Friday, December 30, 2011

पाण्डुलिपि से गुम हस्तलेख

शब्द सन्दर्भ-कातिब, मदरसामुदर्रिस, मदारकाग़ज़vejir3

पा ण्डुलिपि हिन्दी का जाना-पहचाना और और बोली-भाषा में चलने वाला शब्द है। यह एक ऐसा शब्द है जिसकी अर्थवत्ता तो लगभग कायम रही है लेकिन विकसित होते समाज में लेखन तकनीक में आए बदलावों के चलते पाण्डुलिपि का शाब्दिक अर्थ मौजूदा दौर में वह नहीं रहा, मगर आशय आज भी कायम है। पाण्डुलेख या पाण्डुलिपि का मूल अर्थ है हाथ से लिखी गई किसी रचना का शुरुआती प्रारूप।यानी पाण्डुलेख दरअसल हस्तलेख ही है। हस्तलेख यानी हाथ से लिखा हुआ प्रारूप। अब पाण्डुलिपि का अर्थ प्रेसकॉपी हो गया है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि जब विचार-मीमांसा करते थे तो उनके भाष्य को किसी ज़माने में भूमि को गोबर से पोत कर उस पर खड़िया मिट्टी से लिपिबद्ध किया जाता था। कालान्तर में यह काम दीवारों पर होने लगा। उसके बाद लकड़ी की पाटियों का चलन हुआ। मिट्टी से पुते काष्ठ-फलक पर लिखा जाने लगा। उसके बाद ताड़पत्र पर लिखने का चलन हुआ और तब भी पुस्तकाकार प्रारूप का नाम पाण्डुलिपि रहा और फिर जब काग़ज़ का दौर आया, तब भी हस्तलिखित मसौदा ही पाण्डुलिपि कहलाता रहा। आज जबकि कम्प्युटर का युग है और हाथों से लिखना क़रीब क़रीब बन्द हो चुका है, कम्प्युटर के ज़रिए बनाए गए प्रारूप को भी पाण्डुलिपि ही कहते हैं।
पाण्डुलिपि हिन्दी की तत्सम शब्दावली का हिस्सा है। संस्कृत के पाण्डु और लिपि से मिल कर बना है पाण्डुलिपि। पाण्डु का अर्थ होता है पीला या सफ़ेद अथवा पीली आभा वाली सफेदी। वैसे पाण्डुलेख या पाण्डुलिपि में किसी सतह को सफेदी से पोत कर लिखने का भाव है। एक प्रसिद्ध पौराणिक पात्र और कुल के मुख्य पुरुष का नाम भी पाण्डु था। पाँच पाण्डव इन्ही पाण्डु की सन्तान थे। वे जन्म से पीले रंग के थे इसलिए उनका नाम पाण्डु पड़ा। मोनियर विलियम्स पाण्डु की व्युत्पत्ति संस्कृत की पण्ड धातु से होने की सम्भावना जताते हैं। इससे बने संस्कृत पाण्ड्र का अर्थ भी श्वेत होता है। इसका मराठी रूप है पांढर् जिसमें सफेद रंग का आशय है। श्वेतकमल के लिए पुण्ड्र या पुण्डरीक शब्द हैं जिनकी इस शब्दावली से रिश्तेदारी है। इनके मूल में पण् धातु है। पण् यानी पवित्र कर्म। गौर करें श्वेत वर्ण पवित्रता का पवित्र है। बेदाग। कलुषहीन। इसीलिए पाण्डु शब्द में सफेदी का भाव प्रमुख है। पाण्डु हल्के पीले रंग की मिट्टी को भी कहते हैं। पंजाब में लकड़ी की तख्ती पर लिखा जाता है। इसकी सतह को चिकनी मुल्तानी मिट्टी से पोत कर हमवार बनाया जाता है। मुल्तानी मिट्टी का रंग हल्का पीला होता है। रामरज भी इसी को कहते है। पीला रंग मांगलिक होता है। शादी ब्याह में पीले चावल दिए जाते हैं। गन्ध-चन्दन का रंग पीला होता है। पुरातात्विक उत्खनन में जहाँ कहीं मटमैले या धूसर रंगों के बर्तनों की अधिकता रही उसे पाण्डु भाण्ड सभ्यता नाम भी दिया गया।
पाण्डुलिपि शब्द बहुत प्राचीन नहीं है जबकि पुराने युग में इसके लिए पाण्डुलेख शब्द का प्रयोग होता था। वैसे भी किसी हस्तलिखि दस्तावेज या प्रारूप को पाण्डुलिपि कहना सही नहीं है। पाण्डुलेख ही सही शब्द है। पाण्डुलिपि शब्द से ऐसा आभास होता है मानो किसी लिपि का नाम पाण्डु है। लिपि शब्द का प्रचलित अर्थ वही है जो अंग्रेजी में स्क्रिप्ट का है यानी अक्षर, लेख, वर्णमाला, उत्कीर्णन, चित्रण आदि। प्राचीन काल में ज़मीन और दीवारों पर कुछ न कुछ चित्र उकेर कर ही मनुष्य ने अपने मनोभावों के दस्तावेजीकरण का काम शुरू किया था। इसके बाद ही भाषा के सन्दर्भ में चिह्नों पर मनुष्य का ध्यान गया। उसके द्वारा व्यक्त विविध चित्र-संकेत ही प्रारम्भिक भाषाओं के लिपि-चिह्न बने। लिपि बना है संस्कृत की लिप् धातु से जिसमें लेपना, पोतना, चुपड़ना, प्रज्वलित करना या आच्छादन करना जैसे भाव हैं। गौरतलब है कि वैदिक सभ्यता में हवन यज्ञादि से पूर्व भूमिपूजन के लिए ज़मीन को लीपा जाता था। उस पर माँगलिक चिह्न बनाए जाते थे। हिन्दी में लीपना, लेपन, आलेपन जैसी क्रियाएँ इससे ही बनी हैं। लिप् से ही बना है लिप्त शब्द जिसका अर्थ है किसी गीले पदार्थ से सना हुआ, लिपा हुआ, पुता हुआ। लिप्त का परवर्ती विकास किसी के असर में होना, लीन रहना, प्रभाव में होना जैसे आशयों से प्रकट होता है। कुछ और शब्द भी इसी कड़ी में हैं जैसे संलिप्त यानी संलग्न रहना और निर्लिप्त यानी अलग रहना, उदासीन रहना, जुड़ाव न होना।
गौरतलब है कि प्रारम्भिक लेखन कलम या लेखनी से नहीं, बल्कि लेखनी जैसी शलाका या नुकीले पत्थर से आलेपित सतह को गोदने या

manuscript2... पाण्डुलेख ही सही शब्द है। पाण्डुलिपि शब्द से ऐसा आभास होता है मानो किसी लिपि का नाम पाण्डु है।...

उत्कीर्ण करने से होता था। बाद में लिपि-चिह्न स्थिर होने के बाद जब ताड़ पत्र या कपड़े पर लिखने का चलन हुआ तब असल में लिपि को व्यावहारिक अर्थ मिला। सो पाण्डुलिपि शब्द में लिपि से तात्पर्य संकेताक्षर, चिह्न या वर्णमाला से ही है। किसी सतह को पीला या सफ़ेद पोत कर उस पर किसी भी रंग के लेखन को पाण्डुलिपि कहा गया। लेख में भी उत्कीर्णन का भाव है। यह बना है लिख् धातु से जिसमें लकीर खींचना, रेखा बनाना, घसीटना और छीलना, खुरचना जैसे भाव हैं। लिख का प्राचीन रूप था रिष् या ऋष्। देवनागरी का ऋ अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना। इसमें खरोचने, लकीर खींचने, चोट पहुंचाने जैसे अर्थ भी हैं। ऋ की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी, उर्दू, फारसी अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ। हिन्दी का रीति या रीत शब्द इससे ही निकला है। का प्रतिरूप नजर आता है अंग्रेजी के राइट ( सही-उचित) और जर्मन राख्त (राईट)में। लकीर और रेखा का अर्थ एक ही है। इन दोनों का मूल भी एक है। लिख् और रिष् धातुओं से इनका विकास हुआ है। अंग्रेजी का राइट शब्द भी इसी कड़ी में है। इनसे बने लेख, लेखनी, लेखक, लीक, लकीर, रेखा जैसे शब्द तो हिन्दी में खूब प्रचलित हैं।
पाण्डुलिपि के लिए पहले हस्तलेख या हस्तलिपि शब्द भी प्रचलित था। हस्तलेख मे हाथ से की गई चित्रकारी, लेखन से आशय है। बाद में इसका आशय दस्तावेज, परिपत्र या प्रारूप हो गया। बाद में इसे पाण्डुलिपि के अर्थ में लिया जाने लगा। चव्यापक अर्थो में पाण्डुलिपि या पाण्डुलेख में आलेख, प्रारूप, मुख्य प्रारूप, किसी कृति का प्रकाशन पूर्व का रूप जैसे आशय प्रकट होते हैं। मगर अब इसका प्रयोग पुस्तक प्रकाशन के सन्दर्भ में प्रेस कॉपी से ही है जिसे अंग्रेजी में मेन्युस्क्रिप्ट कहते हैं। यह बना है लैटिन के सामासिक पद मेन्युस्किप्टस manu scriptus से। इसका पहला पद बना है प्राचीन भारोपीय धातु मेन से जिसका अर्थ है हाथ, हाथ में हाथ देना आदि। अंग्रेजी का मेन्युअल शब्द इससे ही बना है जिसमें हस्तचालित, हस्तनिर्मित होने का भाव है। इसका एक अर्थ हस्तलिखित प्रारूप भी है। स्क्रिप्टस लैटिन के स्क्रिप्टम से बना है जिसमें किताब, नियमावली, लकीर, चिह्न जैसे भाव है। जिसके मूल में प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु स्कर है। प्राचीन भारोपीय धातु ker का ओल्ड जर्मनिक में रूप हुआ sker जिसका मतलब होता है काटना, बाँटना, विभाजन करना। संस्कृत में इसका रूप है कृ। कर्तन यानी काटना जैसा शब्द इससे ही बना है। कर्तनी यानी जिससे काटा जाए। कतरना, कतरनी यानी कैंची जैसे देशज शब्द इसके ही रूप हैं। अंग्रेजी के शेयर share यानी अंश, टुकड़ा, हिस्सा।

