Wednesday, July 9, 2008

रवीश की ब्लागवार्ता में शब्दों का पुरोहित

साथियों आज (बुधवार 7.7.2008) के दिल्ली से प्रकाशित होने वाले दैनिक हिन्दुस्तान में एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीशकुमार ने अपने साप्ताहिक कॉलम ब्लागवार्ता में शब्दों का सफर पर लिखा है। कृपया ज़रूर देखें । रवीश भाई का शुक्रिया कि सफर में न सिर्फ वे साथ हैं बल्कि पैनी नज़र भी है।

स कॉलम में शब्दों के सफर पर लिखा गया है इसकी सूचना मुझे अफलातूनजी के ईमेल से प्राप्त हुई जिसे मैने दोपहर दो बजे देखा। उन्होंने मुझे हिन्दुस्तान का लिंक भी भेजा जिस पर यह लेख छपा है। अफ्लूभाई का भी मैं शुक्रिया अदा करता हूं। उनके द्वारा भेजे लिंक के जरिये फांट डाऊनलोड नहीं हो पाए तो मैने पल्लव बुधकर की मदद ली जिन्होने मुझे पीडीएफ फाइल उपलब्ध करा दी जिसे यहां देखा जा सकता है।

और शब्दों के सफर का साल पूरा

वीश के लेख में तथ्य की एक मामूली भूल थी। शब्दों का सफर ब्लाग की शक्ल में दिसंबर 2006 में बन गया था मगर तब तक इसमें ब्लाग प्रोफाईल के अलावा कुछ भी नहीं डाला जा सका था । इसे दो बार डिलीट भी किया गया और पहली पोस्ट तीन जुलाई 2007 को डाली गई थी - अश्व यानी गधा , घोड़ा, सिपाही. इस तरह शब्दों का सफर को अभी दो साल नहीं बल्कि चार दिन पहले ही एक साल पूरा हुआ है। चूंकि जन्मदिन मनाने की मेरी आदत नहीं सो सफर का एक साल पूरा होने की सूचना मैने किसी को नहीं दी। बहरहाल, इस पूरे साल में ब्लागजगत ने शब्दों के सफर का दिल से स्वागत किया , अपनाया और सफर में कदमताल शुरू की उसके लिए में सभी साथियों का आभारी हूं। शब्दों में जता नहीं सकता, नाम गिना नहीं सकता । सफर में साथ बने रहें , इतना ही कह सकता हूं । मैं अपनी ओर से रोज़ एक नया शब्द लेकर आभार जताने का विनम्र प्रयास पूरे साल करता रहूंगा। आमीन ।

19 कमेंट्स:

अभिषेक ओझा said...

अभी-अभी देख के आ रहा हूँ. फॉण्ट इंस्टाल करने पर दिखाई दे रहा है... उसी पेज से फॉण्ट डाउनलोड किया जा सकता है. ढेर सारी बधाई स्वीकारें !

प्रभाकर पाण्डेय said...

बहुत-बहुत बधाई। बड़े भाई।

Anonymous said...

लेख ये है.

ब्लॉग वार्ता : शब्दों के खानदान का एक पुरोहित
रवीश कुमार
हमेशा के लिए स्मृति से बाहर कर दिया। जो बोला जाता है वही तो लिखा जाएगा। तभी तो सर्वजन से संवाद होगा। लेकिन क्या जो बोला जा रहा है, वह अर्थसहित समझ लिया जा रहा है? उर्दू का एक शब्द है खुलासा। इसका असली अर्थ और इस्तेमाल के संदर्भ की दूरी को कोई नहीं पाट सका। इसीलिए बीस साल से पत्रकारिता में लगा एक शख्स शब्दों का साथी बन गया है। वो शब्दों के साथ सफर पर निकला है। अजित वडनेरकर।
ब्लॉग का पता है http://shabdavali.blogspot.com/
दो साल से चल रहे इस ब्लॉग पर जाते ही तमाम तरह के शब्द अपने पूरे खानदान और अड़ोसी-पड़ोसी के साथ मौजूद होते हैं। मसलन संस्कृत से आया ऊन अकेला नहीं है। वह ऊर्ण से तो बना है, लेकिन उसके खानदान में उरा (ोड़), उरन (ोड़) ऊर्णायु (ोड़), ऊर्णु (छिपाना)। इन तमाम शब्दों का अर्थ है ढांकना या छिपाना। एक ोड़ जिस तरह से अपने बालों से छिपी रहती है, उसी तरह अपने शरीर को छुपाना या ढांकना।

