसे महल्ला का जाता रहा होगा। बाद में अन्य आबादियों के लिए भी इसका इस्तेमाल होने लगा। अरब क्षेत्रों में महल्ला किसी भी आबादी के नाम से पहले लगाया जाता है जैसे महल्ला अल कुब्रा। यह परिपाटी मिस्र में ज्यादा है। भारत में भी महल्ला चमेलियान जैसे नाम मिलते हैं। दिल्ली के झंडेवालान, कुंडेवालान जैसे नामों के आगे खड़ा महल्ला शब्द साफ देखा जा सकता है।
    मुस्लिम शासन काल में महल्ला का अर्थ जिला, तहसील, वार्ड या शहर की एक रिहाइश को कहते थे। गुजरात में एक ज़िला है पंचमहल। उसे यह नाम पांच तालुकों के आधार पर मिला है। वैसे पंचमहल का अर्थ पांच महल या पांच मंजिला महल भी हो सकता है किन्तु यहां पांच महल्लों से अभिप्राय है। किन्हीं संदर्भों में महल्ला शब्द का इस्तेमाल सिर्फ मुस्लिम आबादी के लिए भी मिलता है। महल्ला शब्द का इस्तेमाल उज्बेकिस्तान, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान जैसे मुल्कों में एक सामाजिक व्यवस्था के बतौर ज्यादा होता है। जैसे अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान में समुदाय के लिए ज़िरग़ा शब्द प्रचलित है, या भारत में खाप अथवा जाति पंचायत होती है वैसे ही इन मुल्कों की सामाजिक व्यवस्था में महल्ला का बड़ा महत्व है। ये महल्ले किसी खास इलाके में रहनेवाले लोगों में धार्मिक –सांस्कृतिक ऐक्य के लिए बनाई गई बिरादरियां होती हैं। महल्ला की एक संचालन समिति होती है जिसका प्रमुख रईस कहलाता है।

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    Tuesday, November 10, 2009

    सरदार की ब्लागरी शुरु [बकलमखुद-114]

    logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 114वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
    पिछली कड़ी-चूजों को लगे पंख [बकलमखुद-113]
    सा मान्य बीमा कंपनी के जिस डीएम से झगड़ा हुआ था। उस का सभी से झगड़ा होता चला गया। चाहे वे कर्मचारी थे या प्रोफेशनल। लेकिन फिर भी कुछ कमजोर लोग ऐसे रह ही गए जिन के बल पर वह अपना काम करता रहा। सब लोग उस से परेशान। कई ने उस की शिकायत भी की लेकिन सब बड़े अफसरों को उस ने पानी में ऐसा उतारा हुआ था कि कोई शिकायत नहीं सुनी जाती। उस के कर्मों ने कंपनी की एक शाखा तक बंद करवा दी। उस ने पूरे पाँच वर्ष निकाले। इस बीच हाउसिंग फाइनेंस ने संपत्ति के स्वत्वान्वेषण का काम जो हर स्थान पर कुछ वकीलों को दिया जाता था उसे आउट सोर्स कर दिया। चार राज्यों का काम दिल्ली की एक फर्म को दे दिया गया। हालांकि उस फर्म के लिए सारा काम करना संभव नहीं हो सका और कुछ स्थानों पर वकील काम करते रहे। पर बड़े नगरों में उस फर्म ने जिन वकीलों को विस्थापित कर दिया, सरदार भी उन में से एक था। उस के सामने फिर काम का संकट खड़ा हो गया। एक साथ एक तिहाई आमदनी का स्रोत छिन गया था। उन्हीं दिनों सामान्य बीमा कंपनी का डीएम बदल गया। वहाँ से काम वापस मिलने लगा लेकिन यह छिने हुए काम का पाँचवाँ हिस्सा भी नहीं था।
