Saturday, March 13, 2010

यारी-दोस्ती और जारज संतान…

संबंधित कड़ियां>इश्क के पेचोख़म> इश्क से ईश्वर तक> मुहब्बत करनेवाले कम न होंगे…

किसी स्त्री के आशिक के अर्थ में जारः शब्द की अर्थवत्ता फारसी के यार में भी कायम है। प्राचीनकाल के किसी भी समाज में बिना विवाह हुए किसी महिला का पुरुष से मैत्रीपूर्ण संबंध उचित नहीं माना जाता था।
हि न्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त दस संज्ञासूचक शब्दों की अगर सूची बनाई जाए तो यार yaar शब्द उसमें निश्चित ही नज़र आएगा। यार शब्द का इस्तेमाल किए बिना कोई बातचीत पूरी नहीं होती। हर खासो-आम तक इस शब्द की पहुंच है और इसका समान रूप से प्रयोग किया जाता है। किसी ज़माने में यार शब्द का प्रयोग पुरुषों के संवादों तक सीमित था, महिलाओं के लिए इसके प्रयोग पर अघोषित वर्जना लागू थी, मगर अब अर्से से इसका इस्तेमाल महिलाएं भी ठाठ से करती हैं। सामान्य शिष्टाचार के संवादों की शुरुआत तक इस शब्द से होती है जैसे और यार, आओ यार, क्या हाल हैं यार , छोड़ो यार, चलो यार, क्या बताएं यार, अरे यार वगैरह वगैरह। यार शब्द से बने कुछ अन्य शब्द भी प्रचलित हैं जैसे यारी, याराना, यार-दोस्त, यारी-दोस्ती, यारबाज या यारबाश आदि।
यार शब्द का अर्थ है मित्र, दोस्त, बंधु, सखा, साथी आदि। यार शब्द की अर्थवत्ता में प्रेमी, आशिक , माशूक भी समाए हैं। इसके अलावा यह शब्द मददगार, सहायक का भाव भी रखता है। यार इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है। यार शब्द हिन्दी में फारसी से आया है। जॉन प्लैट्स के उर्दू इंग्लिश हिन्दुस्तानी कोश के मुताबिक यार शब्द की संभावित व्युत्पत्ति जारः से बताई गई है। संस्कृत के जारः शब्द में मूलतः प्रेमी, आशिक, उपपति का भाव है। किसी स्त्री के आशिक के अर्थ में  जारः शब्द की अर्थवत्ता फारसी के यार में भी कायम है। प्राचीनकाल के किसी भी समाज में महिला raceका पुरुष से मैत्रीपूर्ण संबंध उचित नहीं माना जाता था। ऐसे में किसी पुरुष से मित्रवत या प्रेमी का रिश्ता अवैध और अनैतिक माना जाता था। इसीलिए जारः शब्द में मूलतः स्त्री के सखा, मित्र या आशिक का ही भाव है। विवाहिता या अविवाहिता स्त्री के सखा को समाज मान्यता नहीं देता था। ऐसे पुरुष से उत्पन्न संतान को जारजः कहा जाता था। हिन्दी में अवैध संतान के लिए जारज शब्द खूब बोला समझा जाता है।
संस्कृत के जारः शब्द की अर्थवत्ता स्त्री के प्रेमी, आशिक या सखा तक सीमित है मगर जब यह फारसी में दाखिल हुआ तब इसमें शामिल सखाभाव ने स्त्री के दायरे से मुक्ति पाई और विशुद्ध साथी, संगी, मित्र, दोस्त के अर्थ में यह स्थापित हुआ। इसके बावजूद इसमें आशिक, प्रेमी आदि भाव भी सुरक्षित रहे। ईरानी संस्कृति में भी किसी महिला के मित्र के लिए असम्मान का भाव था और धिक्कार अथवा उलाहने के तौर पर यार शब्द का इस्तेमाल होता है। दिलचस्प है कि किसी स्त्री के संदर्भ में यार शब्द की तुलना में आशिक का दर्जा काफी ऊंचा है। स्पष्ट है कि किसी पुरुष का मित्र सगर्व खुद को यार कह सकता है मगर किसी स्त्री का यार होना समाज में स्त्री और पुरुष दोनों के लिए निंदनीय है। मित्रता के लिए यार से यारी अथवा याराना जैसे शब्द बने हैं। बहुतों से मित्रता रखनेवाला अथवा मैत्रीपूर्ण संबंधों में भरोसा रखनेवाले व्यक्ति के लिए यारबाश या यारबाज शब्द हैं।
यार की तरह ही मित्र के लिए दोस्त dost शब्द भी हिन्दी के बहुप्रचलित शब्दों में शुमार है। दोस्त की अर्थवत्ता भी करीब करीब यार जैसी ही है यानी मित्र, सखा, साथी, संगी के साथ इसमें भी प्रेमी या आशिक का भाव है, अलबत्ता स्त्री के संदर्भ में यार की तरह दोस्त शब्द में नकारात्मक भाव नहीं है। दोस्त भी इंडो-ईरानी भाषा परिवार का शब्द है। संस्कृत में जुष्ट शब्द है जिसका अर्थ है प्रसन्न, संतुष्ट रहनेवाला। साथी, समर्थ, मददगार आदि। जुष्ट बना है जुष् धातु से जिसमें अनुकूल, मंगलकारी, प्रसन्न रहने का भाव है। खुश करना, चाहना, प्रसन्न रहना, भक्त, अनुरक्त होना और संतुष्ट करना जैसे भाव भी इसमें हैं जो मैत्री और सखी भाव से जुड़ते हैं। अवेस्ता में इसका रूप जुस्त just हुआ जो पह्लवी के दोस्त में तब्दील हुआ। यारी, याराना की तरह दोस्त से भी दोस्ती, दोस्ताना जैसे शब्द बने हैं। अपना काम साधने के लिए किसी को भी सखा या बंधु बना लेने वाले व्यक्तियों के संदर्भ में यार पालना या दोस्त पालना जैसे मुहावरे कहे जाते हैं। अभिप्राय यही है

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Friday, March 12, 2010

जरा ज़बान संभाल के…

tongue sticking out rolling stonesसंबंधित कड़िया-1.टाईमपास मूंगफली 2.पूनम का परांठा और पूरणपोली 3.पकौडियां, पठान और कुकर.4.शराबी की शामत, कबाबी की नहीं.5.गुपचुप गोलगप्पा और पानी बताशा .…6.जड़ में मट्ठा डालिये…[खानपान-4].7.लस्सी दा जवाब नहीं…[खानपान-3].8.पूरी में समायी कचौरी [खान पान-9].9आटा-दाल का भाव…[खान पान-6].10.गधे पंजीरी खा रहे है...[ खानपान-2].[चटकारा-a].11.[चटकारा-b].12.[चटकारा-c].13.[चटकारा-d].14.[चटकारा-e].

मुंह के भीतर स्वादेन्द्रिय का काम करनेवाला शरीर का महत्वपूर्ण अंग जीभ है। इसे ज़बान भी कहा जाता है। जीभ का रसना नामकरण जहां स्वाद के मद्देनज़र हुआ है वहीं इसे जीभ या ज़बान वाणी उत्पन्न करनेवाले अंग के रूप में मिला है। अंग्रेजी में जीभ को टंग कहते हैं जो भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है। जीभ और ज़बान एक ही मूल से निकले शब्द हैं और इस तरह इन्हें इंडो-ईरानी परिवार में रखा जाता है मगर इसी मूल से अंग्रेजी का टंग tongue शब्द भी निकला है। इस तरह ये तीनों शब्द सहोदर हैं और भारोपीय भाषा परिवार के माने जाते हैं। जीभ के लिए ज़बान शब्द फारसी भाषा से आया है। संस्कृत में जिव्हा शब्द का प्रयोग रसना के लिए होता है। जिह्वा का प्राकृत रूप हुआ जिब्भ और इससे हिन्दी में बना जीभ। संस्कृत जिह्वा का मूलरूप जिह्वः है।  जिसका जन्म ह्वै धातु है जिसमें पुकारना, बुलाना, नाम लेकर पुकारना, आवाज़ करना जैसे भाव हैं। जाहिर है ये सारी क्रियाएं जीभ के जरिये ही सम्पन्न होती है जिसका रिश्ता वाक् शक्ति से है। ह्वै + ड के मेल से बना जिह्वः जिससे बने जिह्वा से ही हिन्दी का जीभ शब्द बना। ह्वै से बना है ह्वानम् जिसमें पुकारने, बुलाने , क्रन्दन करने, आमंत्रित करने का भाव है। बुलावा, आमंत्रण, निमंत्रण, ललकार, चुनौती के अर्थ में हिन्दी में आह्वान शब्द खूब जाना पहचाना है। यह तत्सम शब्द है और संस्कृत से जस का तस  लिया गया है। आह्वान में देवताओं को संबोधित करने का भाव है वहीं बुलाने का भाव भी है। यह बना है ह्वै धातु में आ उपसर्ग लगने से जिसमें जोड़ने, समाने, शामिल करने का भाव है। इसके साथ इसमें ल्युट् प्रत्यय भी लगता है।
भाषाविज्ञानियों नें इन सभी शब्दों के लिए मूल रूप से एक धातु dnghwa की कल्पना की है। संस्कृत जिह्वा का अवेस्ता में वर्ण विपर्यय के जरिये हिज्वा hizva, हिजुआ hizua- और हिजु hizū- जैसे रूप हुए। प्राचीन फारसी में इसके hzanm, hizânam जैसे रूप हुए और फिर मध्यकालीन फारसी में यह उज़वान uzwân, हिज़बाना hizabana हुआ और फिर फारसी में इसने ज़बान zaban का रूप लिया। फारसी-ईरानी की पड़ोसी भाषा आर्मीनियाई मे यह लेज़ू और लिथुआनी में ल्यूजूविस हुआ। भारोपीय धातु dnghwa से लैटिन का प्राचीन रूपांतर dingua हुआ। मूल रूप से इंग्लिश और जर्मन रूपों का उद्गम पुरानी लैटिन के dingua से माना जा सकता है जिसका एक रूप गोथिक भाषा के टुग्गो tuggo के रूप में सामने आया और दूसरा रूप लैटिन में लिंगुआ हुआ जिससे भाषा के अर्थ में अंग्रेजी का लैंग्वेज शब्द सामने आया। से माना जा सकता है जो लैटिन में लिंगुआ बना। अंग्रेजी टंग की व्युत्पत्ति गोथिक को टुग्गो से मानी जा सकती है। ओल्ड इंग्लिश से इसका रूपांतर tunge/tongue के क्रम में टंग हुआ। जर्मनिक में यह zunga/Zunge के रूप में मौजूद है। हिन्दी में ज़बान और ज़ुबान दोनों रूप इस्तेमाल होते हैं जो मूलतः फारसी से आए हैं। हिन्दी में आमतौर  Tongue-HandShake--23191 पर नुक्ता नहीं लगता है। एक ही भारोपीय मूल dnghwa से टंग शब्द बना और लैटिन के लिंगुआ के जरिये भाषा के लिए लैंग्वेज शब्द बना। इसके विपरीत इसी मूल के इंडो-ईरानी भाषा परिवार में ऐसा नहीं हुआ। फारसी उर्दू के ज़बान शब्द में दोहरी अर्थवत्ता का विकास हुआ। इसमें जीभ और भाषा दोनों का भाव है।
हिन्दी में जीभ और ज़बान से बने कई मुहावरे प्रचलित हैं जैसे-ज़बान चलाना या ज़बान चलना जिसका अर्थ है किसी की शान के खिलाफ बोलना, बढ़ चढ़ कर बोलना अथवा वाद-विवाद करना। वाचाल के अर्थ में अक्सर लम्बी ज़बान मुहावरे का प्रयोग होता है। यह मूलतः फारसी से आया है जिसका असली रूप है ज़बान दराज़ करदन अर्थात जबान लम्बी करना। चूंकी बोलने की क्रिया जीभ के जरिये ही होती है इसलिए ज्यादा बोलने, शेखी बघारने या ऊंचे सुर में बोलने के लिए यह मुहावरा इस्तेमाल होता है। इसी तरह ज़बान संभाल कर बोलना यानी सोच समझ कर कुछ कहना, जबान बंद रखना यानी चुप रहना जैसे मुहावरे भी भाषा को अधिक अर्थपूर्ण बनाने के लिए प्रयुक्त होते हैं। लम्बे समय तक किसी भेद को छुपाए रखने के बाद उसे सार्वजनिक करने के संदर्भ में ज़बान खोलना कहते हैं। अपनी कही बात से मुकरना या बयान बदलने के अर्थ में ज़बान से फिरना या ज़बान बदलना जैसे मुहावरे प्रयोग किए जाते हैं। कठिन और पेचीदा तथ्यों को याद रखने के संदर्भ में ज़बानी याद होना कहा जाता है। हवाई या आधारहीन बातों के संदर्भ में ज़बानी जमाखर्च मुहावरा खूब लोकप्रिय है। बड़बोलेपन को लेकर चेतावनी देने के लिए ज़बान खींचना भी आम मुहावरा है। किसी को वचन देने के संदर्भ में ज़बान देना कहा जाता है। ज़बान बंद रखना यानी चुप रहना। नोकज़ोख करने के लिए ज़बान लड़ाना मुहावरा इस्तेमाल होता है। ज़बान का पक्का होना मुहावरा वचनबद्धता निभानेवाले के लिए इस्तेमाल होता है जबकि इसके विपरीत ज़बान का कच्चा मुहावरे का प्रयोग वादाफरामोशी के लिए किया जाता है। ज़ुबान के साथ फारसी का बद् उपसर्ग लगने से बनता है बद्ज़ुबान का अर्थ है जो तीखी और घटिया बातें करता हो। इसी तरह ज़ुबान में बे उपसर्ग लगने से बनता है बेजुबान यानी न बोलनेवाला अथवा गूंगा। 
जीभ को रसना भी कहते हैं। रसना शब्द बना है रस से। रस यानी तरल, द्रव या सार। स्वाद के लिए रस होना ज़रूरी है। मुंह में जीभ के इर्द-गिर्द लार ग्रंथियां होती है जो खाद्यपदार्थ का स्पर्श होते ही सक्रिय हो जाती हैं जिससे रस का सृजन होता है। इसीलिए जीभ को रसना भी कहते हैं। दार्शनिक अर्थो में रसना राग-रंग और विलास की प्रतीक है क्योंकि यह जीवन के भौतिक आधार यानी रसीले-चटपटे पकवानों से तृप्त होती है। ज्ञानी कहते हैं कि जीवन का आधार भक्ति-रस है जो मन के भीतर उपजता है। इस तरह देखें तो स्वाद का असली रिश्ता रसना यानी जीभ से है जो भोजन का रस भी लेती है और बातों का भी।