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Monday, December 26, 2011

…दम ले ले घड़ी भर-2

mws-breatheपिछली कड़ीःदम मारो दम और नाक में दम-1

म से कई मुहावरे जन्मे हैं और इनमें से कई फ़ारसी से आए हैं। दम में सुस्ताने का आशय भी है। दम लेना मुहावरे में यही बात व्यक्त हो रही है। सुस्ताना क्या है? यह भी श्वास प्रक्रिया का ही हिस्सा है। भागदौड़ और व्यस्तता से हट कर थोड़े समय के लिए चैन की साँस लेना ही दम लेना है। चैन की साँस लेना क्या है? फेंफड़ों के ज़रिए भरपूर हवा खींच कर जब हृदय में भेजी जाती है, तब हृदय इसमें से शुद्ध ऑक्सीजन खींच कर धमनियों के ज़रिए शरीर में भेजता है। चैन की साँस की यह जैविक व्याख्या है। दम लेने से फिर उत्साह आता है। सचिन देव बर्मन का गाना याद करें-“दम ले ले घड़ी भर, ये छैयाँ पाएगा कहाँ”। यहाँ दम सुस्ताने, चैन की साँस के अर्थ में है। लेकिन दम में क्षणभर, पलभर वाला भाव भी है। दम भर यानी क्षण भर। “ दम भर सुस्ता लूँ ” में एक साँस लेने जितने वक्त की मोहलत माँगी गई है। राजकपूर की फिल्म आवारा का गीत याद करें- “दम भर जो इधर मुँह फेरे...”यहाँ क्षण भर का ही आशय है। अचानक के अर्थ में हिन्दी में एकदम शब्द का खूब प्रयोग होता है। इस एकदम में कालांश का भाव है, तत्क्षणता की बात ही यहाँ प्रमुखता से उभरती है। दम यानी साँस इसलिए एकदम यानी एक साँस में। एक साँस और निश्वास में जितना वक्त लगता है, शीघ्रता का भाव है एकदम में। दम तोड़ना का अर्थ है मृत्यु होना। सांस टूटना इसका हिन्दी रूप है। हृदय का धड़कना बन्द होने से इसे जोड़ें। दम घोंटने से भी दम टूटता है और स्वाभाविक रूप से भी दम टूटता है।
कदम की तरह हरदम समास का भी हिन्दी में खूब प्रयोग होता। हरदम का प्रयोग हर वक्त की तरह होता है। हर दम में हर हर क्षण साथ जीने का भाव है। हरदम साथ रहना में हर वक्त साथ निभाने का आशय है। इसी तरह मित्र, संगी, बंधु को हमदम भी कहा जाता है। हमदम यानी साँस का संगी। जो हर पल साथ निभाए, वह है हमदम। साँस अगर रूकती है तो उसे साँस फूलना कहते हैं। अधिक श्रम करने पर भी ऐसा होता है और शारीरिक तन्त्र के विकार से भी ऐसा होता है। फ़ारसी में इसे दम फूलना कहते हैं और चलती हिन्दी में सांस की बीमारी। इसके लिए दमा शब्द आमतौर पर खूब प्रचलित है। धूम्रपान करनेवालों या धूल-गर्द के बीच रहने वालों को दमा की बीमारी होती है। कलन्दरों, फ़कीरों को यहाँ याद करें। लगातार गाँजा, चरस पीना उनकी खास पहचान रही है। “दमादम मस्त कलन्दर” वाली कव्वाली के दमादम में दम लगाना का आशय ही मूल है। यहाँ ध्यान रहे पकोर्नी धम की मूल भारोपीय धातु धेम dhem बताते हुए उसका रिश्ता फूँक, धुँआ और गर्द से विशेष तौर पर जोड़ते हैं। दमा के बारे में मशहूर है कि यह असाध्य रोग है इसलिए कहावत भी है कि “दमा तो दम के साथ ही जाता है”।
र्वाधिक चर्चित मुहावरा है नाक में दम करना। अर्थात बहुत तंग या परेशान करना। दरअसल इसमें छींकने की वजह से होने वाली परेशानी का अर्थविस्तार हुआ है। दम में निहित गर्द, धूल, दबाव, श्वास पर गौर करें। साँस की बीमारी, दमा, प्रदूषण या अन्य कारण से आने वाली छींकें श्वसन प्रणाली को बुरी तरह प्रभावित करती है। बेहद दबाव के साथ नाक से निश्वास निकलती है। कभी कभी यह क्रिया अनवरत जारी रहती है। यही है नाक में दमदम दिखाना, दमदार होना, दम भरना जैसे मुहावरों में शक्ति, सामर्थ्य उभर कर आ रहे हैं। दम दिखाना यानी ताक़त दिखाना। इसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों भाव है। दम दिखाना शौर्य प्रदर्शन भी हो सकता है और किसी का दमन करना भी हो सकता है। दम भरना यानी हूँकारना। हूँकार में दर असल अनुकरणात्मक शब्द है जो फेंफड़ों में एक साथ हवा भरने के बाद की निश्वास से उत्पन्न ध्वनि है। एक साथ साँस तभी भरी जाती है जब बहुत ज्यादा मेहनत की जाए, अधिक वज़न उठाया जाए। प्रकारान्तर से इसमें बड़ी जिम्मेदारी लेने की घोषणा का आशय है। आजकल दम भरना, डींग हाँकना का पर्याय भी है। इसमें मूलतः दूसरे पक्ष से खुद को ताकतवर साबित करने की बात है।
फ़ायर ब्रिगेड के लिए दमकल शब्द का प्रयोग होता है। दरअसल दमकल में ब्रिगेड और फायर का कोई भाव नहीं है बल्कि फायर ब्रिगेड की मशीन को दमकल कहा जाता है। हिन्दी शब्द सागर में दमकल का अर्थ बताया गया है, ऐसा यन्त्र जिसमें बहुत सारे नल लगे हों और जिनमें अत्यधिक दबाव से पानी छोड़ा जाता हो। यहाँ दम का अर्थ दबाव से है। कल यानी मशीन। मिट्टी के चूल्हे की जगह बाद में पोर्टेबल लोहे का चूल्हा आने लगा था इसे दम चूल्हा कहते थे। बोलचाल में इसके लिए सिगड़ी शब्द ज्यादा प्रचलित है। ग़रीब बस्तियों में यह अब भी मिलता है। इसमें लोहे के एक सिलेंडरनुमा आकार में जाली पर कोयला रखा जाता है। सिलेंडर के नीचे बने छेद से लगातार हवा फूँकी जाती है जिससे सिगड़ी का कोयला सुलगने लगता था। दम की महिमा निराली और अनंत है। हिन्दी में शुद्धतावाद का दम भरने वालों को समझ लेना चाहिए कि न जाने कितने प्रवासी शब्द भाषा संसार में निवासी बन गए हैं और उनके दम पर ही हिन्दी की विविध अभिव्यक्तियाँ टिकी हुई हैं।

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Sunday, December 25, 2011

दम मारो दम और नाक में दम-1

संबंधित आलेखः 1.कृष्ण की गली में 2.पकौड़ियां, पठान और कुकर

Blow"संस्कृत,ज़ेद व यूरोपीय भाषाओं का तुलनात्मक करने वाले जर्मन भाषाविद प्रो.एफ बॉप ने अठारहवीं सदी में भारोपीय धातु ध्म की कल्पना की थी जिसमें फूँकने, दबाने का भाव है।"
क ज़बान से दूसरी ज़बान में दाखिल हुए शब्दों के लोकप्रिय होने के पीछे कुछ खास वजह होती हैं। पहली वजह यह हो सकती है कि वह शब्द जिस भाव को अभिव्यक्त करता है वह भाव या संज्ञा मूल भाषा में न हो। जैसे अंग्रेजी के स्टेयरिंग, ब्रेक, टिफिन जैसे शब्दों के आसान विकल्प हिन्दी में नहीं हैं। दूसरी वजह उस शब्द के वैकल्पिक मूल शब्द की तुलना में विदेशी शब्द का उच्चारण आसान या लुभावना होना जैसे प्रसन्न, मुदित, आनंद की तुलना में फ़ारसी का ख़ुश शब्द ज़्यादा इस्तेमाल होता है। तीसरे क्रम पर ऐसे विदेशी शब्द आते हैं जिनकी अर्थवत्ता मूल भाषा के वैकल्पिक शब्द की तुलना में ज्यादा होती है इस कड़ी में दम शब्द आता है। फ़ारसी के दम में जितने भाव है उन्हे व्यक्त करने वाला हिन्दी में कोई अकेला शब्द नहीं है। एक भाषा के शब्दों की घुसपैठ दूसरी भाषा में इन्हीं कारणों से होती है। अक्सर इसके पीछे किसी साजिश को देखा जाता है। दम शब्द को हिन्दी नें अपनाया है और अब यह हिन्दी का ही हो गया है। मूल रूप से यह इंडो-ईरानी भाषा परिवार का सदस्य है। इससे मिल कर खान पान की शब्दावली में दमआलू या दमपुख्त ( भाप में पकी सामग्री) जैसे शब्द बने हैं तो स्वास्थ्य सम्बन्धी दमा शब्द भी इसी कतार में है। फायर ब्रिगेड वाला दमकल इंजन भी इसके साथ ही खड़ा नज़र आता है तो सूफ़ी कव्वाली दमादम मस्त कलन्दर की याद भी आए बिना नहीं रहती। चलते चलते मुहावरों वाला नाक में दम भी याद कर लीजिए। 
म का अर्थ है श्वास, प्राणवायु, ज़ोर, धक्का, धौंकना, दबाना, क्षण, कालांश, भाप, दबाव, शक्ति, जोश, वाष्प, खींचना, कश, सेंकना, विश्राम, वाष्पित वगैरह वगैरह। ध्यान रहे ये तमाम अर्थ हिन्दी के किसी एक शब्द में अभिव्यक्त नहीं होते। अगर दम का मूलार्थ दबाव, धकेलना, फूँकना भी माना जाए तो इसका आशय शक्ति, श्वास, या क्षण नहीं हो सकता मगर दम के अर्थ विस्तार में यह हुआ है। हृदय की दो धड़कनों के बीच के अन्तराल को दम शब्द की अर्थवत्ता में इज़ाफ़ा कर दिया और इसमें क्षण या लम्हा का आशय उभर आया। फ़ारसी दम का मूल है अवेस्ता का दम शब्द है। इसका संस्कृत प्रतिरूप है धम् जिसमें धौंकने, फूँकने, धकेलने, निश्वास और फूँक कर आग सुलगाने का आशय है।

breathing... दम का मूलार्थ दबाव, धकेलना, फूँकना भी माना जाए तो इसका आशय शक्ति, श्वास, या क्षण नहीं हो सकता मगर दम के अर्थ विस्तार में यह हुआ है। ...

इंडो-ईरानी परिवार की ज्यादातर भाषाओं में जैसे खोतानी, पार्थियन, फ़ारसी, सोग्दियन और पहलवी में इसका दम रूपान्तर ही प्रचलित है। संस्कृत,ज़ेद व यूरोपीय भाषाओं का तुलनात्मक करने वाले जर्मन भाषाविद प्रो.एफ बॉप ने अठारहवीं सदी में भारोपीय धातु ध्म की कल्पना की थी जिसमें फूँकने, दबाने का भाव है। पकोर्नी इसके लिए
dhem धातु बताते हैं। उनके मुताबिक इसमें धौंकने के साथ साथ धूल-धुँआ उड़ने जैसा भाव भी है। वे अंग्रेजी के dim, damp जैसे शब्दों का रिश्ता इससे जोड़ते हैं। दक्षिण-पूर्वी ईरानी ज़बान पारची में इसका रूप धमन होता है जिसका अर्थ है हवा, वायु। हिन्दी में धम्मन चमड़े से बनी उस झोली ( भाथी )को कहते हैं जिसे दबाने से भट्टी में हवा पहुँचती है। हारमोनियम का हवा भरने का पल्ला भी धम्मन कहलाता है। प्राकृत में इसका रूप धमणी है अर्थात धौंकनी। हवा फूँकने की नली। 
संस्कृत धम में निहित फूँकने, धकेलने की क्रिया से श्वास लेने के आशय का शब्द चाहे हिन्दी में नहीं बना हो, पर इसके फ़ारसी रूपान्तर दम में यही सारे भाव होते हुए श्वास लेने का भाव भी प्रकट होता है। हृदय का काम लगातार फूलना-सिकुड़ना है जिसके ज़रिए नसों में दबाव के साथ खून दौड़ता है। हिन्दी में हृदय से ताज़ा रक्त शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाने वाली वाहिनी को धमनी कहती है। यह धमनी शब्द इसी धम से आ रहा है जिसका आशय है तेज दबाव वाली रक्तवाहिनी। प्राकृत में इसका रूप धमणी है अर्थात धौंकनी। हवा फूँकने की नली। हृदय दरअसल रक्तशोधन यन्त्र है। रक्त में यहाँ ऑक्सीजन मिलाई जाती है और उसे धक्के से धमनी के ज़रिए पूरे शरीर में दौड़ाया जाता है। अशुद्ध रक्त वाली वाहिनी को शिरा कहते हैं जो पूरे शरीर से अशुद्ध रक्त एकत्र कर फिर से हृदय तक लाती है। लुहारों-कसेरों के यहाँ छोटी भट्टी होती है जिसे बाँस या धातू की पोली फूँकनी से फूँका जाता है ताकि आग तेज़ हो सके। इसे धौंकनी कहते हैं। ज्यादा हवा यानी ज्यादा आक्सीजन। आग को हवा नहीं, आक्सीजन की दरकार होती है। संस्कृत में धमक शब्द का अर्थ फूँकने, धौंकने वाला है। धौंकनी भी इसी मूल का है। अलबत्ता हिन्दी के धमक, धमकी जैसे शब्दों की इससे कोई रिश्तेदारी नहीं है। मेरे विचार में ये दोनो शब्द अनुकरणात्मक हैं।
म् में निहित फूँकने, धकेलने की क्रिया का अर्थविस्तार ताक़त, शक्ति के अर्थ में फ़ारसी के दम में नज़र आता है। दम लगाना यानी ज़ोर लगाना है। चिलम या हुक्का पीने को “दम लगाना” या “दम मारना” भी कहते हैं जहाँ इसका अर्थ धुँए के कश को ताक़त के साथ भीतर खींचना है। गौरतलब है कि दम की तरह ही कश भी इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है। संस्कृत का मूल शब्द है “कृष्” जिसका अर्थ है खींचना, धकेलना, उखाड़ना और हल चलाना। प्राचीन फारसी यानी अवेस्ता में भी “कृष्” शब्द इसी अर्थ में प्रचलित था। आज की फारसी में इसका रूप कश के रूप में मिलता है। कश यानी खींचना। गौर करें कि धूम्रपान में धुँएं को खींचा जाता है इसलिए इस क्रिया को कश कहा जाता है। इसी कश से बना कशिश जिसका मतलब भी आकर्षण है और खुद आकर्षण इसी कृष से बना है। कशमकश, रस्साकशी, मेहनतकश, नीमकश फाकाकशी जैसे शब्दों में भी यह मौजूद है। -जारी

