Thursday, December 31, 2009

मित्र-चर्चा के साथ नए साल का स्वागत

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सफर के साथियों को 2010 की खूब-खूब शुभकामनाएं
2009 की शुरुआत भी मित्रों के आगमन से हुई थी। नए-नए ब्लाग मित्र, जिनसे मिलें तो नए से नहीं लगते। देखते-देखते साल बीत गया। इस बीच ब्लाग-मित्रों की आमद लगी रही। इलाहाबाद में साथियों से मिलना हुआ और यूं लगा मानों बरसों से पता-ठिकाना तो जानते थे, पर सिरहाने की किताब में दबा कर बिसराए थे।
खुशकिस्मती से साल के आखिरी महीने की शुरुआत में भी दो अपनों का घर पर आना हुआ। हिन्दी कविता के जाने-पहचाने नाम हैं गीत चतुर्वेदी और विजयशंकर चतुर्वेदी। गीत दैनिक भास्कर में मैगजीन एडिटर हैं और भोपाल में ही रहते हैं। बेहद सीधे, सरल। पढ़ाकू, विचारक। कम उम्र में ख्याति और विद्वत्ता  अर्जन कर पाने का सौभाग्य और जतन दोनो ही उनके हिस्से में हैं। जितना हम जान पाए।  चंद अर्सा पहले तक वे जलंधर में होते थे। अब बढ़ी हुई जिम्मेदारियों के साथ भोपाल में हैं। उनसे रोज मुलाकात की सुविधा है मगर हम मिल नहीं पाते। फोना-फोनी हो जाती है। महिने के पहले हफ्ते में अचानक उनका फोन आया। हम संयोग से उस दिन छुट्टी पर थे। सूचना थी कि दफ्तर में हमारे मित्र बैठे हैं-विजय शंकर चतुर्वेदी जो मध्यप्रदेश के सतना शहर के रहनेवाले हैं, मगर अब मुंबई जा बसे हैं। वहां काफी सालों से हैं।  बाहर से शांत मगर चेतना के स्तर पर सजग-असंतोषी। हिन्दुस्तानियत के वकील। इतिहास-परम्परा के अध्येता की मुद्रा में भी नजर आते हैं। अखबार, टीवी के बाद अब एक टेलीकम्युनिकेशन से जुड़ी भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी में मोबाइल पत्रकारिता कर रहे हैं। दोनों साथी गंभीर ब्लागर भी हैं, मगर हमारे घर पर इन दो “चौबे” के आगमन को छब्बे से दुबे बनने की कहावत सुना हुआ मन कहीं न कहीं यह भी कह रहा था कि कहीं यह अपशकुन न हो। दो – दो चौबे और वो भी कवि, पत्रकार। ईश्वर जाने क्या होगा…कर्णपिशाचिनी ने भी तो कोई चेतावनी नहीं दी थी? खैर, हमने छुट्टी के बावजूद घर से निकलने का मन बनाया पर फिर इरादा बदलते हुए दोनों को घर आने के लिए निमंत्रित किया जो फौरन ही स्वीकार कर लिया गया।
विजय जी को उसी दिन रात को जबलपुर जाना था। इससे पहले उन्हें वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज के घर भी जाना था। बहरहाल दोनों मित्रों के साथ बिताए कुछ पलों का झरोखा हैं ये तस्वीरें। इस मुलाकात को इसलिए भी आप तक पहुंचा रहे हैं ताकि अपने मित्रों और शुभचिंतकों से मिलने-जुलने का मौका नए साल भी इसी तरह मिलता रहे, मन की यह बात सब तक पहुंच सके। चित्रों में बीच में बिराजे हैं गीत, दाएं हैं विजय। क्लिक किया अबीर ने।
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Wednesday, December 30, 2009