    वकालत में मंदी, अदालतों में घमासान 
    श्रम न्यायालय में लम्बित मुकदमों की संख्या साढ़े तीन हजार ऊपर जा रही थी। हर साल चार-सौ मुकदमे नए आ जाते जब कि किसी भी तरह से डेढ़-दो सौ से अधिक मुकदमे निर्णीत नहीं हो रहे थे। स्थिति यह थी कि लंबित मुकदमों के निपटारे में ही बीस वर्ष का समय चाहिए था और मुकदमों का दायरा निपटारे से अधिक होने के कारण हर साल उन की संख्या बढ़ रही थी। अनेक सेवार्थी तो ऐसे थे जिन्हें अपने जीवनकाल में मुकदमे के निपटारे आशा नहीं रह गई थी। मुवक्किल प्रत्याशा के अनुपात में फीस तय और अदा करता है। फीस दर बढ़ने के बावजूद वकीलों की आय कम हो रही थी। इसी बीच श्रम न्यायालय के जज का स्थानांतरण हो गया और उस के स्थान पर किसी जज को नहीं लगाया गया। अदालत दो वर्ष तक खाली पड़ी रही। सरदार को फुरसत हो गई। इस बीच उस ने अच्छी फीस के कुछ फौजदारी और दीवानी मुकदमे लड़े और उन में सफलता भी पायी। लगने लगा कि श्रम न्यायालय में काम न रहने पर भी अपने लायक काम मिलता रहेगा। इन मुकदमों की सफलता इस काम को बढ़ाएगी। लेकिन सामान्य वकालत की स्थिति भी कम खराब न थी। दीवानी और फौजदारी अदालतें मुकदमों से अटी पड़ी थीं। एक-एक अदालत के पास चार-चार पाँच-पाँच अदालतों जितना काम इकट्ठा हो गया था। इस क्षेत्र में वकीलों के बीच घमासान था। वकील और उन के ऐजेंट काम के लिए अब सेवार्थियों के घर पहुँचने लगे थे। अधिकतर फौजदारी मुकदमों में वकील तफ्तीश करने वाले पुलिस अधिकारी की सिफारिश पर नियुक्त होने लगे थे। वकील की फीस में उन का कमीशन भी शामिल होने लगा। बढ़ती आबादी के मुकाबले अदालतों की स्थापना न होने से वकालत का व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हो रहा था। साफ था कि जब तक अदालतों की संख्या बढ़ती नहीं और सभी अदालतों में जजों की पदस्थापना नहीं होती। मुकदमों में लगने वाले समय में कमी नहीं आती। जिला स्तर तक वकालत का व्यवसाय कमाई के लिए बिलकुल बेकार हो चुका है। वकालत का व्यवसाय घोर और लंबी मंदी का शिकार हो चला था।
    तीसरा खम्भा का आग़ाज़
    न्ही दिनों अंतर्जाल पर सरदार का हिन्दी ब्लाग से परिचय हुआ। वहाँ साहित्य, पत्रकारिता, संस्मरण, राजनीति सब कुछ थे। फिर क्या था? वह रोज अंतर्जाल में विचरने लगा। वहाँ हिन्दी लिखने की में समस्या थी लेकिन वह भी हिन्दी आईएमई ने समाप्त कर दी। उस में रेमिंग्टन कुंजी-पट था जो लगभग कृति फॉण्ट के कुंजी पट जैसा ही था। इस की मदद से टिप्पणियाँ करना चालू हो गया। एक पुराने गुरूजी का उल्लेख अनूप शुक्ल के किसी आलेख पर देखा। वर्षों से गुरू जी का पता न था। उन से पते की फरमाइश की तो उन्हों ने प्रियंकर जी के माध्यम से उसे पूरा कर दिया। साथ ही यह भी