Saturday, December 19, 2009

भेड-चाल से भेड़िया-धसान तक

संबंधित पोस्ट-1.कुलीनों की गोष्ठी में ग्वाले. 2.गवेषणा के लिए गाय ज़रूरी है.3.गोस्वामी, गोसाँईं, गुसैयांsh2

प्र कृति के विविध रूपों और पशु-पक्षियों के स्वभाव से जुड़े शब्दों ने भी भाषा को समृद्ध किया है। आंख मूंद कर किसी के पीछे चलने को अंधानुकरण कहा जाता है। भाषा को लालित्यपूर्ण और वाक्य को ज्यादा अर्थपूर्ण बनाने के लिए इस संदर्भ में भेड़-चाल मुहावरा है जो खूब प्रचलित है। सामाजिक प्राणियों की एक लम्बी श्रंखला है जिसमें भेड़ें भी आती हैं। भेड़ों का स्वभाव होता है एक दूसरे के पीछे चलना। किसी स्थान पर अगर एक भेड़ किसी ओर चल पड़ती है तो बाकी भेड़ें भी उसी का अनुसरण करती हैं। गति करते इस समूह को ही भेड़ों का रेवड़ कहा जाता है। भेड़ को हिन्दी की कुछ शैलियों में गाडर भी कहा जाता है। एक दूसरे के पीछे चलने की वजह से भेड़ों को कभी नुकसान नहीं होता। प्रकृति नें किन्हीं प्राणियों को समूह में रहने का गुण दिया है जिसके चलते वे अपनी सुरक्षा कर पाते हैं। मनुष्य ने भेड़ों के इस स्वभाव को अंधानुकरण से जोड़ा। इस तरह से भेड़-चाल का अर्थ हुआ बिना सोचे-समझे किसी का अनुसरण करना, नकल करना या किसी की पटरी पर चलना। लीक पर चलना जहां लियाकत की बात है वहीं भेड़चाल बुद्धिमानी की निशानी नहीं है।
भेड़चाल के लिए हिन्दी में एक मुहावरा और प्रचलित है-भेड़िया-धसान। अर्थ वही है-आंख मूंदकर किसी का अनुसरण करना। यहां कई लोग भेड़िया-धसान में हिंस्र जंतु भेड़िया को देखते हैं जबकि यहां भेड़ से ही तात्पर्य है। पहले भेड़ शब्द की व्युत्पत्ति देखते हैं। यह बना है संस्कृत के मेष से जो एक राशिनाम के अलावा बकरी  प्रजाति के एक चौपाए का नाम भी है, जिसका आकार उससे कुछ कम होता है। मेष से बने मेढ़ा या मेढ़ी जैसे शब्द। इनका अगला रूप हुआ भेड़। आमतौर पर लिंग निर्धारण के लिए भेड़ के आगे नर या मादा शब्द लगाया जाता है। बकरी का पुल्लिंग बकरा होता है उसी तरह भेड़ का पुल्लिंग मेढ़ा होता है। उसे भेड़ा भी कहते हैं पर यह शब्द आज की हिन्दी में sheep2अप्रचलित है। संस्कृत में मादा भेड़ को मेषिका कहते हैं। मेषिका> मेढ़िका> भेड़िका> भेड़िआ के क्रम में इसका रूपांतर हुआ। प्रसंगवश बकरी के बच्चे को मेमना कहते हैं। यह ध्वनि अनुकरण प्रभाव से बना शब्द है। बकरी का शावक में-में की आवाज करता है जिसकी वजह से इसका यह नाम पड़ा। भेड़ के बच्चे को दुम्बा कहते हैं। खासतौर पर भेड़ की वह प्रजाति जो सामान्य भेड़ो से तगड़ी होती है। ऐसे भेड़ों के बच्चों की दुम काफी झबरीली होती है जिसकी वजह से उसे दुम्बा कहते हैं। दुम फारसी का शब्द है। 
सान शब्द का मतलब है गिरना, फिसलना, धंसना, दल-दल भूमि, रेतीली भूमि आदि। जॉन प्लैट्स की डिक्शनरी के मुताबिक धसान का अर्थ किसी को रास्ता देना या आगे बढ़ाना भी है। यह बना है संस्कृत की ध्वंस् धातु से जिसमें नष्ट होना, ढहना, गिरना आदि भाव हैं। विनाश के अर्थ में विध्वंस इसी मूल से जन्मा है। प्राचीन खंडहरों को ध्वंसावशेष भी कहते हैं। धसान संस्कृत के ध्वंसन का अपभ्रंश है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक धंसना, धसकना, धंसाना जैसे शब्द इसी मूल से जन्मे हैं। धंसना में पैठना और चुभने का भी है। जैसे मन में किसी  की बात धंसना। तीर या कांटे का धंसना आदि। इस तरह भेड़िया-धसान शब्द में गड्ढे में गिरने का भाव स्पष्ट हो रहा है। खुद का अहित करने के अर्थ में गड्डे में गिरना भी हिन्दी का प्रसिद्ध महावरा है। किसी के अंधानुकरण का परिणाम भी आखिरकार यही होता है। यह भाव कबीर के इस दोहे से भी उजागर हो रहा है-