मगजपच्ची से भेजा-फ्राई तक

brain

ब किसी मसले पर अत्यधिक सोच-विचार होता है तब अक्सर इसे मगजपच्ची या मगजमारी कहा जाता है यानी यानी बहुत ज्यादा दिमाग लगाना। स्पष्ट है कि मगज शब्द का अर्थ मस्तिष्क या दिमाग ही है। आमतौर पर हिन्दी में मस्तिष्क के अर्थ में दिमाग, मगज या भेजा जैसे शब्दों का ज्यादा प्रयोग होता है। दिमाग शब्द का प्रयोग अक्सर शिष्ट भाषा में होता है जबकि मगज या भेजा शब्दों का प्रयोग देशी बोलियों में खूब होता है और इन शब्दों की विशिष्ट अर्थवत्ता के चलते इनसे जुड़े मुहावरे भी खूब प्रचलित हैं। अनर्गल बोलनेवाले और बातूनी व्यक्ति की वाचिक-चेष्टाओं को भेजा चाटना, दिमाग चाटना या मगज चाटना कहा जाता है। मगजपच्ची का अर्थ है दिमाग पक जाना। इसी तरह मगजमारी में मस्तिष्क की सोचने-विचारने की क्षमता चुक जाने का भाव है।
गज और भेजा इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द हैं जबकि दिमाग अरबी मूल से आया है। संस्कृत में इसकी मूल धातु है मज्ज्। यह भी दिलचस्प है कि हिन्दी में मगज शब्द जहां फारसी से आया है वहीं भेजा शब्द इसके मूल तत्सम का तद्भव रूप है। मगज शब्द का मूल फारसी रूप मग्ज़ है। यह अवेस्ता के मज्ग mazga से बना है। इसका संस्कृत रूप है मस्ज् जिसका अर्थ है सार, तरल, रस आदि। इससे ही बना है संस्कृत और हिन्दी का मज्जा शब्द जिसका अर्थ है अस्थियों के भीतर का द्रव (बोनमेरो bonemarrow), वसा, चर्बी, पौधों का रस आदि। ध्यान रहे सार शब्द का मूल भाव रस में ही है। सार अर्थात निचोड़ शब्द से भी यह स्पष्ट है। मज्जनम् शब्द का अर्थ है डूबना, भीगना, द्रव में सराबोर होना। जीवशास्त्र के नजरिये से देखें तो भी मस्तिष्क खोपड़ी के भीतर एक द्रव के भीतर तैरता है। मस्तिष्क का काम है इंद्रियों से मिले संकेतों को ग्रहण कर उनका सार अर्थात अभिप्राय समझना, सो मज्जा शब्द में मस्तिष्क का भाव इसी रूप में स्थापित हुआ। मज्जा का अवेस्ता रूप हुआ मस्ग। वर्ण विपर्यय से इसका फारसी रूप हुआ मग्ज जिसमें इसके वे सभी अर्थ  सुरक्षित रहे जो मूल संस्कृत-अवेस्ता में थे यानी सार, तत्व, निष्कर्ष, नतीजा, अक्ल, बुद्धि आदि। फारसी मग्ज़ ने ही हिन्दी-उर्दू में मगज का रूप लिया।
संस्कृत में चर्बी के लिए मेद शब्द है। पृथ्वी को मेदिनी कहा जाता है क्योंकि यह सभी सभी पार्थिव पदार्थों का सार रूप है। मेद का एक अर्थ मस्तिष्क भी है। मेद का रिश्ता मज्ज् से है। मराठी में मस्थिष्क के लिए एक शब्द मेदू भी है। मेद में सार अर्थात गूदा का भाव भी है। गूदा क्या है? जैव-वानस्पतिक पदार्थों का वह रूप जिसमें से बीच, अस्थि या छाल की उपस्थिति न हो। अर्थात गूदा, सार है। मेद या मज्जा को इसी रूप में देखें तो मस्तिष्क का सार रूप वाला अर्थ और भी स्पष्ट होता है। का अगला रूप होता है। मेधः, मेधा, मेधावी जैसे शब्द भी इसी क्रम में खड़े नजर आते हैं जिनका bsअर्थ बुद्धि, प्रतिभा, बुद्धिमान है और रिश्ता अंततः मस्तिष्क यानी मगज से ही जुड़ता है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार की कुछ अन्य भाषाओं में भी इसके विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं जैसे खोतान में यह मज्सा majsaa है पश्तो में मग्जे। ताजिकिस्तान और बदख्शां क्षेत्रों में बोली जाने वाली शुघ्नी भाषा में इसका रूप मग्स है। इस शब्द की व्याप्ति मंगोल-तुर्किक परिवार में भी हुई है। इस परिवार की चुवाश भाषा, जो रूस के मध्यक्षेत्र में बोली जाती है, इसका रूप है माइम, जबकि सुदूर साइबेरिया के याकुतिया क्षेत्र की साखा जबान में भी इसकी मौजूदगी मेयी के रूप में पहचानी गई है। किरगिजिस्तान की किरगिजी बोली में यह मे me है और तातारी में यह माई है। इसी तरह यूरोपीय भाषाओं में भी इस शब्द ने आश्चर्यजनक रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
भाषाविज्ञानियों ने इसके मूल प्राचीन भारोपीय धातुरूप की कल्पना मोज़्घो mozgho के रूप में की है जिसमें अस्थिमज्जा या मस्तिष्क का भाव है, जिसका अर्थ है दिमाग, बुद्धि, समझ, भेजा वगैरह। प्राचीन जर्मन में इसका रूप हुआ मस्ज्ग mazga और जर्मन में मर्ह् Marh , डच में यह हुआ मर्ग़। जर्मन से यह अंग्रेजी के मैरो marrow में ढल गया जिसका अर्थ है अस्थिद्रव, सार, मज्जा वगैरह। ध्यान रहे, मूल धातु में निहित रस या सार वाले भाव का दिमाग या मस्तिष्क वाले अर्थ में विस्तार कई भाषाओं मे हुआ है। अंग्रेजी के मैरो में इसका अस्थिमज्जा वाला अर्थ सुरक्षित रहा मगर कई भाषाओं में इसके भाववाची अर्थविस्तार ने मगज का रूप लिया। हिन्दी का भेजा शब्द भी मज्जस् से बना है। संस्कृत के तद्भव रूपों में ध्वनि का चरित्र में बदलता है। यहां मज्ज> मज्जस् > भज्जअ> भेजा के जरिये यह हुआ है। व्यर्थ की बकवाद करने के अर्थ में दिमाग चाटने वाले मुहावरे की तरह ही भेजा खाना या भेजा चाटना मुहावरा भी हिन्दी को लालित्य प्रदान करता है। मांसाहारी लोगों के लिए भेजा खाना मुहावरा नहीं बल्कि सचमुच भेजा एक खाद्य पदार्थ है साथ ही अस्थिमज्जा भी मासाहारियों को खूब पसंद है। निचोड़ना और चूसना जैसे शब्द अपने आप में मुहावरे की खासियत रखते हैं। हड्डी तक चूस जाना मुहावरे का अर्थ है ऐसी मुसीबत जिससे पार पाने में जीवन की सभी शक्तिया चुक जाएं। मांसाहारियों में धारणा है कि अस्थिमज्जा में जीवनी शक्ति होती है। हड्डियों के भीतर सुरक्षित द्रव होने से यह धारणा बनी हो या इसका जीववैज्ञानिक आधार भी है, इसकी गहराई में जाने की जरूरत नहीं है, मगर मांसाहारी हड्डी निचोड़ने चूसने से नहीं चूकता है क्योंकि इसके भीतर एक खास स्वाद छुपा है। [संबंधित कुछ अन्य शब्दों की चर्चा अगली किसी कड़ी में]

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Tuesday, December 29, 2009

कँवर साब का कुँआरापन

girl-child
कम् धातु में निहित स्नेह और अनुराग जैसे भावों के बावजूद इन्सान अपनी ही संतान यानी कुमार/कुमारी में फर्क करने लगा