सलाह दी कि सरदार को ब्लाग लिखना चाहिए। उस ने आरंभिक जीवन में कहानियाँ लिखी थीं। वकालत के दिनों पत्रकारिता भी की थी। कभी कभी भावना व्यक्त करने के लिए कवितानुमा भी कुछ लिखा था जिसे सराहा भी गया था। लेकिन वकालत के व्यवसाय की व्यस्तता ने सब कुछ बहुत पहले ही रोक दिया था। बीच में करीब साल भर एक दैनिक में साप्ताहिक कॉलम जरूर लिखा, शेष सब फुरसत मिलने पर लिखना बकाया था। व्यवसाय में छाई घोर मंदी और हिन्दी ब्लागरी से परिचय ने उस वक्त को जल्दी ही ला दिया। श्रम न्यायालय में जज के अभाव ने सरदार को जो खाली समय दिया था उस ने न्याय व्यवस्था की दुर्दशा और वकालत के व्यवसाय पर पड़ रहे उस के प्रभाव ने सोचने और कुछ करने को प्रेरित किया था। उस के अपने व्यवसाय पर पड़ रहा विपरीत प्रभाव उसे सब से अधिक परेशान कर रहा था। उस ने अदालतों की संख्या बढ़ाने की जरूरत को वकीलों के बीच व्याख्यायित करने का प्रयत्न किया था और यह भी कि इस के लिए वकीलों को ही सरकार से लड़ना होगा। लेकिन अदालतों की संख्या बढ़ने पर काम का बड़े नगरों से कस्बों और कस्बों से गांवों की और विकेन्द्रीकरण अवश्यंभावी था, जिस से वकील हमेशा भय खाता है क्यों कि वह हमेशा उस के मौजूदा काम को कम कर देता है। वकीलों के बीच सरदार की कोशिश कामयाब नहीं हो सकी। अचानक मन बना कि न्याय प्रणाली की समस्याओं को लेकर ब्लाग बना कर अपनी बात को लोगों तक पहुँचाया जाए। इस तरह ‘तीसरा खंबा’ का जन्म हुआ।
    … और अनवरत का भी जन्म
    रंभ में तीसरा खंबा तक पहुँचने वाले पाठकों की संख्या बहुत कम थी। वह विषय आधारित ब्लाग था। सरदार ने कुछ पुराने ब्लागरों से पूछा तो सलाह मिली कि पाठक खुद ही जुटाने होंगे। कुछ दिन में महसूस हुआ कि ब्लाग जगत में ब्लागरों से अन्तर्क्रिया करना आवश्यक है अन्यथा यहाँ तुम्हें कोई नहीं गाँठने वाला। इस तरह कोई बाईस दिन बाद अनवरत का जन्म हुआ। अनवरत में पाठक आने लगे और अंतर्क्रिया भी खूब होने लगी। लिखने का उत्साह बढ़ने लगा। उन दिनों तक हिन्दी ब्लाग पर गूगल विज्ञापन परोसता था। ऐसा भी लगा था कि यदि ब्लाग पर पर्याप्त पाठक आने लगे तो इन से पहले साल में इतनी आय तो की ही जा सकती है कि उन का खर्चा निकाला जा सके। कुछ महिनों बाद ही गूगल ने हिन्दी ब्लागों पर अपने विज्ञापन परोसने बंद कर दिए। जो आ रहे हैं वे सभी सामाजिक (मुफ्त) सेवा के विज्ञापन हैं। इस से यह तो निश्चित हो गया कि फिलहाल ब्लाग आय का तो क्या? ब्लाग लेखन का खर्च निकालने का साधन भी नहीं बन सकता। लेकिन ब्लाग के रूप में सस्ते में अभिव्यक्ति का जो साधन उपलब्ध था उस से अपनी बात को पहुंचाने का अवसर मिल रहा था। उस ने तय किया कि वह हर हालत में अपने ब्लाग लेखन को जारी रखेगा और उसे नियमित रखने का प्रयत्न करता रहेगा। अगली कड़ी में समाप्त

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    Monday, November 9, 2009