ऐसी गति संसार की, ज्यों गाडर की ठाट।
एक पडी जेहि गाड मैं, सबै जाहिं तेहि बाट।।
र्थात, इस संसार की अजीब गति है। जिसे देखो, भेड़-चाल में मगन, बिना यह सोचे-विचारे कि जिसके पीछे वे जा रहे हैं, अगर वह गड्ढे में गिरेगा तो सबकी गति भी वही होगी। कबीर के उक्त दोहे में भेड़ के लिए गाडर शब्द का इस्तेमाल हुआ है। भेडिया धसान या भेड़चाल के लिए संस्कृत उक्ति भी है-गड्डरिका प्रवाह। इन्हीं अर्थों में संस्कृत की एक और उक्ति है-लोकानुलोका गतिः  अर्थात एक दूसरे को देखकर अनुकरण करना। यहां समाज में व्याप्त नकल की वृत्ति की ओर ही इंगित किया है। वाशि आप्टे के संस्कृत-इंग्लिश कोश के अनुसार संस्कृत में भेड़ को गड्डरः कहा जाता है। भेड़ों के रेवड़ या उनकी कतार के लिए गड्डरिका या गड्डलिका शब्द है। गड्डरिका-प्रवाह में भेड़ों के एक के पीछे एक चलने की बात ही उभर रही है। यह शब्द तो हिन्दी में प्रचलित नहीं हैं मगर इससे बने कुछ शब्दों का प्रयोग खड़ी बोली और लोकबोलियों में खूब होता है जैसे चरवाहा के लिए गड़रिया एक आम शब्द है। यह चरवाहों की एक जाति का नाम भी है। यह बना है गड्डरिक से। स्पष्ट है कि किसी दौर में भेड़ो को चरानेवाले चरवाहों को ही गड़रिया कहते थे। गायों की देखभाल करनेवालों को गोपालक कहा जाता था। गड्डरी से ही बना है गाडर शब्द जिसका अर्थ है भेड़। मध्यप्रदेश के सिवनी जिले की तहसील का नाम भी गाडरवारा है, जो ओशो की जन्मस्थली भी है। संभवतः भेड़ों की बहुतायत अथवा भेडपालन यहां का प्रमुख कर्म था। एक तथ्य यह भी है कि चर्मकार समाज, जिसे यहां अहीरवार कहा जाता है, की संख्या यहां सर्वाधिक है। पिछले दिनों मृत पशुओं की खाल न उतारने का संकल्प करते हुए उन्होंने आंदोलन भी किया था। 
हिन्दी में गड़रिया-पुराण कहावत भी है जिसका अर्थ है बेमतलब की, ऊबाऊ चर्चा। गंवारों की बातें। भेड़ों को चरने के लिए छोड़ कर गड़रिये दूरदराज की कहानियां और तरह तरह की गल्पचर्चा कर समय व्यतीत करते थे, जिसका नागर समाज में कोई महत्व नहीं था। आज का लोकप्रिय और शिष्ट शब्द गोष्ठी भी इसी तरह जन्मा है। प्राचीन काल में गोष्ठ sheepवह स्थान था जहां गाएं बांधी जाती थी, उन्हे चारा-दाना –पानी दिया जाता था। तब सभी गोपालक एक साथ बैठकर दुनिया-जहान की चर्चा करते थे जिसे गोष्ठी कहा जाता था। पिकनिक के अर्थ में मालवा राजस्थान में गोठ शब्द बहुत आम है। खान-पान और आनंद के उद्धेश्य से एकत्र एक छोटे जमावड़े के लिए गोठ इतना उचित शब्द है कि इसे सभी क्षेत्रों के लोगों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। आज बड़ी-बड़ी कान्फ्रेन्स, कान्क्लेव, सेमिनारो को गोष्ठी कहा जाता है। देश की सबसे बड़ी गोष्ठी संसद की कार्यवाही देखकर समझा जा सकता है कि नागर समाज सभ्य होने का जो दावा करता है, कितना खोखला है।