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Wednesday, March 10, 2010

पाखाना लगना, लैट्रिन आना, बाथरूम करना…

Defecation_img_1907पिछली कड़ियां-1.गोबरगणेश का चिंतन अर्थात गोबरवाद.2.निकम्मों की लीद और खाद निर्माण.3.टट्टी की ओट और धोखे की टट्टी

नि त्यकर्म से निवृत्त होने की क्रिया को सभी संस्कृतियों में तरोताज़ा होने, स्वच्छ होने या निर्मल होने से जोड़ा गया है। टॉयलेट toilet को शुद्ध हिन्दी में शौचालय कहते हैं। शंकानिवारण की क्रियाएं शौच से जुड़ती हैं। टट्टी जाने के लिए संस्कारी भाषा में शौच जाना भी कहते हैं जो बना है संस्कृत की शुच् धातु से जिसमें स्वच्छता, निर्मलता, पवित्रता, पावनता, सफाई जैसे भाव जुड़े हैं। पवित्रता के अर्थ में हिन्दी का शुचिता शब्द इसी धातुमूल से जन्मा है। शौचक्रिया का अर्थ मोटे तौर पर मलविसर्जन है किन्तु उसमें सभी नित्यकर्मों से निवृत्त होने का भाव है। ऐसे काम, जिनसे शरीर की मलिनता दूर हो और तनमन में शुचिता का भाव जगृत हो, वही शौचकर्म है। इस तरह शौचालय का अर्थ हुआ जहां जाकर शुद्ध हुआ जाए। टट्टी की तरह इस शब्द का भी अर्थ विस्तार हुआ। हिन्दी में मानव मल के अर्थ में शौच शब्द का इस्तेमाल भी होता है जैसे वहां बहुत सारा शौच पड़ा था।
टट्टी या शौचालय के अर्थ में हिन्दी में पाखाना शब्द का भी खूब इस्तेमाल होता है। इसके कई रूप प्रचलित हैं जैसे पैखाना, पखाना या पाखाना। यह फारसी के पाखानः या पाखानह से जन्मा शब्द है। पाखाना के साथ लगा “खाना” साफ बता रहा है कि यह स्थानवाची शब्द है। मगर शंका समाधान के लिए लोग पाखाना जाते भी हैं, पाखाना करते भी हैं। शिशु कपड़ों में ही पाखाना कर देते हैं और कई लोगों को डर के मारे पाखाना लग जाता है। पाखाना में आए पा का अर्थ प्रायः पैर से लगाया जाता है। फारसी का पा दरअसल इंडो-यूरोपीय मूल का शब्द है। संस्कृत हिन्दी का पद, पैर और अंग्रेजी का फुट, पैडल, पैड जैसे शब्द इसी मूल से निकले हैं जिनमें चलने, टिकने, आधार या पैरों का भाव है। कुछ व्याख्याकार पाखाना का अर्थ वह स्थान बताते हैं जहां पाद प्रक्षालन अर्थात पैर धोए जाएं। इस अर्थ में पाखाना का अन्वय हुआ पा + खाना। पुराने ज़माने में बाहर से आने पर लोग घर के आंगन में एक नियत स्थान पर पैर धोकर ही कमरों में प्रवेश करते थे। नित्यकर्म में हस्त-पाद प्रक्षालन तो निहित है मगर पाखाना शब्द सीधे सीधे टट्टी या टॉयलेट से जुड़ रहा है। इसी तरह नित्यकर्म के संदर्भ में पैर धोने की क्रिया में मलविसर्जन क्रिया स्पष्ट नहीं होती साथ ही पा + खाना के पा शब्द से धोने की क्रिया अथवा विशेषण का बोध भी नहीं होता। शौचालय में निहित व्यंजना के आधार पर अगर पाखाना शब्द का अन्वय अगर पाक+ खाना किया जाए तब इसका भावार्थ वहीं निकलता है जो शौचालय का स्थूल अर्थ है अर्थात पवित्र होने, स्वच्छ होने का स्थान। पाक में क्रिया और विशेषण का बोध भी होता है। मुझे लगता है बतौर शौचालय इस शब्द की यह व्युत्पत्ति तार्किक है।
हिन्दी में लेट्रिन latrine शब्द का इस्तेमाल भी शौचालय या टट्टी के अर्थ में खूब होता है। इसकी आमद अंग्रेजी से हुई है। इसकी मूल भारोपीय धातु है लू lou-जिसका अर्थ है धोना। लैटिन में इससे बना लैवेयर lavare जिसमें भी प्रक्षालन,

... टट्टी की तरह अब बाथरूम भी ‘आती’ है और बाथरूम ‘किया’ भी जाता है अर्थात बाथरूम पदार्थ भी है... roman-latrine-j000112_440440प्राचीन रोमन युग का सार्वजनिक शौचालय  

नहाना-धोना जैसे भाव हैं। lavare में लैटिन का -trina प्रत्यय जुड़ा जिसमें स्थान या कार्यस्थल का भाव है। इस तरह lavatrina होते हुए इसका लैट्रिना latrina रूप स्थिर हुआ जिसका अर्थ हुआ नहाने की जगह, स्नानागार। पाश्चात्य समाज में नहाने और शौच के लिए एक ही स्थान पर व्यवस्था रहती है जिसे हम अटैच्ड लैटबाथ कहते हैं। इस तरह लैट्रिन शब्द का अर्थ किसी ज़माने में बाथरूम ही था मगर बाद में इसमें टॉयलेट या शौचालय का भाव रूढ हो गया। अब पाश्चात्य समाज में भी टॉयलेट या लैट्रिन के स्थान पर वाशरूम शब्द का अधिक इस्तेमाल होता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे टट्टी की बजाय हमने पहले लैट्रिन शब्द का इस्तेमाल शुरू किया। बाद में लैट्रिन शब्द का प्रयोग हिन्दी में भी विष्टा की तरह होने लगा जैसे लैट्रिन आना, लैट्रिन करना, लैट्रिन पड़ी है वगैरह वगैरह। तरोताज़ा होने के स्थान के लिए जिस तरह से टॉयलेट या लैट्रिन से पीछा छुड़ाकर अंग्रेजी ने वाशरूम का दामन पकड़ा है उस तरह का कोई शब्द हिन्दी में नहीं बना। अलबत्ता टट्टी की बजाय टॉयलेट शब्द हमें अधिक सभ्य लगता है। शुचिता का अर्थ ही निर्मलता है और निर्मलता का अर्थ है निर् + मल अर्थात मल का न रहना या मल का तिरोहित होना। इस क्रिया को स्थूल रूप में देखें तो यह नित्यकर्म से जुड़ती है। देह से मल निस्तारण की क्रिया में नहाना भी शामिल है और मल विसर्जन भी। दोनों क्रियाओं में शरीर निर्मल हो रहा है। शब्दविलास के तौर पर हम चाहें तो शौचालय को निर्मलधाम कह सकते हैं।
विभिन्न समाजों की संस्कृति, तौरतरीकों और आदतों का प्रभाव भी भाषा पर पड़ता है जिससे शब्दों की अर्थवत्ता बदलती चलती है। कई बार यह बदलाव हास्यास्पद होता है मगर भाषा तो समृद्ध होती ही है। ऐसा ही एक शब्द है बाथरूम। भारतीय परम्परा में आमतौर पर स्नानागार और शौचालय अलग अलग होते हैं। शौचालय चाहे निर्मल और शुद्ध होने का स्थान हो पर उसमें स्नानगृह का भाव नहीं है। ज्यादातर भारतीय अटैच्ड लैटबाथ पसंद नहीं करते। खासकर छोटे शहरों और कस्बों में यह प्रवृत्ति अधिक है। यह दिलचस्प है कि भारतीय स्त्री-पुरुष लघुशंका के लिए स्नानागार का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी तर्ज पर स्नानागार के लिए हिन्दी में बाथरूम इतना प्रचलित हो चुका है कि कोई दूसरा शब्द नहीं सूझता। देश के मध्यवर्ग में लघुशंका के अर्थ में बाथरूम शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है। खासतौर पर महिलाएँ इस शब्द का प्रयोग अधिक करती हैं। टट्टी की तरह अब बाथरूम भी ‘आती’ है और बाथरूम ‘किया’  भी जाता है अर्थात बाथरूम पदार्थ भी है।