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Friday, December 23, 2011

...लेकिन अपना अपना दामन

पिछली कड़ियाँ-1.दम्पती यानी घर के मालिक 2.घरबारी होना, गिरस्तिन बननाOLYMPUS DIGITAL CAMERA

न्धन को लोग नकारात्मक भाव से लेते हैं जबकि इसमें सकारात्मकता है। बन्धन में हमेशा सुरक्षा और जुड़ाव का भाव होता है। वैवाहिक स्थिति के सन्दर्भ में भी विवाह-बन्धन शब्द का जो प्रयोग है वह एक सूत्र में बन्धने के साथ सह-जीवन का अनुबन्ध भी होता है। दाम्पत्य में एक दूसरे के अधीन होने का जो भाव है वह इसीलिए है। “दाम्पत्य” बना है संस्कृत के दम से जिसका अर्थ है घर, आश्रय, निवास आदि। दम में बांधने का, रोकने का, थामने का, अधीन करने का भाव भी है। ज़ाहिर है ये सारे गुण जिस चीज़ में होते हैं उसे घर भी कहते हैं और बन्धन भी। घर भी बन्धन है, परिवार भी बन्धन है। हर वह व्यवस्था बन्धन है जिसके न रहने से हम बिखरने लगते हैं। बन्धन में सुरक्षा है, भरोसा है, विश्रान्ति है और आनंद है। “दम” की कड़ी में ही इंडो-ईरानी परिवार का एक अन्य शब्द भी है “दामन”। फ़ारसी से हिन्दी में आए कुछ विशिष्ट शब्दों में “दामन” भी एक है। दामन का प्रयोग बोलचाल की हिन्दी में भी होता है और साहित्यिक हिन्दी में भी, खासतौर पर शायरी में खूब होता है। दम से जुड़े सभी बन्धनकारी, आश्रयसूचक भावों का समावेश दामन में है। “फूल खिले हैं, गुलशन गुलशन। लेकिन अपना अपना दामन।।” जिगर मुरादाबादी के इस मशहूर शेर का भाव यही है कि खुदा की बनाई यह दुनिया गुणों की खान है। इसमें से कितना कुछ अपनी झोली में भर पाते हैं, यह देखने की बात है।
दामन का अर्थ होता है साड़ी का पल्ला, पल्लू, आँचल, अंगवस्त्र का निचला झूलता हिस्सा जिसे किसी अन्य के कंधे पर भी डाला जा सकता है या खुद के सिर को भी ढँका जा सकता है। दामन में छाया का भाव भी है। हवाओं से चलते वाले जहाज़ों के बादबान को भी दामन कहा जाता है। पर्वतीय उपत्यका को भी दामन कहते हैं क्योंकि वह चारों ओर से सुरक्षित होती है। पहाड़ी के दामन में ही बसाहट होती है। मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोश के मुताबिक मैदान या समतल भूमि को भी दामन कहा जाता है। साड़ी के पल्लू के लिए आँचल शब्द भी खूब इस्तेमाल होता है। अंचल या आँचल में भी सुरक्षा का भाव है। आँचल पल्ला भी है, छाया भी और बन्धन भी। अंचल का अर्थ इलाका, क्षेत्र भी होता है। प्रायः क्षेत्र के नामों के साथ अंचल शब्द का इस्तेमाल होता है जैसे वनांचल, अरुणांचल आदि। दामन शब्द की मुहावरेदार अर्थवत्ता भी है और पल्ले से जुड़े जितने भी मुहावरे हैं वे सब दामन के साथ इस्तेमाल होते हैं जैसे “दामन थामना” यानी संकट में भरोसा करना, “दामन छुड़ाना’ यानी पीछा छुड़ाना, “दामन में छिपाना” यानी आश्रय में लेना आदि। हाँ, उर्दू में “दामन साफ़ होना”, “पाक दामन होना” जैसे लोकप्रिय मुहावरे भी हैं। पाक-दामन या दामन साफ़ होना का अर्थ है किसी भी बुराई से खुद को बचा कर रखना। दामन के निवास या घर जैसे अर्थों पर गौर करें। “मेरा दामन साफ़ है” का अर्थ खुद के चरित्र, घर, ज़मीन या आधार को पवित्र बताना ही है। उर्दू में दामने-मरियम मुहावरा है। सतीत्व, साधुता के सन्दर्भ में इसका प्रयोग होता है। गौरतलब है कि मरियम का दामन बेदाग़ था।
इंडो-ईरानी परिवार का होने के नाते दम, दामन, दाम के उर्दू, फ़ारसी में समान आशय के बावजूद अर्थवत्ता में कुछ अन्तर है। जैसे दाम का एक अर्थ पालतू मवेशी भी होता है। भाव यहाँ भी जंगली, वनचर को अपना सहचर बना लेने का है। गौर करें कि पालतू बनाने के लिए पशुओं को जाल में फाँसना पड़ता है। फाँसने का फन्दा रस्सी से ही बनता है। जाल भी बिछाया जाता है जो रस्सी से ही बनता है। फाँसना क्रिया के मूल में ही दरअसल खुद पशु है। पशु है इसीलिए वह फँसता है। पशु शब्द की उत्पत्ति भी दिलचस्प है। आदिमकाल से ही मनुष्य पशुओं पर काबू करने की जुगत करता रहा। अपनी बुद्धि से उसने डोरी-जाल आदि बनाए और हिंसक जीवों को भी काबू कर लिया। संस्कृत में एक शब्द है पाश: जिसका अर्थ है फंदा, डोरी, शृंखला, बेड़ी वगैरह। जाहिर है जिन पर पाश से काबू पाया जा सकता था वे ही पशु कहलाए। पाश: शब्द से ही हिन्दी का पाश शब्द बना जिससे बाहूपाश, मोहपाश जैसे लफ्ज बने। प्राचीनकाल में पाश एक अस्त्र को भी कहा जाता था। पाश: शब्द के जाल और फंदे जैसे अर्थों को और विस्तार तब मिला जब बोलचाल की भाषा में इससे फाँस, फाँसी, फँसा, फँसना, फँसाना जैसे शब्द भी बने।
पौराणिक सन्दर्भों में दम का अर्थ पाश, रस्सी, माला, हार, कमरबन्द आदि के तौर पर भी मिलता है। कृष्ण का एक नाम दामोदर भी है। माँ यशोदा ने कृष्ण को एक बार कमरबन्द के ज़रिए पेड़ के तने से बान्ध दिया था। इसीलिए उन्हें दामोदर (दाम + उदर जिसका पेट रस्सी से बन्धा हो) कहा जाने लगा। यह तो हुआ दाम का बन्धनकारक यानी रस्सी के आशय वाला भाव। आश्रय सूचक भाव वाली व्याख्या भी है। दाम का अर्थ विश्व या लोक से ग्रहण करते हुए इसका अर्थ-जिसके उदर में सारा विश्व हो, यह भी बताया जाता है। हिन्दी में अदवान, अदवाइन जैसे शब्द भी हैं जिनसे रस्सी का आशय निकलता है। अदवाइन या अदवान चारपाई के पैंताने की ओर वाली रस्सी की उस बुनावट को कहते हैं जिसके जरिए चारपाई के झोल को कसा जाता है। टर्नर के अनुसार यह बना है अन्तदमनी से जबकि शब्दसागर के मुताबिक यह अधःदाम से बना है। दोनों में ही दाम शब्द का महत्व है। बाकी अन्त और अधः का भाव भी एक ही है। प्रायः सभी कोशों में दामनी को एक रस्सी या वह आवरण बताया जाता है जिसे घोड़ों के पुश्त पर धूप से बचाव के लिए डाला जाता है। दामनी का एक अर्थ मद्दाह साहब के कोश में महिलाओं की ओढ़नी भी बताया गया है। दामनगीर उस व्यक्ति को कहते हैं जिसने आश्रय के लिए साथ पाया हो, दामन पकड़ा हो। वह साया, छाया अथवा आश्रय जिसकी छत्रछाया में हम महफ़ूज़ रहें, उसे दामने-दौलत कहते हैं। मित्र का साथ ही दामने-यार है और रात का आखिरी पहर दामने-शब है।

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Tuesday, December 20, 2011

मुहावरे में बचा कुठाराघात

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हि न्दी का कुठाराघात ऐसा शब्द है जो तत्सम शब्दों के मेल से बना होने के बावजूद लिखत-पढ़त और बोलचाल की हिन्दी में बना हुआ है। लिखत-पढ़त में ज्यादा, बोलचाल में कम। मगर शब्दों के जीवन्तता को आँकने के यही पैमाने हैं। पहला, वर्तमान लिखत-पढ़त में कोई शब्द कितना इस्तेमाल हो रहा है। दूसरा, यह शब्द कितना बोला जा रहा है। कोई शब्द अगर साहित्य की भाषा में बना हुआ है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में वह बोली-भाषा में शामिल हो जाएगा। शायद शिष्ट-कुलीन समाज में उसका व्यवहार होता भी हो। सो कुठाराघात शब्द से हिन्दी समाज का सामान्य पढ़ा लिखा व्यक्ति अपरिचित नहीं है। बहुत बड़े नुकसान के तौर पर इसका आशय सहज बोधगम्य है क्योंकि लगातार कुठाराघात के चलते पेड़ तो छोड़िए, जंगल के जंगल मनुष्य ने पहले कुल्हाड़ों, फिर आरामशीनों से खत्म कर दिए। ऐसे में अब जो भी कुठाराघात होना है, वह मुहावरे के आईने में ही होगा।
कुठाराघात शब्द का एक प्रयोग देखिए-'”हिन्दू समाज की कई कुरीतियों के खिलाफ़ कबीरबानी एक तरह से कुठाराघात थी।” संस्कृत के कुठार में आघात शब्द जोड़ने से बना है कुठाराघात जिसका अर्थ होता है कुल्हाड़ी द्वारा किया गया आघात। कुठार शब्द बना है कुठ् धातु से जिसका अर्थ होता है पेड़, वृक्ष। कुठार शब्द में कुठ के साथ जो आर् नज़र आ रहा है वह दरअसल आरी वाला आर् है। हिन्दी में आरी उस दाँतेदार यन्त्र को कहते हैं जिससे कठोर सतह को काटा जाता है। आमतौर पर इससे लकड़ी ही काटी जाती है। कुठ + आर = कुठार। यह जो आर् है इसे समझने के लिए किसी गरारी लगे यंत्र के चक्कों में बनें दाँतों पर गौर करें। संस्कृत में इसके लिए ही अरः शब्द है जिसके मूल में धातु है। में मूलतः गति का भाव है। जाना, पाना, घूमना, भ्रमण करना, परिधि पर चक्कर लगाना आदि। ऋतु का अर्थ है चक्कर क्योंकि नियतकाल के बाद मौसम परिवर्तन होता है। यहाँ चक्र गति है। गरारी के दाँतों में फँसी शृंखला घूमते हुए यन्त्र के चक्के लगातार घूमते रहते हैं। गरारी की व्युत्पत्ति देखें- अरघट्ट> गरह्ट्ट> गरट्ट> गरारी। इसी तरह लोहे या लकड़ी को काटनेवाले दांतेदार यंत्र के लिए आरी नाम भी इसी अरः से आ रहा है। हिन्दी का आरा और अंग्रेजी की मशीन को जोड़ कर आरामशीन एक नया शब्द हिन्दी को मिल गया। भाषा ऐसे ही विकसित होती है। स्पष्ट है कि कुठार में यही आर् है। अर्थात कुठार उस दाँतेदार या तीखे यन्त्र का नाम है जिससे पेड़ काटा जाए। कुठार से ही हिन्दी के

treesforfree_suicide ... वृक्ष के तने पर कुल्हाड़ी का वार उस वृक्ष की प्रगति को रोक देता है। तने पर कुठाराघात होने से वृक्ष के विकास की कोई सम्भावना बाकी नहीं रहती क्योंकि इसे पोषण देने वाले इसके विभिन्न अंग इससे काट दिए जाते हैं। ...