    सच्चाई क्या है? [मातृभाषा-3]

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    पिछली कडियों में आपने पढ़ा- मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। मेरी नज़र में बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है। जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उसका मातृ-परिवेश कहलाएगा। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान कायम रखने में अगर हम सफल होते हैं तब मातृभूमि या जन्मभूमि को हम क्षेत्रीय पहचान से जोड़ कर देख सकते हैं वर्ना मातृभाषा, मातृभूमि जैसे सवालों का जवाब सिर्फ और सिर्फ हिन्दी और भारत के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। विस्तार से देखें-(मातृभाषा-1/ मातृभाषा-2)
    रा ष्ट्रभाषा ज्यादा व्यापक शब्द है या मातृभाषा ? तकनीकी तौर पर तो राष्ट्रभाषा ही व्यापक शब्द है। मगर यहां भी नजरिया महत्वपूर्ण है। मध्यकाल में यूरोप में लिंगुआ फ्रांका टर्म चल पड़ी थी जिसका अर्थ सम्पर्क भाषा या सामान्य भाषा से था। मातृभाषा, राष्ट्रभाषा जैसे विशेषणों को हम केवल काग़ज़ी खानापूर्ति या बेहद ज़रूरी वर्गीकरणों के लिए सुरक्षित छोडें। यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि किसे वह मातृभाषा का दर्जा देना चाहता है। राष्ट्रभाषा तो जाहिर है, पसंद के इस दायरे से बाहर है, क्योंकि वह विधान-सम्मत तथ्य है। आज अक्सर राष्ट्रभाषा हिन्दी के भविष्य को लेकर चिंता प्रकट करते हुए अंग्रेजी को सम्पर्क भाषा के तौर पर विकसित होते जाने की बात कही जाती है। मेरा स्पष्ट मानना है कि इस देश की निर्विवाद लिंगुआ फ्रांका हिन्दी/हिन्दुस्तानी ही है। व्यापक तौर पर पाकिस्तान को भी शामिल कर लें, क्योंकि उर्दू को मैं अलग भाषा नहीं हिन्दी की शैली समझता हूं, तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की लिंगुआ फ्रांका हिन्दुस्तानी ही है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा चाहे 1950 में सांविधानिक तौर पर मिला हो, मगर इस देश की साझी संस्कृति ने हिन्दुस्तानी को सदियों पहले लिंगुआ फ्रांका मान लिया था और उदार हृदय से भारत के चारों कोनों ने इसे स्वीकार कर लिया था। यही वजह रही कि देश भर में हिन्दी के विभिन्न रूप बोले जाते हैं।
    Indoeuropean language family tree
    बदला है स्वरूप भी
    हिन्दी आज जिस रूप में बोली जाती है, तीन सदी पहले भी इससे मिलती-जुलती भाषा बोली जा रही थी जिसे हिन्दुस्तानी  कहा जाता था क्योंकि उसमें अरबी-फारसी के शब्द भी शामिल थे। महाराष्ट्र वाले उसे हिन्दुस्तानी कहते थे तो उत्तर वाले उसे दक्कनी। उससे भी कई सदियों पहले प्राकृतों के जरिये अलग अलग सम्पर्क भाषाएं रहीं। मागधी प्राकृत से बांग्ला जन्मी मगर मराठी के विषय में विद्वान एकमत नहीं