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Tuesday, March 9, 2010

टट्टी की ओट और धोखे की टट्टी

an...हम हिन्दुस्तानी नित्यकर्म को प्रकृति की सोहबत में करने के आदी रहे हैं। फारसी में इसे हाज़त-फ़राग़त कहते हैं और हिन्दी में शंका समाधान...

क्या कुछ ऐसे शब्दों की मिसालें गिनाई जा सकती हैं जो स्थानवाची हैं मगर उनका इस्तेमाल पदार्थ के संदर्भ में भी होता है? ज्यादा दिमाग़ लगाने की ज़रूरत नहीं है। मल त्याग से संबंधित जितने भी स्थान हैं उनका प्रयोग विष्ठा या मल के रूप में भी धड़ल्ले से होता है। इस क्रम में टट्टी, टॉयलेट, शौचालय, पाखाना या बाथरूम जैसे शब्द खास हैं। टट्टी का अर्थ होता है बांस की फट्टियों या टाट की चिक, पर्दा या पतली दीवार। टट्टी अपने आप में वह स्थान है जहां आड़ हो,  जहां नित्यकर्म से निवृत्त हुआ जाता है। मगर बोलचाल में विष्टा का पर्याय ही टट्टी हो गया है। इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुहावरे हैं जिनमें आड़ संबंधी अर्थ प्रकट होता है, जैसे- धोखे की टट्टी यानी ऊपर से आकर्षक पर भीतर से कुछ और या छुप कर वार करनेवाला आवरण। टट्टी की ओट लेना यानी छुपना या न मिलने के बहाने बनाना। इधर हंसी-ठट्ठा में शौच क्रिया के लिए टटियाना और इसकी शंका के लिए टटास जैसे शब्द भी बना लिए गए हैं। इसी तरह शौचालय शब्द में लगे “आलय” से ही इसमें स्थान या आश्रय का भाव स्पष्ट है। मगर शौच का अर्थ भी विष्ठाहो गया जबकि मूल आशय अशौच से मुक्ति था। इसी तरह अंग्रेजी में यूं तो टॉयलेट जाया जाता है मगर हिन्दी में टॉयलेट “किया” भी जाता है और “पड़ा” भी रहता है। 

टट्टी शब्द समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में बोला, समझा जाता है। उत्तर में नेपाल से लेकर अफ़गानिस्तान तक लोग इसका इस्तेमाल विष्ठा के अर्थ में ठाठ से करते हैं। टट्टी एक पदार्थ है जबकि अपने मूल स्वरूप में यह स्थानवाची शब्द है। टट्टी शब्द की गहराई में जाएं पता चलता है कि खुले आम हगने के लिए बदनाम हम भदेस भारतीयों नें ही इस नितांत आवश्यक निजी कर्म के लिए आड़ का आविष्कार भी किया था, जिसे संस्कारी भाषा में आज टॉयलेट या शौचालय कहा 332764558_e247636ee8जाता है। सार्वजनिक सेवा के बतौर इन कामों के लिए सुविधाएं या प्रसाधन जैसे शिष्ट शब्द भी मिलते हैं। यूं हम हिन्दुस्तानी इस नित्यकर्म को प्रकृति की सोहबत में करने के आदी रहे हैं। इसके लिए भी दिशा-मैदान जैसा संस्कारी शब्दयुग्म इस्तेमाल होता रहा। उर्दू-फारसी में इसे हाज़त फ़राग़त कहते हैं जिसका सही हिन्दी अनुवाद होता है शंका समाधान। आमतौर पर मूत्रत्याग के लिए लघुशंका शब्द का खूब प्रयोग होता है। मराठी में इसे लघवी कहते हैं। पर शंका अगर बड़ी हो तो उसे क्या कहा जाएगा? जाहिर है टट्टी जाने के लिए हमने दीर्घशंका शब्द भी बना लिया। हाज़त-फ़राग़त में इन दोनों शंकाओं से निवृत्त होने के साथ ही साधारण अर्थों में हाथ-मुंह धोने का भाव भी निहित है जिसे चालू हिन्दी में अब फ्रेश होना कहा जाता है। यूं देखें तो हाज़त फ़राग़त की अर्थवत्ता ज्यादा व्यापक है।
टट्टी शब्द की व्युत्पत्ति टाट यानी जूट का पर्दा या ठट्ठर > टट्टर > टाटी >टट्टी से बताई जाती है। टट्टी का अर्थ होता है टाट से बना हुआ छोटा कक्ष या कोई आड़। हिन्दी भाषी सभी क्षेत्रों में टाट शब्द खूब बोला समझा जाता है। टाट यानी जूट के तन्तुओं से बना हुआ मोटा कपड़ा जिसका इस्तेमाल आमतौर पर अनाज भरने की थैलियों के लिए होता है। निर्धनों के झोपड़े पर पर्दे का काम भी यह टाट का टुकड़ा करता रहा है। सो टाट उस वस्तु या पदार्थ का नाम है जो निजता सुरक्षित रखने के लिए आड़ प्रदान करता है। पुराने ज़माने में बस्तियों में नित्यकर्म के लिए जूट से बने इसी टाट से आड़ बनाई जाती थीं। जॉन प्लैट्स के कोशानुसार यह बना है संस्कृत के तन्त्र में इका प्रत्यय लगने से। तन्त्र+इका > तन्त्रिका >टट्टिका >टट्टिआ > टाटी या टट्टी, यह क्रम रहा तन्त्रिका के टट्टी में बदलने का जिसका अर्थ हुआ वनस्पति तन्तुओं से बुना हुआ मोटा कपड़ा। हालांकि हिन्दी शब्दसागर में टट्टी की दो संभावित व्युत्पत्तियां बताई गई हैं। पहली व्युत्पत्ति है तटी जिसका अर्थ ऊंचा किनारा या ऊंची बाड़। दूसरी व्युत्पत्ति है स्थातृ। यह शब्द स्थ् धातु से बना है जिसमें स्थिरता या आधार का भाव है। स्थातृ से ही बना है ठठरी (ठाट्ठरी > ठठरी > ठटरी) जिसका अर्थ होता है कंकाल, ढांचा या पंजर। गौर करें कि मनुष्य का शरीर अस्थियों के ढांचे पर ही है। अस्थिपंजर के रूप में किसी भी जीव की देह को ठठरी कहा जाता है। स्थातृ का देशज रूप ही ठाठ बना। ठाठ का असली अर्थ है घास-फूस या बांस के जरिये बनाया गया कोई ढांचा जिसे सब तरफ से ढक कर कोई आश्रय या निर्माण किया जाए। ठाट्ठरी से इसका रूप ठट्ठर हुआ और फिर टट्टर जिसका अर्थ ओट या रक्षा के लिए बांस की फट्टियां Hut जोड़ कर बनाया गया ढांचा। तन्त्रिका में जहां बुनावट का भाव है वहीं स्थातृ में स्थिरता या ढांचे का भाव है। घर के एक स्थायी हिस्से के तौर पर टाट से बनी आड़ या ओट की तुलना में स्थातृ से बने ठट्टर या टट्रर से टाटी या टट्टी की कल्पना अधिक तार्किक लगती है। अलबत्ता बांस की खपच्चियों को भी बुना ही जाता है और टाट को भी।
नित्यकर्म से निवृत्त होने के लिए बांस से बनाए ढांचे पर चढ़ाई गई टट्टी के जरिए गांव देहातों में शौचालय बनाए जाते रहे। दिशा मैदान जाने की तर्ज पर ही कालांतर में लिए टट्टी जाना जैसे शब्द प्रयोग शुरू हुए। मूलतः इसमें नित्यकर्म के लिए बनाए गए पोशीदा मुकाम पर जाने का भाव था। टट्टी का अर्थविस्तार हुआ और बोलचाल में टट्टी जाना बाद का काम हुआ, हाज़त या शंका के अर्थ में पहले टट्टी आने लगी। इसी मुकाम पर आकर टट्टी जो स्थानवाची शब्द था, पदार्थ या संज्ञा मे तब्दील हो गया। पंजाबी में दस्त के अर्थ में कई बार टट्टियां लगना कहा जाता है। टट्टी का यह बहुवचन दिलचस्प है। हालांकि यहां मात्रा पर नहीं,  क्रिया की आवृत्ति पर जोर है। मल या विष्ठा की तरह अब जगह जगह “टट्टी” की मौजूदगी देखी जा सकती है। हमें यह गर्वबोध भी नहीं रहा कि प्राचीनकाल में विकसित होते जनसमूहों ने हाज़त फ़राग़त के लिए एक स्थान नियत किया था जो हमारे सभ्य होते जाने के शुरुआती प्रतीकों में था। मगर अब ये हाल है कि बिना टट्टी लगाए अर्थात आड़ में गए देशभर के समूचे रेलवे ट्रैक को भदेस भारतीयों ने विराट खुले शौचालय में बदल दिया है।
अंग्रेजी में शौचालय को टॉयलेट toilet कहते हैं जिसका अर्थ भी टट्टी जैसा ही है। अंग्रेजी का टॉयलेट बना है मध्यकालीन फ्रैंच के toilette से जिसके मूल में है टॉइल toile, जो बना है लैटिन के tela से। इसका अर्थ बांस की चटाई या टाट जैसा कपड़ा होता है जिसे बुना गया हो। इस तरह से टॉयलेट का अर्थ भी प्रसाधन या तैयार होने की जगह होता है जिसमें समय के साथ स्नानागार या शौचालय का भाव समा गया। मूल रूप में टट्टी और टॉयलेट एक ही हैं।
-अगली कड़ी में भी जारी
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Monday, March 8, 2010

औरत लफ़्ज में क्या ख़राबी है?