बहुप्रचलित कुल्हाड़ा या कुल्हाड़ी शब्द बने हैं। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक कुल्हाड़े का मानक माप बारह चौदह अंगुल लंबा और चार छह अंगुल चौड़ा लोहे का होता है। इसके एक सिर पर, जो तीन चार अंगुल मोटा होता है, एक लंबा, गोला छेद, इंच सवा इंच व्यास का होता है जिसमें लकड़ी का दस्ता लगाया जाता है, और दूसरा सिरा पतला, लंबा और धारदार होता है। कुठारा या कुठारी का प्रयोग क्रमशः नाश करने वाला या नाश करने वाली भी होता है।
कुठाराघात का अगला पद है आघात जो बना है घात में उपसर्ग लगने से। घात भारोपीय मूल का शब्द है। प्रोटो इंडो-यूरोपियन भाषा का एक मूल शब्द है ग्वेन। इससे ही भाषाविज्ञानी संस्कृत के हन् या हत् का रिश्ता जोड़ते हैं। इस हन् का ही एक रूप घन् है। इस हन् की व्यापकता इतनी हुई कि अरबी समेत यह यूरोप की कई भाषाओं में जा पहुँचा और चोट पहुँचाना या मार डालना जैसे अर्थों में तो अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई ही साथ ही इसके विपरीत अर्थ वाले शब्द जैसे डिफेन्स (रक्षा या बचाव) के जन्म में भी अपना योगदान दिया। यही नहीं हत्या के प्रमुख उपकरण- अंग्रेजी भाषा के गन की रिश्तेदारी भी इसी हन् से है। हन् न सिर्फ हत्या - हनन आदि शब्दों से बल्कि आहत, हताहत, हतभाग जैसे शब्दों से भी झाँक रहा है। यही नहीं, निराशा को उजागर करनेवाले हताशा और हतोत्साह जैसे शब्दों का जन्म भी इससे ही हुआ है। कहावत है कि बेइज्जती मौत से भी बढ़कर है। हन् जब अरबी में पहुँचा तब तक संस्कृत में ही इसका हत् रूप विकसित हो चुका था। अरबी में इसका रूप हुआ हत्क जिसका मतलब है बेइज्जती, अपमान या तिरस्कार। इसी तरह हत्फ़ यानी मृत्यु। यही हत्क जब हिन्दी में आया तो हतक बन गया जिसका अर्थ भी मानहानि है। हन् से हत् बना और इसके प्रतिरूप घन् से घात बना। घात यानी प्रहार, आघात, चोट, पहुँचाना। घातिन हत्यारे को कहते हैं। आघात का अर्थ भी चोट पहुँचाना, मारना, हिंसक प्रहार होता है। आप्टे कोश के मुताबिक इसका एक अर्थ कसाई खाना भी होता है।
स्पष्ट है कि कुठाराघात में निहित स्थूल भाव तो पेड़ काटने का है मगर इसकी मुहावरेदार अर्तवत्ता में किसी को भरपूर नुकसान पहुँचाने का भाव है। जब हम कहते हैं कि फलाँ बात, फलाँ योजना पर कुठाराघात हुआ तो उसे समझने के लिए हमेशा इस शब्द के मूलार्थ को पकड़ना चाहिए। जिस तरह किसी वृक्ष के तने पर कुल्हाड़ी का वार उस वृक्ष की प्रगति को रोक देता है। तने पर कुठाराघात होने से वृक्ष के विकास की कोई सम्भावना बाकी नहीं रहती क्योंकि इसे पोषण देने वाले इसके विभिन्न अंग इससे काट दिए जाते हैं। इसी तरह किसी योजना या निर्माण पर इसी तरह कोई मुश्किल पैदा करने वाली परिस्थिति निर्मित होने पर उसे भी कुठाराघात की संज्ञा दी जाती है। जब से रिवल्वर, पिस्तौल जैसे हथियार सामने आए हैं, धीरे धीरे मनुष्यों पर कुठाराघात नहीं, गोलियाँ चलने लगीं। 

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Saturday, December 17, 2011

घरबारी होना, गिरस्तिन बनना

landlord पिछली कड़ी-दम्पती यानी घर के मालिक

रो टी, कपड़ा और मकान, नून, तेल, लकड़ी या आटा-दाल का भाव जैसे मुहावरों में क्या समानता है? मोटे तौर पर इन मुहावरों में पदार्थों का उल्लेख है और जिस क्रम और जोड़े के साथ उल्लेख है, उसका महत्व तो गृहस्थी में ही है। गृहस्थ उसे कहते हैं जो घर में रहता हो। गृह+स्थ्  से बना है यह शब्द अर्थात जो घर में स्थिर हो। भारतीय परम्परा में गृहस्थाश्रम चार वर्णाश्रमों में दूसरा अधिष्ठान है। गृहस्थ में विवाहित, बाल-बच्चेदार, गृहपति जैसे भाव हैं। घर और मकान दरअसल एक से शब्द लगते हैं मगर इनमें फ़र्क है। ‘घर’ एक व्यवस्था है जबकि ‘मकान’ एक सुविधा है। ‘घर’ बनता है रिश्तों से, प्रेम से और व्यवहार से जबकि ‘मकान’ बनाता है ईंट-गारे से। सो घर जैसी व्यवस्था में रिश्तों के अधीन होना ज़रूरी होता है। इसीलिए आमतौर पर घर होना, किसी रिश्ते में बंधने जैसा है। शादी-शुदा व्यक्ति को इसीलिए घरबारी कहा जाता है क्योंकि वह रिश्ते के अधीन हो चुका है। किसी स्त्री को गिरस्तिन तभी कहा जाता है जबकि वह विवाहिता हो। मकान को घर का दर्जा यूँ ही नहीं मिल जाता। ‘घर’ बनवाया नहीं, बसाया जाता है। सो गृहस्थ, घरबारी जैसे शब्दों के मूल में जो बात उभर रही है वह है रहने का ठिकाना होना। यानी रहने का ठिकाना ही किसी व्यक्ति को समाज में सम्मान दिलाता है। 
शालीन वही है जो शाल् अर्थात घर में रहता है। आज चाहे शालीन का अर्थ शीलयुक्त हो मगर किसी ज़माने में शालीन का अर्थ घर में रहने वाला यानी घरबारी ही था।  दाम्पत्य में बंधा व्यक्ति दम्पती सिर्फ़ इसलिए नहीं है क्योंकि वह विवाहित अवस्था में है, बल्कि वह गृहस्थ है, गृहपति है। गृहस्थ के लिए ‘घरबारी’ शब्द बना है घर + द्वार से। घरद्वार एक सामासिक पद है जिसमें द्वार भी घर जैसा ही अर्थ दे रहा है। द्वार से ‘द’ का लोप होकर ‘व’ बचता है जो अगली कड़ी में ‘ब’ में तब्दील होता है। इस तरह घरद्वार से घरबार प्राप्त होता है जिससे बनता है घरबारी। गिरस्तिन भी दम्पति के अर्थ में असली घरमालकिन है। घर शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के गृह से मानी जाती है। संस्कृत का गृह और प्राकृत घर एक दूसरे के रूपान्तर हैं। यहाँ ‘र’ वर्ण ‘ग’ से अपना दामन छुड़ा कर आज़ाद होता है और ‘ह’ खुद को ‘ग’ से जोड़ कर ‘घ’ में तब्दील होता है इस तरह ‘गृह’ से ‘घर’ बनता है। मगर घर को अग्निपूजा अनुष्ठान से जोड़ कर भी देखना होगा। प्राचीन अग्निपूजक समाज में प्रत्येक आवास के भीतर एक अग्निस्थान अवश्य होता था। उससे भी पहले कबीलाई दौर में समूह के लिए अग्निग्रह होता था अग्निपीठ का महत्व उपासनास्थल जैसा था और उसी के आस-पास पूरा कुनबा बसता था। उस दौर में अग्नि की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण थी। अग्नि की दैवी महत्ता तो आज भी जनमानस में कायम है। वेदों में अग्नि चुराने का उल्लेख कई बार है। बाद में विकासशील समाज ने पृथक आवासों का निर्माण किया तब भी अग्निस्थान निश्चित रहता था। डॉ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि प्राचीन समाजों में अग्निस्थान और आवास दोनों के लिए अग्नि सम्बन्धी शब्दावली देखने को मिलती है।
गृह का पूर्व रूप गृभ् हो सकता है। ‘घृ’ धातु में चमक, कान्ति का भाव है जो अग्नि का विशिष्ट गुण है। गृह के अर्थ में आवास अर्थ बाद का विकास है। रामविलासजी के मुताबिक संस्कृत के गृह का ‘गृ’, ग्रीष्म के ‘ग्री’ के समान मूलतः अग्निवाचक है। गृह, गृध व अग्नि रखने के स्थान हर्म्य का अर्थ अग्निस्थान भी है और भवन भी है। मोनियर विलियम्स ने ठीक सुझाव दिया है कि इसका सम्बन्ध ‘घृ’ और हर्म्य से होगा जिसका मूलार्थ है पारिवारिक अग्निस्थान। हर्म्य के पूर्वरूप घर्म्य के ‘घर्’ से हिन्दी का ‘घर’ बना। घर्म्य वह स्थान है जहाँ ‘घर्’ अर्थात अग्नि रखी जाती है। प्राचीन काल से घर में अग्नि का होना, अग्नि अनुष्ठान अर्थात अग्नि के आह्वान के साथ भोजन निर्माण होने से ही घर को ‘घर’ का महत्व मिलता था। जिस घर में रसोई न हो, वह ‘घर’ नहीं होता। फ़ारसी का गर्म, वैदिक घर्म का प्रतिरूप है। घर्म से ही गर्मी के लिए ‘घाम’ शब्द बना है। वैदिक ‘हर्म्य’ की रिश्तेदारी संस्कृत के ‘होम’ से है। संस्कृत के ‘होम’ और अंग्रेजी के ‘होम’ में ध्वनिसाम्य तो है पर अर्थसाम्य नहीं। संस्कृत के होम में जहाँ मूल अग्नि का अर्थ प्रधानता के साथ बना हुआ है वहीं अंग्रेजी के होम में वैदिक भाषा के निवास के आशय वाला गौण अर्थ प्रमुख हो जाता है। यहाँ यह उल्लेख ज़रूरी है कि पाश्चात्य भाषा विज्ञानियों नें अंग्रेजी के होम को भारोपीय भाषी परिवार का शब्द तो माना है मगर उसकी व्युत्पत्ति को लेकर उनके पास अलग तर्क हैं।
houseइंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु kam या कम् में भी मुख्यतः झुकाव या टेढ़ापन है जिससे फारसी में कमान या कमानी शब्द बने। संस्कृत की कुट् धातु में भी टेढ़ेपन का भाव है। प्राचीन मकानों की छतें प्रायः दोतरफ़ा ढलानवाली होती थीं। आदिम आश्रयों का निर्माण टहनियों को दोहरा मोड़ने की तरकीब से हुआ। मोड़ी हुई टहनियाँ दीवारों पर टिकाई जाती थीं जिस पर पत्ते, फूस आदि डालकर बनाए छप्पर को छत कहा जाता था। संस्कृत के स्कम्भ और फ़ारसी के खम पर गौर करें। खम का अर्थ है झुकाव या टेढ़ापन। स्कम्भ में झुकाव या टेढ़ापन न होकर मुख्य स्तम्भ का भाव है। खम का ही रूप है कमान। कमान, मेहराब को ही कहते हैं जिस पर मुख्यतः मकान की छत डाली जाती है। अंग्रेजी का होम शब्द भी इसी श्रंखला की कड़ी है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का होम शब्द पोस्ट जर्मनिक के khaim ख़ैम से आया है जिसका गोथिक रूप होता है हैम haim जिसने अंग्रेजी में home का रूप लिया।
 ग्निस्थान के आश्रय वाले गौण अर्थ को बाद के दौर में प्रधानता मिली और अग्नि को सुरक्षित रखने वाले सुरक्षित, घिरे हुए स्थान का भाव इसमें खास हो गया। पाश्चात्य भाषा विज्ञानियों ने इसी घिरे हुए सुरक्षित स्थान वाले अर्थ को निवास के सन्दर्भ में प्रमुखता देते हुए इससे मिलते-जुलते शब्दों को एक वर्ग में रखा। पकोर्नी की भारोपीय धातु तालिका में घेर् *gher- का रिश्ता संस्कृत के घर से जोड़ा गया है। हिन्दी के घिरना, घेरना का सम्बन्ध प्राचीन क्रिया घर् से अगर बनता है, जैसा कि पकोर्नी बताते हैं तो यह उत्तर वैदिक विकास कहा जा सकता है जब घर् में निहित अग्निसूचक भाव गौण होकर निवास, आश्रय प्रमुख हो गया। प्रकारान्तर से यह घेर, घेरा जैसे सुरक्षात्मक भावों की वजह से हुआ है। घेर् *gher-में भी घिरने, घेरने, बाड़ा, वाटिका, प्रांगण, परिसर, जैसे भाव हैं। अंग्रेजी का यार्ड शब्द इसी मूल का है जिसका अर्थ है किसी घर का अहाता या उससे सटा हुआ खाली स्थान। आवास से जुड़े परिसर को भी यार्ड yard कहते हैं। अंग्रेजी का गार्डन शब्द हिन्दी में भी बहुत प्रचलित है। यह इसी मूल का है। अल्बानी में इसका रूप गर्थ है जिसका अर्थ है बाड़, लैटिन में बगीचे के अर्थ में यह होर्तुस है, जर्मन में यह गार्तेन है। यूरोपीय भाषाओं में बस्तियों के नामों के बाद ग्राद, ग्रेड जैसे प्रत्यय लगे हुए मिलते हैं। ठीक वैसे, जैसे हिन्दी में पुर, नगर, नेर, वाड़ा (जबलपुर, जामनगर, बीकानेर, विजयवाड़ा) होते हैं। लेनिनग्राद या बेलग्रेड से इसे समझा जा सकता है। यह ग्राद, ग्रेड इसी मूल के हैं जिनका अर्थ है नगर, किला, बस्ती वगैरह। प्राचीन फ्रीसियन में इसका रूप गोर्दुम  था। रूसी में यह गोरोद gorod या ग्राद grad होता है। ये सारे विकास आदि भारोपीय घोर्धोस से हुए हैं। –अगली कड़ीः ...लेकिन अपना अपना दामन