संबंधित कड़ी-जवानी दीवानी से युवा-तुर्क तक

बिन ब्याहे युवक या युवती के लिए कुँआरा/कुँआरी शब्द प्रचलित हैं। एक खास आयु तक विवाह संयोग न होने से ये विशेषण विवाहोत्सुक या विवाह-योग्य पुरुष पात्रों के लिए जहां सामाजिक परिहास का विषय बन जाते हैं वहीं कन्या के लिए यह अनुभव प्रताड़ना से कम नहीं होता। इन शब्दों के मूल में दरअसल कुमार या कुमारी शब्द हैं और प्रायः समूचे भारत में कमोबेश बालक या बालिका के नाम के पीछे ये विशेषण लगाने का रिवाज है। राजघरानों संतानों के लिए राजकुमार या राजकुमारी शब्द इसी मूल से उपजे हैं। इनके देशज रूप हैं राजकुँवर, राजकुँअर, राजकुँअरी या राजकुँवरी आदि। क्षत्रियों या पूर्व सामन्तों में खुद को कुँवर साहब, कुँवरजी आदि कहलाने की परिपाटी है। इसका एक रूप कंवर साब भी है।  इसके मूल में सामन्ती ठसक ज्यादा है। महिलाओं के लिए कुँवरानी कहलाने का चलन है। पंजाब में लड़की के नाम के साथ कौर जुड़ा होता है जो इसी कुमारी का अपभ्रंश है।
कुमार/कुमारी शब्दों का जन्म हुआ है संस्कृत की कम् धातु से जिसमें लालसा, प्रेम, अनुरक्ति का भाव है। इस धातु की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। कम् से बने कुमार शब्द का अर्थ है पांच वर्ष से कम आयु का बालक, पुत्र अथवा युवा। इसका अर्थ राजकुमार अथवा युवराज भी है। मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश के अनुसार अग्नि, तोता और सिन्धु नद का भी नाम भी कुमार है। बच्चों की देखरेख करनेवाले को कुमारपालन कहते हैं। कुंअर या कुंआरा की व्युत्पत्ति हुई है कुमारकः से जिसका अर्थ युवा या बालक है। इसी तरह कुमारी शब्द बना है कुमारिका से। संस्कृत ग्रंथों में दस से बारह वर्ष के बीच की आयु वाली कन्या कुमारी कहलाती है। स्मृतियों में इसका और सूक्ष्म वर्गीकरण है यानी आठ वर्षीय कन्या गौरी है और दस वर्षीया रोहिणी तथा बारह वर्ष की कन्या कुमारी कहलाती है।– अष्टवर्षा भवेद् गौरी दशवर्षा च  रोहिणी। सम्प्राप्ते द्वादशे वर्षे कुमारीत्यभिधीयते।। लक्षणों के आधार पर सोलह वर्ष की वय तक कन्या को कुमारी कहा जा सकता है। वह लड़की कुमारी कहलाती है जो अविवाहिता है।
म् धातु में निहित लालसा, प्रेम और अनुराग जैसे भावों को संतति के प्रति वात्सल्य के अर्थ में ही देखना चाहिए। संतान के kidsप्रति सहज प्रेम और अनुराग होता है इसलिए कम् धातु से बने कुमार शब्द में संतति का बोध है। यूं काम, कामना, कामिनी, कामदेव जैसे शब्द भी कम् धातु से ही जन्मे हैं। कामः का अर्थ पदार्थ की इच्छा करना, मन में अनुराग या विषय-भोग की कामना जागना है। काम का अर्थ अग्नि भी है। इच्छाएं अग्नि के समान ही हैं जो तेजी से प्रसारित करती हैं और मन में अशान्ति का दाह उत्पन्न करती हैं। व्यापक अर्थ में काम शब्द के दायरे में यौन क्रिड़ा, लम्पटता, रंगरेली, प्रणयोन्माद, उद्दाम आसक्ति जैसे भाव आ जाते हैं। अनियंत्रित सुखोपभोग का लालची व्यक्ति, उद्दाम वासना से वशीभूत व्यक्ति को कामुक, कामातुर कहा जाता है क्योंकि उसके चरित्र में व्यभिचार के बीज होते हैं। कुबेर का एक नाम कामेश भी है। बच्चों के रोगोपचार की एक शाखा कुमारतंत्र कहलाती है।
दुर्गा, पार्वती जैसी देवियों का नाम भी कुमारी है। पार्वती को कन्याकुमारी भी कहा जाता है। भारत का दक्षिणी छोर कुमारी अन्तरीप कहलाता है जो पार्वती के नाम से ही है। हिन्दुओं में कुमारिका को बहुत सम्मान प्राप्त है। नवरात्र में कुमारी पूजन का बड़ा महत्व है। प्राचीनकाल में कुमारी संबंधी मान्यताओं में बहुत विकार आया था और दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा प्रचलित थी। आमतौर पर कौमार्य शब्द का रिश्ता कन्या से जोड़ा जाता है। कौमार्य एक दशा  है जिसका अर्थ है कुमार होने की अवस्था। शिष्टाचार के अंतर्गत विवाह बंधन में बंधने के बाद कौमार्य अवस्था को भंग माना जाता है। कौमार्य अवस्था में ही काम-सम्बंध बनाना भी कौमार्य भंग की श्रेणी में आता है।  कम धातु में निहित स्नेह और अनुराग जैसे भावों के बावजूद इन्सान अपनी ही संतान यानी कुमार/कुमारी में फर्क करने लगा और कुमारों के आगे कुमारियों का अस्तित्व दांव पर लग गया। कन्या भ्रूण हत्या की वृत्ति मनुष्य के नाम पर कलंक है। कुमार और कुमारिकाओं में भेदभाव अगर जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सचमुच पांच साल का बच्चा ही नहीं, पचास साल का बुजुर्ग भी कुमार कहलाने को अभिशप्त होगा।