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

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दु नियाभर female copyमें नारीवादी सोच के लोग औरत aurat शब्द को लेकर ख़फ़ा रहते हैं। उनकी निगाह में महिलाओं के लिए यह बेढंगा और बेइज्जती भरा लफ्ज़ है। आज भी हिन्दी भाषी क्षेत्र की कोई महिला खुद के लिए औरत  शब्द सुन कर कब तमक जाए, कहा नहीं जा सकता। यह भी धारणा है कि औरत सिर्फ शादीशुदा स्त्री को कहा जाता है या पुरुष से जिस्मानी संबंध बना चुकी महिला के लिए ही यह शब्द इस्तेमाल किया जाता है।  अलबत्ता यह सिर्फ सोच के स्तर पर है वर्ना यह शब्द भाषा और समाज से बहिष्कृत नहीं है और पढी-लिखी जमातों में इसका इस्तेमाल खूब होता है। औरत शब्द हिन्दी में बरास्ता फारसी, अरबी से आया। अरबी में इसका रूप है औराह। यह एक क्रिया है जिसका मतलब होता है शरीर के अंगों को ढकना, छुपाना। शरीर के गुप्तांग भी इसके दायरे में आते हैं। यह बना है अरबी धातु औराह या आईन-वाव-रा (ayn-waw-ra) से जिसका मतलब है कानापन या एक आंख से देखना। कुछ लोग इस धातु का अभिप्राय कमजोर, निर्बल, अधूरापन आदि से भी लगाते हैं। औरत शब्द में कुछ खराबी ढूंढना आज के दौर में ठीक नहीं है।  अगर ऐसा होता तो महिलाओं के लिए काम करनेवाले पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान का नाम औरत फाउंडेशन न होता। मद्दाह साहब के कोश में इसे अरबी मूल का मानते हुए इसके स्त्री, जोरू, जाया, भार्या, पत्नी, नारी, महिला जैसे अर्थ ही बताए गए हैं।
female_symbolइस्लामी नज़रिये से औराह का मतलब सिर्फ सिर्फ स्त्री stree से नहीं है बल्कि इसमें पुरुष भी शामिल हैं। शरीर के गुप्त अंगों को छुपाने की क्रिया ही औराह awrah कहलाती है । अलबत्ता स्त्री और पुरुषों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। मसलन मर्द के लिए नाभि से घुटनों तक बदन को ढक कर रखना ज़रूरी है जबकि महिलाओं को चेहरे को छोड़ कर सिर से पैर तक शरीर को ढके रहना ज़रूरी है । इस्लामी व्यवस्थाओं में इस सिलसिले में हिजाब, निक़ाब और बुर्का जैसी womenविभिन्न व्यवस्थाएं दी हुई हैं। मगर औराह के मूल में शरीर को ढकने की ही बात है। स्त्रियों के लिए चूंकि अरबी समाज में सिर से पैर तक  (आपादमस्तक- नख से शिख तक, सरापा) जिस्म को ढकने की बात कही गई और यह सामाजिक रीति भी बन गई तथा औरत शब्द बना अर्थात जो सिर से पैर तक ढकी रहे। यही शब्द जब फारसी और उर्दू में आया तो सामान्य महिला के लिए प्रचलित हो गया क्योंकि भारत में औराह जैसी प्रथा तो नहीं थी अलबत्ता पर्दा प्रथा में इसका एक अलग रूप ज़रूर नज़र आता था।
female_symbolऔरत को खराब माननेवालों का एक तर्क यह भी है कि अरबी समाज में औरत शब्द की बजाय खानुम khanum, बेग़म begum, खानम, निसां या ज़न-ज़ना का इस्तेमाल ज्यादा होता है। गौरतलब है कि इनमें से अधिकांश शब्द अरबी मूल के नहीं है। बेगम शब्द का रिश्ते प्रभावशाली महिला या रसूखदार की स्त्री से जुड़ता है। संस्कृत की भज् धातु से बना है संस्कृत का भगः शब्द जिससे बना है ईश्वर, सबको सबका हिस्सा देने वाला, प्रकारांतर से सबका भाग्यविधाता आदि के अर्थों वाला शब्द भगवान। पुरानी फारसी, ईरानी और अवेस्ता में यह भग लफ्ज़ बग या बेग [BAG] के रूप में मौजूद है। अर्थ वही है-सर्वशक्तिमान। बग या बेग बाद में रसूखदार लोगों की उपाधि भी हो गई। इसी मूल से निकले बेगम शब्द की अर्थवत्ता में शालीन, समृद्ध, प्रभावशाली स्त्री की अर्थवत्ता समा गई। मध्यएशिया के शक्तिशाली कबीलों की जातीय पहचान यह बेग़ शब्द बना। इसका एक रूप उज़बेक में नज़र आता है। उज़बेकिस्तान इसी जाति की प्रधानता की वजह से एक देश का नाम है। यही लोग भारत में उज़बक कहलाए जिसमें गंवार या असभ्य का भाव है। कुछ विद्वान इस BAG में उद्यान के अर्थ वाला बाग़ भी देखते हैं जिसकी व्याख्या समृद्ध भूमि, ऐश्वर्य भूमि के रूप में है। बगीचा इसका ही रूप है। बगराम, बगदाद, बागेवान जैसे शहरों के नामों के पीछे यही अर्थ छुपा है।
female_symbolअरबी-फारसी में महिला के लिए एक अन्य शब्द है  ज़न जिसकी रिश्तेदारी इंडो-ईरानी भाषा परिवार के जन शब्द से है जिसमें जन्म  देने का भाव है। ज़नानी या ज़नान जैसे रूप भी प्रचलित हैं। संस्कृत में उत्पन्न करने, उत्पादन करने के अर्थ में जन् धातु है। इससे बना है जनिः, जनिका, जनी जैसे शब्द जिनका मतलब होता है स्त्री, माता, पत्नी। जिससे हिन्दी-उर्दू के जन्म, जननि, जान, जन्तु जैसे अनेक शब्द बने हैं। भाषा विज्ञानियों ने ज़न, ज़नान, जननि जैसे शब्दों को प्रोटो इंडो-यूरोपीय मूल का माना है और एक धातु खोजी है- gwen जिसका मतलब है स्त्री, माता, पत्नी। अंग्रेजी का क्वीन, हिन्दी का रानी या राज्ञी जैसे शब्द भी इसी मूल से उपजे हैं। इसी तरह चीनी मंगोल भाषा के खान शब्द की आमद जब फारसी अरबी में हुई तो वहां भी प्रभावशाली लोगों को खान khan कहने की परिपाटी चल निकली। मंगोल दायरे से बाहर निकलने के बाद खाकान शब्द का स्त्रीवाची खातून बना जिसका अर्थ साम्राज्ञी था। बाद में फारसी में किसी भी सम्भ्रान्त स्त्री के लिए खातून, खानम या खानुम शब्द का प्रयोग होने लगा।
female_symbolफिर लौटते हैं औरत शब्द पर। नारीवादी सोच के लोगों की निगाह में यह शब्द खराब इसलिए है क्योंकि इसके मूल अर्थ में औरत को कमज़ोर, अपूर्ण मानने जैसी बातें भी निहित हैं। इस्लाम में स्त्री के शरीर को ढके रहने की बात के मूल में तत्कालीन परिस्थितियां थीं। औराह का एक अर्थ है समूचे BurqaSnapshotजिस्म को ढकना। इसमें यह व्यवस्था है कि स्त्री एक आंख से देख सकती है। इसका अर्थ एकाक्षी या कानेपन से जोड़ा जाता है, जो ठीक नहीं है। वैसे शब्दकोशों में औराह का अर्थ कानापन नहीं बल्कि इसके लिए औरा एक अलग शब्द है जिसमें एक आंख से देखने का भाव है। यूं भी यह तार्किक नहीं लगता कि किसी समाज में महिला के तमाम स्वभावगत पहलुओं पर पक्षपातपूर्ण ढंग से राय बनाने के बावजूद, पुरुष से कमतर आंकने के लिए उसे एक आंख का साबित करने जैसा कोई शब्द या टर्म विकसित की गई हो। इस्लामी संदर्भों में भी ऐसी व्याख्या नहीं मिलती।
female_symbolऔरत शब्द में कहीं भी ओछापन, सस्तापन या पुरुषवादी अहंकार वाली बात कम से कम उर्दू-हिन्दी की सरज़मीं इस हिन्दुस्तान में तो नज़र नहीं आती। यह शब्द भी उतनी ही मर्यादा अथवा शालीनता रखता है जितनी कि महिला या स्त्री शब्द में निहित है। स्त्री, महिला, नारी, औरत जैसे शब्दों में सिर्फ परिपक्वता, वयस्कता ही नज़र आती है। इससे पहले की अवस्था को लड़की, कन्या वगैरह कहा जा सकता है। विवाह या शारीरिक सम्पर्क के आधार पर स्त्री, नारी, औरत जैसे शब्दों के अर्थ नहीं निकाले जाने चाहिए। औरत शब्द का इस्तेमाल यह सोचकर नहीं किया जाता कि उसे मर्द की तुलना में कमतर साबित करना है।