है। मोटे तौर पर तो इसका जन्म महाराष्ट्रीय प्राकृत से माना जाता रहा है। दक्षिणापथ के विशाल क्षेत्र को जानेवाले विभिन्न मानव समूह महाराष्ट्र में अलग अलग कालखंडों में बसते रहे। मराठी पर पैशाची प्राकृत का प्रभाव भी है और शौरसेनी का भी। सुदूर मगध से भी यहां जनसमूह आकर बसे हैं और पश्चिम में बृज प्रदेश से लेकर पंजाब तक से आप्रवासी आते रहे हैं। आज की मराठी इन्ही विभिन्न भाषा-भाषी समूहों के साथ सदियों से हो रहे हेलमेल से बनी है। वेदकालीन प्राकृतों के इतने वर्गीकरण नहीं थे। ये बाद में विकसित हुए हैं। विभिन्न प्राकृतों पर स्थानीय बोलियों का प्रभाव भी पड़ा ही होगा। कहने का तात्पर्य यही है कि विभिन्न कालखंडों में मातृभाषा का स्वरूप बदला है। प्राकृतों के उदाहरण से साफ है कि ज्यादातर प्रांतीय बोलियां कभी मूल प्राकृत का ही हिस्सा थीं।
    हिन्दुस्तानी के सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित होने के क्रम में ही देश के विभिन्न भाषा-भाषी समूहों ने हिन्दुस्तानी सीखनी शुरू की। मराठी और बांग्ला लेखकों के लिए हिन्दी ज्ञान बेहद ज़रूरी था। जो मराठी ब्राह्मण दक्षिणा कमाने उत्तर के राजघरानों के यहां उत्सवों-पर्वों पर जाते थे, उन्हें हिन्दुस्तानी सीखनी अनिवार्य थी। इन्ही में से कुछ समूह उत्तरभारत में ही बस गए। धीरे-धीरे हिन्दुस्तानी उनकी सम्पर्क भाषा से बढ़कर हो गई। परिवार में चाहे मराठी का जोर रहा हो मगर परिजनों के बीच भी हिन्दी का व्यवहार बढ़ा।  मातृभाषा दरअसल वह है, जिसके जरिये व्यक्ति शैशवकाल में बाहरी दुनिया को समझता है। मेरे बचपन की बात बताऊं। मुझे याद नहीं आता कि दुनिया को समझने के लिए, मुझे अपनी कामचलाऊ मराठी के किसी शब्द का हिन्दी विकल्प अपने परिजनों से पूछना पड़ा हो। इसके ठीक उलट आज तक मैं हिन्दी शब्दों के मराठी विकल्प पूछता हूं। पर मुझे विशाल और समृद्ध मराठी समाज-संस्कृति से जुड़े होने का भाव सुहाता है, सो अपनी मातृभाषा मराठी ही बताता हूं, मगर सरकारी दस्तावेजों में, जनसंख्या विवरणों में अपनी मातृभाषा हिन्दी ही दर्ज कराई है। तमाम उदाहरणों से जाहिर है, व्यवहारतः मेरी मातृभाषा भी हिन्दी है और सम्पर्क भाषा भी और मुझे इससे एतराज भी नहीं है।  अपने बारे में आप लोग खुद तय करें। jioहां, मातृभाषा का वैवाहिक स्थिति से भी कोई रिश्ता नहीं है, भौगोलिक स्थिति से भी नहीं और जन्मदायिनी से भी नहीं।
     निष्कर्ष-
    कुछ मिसालें देखें-
    1.ऐसी संतान की मातृभाषा क्या होगी, जिसकी मां गूंगी हो? 2.मां पंजाबी, पिता तमिल... बच्चे की मातृभाषा क्या होगी? 3. अंग्रेजी बोलनेवाले दो विभिन्न भाषा-भाषियों की संतान किसे मातृभाषा कहेगी? 4. जन्मते ही माँ को खो चुकी संतान की मातृभाषा क्या होगी? 5.अनाथाश्रम में पलनवाले वे बच्चे जो माँ-बाप का नाम नहीं जानते, किसे मातृभाषा कहेंगे ?