और जिस बाल को आप दिन भर संवारते हैं वो तो संस्कृत हिंदी का नहीं बल्कि हिब्रू से आया है। जिनके बाल नहीं होते, उन्हें समझना चाहिए कि बाल मेसोपोटामिया की सयता के धूलकणों में लौट गया है। गंजे लोगों को गर्व करना चाहिए। इससे पहले कि आप इस जानकारी पर हैरान हों अजित वडनेरकर बताते हैं जिस नी धातु से नैन शब्द का उद्गम हुआ है, उसी से न्याय का भी हुआ है। संस्कृत में अरबी जबान और वहां से हिंदी-उर्दू में आए रकम शब्द का मतलब सिर्फ नगद नहीं बल्कि लोहा भी है। रुक्कम से बना रकम जिसका मतलब होता है सोना या लोहा। कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का नाम भी इस रुक्म से बना है जिससे आप रकम का इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे तमाम शब्दों का यह संग्रहालय कमाल का लगता है। इस ब्लॉग के पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी अजब-गजब हंै। रवि रतलामी लिखते हैं कि किसी हिंदी चिट्ठे को हमेशा के लिए जिंदा देखना चाहेंगे तो वह है शब्दों का सफर। अजित वडनेरकर अपने बारे में बताते हुए लिखते हैं कि शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा विज्ञानियों का नजरिया अलग अलग होता है। मैं भाषाविज्ञानी नहीं हूं, लेकिन जब उत्पति की तलाश में निकलें तो शब्दों का एक दिलचस्प सफर नजर आता है। अजित की विनम्रता जायज भी है और जरूरी भी है क्योंकि शब्दों को बटोरने का काम आप दंभ के साथ तो नहीं कर सकते। इसीलिए वे इनके साथ घूमते-फिरते हैं। घूमना-फिरना भी तो यही है कि जो आपका नहीं है, आप उसे देखने- जानने की कोशिश करते हैं।

वरना कम लोगों को याद होगा कि मुहावरा अरबी शब्द हौर से आया है, जिसका अर्थ होता है परस्पर वार्तालाप, संवाद। शब्दों को लेकर जब बहस होती है तो यह ब्लॉग और दिलचस्प होने लगता है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा का एक लोकप्रिय लैंडमार्क है- अट्टा बाजार। इसके बारे में एक ब्लॉगर साथी अजित वडनेरकर को बताता है कि इसका नाम अट्टापीर के कारण अट्टा बाजार है, लेकिन अजित बताते हैं कि अट्ट से ही बना अड्डा।

अट्ट में ऊंचाई, जमना, अटना जैसे भाव हैं, लेकिन अट्टा का मतलब तो बाजार होता है। अट्टा बाजार। तो पहले से बाजार है उसके पीछे एक और बाजार। बाजार के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द हाट भी अट्टा से ही आया है। इसलिए हो सकता है कि अट्टापीर का नामकरण भी अट्ट या अड्डे से हुआ हो। बात कहां से कहा पहुंच जाती है। बल्कि शब्दों के पीछे-पीछे अजित पहुंचने लगते हैं। वे शब्दों को भारी-भरकम बताकर उन्हें ओबेसिटी के मरीज की तरह खारिज नहीं करते। उनका वजन कम कर दिमाग में घुसने लायक बना देते हैं।

हिंदी ब्लॉगिंग की विविधता से नेटयुग में कमाल की बौद्धिक संपदा बनती जा रही है। टीवी पत्रकारिता में इन दिनों अनुप्रास और युग्म शब्दों की भरमार है। जो सुनने में ठीक लगे और दिखने में आक्रामक। रही बात अर्थ की तो इस दौर में सभी अर्थ ही तो ढूंढ़ रहे हैं। इस पत्रकारिता का अर्थ क्या है? अजित ने अपनी गाड़ी सबसे पहले स्टार्ट कर दी और अर्थ ढूंढ़ने निकल पड़े हैं।

PD said...