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Sunday, March 7, 2010

आलू कचालू बेटे कहां गए थे…

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खान-पान की दुनिया की कल्पना आलू के बिना नहीं की जा सकती। दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय पदार्थों में आलू से बने व्यंजनों को निश्चित ही  की जगह यकीनन सर्वोच्च दस स्थानो में है क्योंकि यह हर खासो-आम की पसंद में शुमार है। आलू एक ऐसा कंद है जिससे रोजमर्रा के आहार से लेकर विशिष्ट खाद्यपदार्थ तक बनते हैं। तीते-चरपरे से लेकर मीठे स्वाद वाली चीज़े तक इससे बनती हैं जो नाश्ते से लेकर दावतों तक की शोभा बढ़ाती हैं। सांस्कृतिक विविधता वाले देश में अनगिनत आहार शैलियों में आलू का दर्जा बहुत खास है। शकरकंद को भी आलू के अंतर्गत ही गिना जाता है जिसे स्वीट पोटैटो भी कहते हैं। कुछ हिन्दीभाषी क्षेत्रों में इसे रतालू भी कहते हैं और यह व्रत उपवास के आहार में प्रयुक्त होता है। हालांकि रतालू कंद की अलग किस्म का नाम है।
आलू का जन्मस्थान दक्षिण अमेरिकी देश पेरु में माना जाता है जहां एंडीज़ पर्वत के तराई क्षेत्रों में आठ हजार साल पहले से इसकी भरपूर पैदावार होती रही है। पूरी दुनिया से इसे परिचित कराने का श्रेय स्पेनियों को जाता है। अंग्रेजी में इसे पोटेटो कहा जाता है जबकि भारत की ज्यादातर भाषाओं में इसे आलू ही कहते हैं। कोंकणी, मराठी समेत दक्षिण की कुछ भाषाओं में इसे बटाटा भी कहा जाता है। पूरी दुनिया में इसका सबसे लोकप्रिय नाम पोटेटो ही है जो मूल रूप से स्पेनिश शब्द पटाटा से आया है। 14 वी-15वी सदी में जब स्पेनी जहाजियों के दल भारत को खोजते हुए अमेरिका के पूर्वी द्वीप समूहो तक जा पहुंचे जिसे कैरेबियन कहा गया। इन्हीं द्वीपों में बहुतायत से पाए जाने वाले मीठे कंदमूल से वे परिचित हुए जिसे स्थानीय कैरिबियन भाषा में जो मूलतः इंका परिवार की है, में पताता या बताता कहा जाता था। स्पेनी कारोबारी अपने साथ इसे लेकर आए और स्पेन में इसकी खेती शुरू हुई। एक अन्य मान्यता के अनुसार यूरोपीय खोजियों के दस्ते जब पंद्रहवी सदी में दक्षिण अमेरिका के पेरु, अर्जेंटीना के भीतरी तक पहुंचे तब वे एक अन्य कंद से परिचित हुए जिसे स्थानीय भाषा में पापा कहा जाता था। पोटेटो शब्द में पेरू के पापा और कैरेबियन बताता के मेल से बना है।
ऐसा माना जाता है कि यूरोप में सर्वप्रथम सर फांसिस ड्रेक उत्तरी अमेरिकी द्वीपों से आलू लेकर आए। सर वाल्टर रेले ने इसका बहुत प्रचार किया और जल्दी यह यूरोप से अफ्रीका और एशिया तक फैल गया। यह स्पेनिश भाषा में समा गया। स्पेनी उच्चारण के चलते यह पटाटा हुआ जबकि पुर्तगाली ज़बान में यह बटाटा ही बना रहा। पताता जब अंग्रेजी में पहुंचा तब वहां त वर्ण ट में बदला क्योंकि इतालवी, फ्रैंच,
toni-multi"सन् 1600 में पुर्तगाली व्यापारी सबसे पहल महाराष्ट्र के तट पर मुंबई के पास इसे लेकर उतरे। भारतीय भाषाओं में बटाटा, आलू कहलाया। गुजराती में यह बटाका कहलाया और सिंधी में इसका रूप पटाटो होता है। संस्कृत में कंद के लिए अलु शब्द मिलता है। उत्तर भारत में यह सत्रहवीं सदी में पहुंचा और हिमाचल की पहाड़ियों में अंग्रेजों ने इसकी खेती शुरू की। "

पुर्तगाली और स्पेनी की तरह अंग्रेजी में त ध्वनि का उच्चारण नहीं होता इसलिए पताता patata का अंग्रेजी रूप पोटेटो potato हुआ। भारत के पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्रों में आलू का बटाटा नाम पुर्तगालियों के प्रभाव से ही है। फ्रैंच भाषा की वृत्ति है कि विदेशज शब्दों को जस का तस स्वीकार न करते हुए उसमें देशी तड़का लगा कर इसे अपनाना, इसीलिए फ्रैंच में आलू का नाम हुआ ला पोम् दे तेर्। सन् 1600 में पुर्तगाली व्यापारी सबसे पहल महाराष्ट्र के तट पर मुंबई के पास इसे लेकर उतरे। भारतीय भाषाओं में बटाटा, आलू कहलाया। गुजराती में यह बटाका कहलाया और सिंधी में इसका रूप पटाटो होता है। संस्कृत में कंद के लिए अलु शब्द मिलता है। उत्तर भारत में यह सत्रहवीं सदी में पहुंचा और हिमाचल की पहाड़ियों में अंग्रेजों ने इसकी खेती शुरू की। आज आलू उत्पादन में भारत का स्थान दुनियाभर में तीसरा है। सर्वाधिक आलू चीन मे पैदा होता है। उसके बाद रूस का स्थान है। है। इसी तरह अरवी या अरबी के नाम से पहचाना जानेवाला कंद मूलतः संस्कृत के अलुः का रूपांतर ही है। इसे कई जगह पहाड़ी आलू कहा जाता है। हालांकि कचालू एक खास किस्म का कंद होता है जो अरबी से मिलता जुलता होता है। इसे पहाड़ी अरबी भी कहते हैं क्योंकि यह पहाड़ी क्षेत्रों में ही ज्यादा होता है। हम्प्टी डम्प्टी की तर्ज पर बनी हिन्दी कविता आलू कचालू बेटे कहां गए थे....हिन्दी में बेहद लोकप्रिय है और नर्सरी के बच्चे अर्से से इसे दोहरा रहे हैं।
आलू-कचालू नाम की एक चाट भी उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। इसमें उबले आलू और कचालू को मसालों के साथ पेश किया जाता है। यह देशज शब्द माना जाता है। कचालू की व्युत्पत्ति कच्चा+आलू से बताई जाती है। मूलतः यह वराहीकंद है जिसे हिन्दी में अरवी या अरबी भी कहते हैं। मराठी में यह डुकरकंद भी कहलाता है। आलू की कुछ किस्में मीठी भी होती हैं जिसे स्वीट पोटेटो कहते आलू से मिलती-जुलती किस्म के तरह भारत में बतौर कंद, रतालू, जिमिकंद, शकरकंद जैसे कंदमूल प्राचीनकाल से लोकप्रिय रहे हैं। कंद और आलुकः संस्कृत में प्राचीनकाल से प्रचलित नाम हैं। भारोपीय भाषाओं में कंद की व्याप्ति जबर्दस्त है। कंद का ही एक रूप अंग्रेजी के कैंडी में नज़र आता है। संस्कृत के कंद का अर्थ है पिंड। इस समष्टि-समूहवाची संज्ञा का एक अर्थ आश्रय के रूप में कई नामों से जुड़ कर उभरता है जैसे समरकंद, ताशकंद। कंद का ही एक रूप है खंड अर्थात पिण्ड, भाग, प्रभाग। उपसर्ग के रूप में इससे भी स्थानवाची शब्द बनते हैं जैसे उत्तराखण्ड, बघेलखण्ड, मलाजखण्ड या रूहेलखण्ड आदि।

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Friday, March 5, 2010

भये प्रकट कृपाला दीनदयाला…[माइक्रोपोस्ट]

न ज़र आने, दिखने के या उद्घाटित होने के अर्थ में हिन्दी में प्रकट शब्द का इस्तेमाल आम है। इस संदर्भ में रामचरितमानस की सर्वाधिक याद आने वाली पंक्ति है -भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। यहां प्रकट में एक संकेत अवतार लेने का भी छिपा हुआ है। आम तौर पर किसी महत्वपूर्ण घटना या व्यक्ति के सामने आने ama के संदर्भ में संस्कार-शिष्टाचारयुक्त भाषा में प्रकट शब्द का प्रयोग होता है। यह बना है प्र + कट् + अच् के मेल से। संस्कृत के प्र उपसर्ग में आगे, पहले, सामने, दूर, अत्यंत, बहुत अधिक, प्रमुखता, अभाव, वियोग या अनस्तित्व जैसे भाव है। इसी तरह संस्कृत की कट् धातु का अर्थ है जाना या ढकना। इस तरह प्रकट का अर्थ हुआ सबके सामने आ जाना, उद्घाटित होना, प्रकाशित होना, रोशनी में आना, स्पष्टतः, उजागर, जाहिरा तौर पर, प्रतीतमान, दृष्यमान, बेपरदा, खुला हुआ जैसे भाव हैं। कट् में निहित ढकना जैसे भावों से उजागर जैसे अर्थ का सृजन करने में भी प्र उपसर्ग में निहित विलोम का भाव सहायक हो रहा है अर्थात जो ढका हुआ न हो वही प्रकट है। प्रकट का देशज रूप प्रगट होता है। क वर्णक्रम का अगला अक्षर ग है और अक्सर क और ग में अदला बदली होती है। आजकल प्रकट विशेषण है और हिन्दी में इसका क्रिया रूप इसके साथ करण प्रत्यय लगाने से बनता है अर्थात प्रकटीकरण यानी सामने लाने, उजागर करने या प्रकट करने की क्रिया। इसके लिए साहित्यिक हिन्दी में प्रकटीभवन शब्द का प्रयोग भी हुआ है। प्रकट का क्रिया रूप प्रकटना भी होता है जो संस्कृत के प्रकटन का ही देसी रूप है। देशज रूपों में परगट भी मान्य है और खूब प्रचलित है। खासतौर पर हिन्दी की पश्चिमी शैलियों और पंजाबी में। वहां तो परगटसिंह नाम भी होता है।
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Thursday, March 4, 2010