    ऐसे अनेक दिलचस्प उदाहरण लिये जा सकते हैं जो मातृभाषा की रिश्ता अंततः परिवेश से ही स्थापित करते हैं।
    ...और अंत में
    व्यक्ति जिस भाषा में अपने सुख-दुख, आश्चर्य या अन्य भावों को व्यक्त करने में सक्षम हो...वही उसकी मातृभाषा है। चोट लगने पर मेरे मुंह से कभी मराठी में अगं आई नहीं निकलता अर्थात मां याद नहीं आती। आप जिस भाषा में सपने देखते हैं, वही आपकी मातृभाषा है। यहां अकबर बीरबल के बुद्धिविलास के उस प्रसंग को याद करें जब अकबर ने एक गुमनाम मगर बहुभाषी व्यक्ति की असली भाषा जानने का काम बीरबल को सौपा। बीरबल ने उस व्यक्ति पर ठंडा पानी तब डाला जब वह गहरी नींद में था...वह आदमी चौंक कर कुछ बड़बड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ। अगले दिन बीरबल ने बादशाह को बताया कि उस व्यक्ति की भाषा गुजराती है। पूछने पर बीरबल ने भी भाव सम्प्रेषण वाली उक्त बात ही कही थी।
    भाषाएं लगातार परिवर्तनशील रही हैं। यह जनसमूहों पर छोड़ दिया जाए कि वे अपने लिए कौन सी भाषा चुनते हैं। भाषा स्वतः विकसित होती चलती है। मानकीकरण जैसा कोई भी अनुशासन भाषा को विकसित होने से रोकता है। अलबत्ता साहित्य की भाषा में व्याकरण का अनुशासन जरूरी है। बोलचाल की भाषा प्रवहमान रहे इसके लिए तमाम दुराग्रहों को छोडना होगा। भाषाओं के मिटने की बात पर भी अक्सर चिंता जताई जाती है, वह भी बेमानी है। किन्ही सौ लोगों के समूह में बोली जानेवाली भाषा दो साल बाद नहीं रहेगी ...इस पर सियापा करने का कोई अर्थ नहीं है। सृष्टि में बनने-बिगड़ने का क्रम जारी है। यह सामान्य गति से होता रहे। हम इसकी वजह न बनें। पहले भी कई भाषाएं थीं, जो आज नहीं हैं।
    समाप्त

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    Sunday, November 8, 2009

    सांस्कृतिक पहचान ज़रूरी है [मातृभाषा-2]

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    पिछली कड़ी में आपने पढ़ा- अक्सर मातृभाषा शब्द का अभिप्राय उस भाषा से लगाया जाता है जिसे मां बोलती है। मातृभाषा से तात्पर्य उस भाषा से कतई नहीं है जिसे जन्मदायिनी मां बोलती रही है। मेरी नज़र में बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल मे ही जननि भाव है।  जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, वही महत्वपूर्ण है। यही उसका मातृ-परिवेश कहलाएगा।

    क दिलचस्प मिसाल। पिछली जनगणना में उत्तरप्रदेश और बिहार के करीब साठ हजार लोगों ने अपनी मातृभाषा अरबी लिखवाई। जनगणना मंत्रालय के उच्चाधिकारी भी इस तथ्य से हैरत में थे। विश्लेषण से पता चला कि ये सभी लोग उन  अति पिछड़े इलाकों के थे, जहां मदरसे चलते हैं। इन लोगों की माँओं की भाषा भोजपुरी और अवधी है। पिता भी यही बोलते हैं पीढ़ियों से। इसके बावजूद अरबी को मातृभाषा कहना मूर्खता से बढ़कर कुछ नहीं है। ऐसा उन्होंने धर्म के आधार पर किया है। अगर इतनी तादाद में मुसलमान अरबी जानते हैं तो इस्लाम की गलत व्याख्या के जरिये उन्हें कोई भी ताकत बरगला नहीं सकती। वे खुद पढ़ सकते हैं कि कुरआन और हदीस में क्या लिखा है। किसी मौलवी की मनमानी बेमानी हो जाएगी....अफ़सोसनाक बात तो यह कि ज्यादातर पढ़े-लिखे मुस्लिम भी उर्दू लिपि नहीं जानते, ऐसे में अरबी को पढ़ने-समझने की बात ही अलग है। जनगणना में कई मुसलमानों ने अपनी मातृभाषा हिन्दी भी लिखवाई है।