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Wednesday, December 14, 2011

जिगरी का गुर्दा और कलेजा

पिछली कड़ियाँ1.आखिर क्या है ये ‘सौहार्द्र’2.दिलो-दिमाग़ की बातें hearts

दि ल की बात निराली होती है, पर किसी ने सोचा नहीं होगा कि इतनी निराली होगी जहाँ जिगर दिल से ज़्यादा मज़बूत नज़र आएगा। गुर्दा भी दिल हो जाएगा और कलेजा भी दिल कहलाने लगेगा। मगर सच यही है कि हृदय को दिल तो कहा ही जाता है साथ ही कलेजा और जिगर भी इसके ही नाम है। पिछली कड़ी में स्पष्ट हुआ कि हृदय से ही दिल बना है। सवाल उठता है कि कलेजा और जिगर कहाँ से आए और क्यों दिल के पर्याय बन गए। मुझे लगता है मूलतः यह लोक-अभिव्यक्ति है। दिल के लिए वृक्क (किडनी) और यकृत ( लिवर ) जैसे महत्वपूर्ण शरीरांगों को क्रमश जिगर और कलेजा कहना सामान्य बात नहीं है। एक खास चीज़ के लिए कई सारी उपमाएँ या पर्याय तभी सामने आते हैं जबकि उसके ज़रिये कई तरह की अभिव्यक्तियाँ होती हों। चिन्तन-पीठ के स्तर पर दिल और दिमाग़ एक मुकाम पर खड़े नज़र आते हैं। यह अलग बात है कि दुनियावी मामलों में दिल की सोच को, दिमाग़ की सोच से कम तरज़ीह दी गई है, बावजूद इसके दिल के बाकी जितने भी पर्याय हैं वे सोचने का काम नहीं करते। उनका ज़िक्र जिस्मानी हिस्से या शारीरिक अवयव की तरह ही होता है।
बसे पहले दिल-गुर्दा की बात। इस शब्दयुग्म में भी मुहावरेदार अर्थत्ता है जिसका अर्थ होता है, शक्ति, सामर्थ्य और हिम्मत। मिसाल के तौर पर देखे-आसमान से छलाँग लगाना आसान नहीं, दिल-गुर्दे का काम है। अब यह गुर्दा शब्द सीधे सीधे दिल का पर्याय तो नहीं, पर दिल के साथ इसे अक्सर जोड़ा जाता है। खून को साफ़ रखने का काम करने वाले हिस्से के लिए हिन्दी में किडनी kidney या गुर्दा बेहद आम शब्द हैं। इसे संस्कृत में एक शब्द है वृक्क जिसका अर्थ है हृदय और गुर्दा। टर्नर के मुताबिक वृक्क शब्द में आंत, गुर्दा, हृदय, फेंफड़े जैसे सभी आन्तरिक अंगों की अभिव्यक्ति होती है। हृदय और गुर्दा शब्द के आदिमूल के साथ हृदय शब्द चस्पा था, इसीलिए बाद के दौर में जिगर या कलेजा जैसे भीतरी हिस्सों के साथ भी हृदय का अर्थ जुड़ता चला गया। वृक्क का अवेस्ताई रूप है वेरेत्का या वेरेद्त्का जिससे इसका पहलवी रूप प्राप्त होता है गुर्तक। फ़ारसी के उत्तरी सीमान्त क्षेत्रों में इसका गुर्दा रूप प्रचलित हुआ। हिन्दी में एक मुहावरा है-बुक्का फाड़ कर रोना। आमतौर पर यह माना जाता है कि वृक्क का अपभ्रंश बुक्का है। मगर  वृक्क का एक रूप वृक्का भी है और बुक्का human-organsभी इसी वृक्क से आ रहा है। अमरकोश के मनुष्य वर्ग के चौंसठवें श्लोक में “बुक्काग्रमांसं” में वृक्क का बुक्का रूप बनता दिख रहा है। टर्नर के कोश के मुताबिक पाली में यह वक्का है, सिन्धी में यह बोक्का है, जिप्सी-रोमानी और जिप्सी-ग्रीक में यह बुको है तो कुर्द में यह जुकुरा है। बहरहाल हिन्दी में बुक्का का अर्थ हृदय है। यह मूलतः संस्कृत रूप बुक्क से आया है। हृदय को चीर कर निकलते रूदन के लिए बुक्का फाड़कर रोना जैसा मुहावरा प्रचलित हुआ।
हिन्दी में दिल या हृदय के लिए कलेजा शब्द भी खूब प्रचलित है मगर इनके अर्थ-प्रयोगों में पर्याप्त भिन्नता है। जैसा कि ऊपर कह आए हैं, कलेजा सोचने का काम नहीं करता। दिल चुराया जाता है, कलेजा नहीं।  अलबत्ता दिल चीरने की तर्ज पर कलेजा चीरने की बातें भी हैं। कोई अपना, सगा सा अगर दिल का टुकड़ा है तो उसी तर्ज़ पर कलेजे का भी टुकड़ा होता है। हाँ, मांसाहारी लोग कलेजे के टुकड़े को कलेजी कह कर उदरस्थ कर लेते हैं। दिल के टुकड़े को दिली-चीज़  नहीं कहा जाता। कलेजा यूँ तो दिल का ही नाम है मगर इसका अर्थ लीवर भी होता है। लीवर जिसे संस्कृत में यकृत कहते हैं। कलेजा बना है संस्कृत के कालेयम् से। गहरे लाल या कालिमा की हद तक लाल रंग के इस अवयव को अपने वर्ण की वजह से ही यह नाम मिला होगा।  इंडो-ईरानी भाषाओं में का रूपान्तर अक्सर में होता है जैसे यश्न का जश्न रूप। यव् से जौ का बनना। कालेयम् का कलेजा में रूपान्तर समझना बहुत आसान है। प्राकृत में इसका रूप कलिया होता है। लहँदा, पंजाबी, हिन्दी, बांग्ला में यह कलेजा है। नेपाली में यह कलेजो, असमी में कॉलिजा है, अवधी में यह करेजा, करेजो, करेजू, करेजवा है। सिन्धी-कच्छी रूप करजो है। हिन्दी के लोकगीतों में कलेजा का करेजा, करेजवा जैसे रूप ही देखने को मिलते हैं जिनका अभिप्राय लीवर से नहीं बल्कि हृदय से होता है। दिल, जिगर सम्बन्धी ज्यादातर मुहावरे कलेजे के सन्दर्भ में भी प्रयोग होते हैं जैसे कलेजा फुँकना, कलेजा जलना, कलेजा निकाल कर रखना आदि।
ब खबर लेते हैं जिगर की। एक मशहूर शायर हुए हैं जिगर मुरादाबादी। ज़ाहिर सी बात है कि जिगर में अगर महज़ लिवर ही होता तो वे अपना तख़ल्लुस जिगर कतई न रखते। दिल में जो बात है, वो कुछ खास है। जिगर, कलेजा, गुर्दा इसलिए खास नहीं क्योंकि वे सिर्फ़ दिल नहीं, कुछ और भी हैं। बहरहाल दिल वाले तमाम मुहावरे जिगर पर भी फिट बैठते हैं। बस, जिगर चुराया नहीं, दिखाया जाता है और दिल चुराया भी जाता है, दिखाया भी जाता है। जिगर दिखाना यानी शौर्य का प्रबन्ध करना। शौर्य के सन्दर्भ में दिल के साथ जब गुर्दा जुड़ता है तब जिगर वाली बात पैदा होती है। जिगर, लिवर और संस्कृत का यकृत सगे भाई हैं यानी आदि भारोपीय भाषा से जन्मे हैं। के में तब्दील होने के नियम को याद रखा जानाचाहिए। यकृत के रूप अवेस्ता में याकर, यकारा होता है तो सुदूर लैटिन में यह जेकुर है। पहलवी में यह जकार और फिर जगार हुआ। इसके बाद फ़ारसी में यह जिगर हुआ। कुर्द में यह जर्ग़ है। जिगर का एक रूप होता है दिगर जो कुछ अफ़गानी ज़बानों में है। इसका पश्तो रूप लिगर बनता है। यही प्रक्रिया सुदूर यूरोप की अंग्रेजी में भी घटी जहाँ इसका रूप लिवर हुआ। दिल का टुकड़ा, कलेजे का टुकड़ा की तर्ज़ पर जिगर का टुकड़ा भी प्रसिद्ध मुहावरा है। यह फ़ारसी के लख्ते जिगर से आया है जिसका अभिप्राय सन्तान से है। यारी-दोस्ती की पुख्तगी बताने के लिए जिगरी शब्द भी आजकल चलन में है। जिगरी यानी जो दिल के क़रीब हो।

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Monday, December 12, 2011

दम्पती यानी घर के मालिक

couple
हि न्दी में घरबार, घरबारी या गृहस्थ ऐसे शब्द हैं जिनसे रिश्तों और प्रेम की डोर से बंधी एक ऐसी व्यवस्था का बोध होता है जिसे एक पारिवारिक परिसर कहा जा सकता है। ऐसा ही एक शब्द है दम्पती जिसमें निवास, आवास और आश्रय की महत्ता झलक रही है। आमतौर पर रोटी, कपड़ा और मकान किसी भी दाम्पत्य का आधार माने गए हैं। इसमें गौर करें तो मकान ही एक ऐसी व्यवस्था है जिसे साथ-साथ रहकर पति-पत्नी घर का रूप देते हैं, वर्ना रोटी और कपड़ा तो मनुष्य की वैयक्तिक मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। विवाहपूर्व भी स्त्री और पुरुष किसी न किसी आश्रय में रहते ही हैं। वह घर उनके माता-पिता का होता है। विवाहित व्यक्ति को सबसे पहले भोजन और वस्त्र की नहीं, आश्रय की तलाश होती है। ऐसा स्थान जहाँ वे दाम्पत्य जीवन जी सकें। जहाँ रह कर वे दम्पती कहला सकें। सामान्य विवाहित जोड़े को दम्पती तभी कहा जाता है जब वह अपना आशियाना बना लेता है। देखा जाए तो घर-मालकिन और घर-मालिक जैसे शब्द दरअसल गिरस्त और गिरस्तिन के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। किराए के मकान में भी घर बसाया जा सकता है। दम्पती में इसी घर का भाव है, न कि मकान का। आमतौर पर पति शब्द में ही घर-मालिक का भाव मौजूद है मगर दम्पती जैसा एक शब्द ऐसा भी है जिसमें पति-पत्नी के भाव के साथ दोनों को समान रूप से घर-मालिक, गृहस्वामी बताया गया है।

हिन्दी में संस्कृत मूल के दम्पति का दम्पती रूप प्रचलित है जिसका अर्थ है पति-पत्नी। संस्कृत में दम्पति का जम्पती रूप भी है। मोनियर विलियम्स के संस्कृत कोश में दम का अर्थ घर, मकान,आश्रय बताया गया है वहीं बांधने का, रोकने का, थामने का, अधीन करने का भाव भी है। यही नहीं, इसमें सज़ा देने, दण्डित करने का भाव भी है। अनिच्छुक व्यक्ति या जोड़े को चहारदीवारी में रखना दरअसल सज़ा ही तो है।  दम्पति का एक अन्य अर्थ है गृहपति। पुराणों में अग्नि, इन्द्र और अश्विन को यह उपमा मिली हुई है। दम्पति का एक अन्य अर्थ है जोड़ा, पति-पत्नी, एक मकान के दो स्वामी अर्थात स्त्री और पुरुष। दम् की साम्यता और तुलना द्वन्द्व से भी की गई है जिसमें द्वित्व का भाव है अर्थात जोड़ी, जोड़ा, युगल, स्त्री-पुरुष आदि। जो भी हो, दम्पति में एक छत के नीचे साथ-साथ रहने वाले जोड़े का भाव है। आजकल सिर्फ़ पति-पत्नी के अर्थ में दम्पति शब्द का प्रयोग होने लगा है जबकि इसमें घरबारी युगल का भाव है। दम्-पति अर्थात घर के दो स्वामी।
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विवाह संस्था के दो रक्षक यानी पति-पत्नी, एक छत के नीचे जीवन-यापन करता युगल यानी पति-पत्नी। ज़ाहिर इसमें उनके घरबारी होने का ही भाव है। दम्पती से बना है दाम्पत्य। यह शब्द वैवाहिक स्थिति को दर्शाता है अर्थात पति-पत्नी के साथ साथ रहने की अवस्था ही दाम्पत्य है। मगर सिर्फ साथ साथ रहना दाम्पत्य नहीं है बल्कि  एक दूसरे के अधीन हो जाना, एक दूसरे को सहारा देना ही दाम्पत्य है। मगर अनिच्छित दाम्पत्य सज़ा से कम नहीं होता। 