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Monday, December 28, 2009

कैंची, सीजर और क़ैसर

कतरनी के अर्थ में कैंची शब्द की व्याप्ति हिन्दी की कई शैलियों में है। कैंची की व्युत्पत्ति तुर्की भाषा से मानी जाती है मगर इस शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषाविज्ञानी मौन हैं और संदर्भ भी कम हैं। अनुमान है कि इसका रिश्ता अरबी शब्द कस्र से है, जिसका अर्थ है काटना, छीलना, तराशना। इस धातु से जुड़ी मूल सेमिटिक धातु क-स-र q-s-r में भी यही भाव हैं। यूरोपीय और अरबी भाषाविदों में इस धातु पर विवाद है कि मूलतः कस्र का जन्म ग्रीक या लैटिन मूल से हुआ है अथवा यह सेमिटिक धातु ही है। अरबी शब्द अल-कस्र का अर्थ है महल। कस्र धातु में निहित भावों पर गौर करें तो इसका अर्थ हुआ पत्थरों, चट्टानों, पहाड़ों को काटकर, तराश कर बनाया गया आश्रय। इससे मिलता-जुलता शब्द अंग्रेजी का कैसल भी है। दिलचस्प यह भी कि इस शब्द परिवार का रिश्ता कैसर से भी है जो जर्मनी के सम्राटों की उपाधि थी। कैसर का प्रयोग अरबी, फारसी और उर्दू में भी प्रभावशाली व्यक्तियों की उपाधि के तौर पर होता रहा है जैसे कैसर ए हिन्द यानी हिन्दुस्तान का बादशाह। इसका ताल्लुक प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीजर से भी है। दरअसल लैटिन के castrare और Caedere एक ही मूल के हैं और दोनों में ही काटने, तराशने का भाव है जिससे सीजर और कैसल जैसे शब्द बने। कैसल यानी महल, प्रासाद, किला और कैसर यानी सम्राट। शासक के रूप में इनकी व्याख्या यही है कि राजा हमेशा विशाल भवन में ही रहता है। कैंची समेत कतरनी के अर्थ वाले सीजर और जूलियस सीजर से जुड़े सीजर शब्द पर गौर करने से पहले कुछ अन्य शब्दों पर भी गौर कर लें। अंग्रेजी में कैंची को कहते हैं सीज़र । हिन्दी की कतरनी और अंग्रेजी की सीज़र आपस में मौसेरी बहने हैं। प्राचीन भारोपीय धातु ker का ओल्ड जर्मनिक में रूप हुआ sker जिसका मतलब होता है काटना, बांटना, विभाजन करना। संस्कृत में इसका रूप है कृ। कर्तन यानी काटना जैसा शब्द इससे ही बना है। कर्तनी यानी जिससे काटा जाए। कतरना, कतरनी यानी कैंची जैसे देशज शब्द इसके ही रूप हैं। अंग्रेजी के शेयर share यानी अंश, टुकड़ा, हिस्सा। आज की बाजार-संस्कृति में शेयर का रिश्ता पू्जी से जुड़ता है। शेयर-बाजार, शेयर-मार्केट जैसे शब्द बोलचाल में इस्तेमाल होते है। शीअर shear यानी काटना इससे ही बने हैं और इसका ही बदला हुआ रूप है सीज़र scissors यानी कैंची। शिअर में निहित काटने के भाव का विस्तार होता है लैटिन के Caedere शब्द में, जिससे बने सीजेरियन Caesarian का अभिप्राय है प्रसव के संदर्भ में पेट में चीरा लगाना। ऐसा कहा जाता है कि जूलियस सीजर Julius Caesar को उसकी मां का पेट चीर कर बाहर निकाला गया था। क्योंकि लैटिन के Caedere का मतलब होता है काटना या विभाजित करना, जिससे बने सीजेरियन शब्द का मतलब होता था पेट में चीरा लगा कर प्रसव कराना। आज भी इसका यही अर्थ है। सीजर के युग में सीजेरियन के जरिये सिर्फ नवजात का जन्म ही होता था। दरअसल यह विधि भी तभी आजमाई जाति थी जब प्रसव पीड़ा से मां की मौत हो जाती थी ऐसे में पेट चीर कर बच्चे को बाहर निकालना जरूरी होता था, वर्ना उसकी मौत भी तय होती, इसलिए ऐसे शिशु को सीजेरियन कहा जाता था। हालांकि यह सिर्फ एक कल्पना मात्र है। ऐतिहासिक प्रमाण कहते हैं कि जूलियस के शासन के दौरान उसकी मां जीवित थी और उसकी आयु का ब्योरा भी उपलब्ध है। जाहिर है यहां सीजर नाम का अर्थ वह नहीं है। दरअसल रोमन में सीजर शब्द का जो अंग्रेजी उच्चारण है वह रोमन में नहीं था। रोमन में c को k उच्चारित किया जाता है। इस तरह Julius Caesar रोमन में भी कैसर ही था जो एक उपाधि थी। जर्मन का कैसर kaiser, रूस का ज़ार tszar, zar, czar और अरबी कै़सर qaiser दरअसल एक ही मूल के हैं और इन सभी भाषाओं में इसका अर्थ एक ही है। यहां स्पष्ट है कि जिस तरह से जर्मनिक और रोमन में उच्चारण कैसर हुआ, अंग्रेजी में सीजर हुआ जबकि रूसी में यह जार हुआ। ध्यान दें कि लैटिन या अंग्रेजी का स रूसी में जाकर ज में बदल रहा है। अरबी कस्र ने जब रूस के दक्षिणी हि्स्से में बोली जाने वाली तुर्की भाषा में प्रवेश किया तो बहुत मुमकिन है क़-स-र की स ध्वनि का च में रूपांतर हुआ हो। स ध्वनि पहले ज में बदली हो और फिर च में रूपांतरित हुई होगी। अक्सर च और ज में रूपांतर होता है। यहां र ध्वनि का लोप हुआ है। इस तरह कस्र से ही कैंची शब्द बना हो हालांकि कैंची में जो अनुनासिकता है उसका आधार इस व्युत्पत्ति से नहीं मिलता है। वैसे रूप परिवर्तन के दौरान अनुनासिकता अपने आप आ जाती है जैसे उच्च के देशज रूप ऊंचा में यह नजर आती है। वैसे संस्कृत के कर्तन का रूपांतर कच्चन संभव है। मुमकिन है वर्ण विपर्यय से इसका अगला रूप कैंची बना है। इंडो-ईरानी मूल के शब्दों की आवाजाही तुर्की परिवार में हुई निश्चित ही हुई होगी। इस बारे में बहुत ज्यादा शोध नहीं हुआ है। लैटिन-जर्मनिक का कैसर शब्द शासक-सम्राट की उपाधि के रूप में ईसा पूर्व ही मशहूर हो गया था और इसी उच्चारण के साथ अरबी में पहुंचा था। प्रायः हर भाषा विदेशज शब्द को उनकी अर्थवत्ता और ध्वन्यात्मकता के साथ अपनाने की परिपाटी रही है। अरबों में ऐसा करते हुए उससे मिलती-जुलती धातु से शब्द-निर्माण की परम्परा रही है। भारतीय अंक शून्य की खोज का जब अरबों को पता चला तो उन्होंने अरबी भाषा में इसके मायने तलाशे। उन्हें मिला सिफ्र (sifr) जिसका मतलब भी रिक्त ही होता है। इसी तरह सम्राट के अर्थ में कैसर को अपनाने से पहले अरबों ने यही प्रक्रिया अपनाई। खुशकिस्मती से उन्हें q-s-r धातु मिली जिसमें काटने, विभाजित करने का भाव था। जर्मन K की जगह अरबी में Q का प्रयोग हुआ और इसका रूप हुआ Qaisar क़ैसर यानी शासक, सम्राट, जो अरबी फारसी के जरिये हिन्दी में भी चला आया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 27, 2009

परिवार की बर्बादी का सिलसिला [बकलमखुद-119]

…आना यूपी बोर्ड की मेरिट में, भागना काम की तलाश में दिल्ली, फिर बेरंग वापसी.

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे Image अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 119 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पहला पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
पिछली कड़ी-माई नेमिज चन्द्रभूषण मिश्रा [बकलमखुद-118]