संस्कीरत भाखते पोंगा पंडित

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पं डित शब्द की अर्थवत्ता बहुत महत्वपूर्ण है। सामान्य बोलचाल में इस शब्द का अभिप्राय पुरोहिताई या धार्मिक अनुष्ठान करानेवाला ब्राह्मण होता है। इस शब्द को विभिन्न तरह से उच्चारा जाता है जैसे पंडज्जी, पंडिज्जी, पंडत, पंडा आदि। ब्राह्मणों के उपनाम के तौर पर भी इस शब्द के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं जैसे हिन्दी-मराठी में पंडित, पाण्डेय, पाण्डे, गुजराती में पण्ड्या आदि। कश्मीर राज्य के ब्राह्मण तो कश्मीरी पंडित नाम से ही जाने जाते हैं क्योंकि यह उनके लिए समाज द्वारा तय किया शिष्टाचारी संबोधन है। आदिवासी लोक अंचलों में झाड-फूंक करनेवाले पुरोहित के लिए भी विभिन्न जातीय समाजों में पंडा शब्द प्रचलित है। सभी तीर्थस्थलों पर विभिन्न हिन्दू समाजों के कुलपुरोहितों की वंश परंपरा चली आ रही है जो अपने यजमानों की वंश परंपरा का लेखा-जोखा रखते हैं। इन्हें भी पंडा कहा जाता है। पंडित शब्द में पढ़े-लिखे विद्वान और शास्त्रज्ञ ब्राह्मण का भाव महत्वपूर्ण है। पंडा शब्द का अर्थ तीर्थ-पुरोहित, मंदिर का पुजारी भी होता है। ये अलग बात है कि तीर्थपुरोहित के तौर पर पंडा शब्द की अर्थवत्ता में कहीं न कहीं ठग का भाव भी समा गया है। तीर्थ यात्रा पर जानेवालों को उनके परिजन पंडों से सावधान रहने की हिदायत ज़रूर देते हैं।  इस पंडा में रसोई बनानेवाले की अर्थवत्ता भी समाई है क्योंकि शुचिता-शुद्धता के लिहाज से श्रेष्ठिवर्ग में ब्राह्मण पाकशास्त्री ही होते थे। रसोइयों को महाराज भी कहा जाता है जिसमें भी सम्मान, आदर और जातीय श्रेष्ठता का भाव स्पष्ट है। पंडित का स्त्रीवाची पंडिता होता है जिसमें भी चतुराई, विद्वत्ता, कुशल और प्रवीणता का भाव है। यूं पंडित की पत्नी को देशी भाषा में पंडिताइन कहने का चलन है। पंडा की स्त्री पंडाइन, पंडितानी कहलाती है।
पंडित शब्द की व्युत्पत्ति दिलचस्प है। हिन्दी-संस्कृत के ज्यादातर प्रसिद्ध कोश इसका जन्म संस्कृत के पंडः से बताते हैं जिसका अर्थ है बु्द्धिमत्ता, विद्वत्ता, अक्लमंदी और समझ। ज्ञान-विज्ञान का भाव इसमें निहित है। पंडः का अगला रूप है पंडा जिसका अर्थ है बुद्धिमान, समझदार, ज्ञानी। पंडित शब्द के मूल में पंडा है। पंडित से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है जो चतुर, सूक्ष्मबुद्धि हो। शास्त्रों का ज्ञाता और विद्या में निष्णात हो। पांडित्य इस गुण को pujariअभिव्यक्त करनेवाला शब्द है। पंडित दरअसल उन लोगों की उपाधि भी थी जो विद्वान, अध्येता और शास्त्रों के पारंगत हुआ करते थे। गुरुओं और अध्यापकों को आज भी पंडितजी कहने की परंपरा है यह ठीक उसी तरह है जैसे महाविद्यालयीन शिक्षकों को नाम लिए बिना सामान्यतौर पर डाक्टर साहब कह कर सम्बोधित कर लिया जाता है। पंडित शब्द का प्रयोग आचार्य की तरह भी होता है। संगीत गुरु अपने नाम के आगे पंडित लगाते हैं जैसे पंडित रविशंकर या पंडित हरिप्रसाद चौरसिया। यहां कला में निष्णात शिक्षक का भाव ही प्रमुख है ठीक वैसे ही जैसे गुरु के दर्जे पर पहुंच चुके मुस्लिम फनकार के नाम के आगे उस्ताद लगता है, जैसे उस्ताद अमज़दअली खां या उस्ताद ज़ाकिर हुसैन खां।
प्राचीनकाल में ब्राह्मणों को विद्या का अधिकारी माना गया था, सो पंडित शब्द ब्राह्मणों के   लिए रूढ़ हो गया। विद्वत्ता के आधार पर पंडित शब्द की जो ख्याति थी, वह एक जाति विशेष का बोध करानेवाला संबोधन बनकर रह गई। फलां व्यक्ति पंडित है का अर्थ यह हुआ कि वह ब्राह्मण है। विजातीय विवाह के संदर्भ में पंडितों से रिश्तेदारी जैसे वाक्य में पढ़े लिखे विद्वत समाज से नातेदारी का भाव न होकर ब्राह्मण वर्ग का ही संकेत है। कालांतर में जब जातिवाद की छाया इस देश में बहुत गहरी हुई, धर्मभीरुता, ज्ञान के दायरे को सिर्फ अनुष्ठान-कर्म तक सीमित मानने और मनवाने की ज़िद और पुरखों के अर्जित ज्ञान के झूठे दिखावे के चलते ब्राह्मणों की क़द्र समाज में घटी। सामान्य ब्राह्मण कूपमंडूकता होता गया। नवाचार और नए विचारों को स्वीकार न करने की वजह से उनके भीतर का खोखलापन धीरे धीरे अन्य वर्गों पर प्रकट होना शुरू हुआ नतीजतन दीगर वर्गों में ब्राह्मणों के लिए पोंगा पंडित जैसा परिहासपूर्ण सम्बोधन प्रचलित हो गया।
पंडित शब्द की व्युत्पत्ति पंडा से अगर मानी जाए तब प्रश्न उठता है कि पंड या पंडा के मायने क्या? इसमें निहित ज्ञान, विद्या, समझ जैसे भाव कहां से आए। इसका जवाब देते हैं कृ.पा.कुलकर्णी मराठी व्युत्पत्तिकोश में। दरअसल  पंडा शब्द  एक अच्छा उदाहरण है यह समझने का, जिससे सिद्ध होता है कि संस्कृत के पूर्ववैदिक रूप से जन्मी प्राकृत के कई शब्दों का संस्कृतिकरण उपनिषदकाल और उसके भी बाद तक जारी रहा। पंडित शब्द का उल्लेख उपनिषदों में हुआ है। पंडित शब्द दरअसल प्राकृत के पण्णित का संस्कारी रूप है। यह सर्वसिद्ध है कि ज्ञा धातु भारोपीय भाषा परिवार की आदि धातुओं में एक है जिसकी व्याप्ति ज्ञान, समझ, विद्या के अर्थ में दुनियाभर की भाषाओं में हुई है। अंग्रेजी के नो (know), नालेज, जैसे कई शब्द इसी मूल से बने हैं। रूसी का ज्नान, संस्कृत का ज्ञान और अंग्रेजी का नोन दरअसल एक ही मूल के हैं। ज्ञा से बना ज्ञान। इस श्रंखला में कई शब्द आते हैं। प्रज्ञा का अर्थ है समझ, बुद्धि या ज्ञान। गौरतलब है संस्कृत के ज्ञ वर्ण में ज्+ञ् ध्वनियां हैं। मराठी में यह ग+न+य का योग हो कर ग्न्य सुनाई पड़ती है तो महाराष्ट्र के ही कई हिस्सों में इसका उच्चारण द+न+य अर्थात् द्न्य भी है। गुजराती में ग+न यानी ग्न है तो संस्कृत में ज+ञ के मेल से बनने वाली ध्वनि है। दरअसल इसी ध्वनि के लिए मनीषियों ने देवनागरी लिपि में ज्ञ संकेताक्षर बनाया मगर सही उच्चारण बिना समूचे हिन्दी क्षेत्र में इसे ग+य अर्थात ग्य के रूप में बोला जाता है। शुद्धता के पैरोकार ग्न्य, ग्न , द्न्य को अपने अपने स्तर पर चलाते रहे हैं।
पंडित का ण्ड, दरअसल ज्ञ > ज्+ञ् > ण्ण > ण्ड, इस क्रम में प्राकृत ण्ण से सामने आया। प्रज्ञा से बना प्रज्ञित अर्थात जो विज्ञ हो, विद्वान हो। प्रज्ञित > पण्णित यही है पंडित का पूर्वरूप। उपनिषदों में पहली बार पंडित शब्द मिलता है। खरोष्ठी धम्मपद में पंडित के लिए पणिदो या पणिदु जैसे रूप मिलते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि पंडित का पंडा से नहीं, प्रज्ञा से संबंध है। पाण्डित्य का गुण ही किसी व्यक्ति को पंडित साबित करता है। आज भजन कीर्तन और हवन करानेवाले तोता रटंत पुरोहित को पंडित कहा जाता है। तिलकधारी होना पंडित की निशानी है जबकि किसी ज़माने में उन्नत ललाट पर टीका लगाने के पीछे प्रतीकात्मक रूप से मस्तिष्क में स्थित मेधा का अभिषेक करने का भाव था। आज खुद को पंडित कहलाने के लिए कई पोंगा पंडित टीकाराम गली गली में अपने अशुद्ध उच्चारणों के साथ संस्कीरत भाख रहे हैं।

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Wednesday, March 3, 2010

निकम्मों की लीद और खाद निर्माण

manure

चौ पायों की विष्ठा को लीद कहते हैं, जिसमें गधे, घोड़े, हाथी और ऊंट आते हैं। गोबर की तरह लीद शब्द में भी मुहावरेदार अर्थवत्ता है। बेकार के काम में मशगूल रहना, अनुत्पादक कर्म करने को भी मुहावरेदार भाषा में लीद करना कहा जाता है। जाहिर है विष्ठा सर्वाधिक अनुपयोगी पदार्थ है। वह अपशिष्ट है, त्याज्य है इसलिए अनुपयोगी कर्म या काम का बिगड़ जाना लीद या गोबर का दर्जा पा जाता है। हालांकि रिसाइकल के दौर में हर चीज़ की उपयोगिता प्राचीनकाल से रही है। गोबर या लीद भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। लीद या गोबर के खाद रूपी प्रयोग के चलते एक नया मुहावरा सामने आया है जिसने निठल्लों निकम्मों के नाकारापन को कुछ इज्जत बख्शी है। कुछ बरस पहले  हमारे बालसखा राजगढ़ से आए थे जिनकी ज़बानी हमें इस नए मुहावरे की खबर लगी। राजगढ़ (ब्यावरा) मालवा के उस कोने में स्थित है जो राजस्थान के हाड़ौती अंचल से सटता है। इस इलाके को यहां उमठवाड़ कहते हैं। हमने अपने किसी परिचित के बारे में सवाल किया, जो अपने निकम्मेपन के चलते लगातार ठाले रहते थे। मित्र का उनके बारे में जवाब था कि सब सही चल रहा है और वे खूब खाद बना रहे हैं। अर्थ समझने में कुछ वक्त लगा, पर समझने पर लोकभाषा की समृद्धि पर गर्व हुआ। खाद बनाने वाली सूचना से यह स्पष्ट हुआ कि वो महानुभाव अभी बेकार ही हैं। मुफ्त की रोटियां तोड़ते हैं, खाते हैं और निकालते हैं। यानी खाद बनाते हैं। इस मुहावरे से निठल्लों, नालायकों, निकम्मों को राहत मिल सकती है कि जाने-अनजाने वे खाद निर्माण तो कर ही रहे हैं।