ह जो दम् शब्द है, यह भारोपीय मूल का है और इसमें आश्रय का भाव है। आश्रय के अर्थ में भारतीय मनीषा में धाम शब्द का बड़ा महत्व है। धाम का मोटा अर्थ यूं तो निवास, ठिकाना, स्थान आदि होता है मगर व्यापक अर्थ में इसमें विशिष्ट वास, आश्रम, स्वर्ग सहित परमगति अर्थात मोक्ष का अर्थ भी शामिल है। धाम इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की dem/domu धातुओं से इसकी रिश्तेदारी है जिनका अभिप्राय निर्माण से है। संस्कृत धातु धा इसके मूल में है जिसमें धारण करना, रखना, रहना, आश्रय जैसे भाव शामिल हैं। यूरोपीय भाषाओं में dome/domu मूल से कई शब्द बने हैं। गुम्बद के लिए अंग्रेजी का डोम शब्द हिन्दी के लिए जाना पहचाना है। सभ्यता के विकासक्रम में डोम मूलतः आश्रय था। सर्वप्रथम जो छप्पर मनुष्य ने बनाया वही डोम था। बाद में स्थापत्य कला का विकास होते होते डोम किसी भी भवन के मुख्य गुम्बद की अर्थवत्ता पा गया मगर इसमें मुख्य कक्ष का आशय जुड़ा है जहां सब एकत्र होते हैं। लैटिन में डोमस का अर्थ घर होता है जिससे घरेलु के अर्थ वाला डोमेस्टिक जैसा शब्द भी बनता है । अवेस्तन में इसका रूप दंग-पैतोइस होता है । अंग्रेजी के डेस्पट शब्द पर गौर करें जिसका अर्थ निरंकुश शासक या तानाशाह है । यह मूलतः ग्रीक पद despótēs से विकसित हुआ है जिसका अर्थ शासक, पालक है और इसका रिश्ता भी लैटिन के डोमस domus से है । भारोपीय पद डेम-पोटिस से इसकी समतुल्यता गौरतलब है । यह गौरतलब है कि रोमन संस्कृति में जो डेमपोटेस महल में रहनेवाले शासक के अर्थ में सिर्फ़ पुरुषवाची सर्वसत्ता का प्रतीक था, भारतीय संस्कृति में दम्पती के अर्थ में उसमें पति-पत्नी की अर्थवत्ता और सत्ता स्थापित हुई ।
सीधे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति को शालीन कहा जाता है। शाल् यानी रहने का स्थान, शाला, धर्मशाला, पाठशाला आदि इससे ही बने हैं। संस्कृत का शालः बना है शल् धातु से जिसमें तीक्ष्ण, तीखा, हिलाना, हरकत देना, गति देना, उलट-पुलट करना जैसे भाव है। ये सभी भाव भूमि में हल चला कर खेत जोतने की क्रिया से मेल खाते हैं। हल की तीक्ष्णता भूमि को उलट-पुलट करती है। शालः शब्द के मूल में बाड़ा अथवा घिरे हुए स्थान का अर्थ भी निहित है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक शालीन वह व्यक्ति है जिसके रहने का ठिकाना है। मोटे तौर पर यह अर्थ कुछ दुरूह लग सकता है, मगर गृहस्थी, निवास, आश्रय से उत्पन्न व्यवस्था और उससे निर्मित सभ्यता ही घर में रहनेवाले व्यक्ति को शालीन का दर्जा देती है। कन्या के लिए हिन्दी का लोकप्रिय नाम शालिनी संस्कृत का है जिसका अर्थ गृहस्वामिनी अथवा गृहिणी होता है। व्यापक अर्थ में गृहस्थ ही शालीन है। स्पष्ट है कि आश्रय में ही शालीनता का भाव निहित है। जिसका कोई ठौर-ठिकाना न हो वह आवारा, छुट्टा सांड जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है। हमेशा घर में रहनेवाले व्यक्ति को घरू या घरघूता, घरघुस्सू आदि विशेषण दिये जाते हैं। –अगली कड़ीः घरबारी होना, गिरस्तिन बनना
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Sunday, December 11, 2011

डेरा डालना, डेरा उठाना

Tent Campपिछली कड़ीः भेद की दीवारें, दीवारों के भेद 
कि सी स्थान पर अस्थाई मुकाम या पड़ाव के लिए हिन्दी में डेरा शब्द बहुत प्रचलित है। खेमा, तम्बू, टेन्ट, झोपड़ी, मकान, मन्दिर, मकान, ठिकाना और छोटी बस्ती के लिए डेरा शब्द प्रयुक्त होता है। इस शब्द में मुहावरेदार अर्थवत्ता है। डेरा वैसे तो आश्रय शब्दावली से निकला शब्द है जिसमें आवास, निवास और रहवास का भाव है मगर यह समूहवाची भी है। डेरा एक मोहल्ला, ढाणी, पिण्ड के अलावा धार्मिक या जातीय पहचान वाले समूह की बसाहट भी हो सकता है और सामान्य अर्थों में तम्बू, छोलदारी या अस्थायी बस्ती भी। डेरा अपने आप में पंथ का पर्याय भी है। भारत के पश्चिमी सीमान्त पर आज़ादी से पहले डीआई खान या डीजी खान जैसे नामों वाली बस्तियाँ थीं जिनमें डेरा शामिल था जैसे डेरा इस्माइल खान या डेरा ग़ाजी खान। इनके नाम से ही ज़ाहिर होता है कि कभी यहाँ इस्माइल खान या ग़ाज़ी खान जैसे किसी योद्धा ने अपने लावलश्कर के साथ शिविर डाला होगा। डेरा बस्सी, डेरा बाबा नानक जैसी और भी बस्तियों के नाम हम सबने सुने हैं।

हिन्दी कोश डेरा की व्युत्पत्ति को लेकर एकमत नहीं हैं। शब्दसागर में डेरा का आशय अस्थायी मुकाम, ठहराव से जोड़ते हुए इसका अर्थ मण्डली, गोल, निवास, कैम्प, छावनी आदि बताया गया है। इसकी व्युत्पत्ति ठहरना या ठहराव के ठेठ देसी उच्चारण ठैराव या ठैरना से बताई गई है। यह युक्तिसंगत नहीं है। डेरा शब्द उत्तर भारत की सभी भाषाओं में इसी रूप में प्रचलित है। डेरा में अस्थायी मुकाम, कैम्प, शामियाना, खैमा जैसे भाव ठैरना और ठैराव से अभिव्यक्त नहीं होते। दूसरी बात यह कि ये दोनों शब्द भी इन रूपों में बहुत कम व्यवहार में हैं। कुछ कोशों में डेरा का रिश्ता पर्शियन और पहलवी से बताया है। टर्नर के अनुसार पर्शियन में इसका रूप डेरा होता है जबकि पहलवी में यह डेरो है। जॉन प्लैट्स के कोश में हिन्दी देहरा का रूपान्तर देरा से होने की सम्भावना जताई गई है। हिन्दी में देहरा या देवरा शब्द देवालय का अपभ्रंश है। क्रमश ह और व को लोप से इनके देवघर > देवहर > देवरा और देवघर > देवहर > देहरा जैसे दो रूप प्राप्त होते हैं जो हिन्दी की बोलियों में प्रचलित हैं। देहरा का अर्थ है मकान, निवास, आशियाना, तम्बू अथवा देवस्थान। देवरा और देहरा उत्तर भारत में कई स्थानों के साथ जुड़ा नज़र आता है। राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल रामदेवरा और देहरादून में यह स्पष्ट है। देहरा का आशय यूँ तो देवस्थान से ही है पर देहरादून के सन्दर्भ में यह डेरा का रूपान्तर भी हो सकता है। सिखों के सातवें गुरु हरराय जी के पुत्र बाबा रामराय के 1675 में दून घाटी आने का उल्लेख है। विभिन्न सन्दर्भों से पता चलता है कि उन्होंने दून घाटी में पड़ाव डाला था तब से ही इस स्थान की पहचान देहरादून (डेरादून) हुई। देहरादून में दून का अर्थ है घाटी। यह शब्द बना है द्रोणि से जिसका अर्थ होता है पर्वतीय उपत्यका, घाटी, वैली। हिन्दी का दोना इससे ही बना है। जहाँ तक देहरादून के देहरा की व्युत्पत्ति का प्रश्न है , तमाम विकल्पों के साथ फ़ारसी के देह / दिह से भी देहरा की व्युत्पत्ति सम्भावित है । देह / दिह में गाँव, दीवार, परकोटा जैसे भाव हैं । इस तरह देहरादून का अर्थ हुआ वादी का गाँव । ग्वालियर के पास एक घाटीगाँव भी है । फ़ारसी के दहलीज में 'देह' को देखा जा सकता है । देहरा, देहरी ( देहली) भी दरवाज़े या चौखट की अर्थवत्ता रखते हैं । इस तरह देहरादून का अर्थ हुआ दर ऐ वादी अर्थात घाटी का दरवाज़ा । वह बस्ती जहाँ से द्रोणिका अर्थात दून घाटी शुरू होती है ।
प्रश्न यह है कि देहरा से डेरा को उद्भूत मानें तो शिविर, तम्बू के अर्थ में डेरा भाव का आशय इसमें स्पष्ट नहीं है। डेरा को प्रचलित शब्द मानें और सिर्फ़ देहरादून वाले देहरा का रिश्ता भी कैम्प के अर्थ में डेरा से जोड़ें तब डेरा कहाँ से आया। डेरा bedouinशब्द में सेमिटिक स्रोत से आया है, ऐसा लगता है। प्राकृतिक आश्रयों की आदिम व्यवस्था से आगे बढ़ कर जब कबीलाई घुमंतू समाज ने खेमों में बसेरा करना सीख लिया था। आदिम समाज की बसाहट छोटे छोटे समूहों में होती थी। कोई एक समूह भी एक गोल, मण्डलाकार आकार के तम्बू में रहता था। यूँ भी कोई समूह जब एक साथ होता है तो बैठने की व्यवस्था गोलाकार, मण्डलाकार ही होती है ताकि सभी एक दूसरे के सम्मुख रहें और इस समूह में किसी अन्य के प्रवेश न करने के लिए सुरक्षा-चक्र भी बन जाए। एक दूसरे के सम्मुख होने से समूह दसों दिशाओं में नज़र भी रख सकता था। मूल बात बसाहट की गोलाकार व्यवस्था है। सेमिटिक धातु d-y-r में फिरना, घूमना, मुड़ना, पलटना, वक्र होना जैसे भाव है। अरबी में इससे बना दाइरः अर्थात गोल, घेरा, परिधि, मण्डल आदि। इसके अलावा इसमें मजलिस, सभा, परिषद, परिवार का भाव भी है। यही नहीं, दायरा के दायरे में मोहल्ला, टोला, बस्ती, आश्रम, परिसर का आशय भी है।
रबी के दाइरः का हिन्दी रूप ही दायरा है। इन तमाम अर्थों में मूल बात जो उभर रही है, वह सुरक्षित आश्रय है। इस धातु का एक और रूपान्तर है d-w-r जिससे बना है दर और इसमें भी यही सारे भाव हैं अर्थात घर, मकान, परिवार, आश्रय आदि। अमेरिकन हेरिटेज डिक्शनरी के मुताबिक ये सभी भाव अरब के मूल निवासी खानाबदोश बेदुइन के रहने के ठिकानों अर्थात तम्बुओं, खेमों के लिए प्रयुक्त होते रहे जिन्हें दर, दार, दाइरः कहा जाता रहा। इंडो-ईरानी परिवार की कई लोकभाषाओं में दन्त्य का रूपान्तर मूर्धन्य में होता है। सिख विकी के मुताबिक पंजाबी का डेरा शब्द फ़ारसी के दैर का रूपान्तर है। गौरतलब है कि फ़ारसी में दैर अरबी से आया है जहाँ इसका अर्थ विहार, मठ, आश्रम, देवालय, उपासनास्थल आदि। है। इसी धातु मूल से उपजा दयार शब्द भी हिन्दी-उर्दू में प्रचलित है। दयार का अर्थ भी मकान, घर आश्रय होता है। कुछ विद्वान इन सभी शब्दों में भारोपीय dhwer की झलक भी देखते हैं। संस्कृत का द्वार, रूसी का द्वेर, फ़ारसी का दर, अंग्रेजी का डोर, फ़ारसी का दर्रा ( घाटी, दरवाज़ा ), दरवाज़ा जैसे शब्दों की रिश्तेदारी भी दर, दार, दाइर से है। 
सेमिटिक धातु d-w-r या d-y-r दिर पर गौर करें। मुझे लगता है डेरा का आदिस्त्रोत कहीं न कहीं इंडो-ईरानी परिवार की बहुप्रयुक्त आदिक्रिया वर् में निहित है जिसमें घूमने, घेरने का भाव है जिसकी व्याख्या आवरण, रक्षा कवच में होती है। कवच किसी वस्तु, स्थान या व्युक्ति को चारों ओर से सुरक्षित बनाता है। वर् से ही बनता है वार जो मनुष्यों और पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान का नाम है। लोकभाषा में बाड़ा इसका आम प्रचलित रूप है। मराठी में वाड़ा मोहल्ला है तो पाड़ा हिन्दी में मोहल्ला है। बाड़ी बांग्ला में घर है और बाड़ा पशुओं का आश्रय है। वर् से बने वृ और दिर् की समानता पर गौर करें। इसी कड़ी में सेमिटिक दैर dair की तुलना दीवार के अवेस्ता मूल देगा-वरा dega-vara से करनी चाहिए। सम्भव है। अवेस्ता के ज़रिए पश्चिमी ईरान की ओर इस शब्द का सेमिटिक रूपान्तर dair दैर हुआ हो। ऐसा लगता है कि दैर, दायरा में जो मण्डलाकार, सुरक्षा घेरे का भाव है वह इंडो-ईरानी भाषाओं के किन्हीं आदिरूपों से सेमिटिक परिवार में दाखिल हुआ होगा। ज़ाहिर है सबसे पास का उदाहरण देगा-वरा का ही नज़र आ रहा है। देगा में सुरक्षात्मक संरचना और वरा में मण्डलाकार आकार, जिसमें भी सुरक्षा का ही भाव है, स्पष्ट नज़र आ रहा है। इसकी विस्तृत चर्चा पिछली कड़ी में की जा चुकी है।
डेरा शब्द की अर्थवत्ता का भारतीय भाषाओं में विस्तार हुआ। डेरा बस्ती भी है और बसेरा भी। तम्बू भी है और घेरा भी। मन्दिर भी है, मजलिस भी। मंजिल भी है और मकाम भी। अस्थायी मुकाम की अर्थवत्ता वाले इस शब्द में स्थायित्व भी समा गया। डेरेदार, डेरेदारिन, डेरेवाली जैसे शब्द उन खानदानी तवायफ़ों के लिए कहे-सुने जाते रहे हैं जो कभी बस्ती के बाहर रहती थीं। बाद में शहर में कोई जगह लेकर धन्धा करने वाली तवायफों के लिए यह शब्द रूढ़ हो गया। वैसे डेरेवाल, डेरेदार जैसे शब्द भी हैं जो शिविरार्थी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। डेरा डालना मुहावरा भी है जिसका आशय कहीं विश्राम करना है। घर-गृहस्थी के साज़ो सामान के साथ कहीं और जा बसने के सन्दर्भ में डेरा-डण्डा उखड़ना जैसा मुहावरा भी प्रचलित है। इसमें प्राचीन घुमंतू समाज की स्मृति है। डेरा यानी तम्बू या छप्पर और डण्डा यानी उसका स्तम्भ। डेरा-डंगर भी ऐसा ही पद है। इसमें डंगर का तात्पर्य पशुओं से है। खानाबदोश समाज अपने मवेशियों के साथ ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकता फिरता था। ज़रूर देखें आश्रय शृंखला के सभी आलेख।
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Wednesday, December 7, 2011