    मातृभाषा पर राजनीति
    स संदर्भ में एक तथ्य महत्वपूर्ण है। राजनीतिक कारणों से बीते दशकों में उर्दू को मातृभाषा घोषित करनेवाले मुस्लिम नागरिकों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। आज़ादी से पहले जो मुस्लिम हिन्दी या हिन्दुस्तानी को मातृभाषा लिखवाते थे, वे इसकी जगह उर्दू को यह दर्जा देने लगे। कश्मीर का मामला दिलचस्प है। वहां उर्दू को राजभाषा घोषित करने के बावजूद बहुसंख्यक लोग कश्मीरी को मातृभाषा लिखवाते हैं। मातृभाषा के क्षेत्र में राजनीतिक अध्ययन दिलचस्प साबित हो सकता है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पंजाब, तमिनाडु, आंध्रप्रदेश और बांग्लादेश जैसे assembly_childrens_day_nov20 राज्यों के मुसलमानों में उर्दू को मातृभाषा लिखवाने की वृत्ति कितनी बढ़ी है, इस पर सामान्य शोध कराया जाए।  इन सभी राज्यों की परिवेशगत भाषाएं वही हैं, जो इनका भौगोलिक और भाषायी नाम है। इन राज्यों में उर्दू का वैसा मज़बूत आधार नहीं है जैसा उत्तरप्रदेश, बिहार या दिल्ली में है। गुजरात का पारसी, फारसी न बोलकर ठाठ से गुजराती ही बोलता है। पर राजनीति इस अति अल्पसंख्यक तबके पर असर नहीं डालती। नेताओं के निशाने पर हमेशा मुस्लिम तबका रहा है।
    मातृभाषा-राष्ट्रभाषा-मातृभूमि-
    मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मां शब्द प्रतीक स्वरूप हर किसी को समझ में आता है, वैसे ही मातृभाषा में भी मां का प्रतीक ही महत्वपूर्ण है। मातृभूमि, जन्मभूमि जैसे शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के विकल्प के तौर पर होता है। इनके प्रयोग पर कोई विवाद नहीं हैं बशर्त जन्मभूमि और जन्मस्थान के अर्थ में हम घालमेल न करें। इनमें फर्क है। हम चाहे तो तो दोनो शब्दों की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं, अन्यथा दोनों शब्दों में एक ही भाव है। मातृभूमि को राष्ट्र के अर्थ में भी समझा जाता है और जन्मभूमि को जन्मस्थान के संदर्भ में भी देखा जाता है। वाल्मीकि रामायण की यह प्रसिद्ध उक्ति “जननि जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” में जन्मभूमि का अभिप्राय व्यापक रूप में प्रांत, प्रदेश, राज्य, देश आदि से ही है। इन तमाम शब्दों का, आज के संदर्भ में अर्थ न लगाया जाए। आज इन शब्दों के मायने बदल गए हैं और अलग अलग प्रशासनिक-राजनीतिक विभाजनों मे इन्हें देखा जाता है। मगर इस व्याख्या में इनका अभिप्राय राष्ट्रीय पहचान से ही है। जन्मभूमि, मातृभूमि को वैश्विक संदर्भ में देखे तो भी यह साफ है। मातृभूमि का अर्थ हुआ-
    1. स्वदेश, जहां के आप निवासी हैं। 2.आपके पुरखों की भूमि. 3. आपकी जातीय सांस्कृतिक पहचान वाला स्थान. 4. वह स्थान, जहां आप जन्में हैं.