लीद की व्युत्पत्ति को लेकर शब्दकोश एकमत नहीं हैं। ख्यात विद्वान कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्तिकोश में लीद को पलीद से जोड़ा गया है। याद करें मिट्टीपलीद मुहावरे को जो बना है हिन्दी के मिट्टी और फारसी के पलीद से। जिसमें बेइज्जती, नष्ट करने, मटियामेट करने का भाव है। शब्दकोशों में पलीद के भी अलग अलग रूप मिलते हैं जैसे पिलीद, पलीद, पलीदीह (सभी पह्लवी) पिलद्दी, पिलद्दा आदि जिसमें नीच व्यक्ति, बहुत गंदी वस्तु, पशुओं का उच्छिष्ट, मैली चीज़, विष्ठा, मल, गंदगी जैसे भाव हैं। मराठी व्युत्पत्ति कोश में भी लद्दी, लिद्दा जैसे रूपांतरों का उल्लेख है जो प्राकृत रूप  हैं। जॉन प्लैट्स लीद की व्युत्पत्ति संस्कृत के लिप्त से मानते हैं। जिसमें गीलेपन, तर, दूषित, मलिन, खाया हुआ, सना हुआ जैसे भाव है। कृ.पा. कुलकर्णी भी इसकी यही व्युत्पत्ति सही मानते हैं। लिप्त > लित्त > लीद यह इसका विकासक्रम रहा होगा। मगर प्रसिद्ध भाषाशास्त्री श्रीपाद जोशी इसी कोश के संशोधनपत्र में लीद की व्युत्पत्ति पलीद से मानते हैं, किन्तु फारसी में पलीद की आमद संस्कृत, अवेस्ता, तुर्की या अरबी, किस भाषा से हुई इसका कोई संकेत नहीं करते। उनका मानना है कि भारतीय भाषाओं में इसी पलीद से प का लोप होकर पशुमल के रूप में लीद शब्द की व्याप्ति हुई। अलबत्ता मिट्टीपलीद में यह पलीद शब्द अपने मूल रूप में नजर आ रहा है। यह मुहावरा जाहिर है फारसी में नहीं है बल्कि इसका जन्म हिन्दुस्तानी में हुआ क्योंकि हिन्दी का मिट्टी शब्द फारसी में प्रचलित नहीं। स्पष्ट है कि पलीद शब्द फारसी से अपने मूल रूप में हिन्दी में आया मगर बतौर विष्ठा, उसमें से प वर्ण का लोप होकर लीद शब्द प्रचलित हुआ।
एक अन्य व्युत्पत्ति के अनुसार संस्कृत के लेण्डम् शब्द का अर्थ है विष्ठा या मल जिससे लीद बना है। लेण्ड शब्द से ही हिन्दी में लेंडी, लेंड़ी जैसे शब्द बने हैं जिसका अर्थ होता है छोटे चौपायों जैसे बकरी, भेड़ आदि की विष्ठा या मींगनी। लेण्ड शब्द का एक रूप लण्डम् भी होता है जिसमें भी विष्ठा या मल, अथवा पिंड का भाव है। लीद की व्युत्पत्ति लेण्ड या लण्डम् से ज्यादा तार्किक लगती है क्योंकि मलपिंड के लिए हिन्दी में इससे बने लेण्डा, लेंडी, लेंड़ी जैसे शब्द प्रचलित रहे हैं। Inaugural-Horseकश्मीरी में लीद के लिए लेंद शब्द है। कश्मीरी भी इंडो-ईरानी भाषा परिवार की ज़बान है। कश्मीरी लेंद सीधे सीधे संस्कृत के लेंड का रूपांतर नज़र आता है। कश्मीरी भाषा में ट-ठ-ड जैसे कठोर वर्णों की बजाय कोमल तालव्य ध्वनियों जैसे त-थ-द का प्रयोग होता है और इसीलिए लेंड का लेंद रूपांतर तार्किक है और लेंद से लीद का रिश्ता जुड़ता है। एक संभावना और बनती है। अगर लिप्त से लीद की व्युत्पत्ति को सही माना जाए तो फारसी के पलीद शब्द के जन्म की गुत्थी सुलझने लगती है। संस्कृत के लिप्त का अवेस्ता में वर्ण विपर्यय के जरिये प्लित् या प्लीत् रूपांतर मुमकिन है और फिर इसने ही पलीत होते हुए पलीद का रूप लिया हो। यूं देखें तो पलीद शब्द स्वतंत्र रूप में बहुत कम इस्तेमाल होता है।
छोटे चौपायों की विष्ठा को मेंगनी या मींगनी कहते हैं। बकरी, भेड़, ऊंट, चूहे आदि छोटी छोटी गोलियों के आकार की विष्ठा करते हैं। एक खास बात पर गौर करें। मनुष्य खुद को चाहे जितना श्रेष्ठ समझे, किन्तु सर्वाधिक घृणा उसे मानव विष्ठा से ही होती है। खुद के मल का प्रयोग खाद के रूप में करने की कल्पना भी वह नहीं करना चाहता जबकि पशुओं को वह निकृष्ट समझता है इसके बावजूद उनकी विष्ठा से उसे घ्रणा नहीं होती। हर तरह के पशु की विष्ठा को वह हाथों से उठाता है और पोषक तत्वों की प्राप्ति के लिए उसे खेतों में डालता है जहां पैदा हुए अन्न पर वह पलता है। गाय के गोबर से आज भी घर लीपे जाते हैं ताकि वे साफसुथरे नजर आएं। मींगनी या मेंगनी शब्द हिन्दी के ही हैं। जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी इंग्लिश कोश के अनुसार मेंगनी या मींगनी शब्द हिन्दी के मींग या मींज शब्द से बना है जिसका अर्थ गूदेदार पदार्थ, बीज, सार, दाने आदि होता है। मींज या मींग का मूल है संस्कृत का मज्जा शब्द जो बना है मृज् से जिसमें सार, निष्कर्ष, गूदा आदि है। अपशिष्ट के अर्थ में ये सारे भाव समझे जा सकते हैं। पक्षियों के मल को बीट कहा जाता है जैसे कबूतर, चिडिया या कव्वे की बीट। यह शब्द मूलतः संस्कृत के विष्ठा शब्द का सरल रूपांतर है जो विष्ठा > बिष्टा > बिट्ठा> बीट के जरिए बना है। विष्ठा में अपवित्रता और अशौच का भाव हैं मगर मूलतः से मल से ही जोड़ा जाता है।
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Tuesday, March 2, 2010

सहज की खोज में सहजिया

रो जमर्रा की बोलचाल में सहज शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। आखिर यह सहज है क्या? सरल, सामान्य, सुगम sc50 या साधारण जैसे अर्थों में सहज शब्द का प्रयोग होता है। वैसे सहज का अर्थ है प्रकृत या साधारण रूप में रहनेवाला। सामान्य बोलचाल से लेकर अध्यात्म तक इस शब्द की व्याप्ति है। सहज शब्द बना है सह+ज से। संस्कृत शब्द सह का अर्थ है सम्मिलन, साथ-साथ, सहित, मिलकर आदि। ज धातु में उत्पन्न होना, उद्भूत होना, पैदा होना, वंशज होना जैसे भाव हैं। इस तरह सहज का अर्थ है जो अपने मूल रूप में है अर्थात जिसमें अपना मूल स्वभाव निहित है। जो स्वाभाविक है, आनुवंशिक है। साथ-साथ जन्मा है यानी सहजात है। सहज में सहोदर का भाव भी है। यूं सहज में सामान्य, प्राकृतिक, नैसर्गिक स्थितियों का संकेत ही है जिसमें हमेशा एक सा बना रहना, आसान का अर्थ है। भक्ति आंदोलन (नवीं सदी से पंद्रहवी सदी तक) के दौर मे मगध क्षेत्र में सहजयान का जन्म हुआ। सहज शब्द का प्रयोग दार्शनिक अर्थों में खूब हुआ। सहज शब्द से बना सहजिया सम्प्रदाय कबीर के वक्त में प्रसिद्ध हुआ था। दरअसल मध्यकालीन भक्तिआंदोलन सिद्ध, नाथ, योगी सम्प्रदायों के जरिये बढ़ा जिनका मूल रूप से ब्राह्मण विचारधारा से टकराव था।
विद्वानों के अनुसार सहजिया सम्प्रदाय तांत्रिक बौद्ध परम्परा से जन्मा था जो सहजयान कहलाता था, बाद में यह सहजिया में रूपांतरित हुआ। इस धारा का विकास भक्तिकाल के दौरान कई अलग अलग भक्ति सम्प्रदायों में नज़र आता है। डॉ शशिभूषण दास के अनुसार यह गुह्य साधनावाले योगी सम्प्रदाय का बौद्ध प्रभावित रूप था। पश्चिमोत्तर के सूफी और बंगाल के बाउल / बाऊल भी इससे प्रभावित रहे। हजारी प्रसाद द्विवेदी की सहजसाधना पुस्तक के मुताबिक सहजयान Tantric बौद्धधर्म की महायान शाखा की उपशाखा मन्त्रनय से निकली तीन भक्तिधाराओं अर्थात वज्रयान, कालचक्रयान और सहजयान में एक है जिसमें शुरुआती दो धाराओं में मन्त्रों का महत्व है किन्तु सहजयान में मन्त्रों का महत्व नहीं है। सहजयानियों के मुताबिक सहजावस्था की प्राप्ति ही परमसुख है। निर्वाण और महासुख उसके ही पर्याय हैं। ब्राह्मणवाद के निषेध में यह पंथ खूब बढ़ा चढ़ा था। सरहपा का नाम सहजयानियों में सर्वप्रमुख है। सिखों में भी सहजधारी सिख होते हैं जो दाढ़ी-बाल आदि न रखते हुए सामान्य हिन्दुओं की तरह रहते हैं।
सहजिया, सहजपंथ, सहजधारी, सहजयान जैसे शब्दों के अलावा भी सहज शब्द का प्रयोग होता है जैसे सहज समाधि जिसका तात्पर्य ध्यान की उस अवस्था से है जो बिना किसी आसन या तन्त्रसाधना के हासिल होती है। इसे ही सहजध्यान भी कहते हैं। सहजबुद्धि का अर्थ है सभी जीवधारियों में ईश्वरप्रदत्त वह चेतना या बुद्धि जिससे वे कुछ करने के लिए प्रेरित होते हैं या उन्हें उचित अनुचित का बोध होता है।

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Monday, March 1, 2010

गोबरगणेश का चिंतन अर्थात गोबरवाद

Cow-Pie-3 ... अपने मित्र, गोबरवाद शब्द के जनक और इस दर्शन के व्याख्याकार,  वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीशकुमार को यह पोस्ट समर्पित है। वे कहते है -“मैं गोबरवाद का प्रवर्तक हूं। गोबर को सम्मान दिलाने की लड़ाई लड़ूंगा। कहूंगा लीक को मत बदलो। लीक को गोबर से पोत कर नया कर दो।” इस दिशा में शब्दों का सफर ने गोबर शब्द के इर्दगिर्द ताकझांक करने की कोशिश की है...