मु झसे चार साल बड़ी मेरी बहन पढ़ाई में मुझसे दो ही साल आगे थी। प्राइमरी के बाद उसे तीन किलोमीटर दूर कप्तानगंज बाजार भेजने के बजाय एक किलोमीटर दूर खासबेगपुर गांव भेजा गया। उसकी कद-काठी अच्छी थी लिहाजा बड़े स्कूल जाना शुरू करते ही उसकी शादी के बारे में बात होने लगी। फिर गांव के लुहेंड़े लड़कों की मेहरबानी से कुछ ऐसा हुआ कि प्राइमरी स्कूल से मुक्ति पाकर जब मैंने छठीं की पढ़ाई के लिए कप्तानगंज जाना शुरू किया तबतक, यानी सातवीं का इम्तहान देने के बाद ही उसे स्कूल भेजने के बजाय घर के कामकाज सिखाने का फैसला हो गया। सके बाद से करीब चार साल चला उसकी शादी खोजने का सिलसिला एक मिसऐडवेंचर में समाप्त हुआ। उसका विवाह उससे करीब डेढ़ गुनी उम्र वाले गोरखपुर जिले के एक सज्जन के साथ हुआ, जिनकी पहली पत्नी जीवित थी और ग्यारह साल से अलग रह रही थी। इस विवाह के साथ ही हमारे परिवार की असली बर्बादी शुरू हुई। पहले शारदा ऐक्ट के तहत हमारे घर की कुर्की-जब्ती हुई। फिर करीब चार साल अपनी ससुराल में बिताकर पेट की असाध्य बीमारी अपने साथ लिए बहन हमेशा के लिए हमारे साथ ही रहने चली आई। इसके कोई छह महीने बाद इसी बीमारी से उसकी मृत्यु हुई और उसके तीन महीने बाद मेरे मंझले भाई ने फांसी लगाकर जान दे दी।
ह पूरा घटनाक्रम 1978 से 1983 के बीच का है। इस बीच की खड़ी ढलान में कुछ बिंदु ऊंचाइयों के भी हैं। 1979 में मेरा हाईस्कूल का इम्तहान कई मायनों में यादगार साबित हुआ। मेरा सेंटर महाराजगंज बाजार में पढ़ा था। पहली बार खुद को आजाद पाकर यहां मैं बिल्कुल छू उड़ गया। क्रिकेट खेलना यहीं पहली बार सीखा, इम्तहान के ऐन बीच, और रनिंग सुधारने की कोशिश में सड़क पर गिरकर घुटना फुड़ा बैठा। यहीं पहली बार मैंने वह चीज जानी, जिसे आजकल 'क्रश' कहकर आनंदित होने का रिवाज है, लेकिन मेरे लेखे वह जीवन भर किसी अनजानी चीज के नीचे बुरी तरह कुचल जाने जैसा ही रहेगा। यह किससे हुआ, कैसे हुआ, मैंने न तो किसी से कभी बताया, न आगे कभी बताऊंगा। लेकिन यह एक असंभव कल्पना थी- अपने पीछे एक दिमागी घाव छोड़ती हुई, जो गुलजार का लिखा, भूपेंद्र-लता का गाया गीत 'नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा' सुनते हुए आज भी रिसने और टीसने लगता है।
मेरे घर का, मेरी पढ़ाई का और मेरी इम्तहानी तैयारियों का जो हाल था, उसे देखते हुए उत्तर प्रदेश हाई स्कूल बोर्ड की मेरिट लिस्ट में स्थान पाना मेरे लिए ही नहीं, मेरे पूरे इलाके के लिए गौरव का विषय था। स्कॉलरशिप से पढ़ाई का खर्चा भी कुछ हद तक निकल सकता था। लेकिन इससे ज्यादा उड़ने की इजाजत नहीं थी। बेरोजगार बड़े भाई पिता के नक्शेकदम पर ज्योतिष में ही जोर-आजमाइश के लिए कलकत्ता-दिल्ली की सैर कर रहे थे और मंझले भाई बनारस में ट्यूबवेल ऑपरेटरी करते हुए घनघोर गंजेड़ी बनकर, बल्कि नशे की हालत में सरकारी ट्यूबवेल भी फूंककर घर लौट आए थे।
पिताजी की आमदनी अब दस-बारह रूपये रोजाना तक पहुंच चुकी थी लेकिन इसके बल पर वे मुझे शहर में रखकर पढ़ा तो नहीं सकते थे। इसी में दो झंझट परिवार के सिर और आ गए थे। बहन की शादी के मुकदमे में मां और पिताजी को आएदिन सौ मील दूर देवरिया जाना पड़ता था, जबकि बनारस से लौटे मंझले भाई को अपने नशे के लिए घर के बर्तन-भांड़े बेचने में भी कोई गुरेज नहीं था। दिन-रात की हताशा और झगड़ों से जान छुड़ाने के लिए इंटरमीडिएट के दोनों साल मैंने क्रिकेट या किसी और बहाने से घर के बाहर ही बिताने की कोशिश की और इंटर का इम्तहान होते ही कोई कामधंधा खोजने के लिए भागकर दिल्ली चला आया। यहां बड़े भैया का अपना ही जीना पहाड़ था, लिहाजा महीना बीतते उन्होंने बीच-बीच में कुछ पैसे भेजते रहने के वादे के साथ मुझे गांव वापस रवाना कर दिया।
गले दो साल मेरे लिए बी. एससी. की पढ़ाई से ज्यादा जीवन के मान्य सिद्धांतों की हकीकत परखने के रहे। बहन के ससुराली लोग धर्म-दर्शन में आकंठ डूबे हुए थे। घर के मुखिया चरम रजनीशी थे और ओशो की जलेबीनुमा दलीलों को सवर्ण सामंती दबंगई की राबड़ी में सानकर परोसते रहते थे। एक दिन मेरी बीमार बहन को ये लोग किसी कुचले हुए कुत्ते की तरह घिर्राकर हमारे यहां छोड़ गए। रोजाना घंटा भर पूजा करने वाली मेरी मां की ईश्वरीय शक्तियां बहन की जान तो क्या घर की कुर्की-जब्ती तक नहीं बचा पाईं और जिले भर का भविष्य भाखने वाले मेरे पिता अपने मंझले बेटे की खुदकुशी तो दूर, उसके असाध्य डिप्रेशन के बारे में भी कोई अनुमान नहीं लगा पाए। [-जारी]