Congratulation.. :)

दिनेशराय द्विवेदी said...

कमाल है, आप अपना जन्मदिन नहीं मनाते ठीक है। लेकिन हमारा अधिकार क्यों छीनते हैं। हमें तो मनाने दीजिए। अगर आप को कोटा स्मरण हो तो यहाँ के हास्यकवि जगदीश विमल 'गुलकंद' जरूर याद होंगे। वे वर्ष में चार बार अपना जन्मदिन अपने अलग अलग मित्रों के साथ मनाते थे। यह तो जीवन में आनंद के अवसर उत्पन्न करने का बहाना है। खैर, देर आयद दुरूस्त आयद। ब्लाग का जन्मदिन तो आपने बता ही दिया है। उस की बधाई। जहाँ तक मुझे याद आ रहा है, आप का जन्मदिन 4 सितम्बर है। गलत हो तो इसे भी दुरूस्त कर दीजिएगा।

vinitutpal said...

badhayee, subah pada par aapko bata nahee paya. iske liye mafee.

सागर नाहर said...

रवीश भाई, अजीत जी और अनाम मित्र को लेख हम तक पहुँचवाने के लिये धन्यवाद...

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सगर्व बधाई.
==========
डा. चन्द्रकुमार जैन

यूनुस said...

मुबारक हो ।
आप बहुत महत्‍त्‍वपूर्ण काम कर रहे हैं भाई

Raviratlami said...

शब्दों के सफर के पहले सालगिरह की बधाई. रवीश ने परिचय भी बढ़िया दिया है

sidheshwer said...

मुबारक
बधाई

Mired Mirage said...

यह तो रवीश जी ने बहुत बढ़िया किया कि चिट्ठा संसार के बाहर वालों को भी आपके इस चिट्ठे की जानकारी दी। इतने सुंदर व उपयोगी काम की जितने लोगों को जानकारी मिले कम है। चिट्ठे के जन्मदिन की देर से सही, बधाई।
घुघूती बासूती

Lavanyam - Antarman said...

Well deserved recognition & great Journalistic piece by Ravish ji -
Congratulations to both -
Regards,
Lavanya

Ashok Pande said...

हर तरह की ख़ुशी और बधाई में मुझे भी शरीक समझें अजित भाई! बने रहें!

sushant jha said...

मुबारक हो सर...

समरेंद्र said...

बहुत बहुत बधाई हो सर. आपकी कोशिश बेहतरीन है और इससे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है. शब्दों का ये सफ़र हर रोज नए मुकाम पर पहुंचे यही दुआ है. एक बार फिर बधाई.

शैलेश भारतवासी said...

बधाई हो ॰॰॰॰ बहुत-बहुत बधाई हो।

Udan Tashtari said...

बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

अमित पुरोहित said...

किशोरावस्था से आपको पढे जा रहा हूँ, शुरुआत प्रिंट से हुई थी. एक रजिस्टर भी बनाया, जयपुर से बीकानेर और बीकानेर से फ़िर जयपुर घर बदलने के चक्कर में वह खो गया. अब इन्टरनेट पर आपको पाकर ऐसा लगता हैं वह खोया रजिस्टर मिल गया हैं. फर्क बस इतना हैं की पहले आपको पढ़ कर, उसे मैं अपडेट करता था, अब यह काम आप ख़ुद मेरे लिए कर रहे हैं. आपका बहुत-बहुत शुक्रिया !

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