गो बर की महिमा न्यारी है। हमारी संस्कृति गोबरमय है। धर्म से कर्म तक गोबर व्याप्त है। सड़कों चौराहों से लेकर दिमाग़ तक में गोबर पाया जाता है। विदेशी भी हमारा गोबरप्रेम जानते हैं इसलिए डेनमार्क जैसा बित्ते भर का देश अपना टनों गोबर जहाजों में भरकर भारत भेजने की पेशकश करता है। प्रचलित अर्थों में गाय के अपशिष्ट को गोबर कहा जाता है। हिन्दुओं में कोई भी मांगलिक कार्य पंचगव्य के बिना पूरा नहीं होता। गाय द्वारा प्रदत्त उत्पादों में पंचगव्य को सर्वाधिक  पवित्र और ओषधीय महत्व का माना जाता है। यह गोवंशीय उपहारों का समग्र रूप है जिसमें दूध, घी, दही, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण होता है। भारतीय संस्कृति मे एक ओर तो गोबर का आयुर्वैदिक, ओषधीय और आनुष्ठानिक महत्व है वहीं गोवंशीय पशुओं द्वारा त्याज्य अपशिष्ट के रूप में इसमें विष्ठा से जुड़े हुए हीन भाव भी अभिव्यक्त होते हैं। होली के मौके पर उन्मुक्त और भदेस अभिव्यक्ति के नाम पर कई स्थानों पर गोबर होली भी खेली जाती रही है। आपटे के संस्कृत कोश में गोबर के लिए गोविष्ठा शब्द का उल्लेख है, पर वहां गोबर की व्युत्पत्ति नहीं मिलती। प्रसंगवश कंडा या जलावन के तौर पर गोईठा शब्दdung-beetles दरअसल गोविष्ठा शब्द का ही देशज रूप है। गोविष्ठा > गोइट्ठा >  गोईठा के क्रम में इसका रूपांतर हुआ। गोबर शब्द की व्युत्पत्ति अनिश्चित है और शब्दकोशों में इसके बारे में ठोस जानकारी नहीं मिलती। गाय के प्रति सनातन कृतज्ञता का भाव रखने वाली भारतीय मनीषा ने गाय को माता का दर्जा दिया जिसके विविध आयाम कृषि आधारित सामाजिक संस्कृति में प्रकट हुए।

कुछ संदर्भों के अनुसार गोबर शब्द गो+वरः से बना है। संस्कृत की व ध्वनि हिन्दी में ब में तब्दील होती है। संस्कृत में वर् धातु की व्यापक अर्थवत्ता है जिसमें उपहार, प्रदान करना, मनोकामना, अनुग्रह या परिपूर्ण करने जैसे भाव हैं। मोनियर विलियम्स के कोश में उक्त व्युत्पत्ति की पुष्टि होती है। वर् धातु में पदार्थ, वस्तु या पिण्ड का भाव भी है। इस रूप में ध्यान दें गोबर के रूपाकार पर।  गौरतलब है गो शब्द का अर्थ है गमन करना। संस्कृत की गो धातु में गाय का अर्थ बहुत बाद में स्थिर हुआ, प्रारम्भिक अवस्था में गो शब्द में सिर्फ पशु या चौपाए का भाव था जिसके मूल में उनका लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलते रहने का भाव था। गो का एक अर्थ पृथ्वी भी है क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरि पर लगातार गतिमान रहती है। जॉन प्लैट्स की हिन्दुस्तानी उर्दू इंग्लिश डिक्शनरी में गोबर की व्युत्पत्ति गोवरः के अलावा गो + वट् से भी मानी गई है। वट् में पिंड, गोली, गेंद, वटिका या बट्टी का भाव है। जाहिर है विष्ठापिण्ड
गोबरवाद- गोबर हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया/ हगने के तुरंत बाद नरम रहता है/ सूखने पर सख्त हो जाता है/ जब यह नदी गंगा सूख जाएगी/ एक दिन उसकी तलछटी को गोबर से ही लीपा जाएगा/ रेमण्ड के सूट में पन्डी जी,ग्लब्स पहिन कर/ बिसलेरी के पानी को अंजुरी में भर कर छिड़क देंगे तलछटी पर [रवीशकुमार की पूरी पोस्ट पढ़ें यहां]
के रूप में यह व्युत्पत्ति भी तार्किक है मगर वट् का बट तो हो सकता है किन्तु ट ध्वनि का र में रूपांतर कुछ मुश्किल है।
एक अन्य संदर्भ के अनुसार गोबर शब्द का मूल संस्कृत रूप गोर्वरः है। मराठी में गोबर आधारित पदार्थ जैसे कंडा के लिए गोवरी शब्द है। इसकी व्युत्पत्ति गोर्वरः से मानी गई है।  गो अर्थात गाय अपने अपशिष्ट से भूमि की उर्वराशक्ति को स्थायी बनाती थी। ब्रज प्रदेश में गोवर्धन पर्वत का धार्मिक महत्व है। गोवर्धन नाम से स्पष्ट है कि प्राचीनकाल में यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर था जिसकी वजह से यहां पशुधन की बहुतायत थी। गो+वर्धन का अर्थ है जहां गोवंश वृद्धि प्राप्त करे। गो के व्यापक स्वरूप अर्थात समस्त चौपायों के संदर्भ में भी गोवर्धन शब्द को समझा जा सकता है। हरियाली भरा यह क्षेत्र सिर्फ गोवंश नही बल्कि सभी पशुओं के लिए समृद्ध  आश्रयस्थली था। भाषा के विकास में शब्दों में अर्थविकास के साथ अर्थ संकोच भी होता है। गोवर्धन कालांतर में गोबरधन हो गया। गोबर को सुखा कर, उपले पाथ कर आजीविका चलानेवालों के लिए इस तरह गोबरधन शब्द भले ही अर्थवान होता हो पर यह है शुद्ध शब्दविलास ही। प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास के नायक होरी के पुत्र गोबर का नाम उपहास के रूप में नई पीढ़ी के हिन्दीभाषियों की स्मृति में है जो इसमें छुपे गोवर्धन को शायद पहचान नहीं पाई है।
रामचंद्र वर्म्मा के वृहत प्रामाणिक कोश के मुताबिक गोबर शब्द फारसी मूल का है और गो + बअर का युग्मरूप है। संस्कृत का गो अवेस्ता में भी इसी रूप में विद्यमान है जो फारसी में भी कायम रहा। फारसी में भी गाय समेत अन्य पशुओं के लिए गो शब्द है। कोश के मुताबिक अरबी में बअर का अर्थ गोबर होता है। खोजने पर अरबी में बअर तो नहीं बअर्र, बरर या बर्र शब्द ज़रूर मिलते हैं, जिनका अर्थ है गाय, भेड़ या अन्य पशुओं की विष्ठा। हिन्दू संस्कृति में गोवंश की महत्ता को देखते हुए यह व्युत्पत्ति तार्किक तो है, मगर प्रामाणिक नहीं लगती। भारतीय भाषाओं में गोबर से बने कई देशज शब्द है जिनके आधार पर इतना कहा जा सकता है कि फारसी और अरबी से बना गोबर शब्द हिन्दी में समाया विदेशज शब्द नहीं है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक गोबर शब्द गोमल का देशज रूप है जिसकी व्युत्पत्ति गो + मल से हुई है अर्थात गाय का अपशिष्ट। यह व्युत्पत्ति भी विश्वसनीय नहीं लगती क्योंकि म-ल ध्वनियों से ब-र ध्वनियों का निर्माण एक विरल उदाहरण है। भारतीय संस्कृति में गोवंश के महत्व को देखते हुए गोबर शब्द की व्युत्पत्ति गोवरः या गोर्वरः से मानी जानी चाहिए।
इसी कड़ी से जुड़े कुछ अन्य शब्द और मुहावरे भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे गोबरगणेश। मूर्ख, भोंदू, भद्दा या नालायक के अर्थ में गोबरगणेश मुहावरा हिन्दी में खूब प्रयोग होता है। गौरतलब है कि गोबरगणेश का संदर्भ पुराणों से जुड़ा है। गौरतलब है कि देवों-दानवों में हुए अमृतमंथन के दौरान नंदा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला और बहुला पांच कामधेनुएं भी निकली थीं। देवों को दानवों के संत्रास से मुक्ति दिलाने के लिए आदिशक्ति दुर्गा ने सुरभि गाय के गोबर से गणेश की रचना की और उन्हें avalisa-green-cowsविभिन्य शक्तियां प्रदान कर अपना वाहन सिंह प्रदान किया। गणेश ने दानवों का संहार किया और इस तरह गणनायक या गणपति की उपाधि प्राप्त की।  गोबरगणेश मुहावरे में दरअसल यह संदर्भ छिपा रह जाता है पर अर्थवत्ता पूरी तरह उभर रही है। गोबर से गणेश की रचना एक महान उद्धेश्य के निमित हुई। देवी दुर्गा ने अपनी शक्तियों का संचार कर उसे समर्थ बनाया। लौकिक अर्थों में किसी व्यक्ति को गोबरगणेश कहने के पीछे यही आशय है कि वह मूर्ख है और पौराणिक गोबरगणेश की तरह उसमें अलौकिक क्षमता  नहीं हैं। वह निरा मिट्टी का माधौ है। कुछ लोग देसी गाय के गोबर में उभरी रेखाओं में नजर आती विभिन्न आकृतियों में भी गणेश का रूपाकार देखते हुए गोबरगणेश को इससे जोड़ते हैं। गुड़गोबर करना मुहावरा भी इसी मूल से आ रहा है। यहां भी गोबर के प्रति नकारात्मक भाव सामने आ रहा है। बना बनाया काम बिगड़ना के अर्थ में इसका प्रयोग होता है। गुड़ के निर्माण की प्रक्रिया बड़ी जटिल होती है। निर्माण के विभिन्न चरणों में अगर सावधानी न बरती जाए तो गुड़ ठोस आकार नहीं ले पाता है और पतला रह जाता है। इसीलिए कहा जाता था कि सब गुड़, गोबर कर दिया। बाद में गुड़ से विराम हट गया और गुड़गोबर एक शब्द बन गया।
मराठी में कंडे या उपले को गोवरी कहा जाता है, पूर्वी बोलियों में इसके लिए गोबरी शब्द है। अन्न के भंडारण के लिए गोबर मिट्टी मिलाकर बड़ी टंकियां बनाई जाती हैं, उस पर गोबर की मोटी परत चढ़ाई जाती है जिसे गोबरी कहते हैं। विष्ठा पर पलनेवाले एक कीट को गुबरैला या गोबरैला कहते हैं। यह जीव गोबर के कण को लगातार भूमि पर धकेलता-लुढ़काता रहता है। पूर्वी भारत के गंगा-जमनी इलाके को गोबर पट्टी भी कहा जाता है। इस इलाके को अंग्रेजी में काऊबैल्ट कहते हैं जिसमें गोबरपट्टी का ही भाव है। यह गोबर प्रतीक है यहां की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का, गोबर प्रतीक है यहां की गरीबी से उपजे पिछड़ेपन और दीनता का, गोबर प्रतीक है निम्नवर्ग पर दबंगों के वर्चस्व का। गोबर प्रतीक है दूध उत्पादकों, यदुवंशियों और घोसियों की बहुलता का।  इसी संस्कृति से उपजता है गोदान का गोबर। उम्मीद है कि गोबरवाद शब्द भी जल्दी ही हिन्दी में प्रचलित हो जाए।
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