हप्-हप् खाना या हड़पना ?

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कि सी की वस्तु को जबर्दस्ती हथिया लेना, दूसरे की सम्पत्ति को जबर्दस्ती अपने स्वामित्व में लाने, चतुराई या बलप्रयोग से किसी अन्य के स्वामित्व वाली सम्पत्ति को अपना बनाने की कार्रवाई को हड़पना कहते हैं। हड़प शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर हिन्दी के प्रसिद्ध और आमफ़हम शब्दकोशों में विरोधाभासी जानकारी है जिससे भ्रम पैदा होता है। श्यामसुंदरदास सम्पादित हिन्दी शब्दसागर में हड़प प्रविष्टि को पढ़ने से लगता है मानो यह भोजन करने सम्बन्धी शब्दावली से आया है। कोश में इसे अनुकरणात्मक शब्द बताते हुए इसका अर्थ पेट में डाला हुआ, निगला हुआ बताया गया है। इन भावों का आधार लेते हुए हड़प का आशय गायब किया हुआ, अनुचित रीति या बेईमानी से ले लेना बताया गया है। वाल उठता है कि भोजन करने वाली शब्दावली में हड़प जैसा शब्द नहीं है। भोजन करते हुए भी हड़प ध्वनि का उच्चार नहीं होता। जॉन प्लैट्स अपने हिन्दुस्तानी, उर्दू, इंग्लिश कोश में इसी हप् ध्वनि से हड़प की सादृष्यता की बात कहते हैं। साथ ही वे प्राकृत के हडप्प से भी हड़प की तुलना करते हैं।
हले हप् ध्वनि की बात। भोजन करने में चबाने की क्रिया खास है। दाँत, जीभ और तालु की स्पर्शीय क्रियाओं से चप्-चप् ध्वनि निकलती है, हप् हप् नहीं। मोनियर विलियम्स के संस्कृत-इंग्लिश कोश में हप् वाली प्रविष्टि में इसका कोई स्वतंत्र अर्थ न देते हुए इसे संस्कृत धातु ह्लप् का पाठान्तर (लैटिनः वेरिया-लैक्शिओ) बताई गई है। अर्थात मूल शब्द ह्रप् जिसका अर्थ है to speak जिसमें आवाज़ करना, उच्चार करना, बोलना आदि भाव हैं। स्पष्ट है कि मोनियर विलियम्स ने इसका रिश्ता भोजन करने की ध्वनि से नहीं जोड़ा हैं। शब्दसागर में हड़प को ध्वनिअनुकरण पर बना शब्द तो बताया है पर इसके मूल का उल्लेख नहीं है। वहीं शब्दसागर में हप का रिश्ता ध्वनिअनुकरण के आधार पर कोई वस्तु चट से मुँह में रख कर होठ बन्द करने की आवाज से जोड़ा है। जब हड़प का अर्थ निगला हुआ, पेट में डाला हुआ बताया जाता है तो इसकी मूल ध्वनि हप् बताने कोशकार कैसे भूल गए, यह समझ से परे है। हिन्दी में हप् करना, हप कर जाना जैसे मुहावरे भी हैं और मीठा मीठा हप, कड़वा कड़वा थू जैसी कहावत भी है जिसका अर्थ पसंदीदा वस्तु को अपने पास रख लेना। जॉन प्लैट्स प्राकृत के जिस हड़प्प से हड़प की तुलना का सुझाव देते हैं, उस हड़प्प का अर्थ उनकी प्रविष्टि में chest, cupboard दिया हुआ है। चेस्ट यानी सीना, छाती, वक्ष आदि। दरअसल चेस्ट एक प्रकोष्ठ होता है जहाँ दिल महफ़ूज़ रहता है। इसे हृदय-प्रकोष्ठ कहा जा सकता है। मगर यह हड़पने के मूल भाव से मेल नहीं खाता।
मेरे विचार में दो बातें हैं। जल्दी से कोई चीज़ मुँह में रखने की क्रिया में होठ बन्द करने की ध्वनि हप् है और यह वही है जिसका उल्लेख प्लैट्स भी करते हैं। मगर मोनियर विलियम्स मगर इसका रिश्ता होठों से तो क्या, खाने की क्रिया से भी नहीं जोड़ते। मेरे अपने विचार में हप् ध्वनिअनुकरणात्मक शब्द तो है, मगर भक्षण सम्बन्धी अर्थों से जोड़ने में इसका ध्वनिअनुकरणात्मक होना कम और लक्षणात्मक होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसी वस्तु को सीधे अपने मुँह में लपकने की कोशिश कर के देख लीजिए, हप् की ध्वनि नहीं निकलती। हप् में निश्वास की प्रक्रिया है, आश्वास की नहीं। अब अगर आप हप् का सायास उच्चार चाहते ही हैं तो वस्तु मुँह में जाने के बाद ही हप् उच्चार पाएँगे, अन्यथा नहीं। हाँ, बिना मुँह में कुछ डाले सिर्फ़ हवा में तैरती किसी काल्पनिक चीज़ को लपकने की कोशिश करें, सौ फ़ीसद साफ़ आवाज़ में हर बार हप् हप् का उच्चार सुनाई पड़ेगा। मेरा मानना है कि यह मानवेतर जीव-जंतुओं की भोजन करने की प्रक्रिया को देखते हुए उपजा लाक्षणिक शब्द है।
दिकाल से मनुष्य ने मगरमच्छों, अजगरों, साँपों, सारसों, छिपकलियों, मेंढकों और नाना अन्य प्राणियों को इसी अंदाज़ में अन्य जंतुओं को चट-पट, झपाटे में अपना आहार बनाते देखा है। इस क्रिया की त्वरता, तीव्रता, शीघ्रता, विचित्रता, भीषणता और भयानकता को उसने वर्षों अनुभव किया है। इसके अनुकरण के प्रयास में यह हप् ध्वनि हाथ लगी है, अन्यथा न तो frog-_1837515bजानवर हप् की ध्वनि करते हैं और न ही मनुष्य। मेरे इस विचार की पुष्टि भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक कोश में रॉल्फ़ लिली टर्नर की प्रविष्टि से भी होती है। टर्नर हप् को हप्प लिखते हैं। हप का हप्प रूप भी प्रचलित है जैसे गप का गप्प। गल्प से जैसे गप्प बनता है वैसे ही ह्लप् से हप्प बनेगा। टर्नर ने हप्प का जो पहला आशय लिखा है- sudden movement, वो महत्वपूर्ण है। सडन मूवमेन्ट यानी अप्रत्याशित या आकस्मिक हरकत या क्रिया। टर्नर इसके बाद अन्य आर्य भाषाओं में इससे विकसित शब्दों के अर्थ बताते हैं जैसे कुमाऊँनी में हपकाउणो यानी भकोसना, नेपाली में हप्खानूँ यानी निगलना, हिन्दी मे हप यानी झपट्टा, हपकाना यानी भकोसना, हापर यानी पेटू. हपराना यानी चबर-चबर खाते रहना, मराठी में हप्का यानी झपाटेदार लहर, हपाटणे (अपटणे) यानी पछाड़ देना, झपाटे का विलोम, चित्त करना आदि। स्पष्ट है कि संस्कृत के मूल हप या हप्प का प्रमुख अर्थ टर्नर की निगाह में भी आकस्मिक हरकत ही है। आहार या भोजन की क्रिया के सम्बन्ध में भी आकस्मिकता इसके दायरे में आती है, न कि यह इसका प्रमुख अर्थ है।
ध्यान देने की बात है कि हप्प या हप के सन्दर्भ में जीवभक्षियों की त्वरित क्रिया का अनुकरण मनुष्य ने करने का प्रयास किया तो हप् ध्वनि निकली। दरअसल यह किसी क्रिया का आदिम रीक्रिएशन जैसा था। नाटक का जन्म अनुकरण से ही हुआ है। यह जो हप् है, नाटकीय रूपान्तर ही है। ध्यान रहे, मोनियर विलियम्स लैटिन की टर्म वेरिया-लैक्शिओ यानी पाठान्तर का प्रयोग कर रहे हैं, न कि ह्रप् को ह्लप् का रूपान्तर या क्रमिक विकास बता रहे हैं। गौरतलब है कि प्राचीन ग्रन्थों के विभिन्न भाष्यों में पाठान्तर इसलिए होता रहा क्योंकि हस्तलिखित प्रतियाँ टीकाकार पण्डित खुद भी बनाते थे और पेशेवर नक़लनवीस भी। इसलिए किन्हीं अक्षरों को समझने में भूल-चूक भी होती थी और श्रुतलेखन के दौरान उच्चारणभेद नहीं हो पाता था। इसीलिए दो पाठान्तर मिलने से मोनियर विलियम्स ने यहाँ इसीलिए ह्रप या ह्लप से उत्पन्न हप का रिश्ता भोजन सम्बन्धी क्रिया से नहीं जोड़ते हुए सिर्फ़ उच्चार से जोड़ा है। यही सावधानी टर्नर ने भी बरती है और वे भी हप्प को सिर्फ़ त्वरित, शीघ्रतापूर्ण, आकस्मिक क्रिया ही मानते हैं।
ड़प शब्द का जन्मसूत्र हप् से नहीं है, यह स्पष्ट है। यह भी लगता है कि हप् से हड़प नहीं बल्कि हड़पने की क्रिया में जो व्यापक आशय हैं, उससे हप् में निहित भावार्थ और भी पुष्ट हुए और धीरे धीरे कोशकार बजाय हप् को हड़प से सम्बद्ध करने के, हड़प के हप् से व्युत्पन्न होने की सम्भावना जताने लगे। विभिन्न सन्दर्भों को टटोलने के बाद मेरी यह स्पष्ट मान्यता है कि हड़प के मूल में वही हृ धातु है जिसमें मुग्ध करना, आकृष्ट करना, लेना, अधीन करना, वशीभूत, कब्जा करना, दबोचना, चुराना, डाका डालना, छीन लेना, हथियाना, ले जाना, स्वामित्व जताना, मालिक बनना, इच्छा जताना, अधिकार जताना जैसे भाव हैं। टर्नर कोश से इसकी पुष्टि होती है। टर्नर बताते हैं कि भारोपीय वैदिक हृत् हड़प के मूल में है। हृत् की धातु हृ है। हृत् का पाली रूप हटा है, प्राकृत रूप हड़ा है। दर्दी ज़बान में यह हूढ़ो है। पश्चिमी पहलवी में इसका एक रूप हड़ है। टर्नर सम्भावना जताते हैं कि इसका आशय बाढ़ से हो सकता है। गौरतलब है कि बाढ़ में भी हड़पने की लीला है।
हृ से ही हर, हरण, हारना, हराना जैसे शब्द बने हैं जिनमें पराभव, खोना, गँवाना, अधीन होना-करना जैसे भाव हैं। माला के अर्थ में हार भी इसी मूल से बना है। हार में जो अनुशासन है वह एक सूत्रता का है। इस सूत्र के अधीन होने के लिए विभिन्न वस्तुओं को अपनी निजता खोनी पड़ती है। एक रूपाकार में होकर ही वे माला में पिरोए जा सकते हैं। हार में पिरोए जाने के बाद बहुत सी चीज़ें आसानी से इधर-उधर ले जाई जा सकती हैं।

