Tuesday, September 25, 2007

टेबल का लेन-देन, चल पड़ी बैंक


ज हिन्दी में रोज़ाना बोले जाने वाले शब्दों में बैंक शब्द का भी शुमार होता है । यह भी उन तमाम विदेसी शब्दों में एक है जिनके लिए कोई हिन्दी शब्द नहीं है और न ही कभी इसकी ज़रूरत महसूस की गई । बैक शब्द का विकल्प भारत के पास नहीं था इसका यह मतलब नहीं कि प्राचीन भारत में लोग व्यापारपटु नहीं थे। प्राचीन काल में न सिर्फ दूरदराज़ के देशों के साथ भारत का व्यापार तरक्की पर था बल्कि भारतीयों के वाणिज्यिक कौशल और हिसाब-किताब का लोहा माना जाता था। श्रीकृष्ण वेंकटेश पुणतांबेकर की पुस्तक - भारत की विकासोन्मुख एकता (DEVELOPING UNITY OF ASIA ) में अरब के प्रसिद्ध विद्वान जाहिज का कथन है , ‘गणित और ज्योतिष में उन्होनें ( भारतीयों ने ) बडी तरक्की की है। अरब के महाजन और पूंजीपति उन्हें छोड़ कर किसी दूसरे का एतबार नहीं करते । ईराक के सब कोठी वाले या महाजन सिंधियों
( भारतीयो ) को इसलिए नौकर रखते हैं कि वे हिसाब-किताब ऱखना और कोठीवाली
( banking ) जानते है और ईमानदार तथा स्वामिभक्त होते हैं।’
अब आते हैं बैक पर । बैंक एक अंग्रेजी का शब्द है। भारत में बैंक शब्द अंग्रेजों के साथ आया मगर मूलतः यह लफ्ज अंग्रेजी का भी नहीं है बल्कि इटालियन भाषा का है । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि प्राचीन इटालियन के बैंका शब्द से यह निकला जबकि कुछ लोग मध्ययुगीन फ्रैंच के बैंक्वे से इसका जन्म मानते हैं । वैसे इटालियन में भी बैंक्वे / बैंके शब्द मौजूद है और दोनों ही जगह इसका अर्थ एक ही है – मेज़, टेबल या बेंच ।
गौरतलब है कि यूरोप में यहूदी लोग साहूकारी के धंधे में शुरू से प्रवीण रहे हैं और बाद में पूरी दुनिया में यह तथ्य की सच्चाई प्रमाणित भी हुई । इटली के लोम्बार्डी इलाके के यहूदियों का रूपए-पैसे के लेन-देन का एक खास ढंग था । ये लोम्बार्डी साहूकार बाज़ार में अपनी अपनी बेंच लेकर आते और उस पर विभिन्न तरह की मुद्राएं और कारोबारी दस्तावेज (हुंडिया वगैरह) रखकर मुद्राओं का लेन-देन व अन्य खरीद-बिक्री का काम करते ।
जब कोई साहूकार आर्थिक रूप से कमज़ोर हो जाता तो उसकी बेंच तोड़ दी जाती । बाद में इस क्रिया के लिए बैंक्रप्ट (दिवालिया) शब्द चल पडा़ । बाद में जब मुद्रा से संबंधित लेन-देन और उसे जमा करने का काम संगठित तौर पर होने लगा तो उस स्थान विशेष को ही बैक कहा जाने लगा।

1 कमेंट्स:

Manish said...

रोचक जानकारी थी ..पढ़कर आनंद आया !

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