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Saturday, December 26, 2009

चोरी और हमले के शुभ-मुहूर्त

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कि किसी शुभकार्य के लिए निर्दिष्ट समय को मुहुर्त कहते हैं। ज्योतिष एवं पंचांग में विश्वास करने का संस्कार केवल भारत भूमि पर निवास करनेवालों में ही था, ऐसा नहीं है। प्राचीन यूनान, रोम से लेकर अरब क्षेत्र के निवासियों में भी यह परम्परा थी और ज्योतिषी-नजूमी प्रभावशाली लोगों के लिए सूर्य-चंद्र एवं ग्रहों की स्थिति के आधार पर कालगणना करते थे और उन्हें शुभाशुभ योग के बारे में मार्गदर्शन देते थे। महामहोपाध्याय डॉ पांडुरंग वामन काणे धर्मशास्त्र का इतिहास में आथर्वण ज्योतिष (आथर्वण यानी अथर्ववेद के ज्ञाता ज्योतिषी) के हवाले से लिखते हैं कि अगर व्यक्ति सफलता चाहता है तो उसे तिथि, नक्षत्र, करण एवं मुहूर्त पर विचार करके कर्म या कृत्य करना चाहिए। तिथि का पता न चले तो शेष तीनों पर निर्भर रहना चाहिए। अगर शुरु के तीनों उपलब्ध न हो तो सिर्फ मुहुर्त का आश्रय लेना चाहिए और अगर मुहूर्त भी उपलब्ध न हो तब ब्राह्मण के इस वचन, कि-आज शुभ दिन है, से उसे कर्म करना चाहिए।
मुहूर्त शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में दो बार आया है जिसके मुताबिक इसका अर्थ “अल्पकाल या थोड़े क्षण” से है। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद में दिन-रात के तीस भागों की ओर भी गूढ़ संकेत है। शतपथ ब्राह्मण में मुहूर्त दिन का पंद्रहवां भाग अर्थात दो घड़ी (48 मिनट) है। इससे यह भी स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय काल गणना दिन-रात की अवधि 30 घड़ियों की थी। इनमें सुबह, दोपहर, शाम की शुभाशुभ घडियों (द्वि घटिका) का उल्लेख है। ब्राह्ममुहूर्त एक प्रसिद्ध मुहूर्त है। मुहूर्त के अल्पकाल वाले अर्थ के बाद कालान्तर में इसका एक अन्य अर्थ भी हो गया वह था दो घड़ी। समझा जा सकता है कि तब तक मुहूर्त लगभग समय की एक स्थूल इकाई ही था।संस्कृत में मुहूर्त शब्द से जुड़ा एक शब्द मुहुस्  है जिसमें कुछ क्षण के लिए, थोड़ी देर के लिए  अथवा कुछ क्षण जैसे भाव हैं। वैदिक संज्ञाओं के प्रसिद्ध व्युत्पत्तिकार यास्क ( ईसा पूर्व 10 वीं सदी ) ने निरुक्त में इसकी व्युत्पत्ति मुह्+ऋतु से बताई है जिसका अर्थ है वह काल जो शीघ्र ही समाप्त हो जाता है। ऋतु को हम रुत या मौसम के संदर्भ में इस्तेमाल करने के आदि हैं मगर इसका सूक्ष्म या गूढ़ार्थ काल ही है। संस्कृत में मूलतः किसी राह जाना और कुछ पाना का भाव है। इसमें परिभ्रमण, चक्रण, परिवर्तन, वृत्ताकार गति जैसे भाव हैं जिनके संदर्भ में calendarएक निश्चित अवधि के बाद ऋतुओं के फिर लौटने का अर्थ स्पष्ट होता है। मुह् धातु का अर्थ होता है मुर्झाना, मुर्छित होना, नष्ट होना, जड़ होना आदि। मूढ़ या मूर्ख की मूल धातु भी मुह् ही है। मूर्ख वही व्यक्ति होता है जिसकी चेतना मुर्झा चुकी हो, जो जड़ हो चुका है। बुद्ध की जड़ मुद्रा से बुद्धू शब्द की व्युत्पत्ति के संदर्भ में इसे समझना ज्यादा आसान है।
वैदिक और वेदोत्तर ग्रंथों में पंद्रह और तीस मुहूर्तों के नाम देवताओं के नामों पर रखे गए थे। ब्राह्ममुहूर्त से यह स्पष्ट है। वैदिक काल में मुहूर्त के दोनों प्रचलित अर्थों 1) अल्पकाल या थोड़ी देर और 2) दो घटिकाओं की अवधि प्रचलित थे। बाद में जब दिन की कुछ घटिकाओं का काल शुभ घोषित हुआ तो मुहूर्त का एक तीसरा अर्थ भी प्रकट हुआ, “वह काल जो किसी शुभ कृत्य के लिए अनुकूल हो” (कालः शुभक्रियायोग्यो मुहूर्त इति कथ्यते) आज दरअसल इसी अर्थ में मुहूर्त का प्रयोग होता है और परवर्ती पुराणेतर ज्योतिष धर्मग्रंथों में इसी अर्थ में मुहूर्त का उल्लेख हुआ है। मध्यकालीन संस्कृत साहित्य में मुहूर्त-संबंधी महत्वपूर्ण ग्रंथ जैसे-हेमाद्रि, कालमाधव, कालतत्वविवेचन, निर्णयसिन्धु रचे गए। जैसे जैसे समाज का विकास होता गया, साथ ही साथ ज्योतिष पर भी उसकी आस्था बढ़ती गई।अलग-अलग अवसरों के लिए विद्वानों नें मुहूर्तों की गणनाएं की जैसे विभिन्न संस्कारों, गृह-निर्माण एवं गृह-प्रवेश, विवाह, यात्रा या धावा बोलने का काल, कृषिकर्म और व्यापार वाणिज्य के क्षेत्र में मुहूर्तों का विस्तार होता गया और बात चौर्य-कर्म के मुहूर्त जानने तक जा पहुंची थी। ज्योतिष ज्ञान कहता है कि मृगशीर्ष, भरणी, धनिष्ठा, चित्रा तथा अनुराधा नक्षत्रों में शनिवार या मंगलवार को अगर चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी की तिथियों में अगर चोरी की जाती है तो उसमें सफलता मिलती है। मनुष्य अपनी कर्मठता को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता इसलिए शुभ मुहूर्त में के बाद ही कार्यारम्भ करने में उसका मन रमता है। ये अलग बात है कि सच्चे कर्मयोगी, विचार के जन्म को ही शुभ मुहूर्त मानते हुए बिना आनुष्ठानिक शुरुआत के कर्म-पथ पर बढ़ते रहे और समाज को दिशा देते रहे। यूं देखें तो किसी भी कार्य के शुभारम्भ से पहले उससे जुड़े सभी पक्षों का सम्यक अध्ययन करने के बाद जिस क्षण उसे शुरु किया जाए, वह समय अपने आप में शुभ-मुहूर्त ही होता है।