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18 कमेंट्स:

Suman said...

nice

Baljit Basi said...

१ अंग्रेजी का शब्द कानवाई ( भेड की तरह फौजी गाडिओं का एक साथ चलना) सब ने सुना है. इस पर एक लतीफा सुना दूँ चाहे सभी ने सुना हो. कशमीर की ओर रात को कानवाई जा रही थी एक के पीछे एक , फौजी आधे सोए हुए . आगे वाला एक गड्ढे में गिर गया तो बाकी भी उसके पीछे पीछे जा गिरे . सुबह हुई तो पता चला सारी कानवाई ध्वंसत हो चुकी थी.
CONVOY related to 'CONVEY' from
L. com- "together" + via "way, road."
.२ पंजाबी में भेड़ को भेड बोलते हैं और इसका पुलिंग भी है 'भेडू'.

मनोज कुमार said...

अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

RDS said...

लोकानुलोका गतिः ! हम भारतीय भेडें, 'रेड इंडियनों' के देश की अग्रणी भेड का अनुसरण करती हैं । पहनावे में, भाषा में, विचारों में और तो और संस्कृति में भी हम पश्चिमी भेड की शुक्रगुज़ार हैं ।

जलवायु चिंता पर निष्फल सी गोष्ठी करती वह भेड हमें डेनमार्किया आंखे तरेर कर लीक पर बने रहने का सलीका भी सिखाती रहती है । अपना रेडियोधर्मी कचरा बीच बीच में पीछे उलीचती भी रहती है । और हम झपट्टेबाज़ भेडें, अनुगृहीत हैं ।

गोठ अब पंचसितारा दर्ज़ा पा चुकी है । हमारा देश गोष्ठियों में बहुत माहिर है । आयोग और गोष्ठियों से अलंकृत हमारा देश ! कलुषिता को प्रदर्शित करने वाले श्वेत पत्र ! और सच का सामना करने में माहिर हमारा नेतृत्व ! रंग की छटा भी अदभुत !! काला धन , सफेद झूठ !

निस्सन्देह, हमारा रेवड सबसे विलक्षण है । ऐसे में गडरिये को जितना पुरस्कृत किया जाये, थोडा है ।

- RDS

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

भेडिया धसान में भेड क ही जिक्र होता है आज ही पता चला हम तो भेडियो से सम्वन्ध ही समझते थे

सुलभ सतरंगी said...