    एक उदाहरण-
    मातृभाषा के संदर्भ में मिसाल के तौर पर मेरा जन्म मध्यप्रदेश के सीहोर में हुआ पर मेरी स्मृति में सीहोर नहीं है। राजगढ़ (ब्यावरा) में ही बचपन से युवावस्था तक का समय बिताया। महत्व राजगढ़ का ही है, क्योंकि उसी परिवेश में, मैं बड़ा हुआ हूं, जहां की भाषा हाड़ौती से प्रभावित मालवी है। इस क्षेत्र का भौगोलिक नाम उमठवाड़ है। यहां की बोली home_langues_260 मालवी कम, उमठवाड़ी ज्यादा कहलाती है। स्पष्ट है कि इसका मेरे व्यक्तित्व पर असर भी है भाषा और संस्कार दोनों स्तरों पर। सीहोर-राजगढ़ दोनों ही मालवांचल में आते हैं, इसलिए क्षेत्रीय पहचान के तौर पर मैं खुद को मालवी कहने में ज्यादा सुविधा महसूस करता हूं। इसके बावजूद मेरा खुद को मालवी कहना मातृभूमि के सवाल का जवाब नहीं है। मैं मुख्य सवाल से बच रहा हूं, घुमा रहा हूं। उपरोक्त वर्गीकरण के तहत देखें तो सिर्फ जन्म हो जाने भर से मेरा सीहोर से कोई भावनात्मक लगाव नहीं बनता। सीहोर मेरे सपने में नहीं आता, राजगढ़ आता है क्योंकि वह मेरे परिवेश का हिस्सा था। महाराष्ट्र जहां से मेरे पुरखे आए हैं और आकर ग्वालियर में बसे, वह ज़रूर मेरी मातृभूमि हो सकती है, क्योंकि पुरखों के द्वारा बोली जाने वाली मराठी भाषा और पृथक सांस्कृतिक पहचान के साथ ही मैं राजगढ़ में बड़ा हुआ। हमे मराठी कहा जाता है। हमारा परिचय महाराष्ट्रीय समूह के तौर पर दिया जाता है, सो तार्किक रूप में मेरी मातृभूमि महाराष्ट्र है, यह मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हैं।
    एकीकृत सांस्कृतिक पहचान 
    किन्तु यह दृष्टिकोण तब तक ही तर्कसंगत था जब तक भारत की पहचान भारतवर्ष के रूप में थी, जिसके अलग अलग हिस्से स्वायत्त पहचान रखते थे, तब स्वदेशी पहचान का अर्थ या मातृभूमि का अर्थ वही था जिसकी विवेचना ऊपर की है। मगर आज जब भौगोलिक परिभाषाएँ बदल चुकी है, वैश्विक परिदृष्य बदल चुका है, तब व्यापक अर्थ में मेरी मातृभूमि भी भारत ही कहलाएगी, अलबत्ता जन्मभूमि सीहोर है। मेरी सांस्कृतिक पहचान भारत भूमि की एकीकृत सांस्कृतिक पहचान से जुड़ेगी। मेरा महाराष्ट्रीय होना महत्वपूर्ण तब है जब महाराष्ट्रवासी महाराष्ट्रीय बंधु उदार हृदय से मुझे मराठी मानें। वे ऐसा नहीं करते हैं। यह अनुभव मुझे हो चुका है। शायद अन्य भाषा-भाषी बधुओं को भी हुआ हो जो बरसों पहले अपनी जड़ों से उखड़ कर हिन्दी या अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों में जा बसे हैं। अलबत्ता उत्तर भारत के जिन हिस्सों में हम पले बढ़े हैं, अगर हिन्दी भाषी संस्कारों के बावजूद मेरे नाम के साथ जुड़े वडनेरकर के चलते, मुझे मराठी समझा जाता है तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि इस विशाल क्षेत्र ने मराठियों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है, उल्टे कई मामलो में सहर्ष हमारी संस्कृति को यहा सराहना मिली है। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को जब तक हम और हमारी पीढ़ियां कायम रख पाते हैं, तब तक मुझे खुद को मराठीभाषी या मराठी कहने मे कोई परेशानी नहीं है। मगर यह भी कहूंगा कि हमारी संस्कृति हिन्दी क्षेत्रों में चाहे अलग पहचानी जाती हो, मगर हमारे आचार व्यवहार अब वैसे नहीं रह गए हैं जैसे मूल महाराष्ट्रवासियों के हैं। आचार-व्यवहार का यही फर्क पुणे-नागपुर में थोड़ा सा वक्त गुजारने पर साफ समझ में आता है। ऐसे में वे भेदभाव के दोषी भी नहीं कहे जा सकते। अलबत्ता यह साफ है कि मातृभूमि शब्द में जिस तरह से मातृ शब्द मूल पहचान से जुड़ा है, उस पर ही इस शब्द पर विचार करते समय गौर करना चाहिए। इस मूल पहचान का हमारे वर्तमान से कितना रिश्ता है।
    -अगली कड़ी अंतिम

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