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Friday, December 25, 2009

मामा शकुनी, सुगनचंद और शकुन्तला

क्रिसमस पर मंगलकामनाएं

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दु नियाभर के समाजों में हर अच्छी शुरूआत के लिए शगुन-विचार करने का रिवाज है। बोल-चाल की हिन्दी में इसे सगुन बिचारना या सगुन-बांचना भी कहते हैं। नया काम मंगल बेला में हो जाए, ऐसे कार्य जो पुण्य प्राप्ति की आकांक्षा रखकर किये जाने हैं, उनके संबंध में  शुभाशुभ  सोचकर  ही कोई निर्णय लिया जाए, यही सारी बातें आदिकाल से शगुन-विचार के तहत आती रही हैं। शगुन का एक अन्य रूप शकुन भी हिन्दी में खूब प्रचलित है। इसके सगुन, शगुन, सुगन, सुगुन जैसे देसी रूपों के अलावा शकुन जैसा शुद्ध तत्सम रूप व्यवहार में हैं। शकुन या शकुन्तला जैसे नाम जहां स्त्रियों में होते हैं वहीं इससे सुगनचंद या सगुनचंद जैसे पुरुषवाची नाम भी प्रचलित हैं। शगुनिया हिन्दी में उस पुरोहित को कहते हैं जो पोथी-जंत्री बांच कर शुभकार्य के मुहूर्त निकाल कर रोजी चलाता है। ये तमाम रूप बने हैं संस्कृत के शकुनः से जिसका मतलब है शुभ लक्षण, अवसर आदि। शकुन में निषेधात्मक उपसर्ग लगने से अपशकुन शब्द बनता है जिसका अर्थ बुरा समय, खराब संकेत, अशुभ लक्षण आदि होता है। शकुन का प्राकृत रूप होता है सगुणु जिससे बना शगुन। जिस तरह शुभ चिह्न, एक पक्षी विशेष वगैरह। शकुनः के आधार में है संस्कृत धातु शक् जिसमें काल, समय, समर्थ होने की इच्छा रखना, कर सकने की इच्छा रखना शामिल है।
हाभारत के ख्यात चरित्र , कौरवों के मामा शकुनी का नाम भी इसी धातु से बना है। इसका मतलब हुआ जो स्वयं अपनी आत्मा का उद्धार कर सके। शकुनि में इसका विरोधाभास ही नज़र आता है। इस पांडव-द्वेषी गांधारी-बंधु के चरित्र की काली छाया समाज पर इतनी गहरी रही कि आज मुहावरे के तौर पर धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी के भाई का उल्लेख मामा शकुनी के रूप में ही होता है। महाभारत में कौरवों के इस निकट संबंधी का उल्लेख ऐसे व्यक्ति के तौर पर आता है जिसका परामर्श अनिष्टकारी हो। जाहिर है अपनी मूल भावना के अनुरूप शकुनी नाम तो मंगलकारी है मगर शकुनि के कुसंस्कार इस मंगलकारी शब्द की अर्थवत्ता पर हावी हो गए और यह नाम कुख्यात हो गया। अगर कौरवों के पक्ष में सोचें तो शकुनि की सोच और तिकड़में अस्थाई रूप से तो मंगलकारी थीं। शुभाशुभ विचार काल विशेष में ज्योतिष और नक्षत्र-गणना के आधार पर होता है जिससे यह तय हो सके कि अमुक और इच्छित घड़ी उस कार्य के योग को प्राप्त करने में योग्य या सक्षम है या नहीं। शक्ति का अर्थ होता  है बल, ताकत या सामर्थ्य, जो इसी मूल धातु अर्थात शक् से आ रहे हैं। यही नहीं वाहन के अर्थ में शकट शब्द भी इसी कतार में है जिसका अर्थ होता है गाड़ी। वाहनों को हमेशा ही शक्ति का प्रतीक समझा जाता है क्योंकि ये भारवाही होती हैं जिससे इनमें शक्ति स्थापित होती है। हिन्दी का छकड़ा शब्द शकट से बने शकटिका का ही रूप है। शूद्रक के प्रसिद्ध नाटक मृच्छकटिकम् यानी मिट्टी की गाड़ी में यही शब्द झांक रहा है।
Harappa-oxcartकुनः का एक अर्थ मांगलिक लक्षणों वाला एक पक्षी भी होता है जिसे पालना अच्छा समझा जाता है। इसके लिए शकुन्तः शब्द भी है। नीलकंठ को भी शकुन्तः कहा गया है।  वैसे आप्टे कोश में चील, गिद्ध जैसे पक्षियों का नाम इस संदर्भ में आता है। ध्यान रहे, पक्षियों का अलग अलग अवसरों पर घरों की मुंडेर, पेड़ों पर बैठना, कूकना आदि विभिन्न संस्कृतियों में प्राचीनकाल से ही शगुन-विचार के दायरे में आता रहा है। तोता का एक नाम शुकः भी है जिसके आधार पर हिन्दी में सूआ, सुआ और सुग्गा जैसे शब्द भी बने हैं। राजस्थानी में इसे सुवटिया भी कहते हैं। शुक-सारिका का जोड़ा भी मांगलिक माना जाता है।एक छोटी चिड़िया, गोरैया को भी शकुनी कहा गया है।इसी तरह शकुनि का अर्थ गिद्ध, चील, बाज और मुर्गा जैसे पक्षी भी हैं। शकुन्त, शकुनी, शकुन्तकः, शकुन्तिः जैसे शब्द संस्कृत में पक्षियों के ही नाम हैं। पुराणों की प्रसिद्ध नायिका शकुन्तला के नामकरण के पीछे यही मांगलिक भाव है। ऋषि विश्वामित्र से उत्पन्न कन्या को उसकी मां मेनका जन्म के बाद ही वन में छोड गई थीं जहां शकुन्त पक्षियों ने उसकी देखभाल की इसलिए उसका नाम शकुन्तला पडा। बाद में कण्व ऋषि ने उसे पाला । पुराणों के अनुसार दुष्यंत से उसका गांधर्व विवाह हुआ और पुत्र भरत उत्पन्न हुआ जिसके नाम पर इस देश का नामकरण भारत हुआ। [सम्पूर्ण संशोधित और विस्तारित पुनर्प्रस्तुति]

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Thursday, December 24, 2009

लंगर में लंगूर की छलांग

anchor…लंगर चाहे खुद हिलता-डुलता हो, पर जिससे वह बंधा रहता है, उसे ज़रूर स्थिरता प्रदान करता है…लंगर के दीगर मायने खूंटा, बिल्ला, चिह्न भी हैं…

हि न्दी में लंगर शब्द का दो तरह से प्रयोग होता है। बड़े जहाजों या नावों को पानी में एक ही स्थान पर स्थिर रखने के काम आने वाले लोहे के एक भारी उपकरण को लंगर कहते हैं, ताकि समुद्री लहरें जहाज को बहा न ले जाएं। इसमें दो या तीन कांटेनुमा फलक होते हैं। यह सिरा सबसे भारी होता है और लोहे की मोटी जंजीर से बंधा रहता है। जहाज जब किसी बंदरगाह पर रुकता है तो सबसे पहले इसी उपकरण को पानी में गिराया जाता है। पानी में जाकर यह रेत में धंस कर अपनी पकड़ मजबूत बना लेता है। किसी स्थान पर डेरा डालने या अस्थाई मुकाम करने को भी अब लंगर डालना कहा जाता है। इसी तरह कही कूच करने, यात्रा पर निकलने के संदर्भ में लंगर उठाना का इस्तेमाल होता है। ये दोनो वाक्य मुहावरा बन चुके हैं। सूफियों के डेरों और आश्रमों में अक्सर सदाव्रत चलते रहते हैं, ऐसे ठिकानों को भी लंगर कहा जाता है। आमतौर पर जिस स्थान पर सामूहिक रसोई बनती है उसे लंगर कहते हैं। सेना के जवानों की रसोई  भी लंगर ही होती है।
लंगर दरअसल इंडो-ईरानी आधार से उपजा शब्द है जो हिन्दी, उर्दू और फारसी में एक समान उच्चारण और अर्थवत्ता के साथ मौजूद है। यह बना है संस्कृत की लङ्ग धातु से जिसमें झूलने, हिलने, डोलने का भाव है। इसके अलावा इसमें पहचान चिह्न, खूंटा, बिल्ला आदि भाव भी हैं। खूंटे के अर्थ में ही इसका एक अन्य अर्थ है हल की शक्ल का एक शहतीर। इसके अलावा बहुत वजनी चीज को भी लंगर कहते हैं। इससे बना है संस्कृत का लङ्घ जिसका अर्थ है उछलना, कूदना, दूर जाना, झपट्टा, आक्रमण करना, अतिक्रमण करना आदि। जब ये तमाम बातें होंगी तो रुष्ट या नाराज होना स्वाभाविक हैं, सो ये भाव भी इसमें समाहित हैं। सीमा पार करने के लिए हिन्दी में उल्लंघन शब्द का प्रयोग आमतौर पर होता है, जो इसी मूल से आ रहा है। लांघना यानी उछल कर पार जाना भी इसी मूल से आ रहा है। उछलने के अर्थ में हिन्दी में कूदना शब्द भी है और छलांग भी, मगर छलांग में जो बात है, वह कूद में नहीं। हिन्दी शब्द सागर के मुताबिक छलांग देशज शब्द है और इसकी व्युत्पत्ति उछल+अंग से बताई गई है

... गुरु की ओर से प्रसाद के बतौर लंगर यानी सदाव्रत चलता है।...pic14 Guru Langarkanhaiya3