अयंत सन्तुलिओत और सारगर्भित शब्द चर्चा रही ये..

संभव हो तो शिष्टाचार और शिष्टमंडल सम्बन्धी व्याखान देने का कष्ट करें.

- सुलभ

sanjay vyas said...

और समृद्ध हुए.
गोठ से अच्छी याद दिलाई.

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

हमेशा की तरह रोचक और ज्ञानवर्धक पोस्ट..!

Amit said...

ajit abhiyya ..भेडचाल की तरह यदि शेर-चाल भी कोई श्हब्द है तो.."शब्दो ंका सफ़र" के लिए उपयुक्त है.....शानदार पोस्ट है...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर आलेख। बहुत चीजें स्पष्ट हो गईं। अभी तो कई समूहों को वो भैड़ नहीं मिल रही जिस के पीछे चला जा सके।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

यह बहुत बढ़िया जानकारी रही!
अन्धानुकरण करने मं हम भारतीयों का कोई मुकाबला नही है।

शिरीष कुमार मौर्य said...

आदरणीय अजित भाई,

शब्दों के इस सफ़र पर आना हर बार कुछ और समृद्ध कर जाता है. आपकी लगन अद्भुत और सामर्थ्य अपार है.

सलाम के साथ शिरीष
***

डॉ टी एस दराल said...

भेड़ चाल पर अच्छी जानकारी. धन्यवाद, अजित जी.
tsdaral@yahoo.com

निर्मला कपिला said...

वाह भेडचाल लगता है छोटा सा शब्द मगर इतना बदा इतिहास ? धन्यवाद बहुत अच्छा रहा ये सफर भी

विष्णु बैरागी said...

'भेडिया धसान' शब्‍द-युग्‍म प्रयुक्‍त करने से मैं खुद को रोकता रहा। मुझे इसका भेडिया ये जुडना कभी समझ नहीं आया। आज आपने मेरी उलझन दूर कर दी।

मालवा में भी भेड को गाडर कहा जाता है। नर भेड के लिए भेडा आज तक नहीं सुना।

Baljit Basi said...

गुरु ग्रन्थ साहिब में कबीर ने देखो गाडर समेत कितने जानवरों के नाम गिनवाए:
जल महि मीन माइआ के बेधे
दीपक पतंग माइआ के छेदे
काम माइआ कुंचर कउ बिआपै
भुइअंगम भ्रिंग माइआ महि खापे
पंखी म्रिग माइआ महि राते
साकर माखी अधिक संतापे
तुरे उसट माइआ महि भेला
सिध चउरासीह माइआ महि खेला
माइआ ऐसी मोहनी भाई
जेते जीअ तेते डहकाई
सुआन सिआल माइआ महि राता
बंतर चीते अरु सिंघाता
मांजार गाडर अरु लूबरा
बिरख मूल माइआ महि परा

भाव सब जानवर माया के चक्कर में पड़े हैं

अजित वडनेरकर said...

@बलजीत बासी
वाह वाह बलजीत भाई। तुसी दिल जीत लिया।
कुत्ता, हिरण, कीट-पतिंगा, मछली, भेड़, भ्रंग,पक्षी, मक्खी,सियार, शेर, बिल्ली, चीता ये सब मनुष्येतर प्राणी हैं।
इन सबका माया अर्थात स्वार्थ से सरोकार और प्रकारांतर से दुनिया ही माया-मोह के चक्कर में हैं, ऐसा संबंध प्रतीकात्मक ढंग से कबीर ही
समझा सकते थे।
आभार

अजित वडनेरकर said...

@आरडी सक्सेना
रमेश भाई, आपको तो किसी अखबार का संपादक होना चाहिए था। एकदम संपादकीय टिप्पणी सरीखी प्रतिक्रिया मिली है आपकी, इस कौपीन-हे-गुनी मौसम में।
आभार। दिन भर व्यस्त रहा सो जवाब नहीं दे पाया।

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