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Monday, December 5, 2011

दिलो-दिमाग़ की बातें

पिछली कड़ी-आखिर क्या है सौहार्द्र?Heart

फ़ा रसी ने कुछ ऐसे नायाब शब्द हिन्दी को दिए हैं कि जिनके बिना दिल की बात ज़ुबाँ पर आनी मुश्किल होती है। अब देखिए, इस दिल को ही लीजिए, दिल यानी हृदय। दिल से जुड़ी कितनी ही बातें मुहावरों की शक्ल में आज विभिन्न भाषाओं में समायी हैं। मराठी के दिलगीर शब्द से हिन्दी वाले अपरिचित हैं, मगर मूलतः मराठी में इसकी आमद फ़ारसी से ही हुई है। दिलगीर यानी दुखी, शोकाकूल, शोक-संतप्त आदि। दिलगीर का एक अन्य अर्थ खेद प्रकट करने वाला या पश्चाताप जताने वाला भी होता है। दिलफ़रेब, दिलरुबा, दिलबर, दिलकश, दिलेर, दिलावर, दिलवाला, दिलदार, दिलखुश, दिलचस्प जैसे न जाने कितने शब्दों का रोज़ बोलचाल में इस्तेमाल होता है। दिल से जो अभिव्यक्ति और लालित्य पैदा होता है, वह बात हृदय से नहीं आती। हिन्दी में आमतौर पर हृदय शब्द का प्रयोग अब शरीर के अंग की तरह चिकित्सकीय आशय में होता है। इस सन्दर्भ में हृदय-रोग, हृदय-रोगी आम शब्द हैं। यही हाल अंग्रेजी के हार्ट शब्द का है। हार्ट-प्रॉब्लम, हार्ट-पेशेन्ट जैसे शब्द आमतौर पर हिन्दी में प्रचलित हैं। दूसरी ओर दिल की अर्थवत्ता व्यापक है। शरीरांग के रूप में भी दिल शब्द का प्रयोग होता है, जैसे-दिल में छेद होना। मगर किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है। किसी को दिल का रोगी कहने के पीछे अक्सर हृदयरोगी का आशय नहीं होता बल्कि आशिक माशूक वाली बात होती है।
संस्कृत हृदय के मूल में हृद् है जिसका अर्थ है दिल और इसके लिए भाषा वैज्ञानिकों ने मूल इंडो-यूरोपीय धातु कर्द kerd तलाश की है जिसका आधार ग्रीक का कार्दिया kardia है। हृदय का संबंध सोच-विचार करने से है। मलयालम में यह करुतु है जिसका साम्य कॉर्ड से जोड़ा जा सकता है। करुतु का अर्थ है सोचना, विचारना, कल्पना करना आदि। वैसे ख्यात भाषवाविद् डॉ रामविलास शर्मा द्वारा बरो और एमेनो के द्रविड़ व्युत्पत्ति कोश से संग्रहित शब्दों में मलयालम के करिळ का उल्लेख है जिसे उन्होंने इसी शब्द शृंखला का हिस्सा बताया है। द्रविड़ परिवार की ही कोत भाषा में यह कर्ल है। वे इन शब्दों की ग्रीक कॉर्दिया से तुलना करते हैं- कर्द > कर्ल। हिन्दी का शृद्धा शब्द भी इसी परिवार का है जिसका अर्थ है आस्था, निष्ठा, भरोसा जिनका रिश्ता दिल से है। इसके अलावा मन की स्वस्थता और हृदय की शान्ति जैसे भाव भी इसमें हैं। हालाँकि इसका अर्थ थोड़ा भिन्न है मगर रामविलास शर्मा बड़ी आसानी से इसकी हृदय से रिश्तेदारी साबित करते हैं। उनके अनुसार शृद्धा का शृद् और हृदय का हृद दरअसल एक ही हैं। लिथुआनी का सिर्डिस और रूसी का सर्डेस / सेर्द्त्से इस सिलसिले में गौरतलब है जिसका उच्चारण शृद्धा से मिलता-जुलता है।
इंडो-ईरानी भाषा परिवार का दिल भी भारोपीय धातु कर्द kerd से ही तैयार हुआ है। यह दिलचस्प है कि इस धातु के पहले वर्ण का उच्चार पूर्व से पश्चिम तक अलग अलग होता रहा है। ये सभी ध्वनियाँ कण्ठ्य, तालव्य, दन्त्य और दन्त्यमूलीय हैं। इसी तरह इनकी प्रकृति भी कण्ठ्य, स्पर्श और स्पर्श संघर्षी रही है। इंडो-ईरानी परिवार की भाषाओं में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए ध्वनियों की प्रकृति कण्ठ्य से तालव्य और फिर दन्त्य में तब्दील हुई है। पंचनद, उत्तरी ईरान, कुर्दिश, आर्मीनियाई और फिर जर्मन। चाहें तो इस क्रम को ठीक उलटा भी मान सकते हैं। संस्कृत के हृद् में मूल ध्वनि   है जो कण्ठ्य संघर्षी है। इससे हृदय शब्द बनता है। अवेस्ता में इस का रूपान्तर ज़ / झ़ में होता है और वहाँ हृदय के लिए ज़रेदा शब्द मिलता है। कुर्दिश में यह ज़ार है और बलूची में ज़ेर्दे तो आर्मीनियाई में ज़ का बदलाव में होता है जो दन्त्यमूलीय ध्वनि है। यहाँ हृदय के लिए सिर्त शब्द है। रूसी में यह सर्डेस या सेर्द्स्ते है। जर्मन में यह हर्ज़ है मगर प्रोटो जर्मन में यह ख़ैर्तन था। बहरहाल, अवेस्ता के ज़रेदा zereda से पहलवी के दील और फिर फ़ारसी के दिल, देल का विकास हुआ है।
हृदय से दिल का विकास विस्यमकारी सा लगता है मगर जिस तरह हम सूक्ष्मतम एक कोशिकीय जीव-विभाजन के सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए तमाम जीवधारियों के विकसित होने की कल्पना को स्वीकार कर  लेते हैं, भाषा और शब्दों के विकास का सफ़र उतना दुरूह और असम्भव नहीं है। समूचे तुर्क-ईरान क्षेत्र में अवेस्ताई ज़रेदा के कई रूपान्तर हुए हैं जैसे ताज़िकिस्तान के पामीर और बदख्शाँ क्षेत्र की क़बाइली भाषा इशकाशिमी में यह ज़िल है तो पूर्वी तुर्की में बोली जाने वाली जज़ाकी में यह ज़ेर्री है। पामीर क्षेत्र की ही एक अन्य भाषा सारीगुल में इसका रूप झाँर्द है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक पार्थियाई भाषा में इसका एक रूप ज़िर्द रहा होगा। जॉर्जिया की एक बोली ओसेटिक में इसका रूप झ़िर्द मिलता है। डॉ शर्मा की बात तार्किक लगती है कि जैसे लैटिन कोर्द का रूप कोर हुआ, वैसे ही ज़िर्द ( ज़रेदा का एक रूप ) का रूपान्तर ज़िर हुआ होगा। ज़िर > जिर > दिर के बाद अगला रूपान्तर दिल हुआ होगा। गौर तलब है कि बदख्शाँ की इशकाशिमी भाषा में ज़िर का रूप ज़िल है।
दिल के साथ अक्सर दिमाग़ का ज़िक्र भी होता है। सयानों का कहना है कि “दिल की नहीं, दिमाग़ की बात सुननी चाहिए”। मगर जो लोग दिल से बोलते हैं, वे सुनते भी दिल की ही हैं। दिल की तरह दिमाग़ भारोपीय भाषा परिवार का न होकर सेमिटिक कुनबे का शब्द है। कुछ सेमिटिक भाषाओं में दिमाग़ का उच्चारण दिमाह की तरह होता है जैसे इथियोपिया की ग़ीज़ भाषा में। अरबी में दिमाग़ का अर्थ होता है मस्तिष्क, ब्रेन। इसका अर्थ होता है सिर, सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा, शिखर आदि। दिमाग़ के अन्तिम दो वर्णों से भारोपीय मस्ज्, मग्ज़, मज़्ग याद आते हैं जिनसे हिन्दी में प्रयोग होने वाले कुछ ख़ास शब्द बने हैं। मगज और भेजा इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द हैं जबकि दिमाग अरबी मूल से आया है। संस्कृत में इसकी मूल धातु है मज्ज्।
यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी में मगज शब्द जहाँ फारसी से आया है वहीं भेजा शब्द इसके मूल तत्सम का तद्भव रूप है। मगज शब्द का मूल फारसी रूप मग्ज़ है। यह अवेस्ता के मज्ग mazga से बना है। इसका संस्कृत रूप है मस्ज् जिसका अर्थ है सार, तरल, रस आदि। इससे ही बना है संस्कृत और हिन्दी का मज्जा शब्द जिसका अर्थ है अस्थियों के भीतर का द्रव (बोनमेरो bonemarrow), वसा, चर्बी, पौधों का रस आदि। मुमकिन है अवेस्ता के मज़्ग से यह अरबी में आयात हुआ हो जहाँ इसका अरबीकरण दिमाग़ के रूप में हुआ हो। वैसे भी अन्य सेमिटिक भाषाओं में यह शब्द अरबी से ही गया है। यूँ भी अरबी और फ़ारसी में भाषायी लेन-देन रहा है। हिन्दी का भेजा शब्द मज्ज से बना है। संस्कृत के तद्भव रूपों में प ध्वनि का चरित्र भ में बदलता है। यहाँ मज्ज> मज्जस् > भज्जअ> भेजा के जरिये यह तैयार हुआ है। अक्सर दिलवाले दिल लिया दिया करते हैं, दिल से दिल लगाया करते हैं। बेवकूफ़ किस्म के लोग हमेशा दूसरों का दिमाग़ चाटते या दिमाग़ खाते हैं। व्यर्थ की बकवाद करने के अर्थ “भेजा खाना” या “भेजा चाटना” मुहावरा भी हिन्दी में प्रचलित है।
-जारी

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