जिसके मुताबिक पैरों को एकबारगी दूर तक आगे फेंक कर कूद कर वेग से आगे बढ़ने की क्रिया है, जबकि जॉन प्लैट्स के मुताबिक छलांग बना है उद्+शल्+ लङ्घ=छलांग होता है। संस्कृत मे उद् धातु का अर्थ है ऊपर उठना, शल् का अर्थ है गति, हिलाना, हरकत करना आदि और लङ्घ का अर्थ है सीमा पार करना। अर्थात छलांग में सिर्फ कूदने की क्रिया नहीं है बल्कि सीमोल्लंघन का भाव भी है। सामान्य से ऊंची कूद को छलांग कहा जा सकता है। छलांग में सामान्य तौर पर क्षैतिज गति का भाव है मगर मुहावरे में ऊंची छलांग भी होती है। फलांग भी इसी कतार में खड़ा नजर आता है।
गौर करें बंदर के लिए संस्कृत में लांगुलिन् शब्द है। लँगूर इसका ही देशी रूप है। लांगुल का अर्थ पूंछ भी है। पूंछ का लटकने, डोलने का भाव स्वतः ही स्पष्ट है। वैसे लँगूर की एक परिभाषा लम्बी पूंछ वाला बंदर भी है। समझा जा सकता है कि शरारती स्वभाव के चलते इसे यह नाम मिला है। शरारतों में किसी न किसी सीमा का उल्लंघन शामिल है।  अपंग अपाहिज जिसे पगबाधा हो, उसे लंगड़ या लंगड़ा कहा जाता है जो इसी मूल से उपजा शब्द है। लंगड़ा व्यक्ति एक पैर झुलाते हुए और खुद भी हिलते-डुलते चलता है। वृहत् प्रामाणिक कोश के अनुसार नटखट गाय के गले में बंधा लकड़ी का कुंदा भी लंगर कहलाता है जिसकी चोट से उसकी चंचलता काबू में रहती है। लंगर में किसी भी लटकती हुई वस्तु का भी बोध है। लँगर या लाँगर शब्द भी इसी मूल के है जिसका अर्थ पाजी, नटखट, शरारती या बदमाश होता है। कृष्णलीला के एक प्रसंग में राधा तंग आकर नटखट कन्हाई से कहती हैं-छाँड़ौं लंगर मोरी बैंयां धरो ना। नटखट बच्चों की तुलना लँगूर से भी की जाती है। लंगर के रसोई भंडार या सदाव्रत वाले अर्थ पर गौर करें। दरअसल संस्कृत मूल से फारसी में प्रवेश के बाद ही लंगर शब्द का इस अर्थ में प्रयोग शुरू हुआ होगा, ऐसा अनुमान है। खाना, कैम्प, क़ला, डेरा, तम्बू, खेमा, पड़ाव, लश्कर और ठाठ जैसी शब्दावली के अंतर्गत ही लंगर शब्द भी आता है। इन तमाम शब्दों का प्रयोग अस्थाई फौजी रिहाइश के संदर्भ में शुरु हुआ। लंगर में खूंटा गाड़ने के भाव पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि लंगर बांधना, लंगर लगाना, लंगर उखाड़ना जैसे वाक्य जो हम साहित्य में और बोलचाल में सुनते आए हैं, वे दरअसल कहीं मुकाम करने का अर्थबोध ही कराते हैं। पुराने जमाने में फौज लगातार गतिशील रहती थी। आज यहां, कल वहां। पड़ाव के अर्थ में ही हिन्दी उर्दू में लंगर शब्द का चलन शुरू हुआ अर्थ था खूंटा गाड़ कर डेरा लगाना।
वाल उठता है सदाव्रत या भोजनशाला के तौर पर लंगर शब्द कैसे रूढ़ हुआ। आसान सी बात है। लंगर का मूल अर्थ चार खूंटे गाड़ कर छप्पर तानना है जबकि रहने-सोने की रिहाइश की सुब्हो-रात की व्यवस्था अलग होती है जिसके लिए उपरोक्त तमाम शब्द पहले से मौजूद थे। भोजन बनाना एक तात्कालिक आवश्यकता है जिसमें बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगता और सिर्फ धूप, बारिश से बचाव के लिए छत की जरूरत होती है। इसीलिए जब कहीं फौजी पड़ाव होता था तो सबसे पहले आनन-फानन में लंगर तान दिया जाता था ताकि रसोइये फौरन अपने काम में जुट सकें। सिख पंथ मूलतः फौजी अनुशासन वाला पंथ रहा है। इस पंथ के गुरु महानतम योद्धा रहे हैं। इसीलिए लंगर शब्द यहां खास मायने रखता है। अब गुरु की ओर से प्रसाद के बतौर लंगर यानी सदाव्रत चलता है। लंगर का अर्थ  मुफ्त का खाना भी हो गया है। मुख्य बंदरगाह से दूर वह स्थान जहां जहाजों को लंगर डालना होता है, लंगरगाह कहलाता है। इसी तरह कंगलो-गरीबों के लिए सदाव्रत की जगह भी लंगरखाना कहलाती है। स्पष्ट है कि लङ्ग में चाहे हिलने डुलने का भाव हो, मगर यह इससे बांधी जानेवाली संज्ञा को जरूर एकाग्र करता है। भूखों-असहायों के लिए चलनेवाला लंगर भी उन्हें जीने का आधार देता है।

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Wednesday, December 23, 2009

कसूर किसका, कसूरवार कौन? [आश्रय-26]

RedFort ताजा कड़ियां- सब ठाठ धरा रह जाएगा…[आश्रय-25] पिट्सबर्ग से रामू का पुरवा तक…[आश्रय-24] शहर का सपना और शहर में खेत रहना [आश्रय-23] क़स्बे का कसाई और क़स्साब [आश्रय-22] मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21] कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20] सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19] जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]

कि सी चीज़ में कुछ खामी या त्रुटि रह जाने पर उसे कसर रह जाना कहते हैं। इसी से मिलता जुलता शब्द है कुसूर जिसे हिन्दी में कसूर भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है दोष, त्रुटि या गलती। व्यापक अर्थ में इसका अर्थ अपराध, जुर्म भी माना जाता है। कुसूर शब्द अरबी का है जिसमें फारसी का वार प्रत्यय लगा कर एक नया शब्द बना लिया गया कुसूरवार।दोषी या अपराधी के लिए कसूरवार या कुसूरवार शब्द खूब इस्तेमाल होते हैं।  ये तमाम शब्द अरबी मूल के हैं और इसी रास्ते से फारसी, हिन्दी, उर्दू में दाखिल हुए। इन शब्दों की रिश्तेदारी कुछ अन्य शब्दों से भी है जो हिन्दी में बोले-समझे जाते हैं। हिन्दी-उर्दू में कसर निकालना मुहावरा है जिसका मतलब होता है गलती या कमी निकालना। किसी कार्य के पूरा होने पर उसकी समीक्षा के दौरान भी कमी या न्यूनता नजर आती है जिसे कसर रह जाना कहते हैं। कसर निकालना का एक अर्थ बदला लेना भी होता है जैसे “तब तो कुछ कर न पाए, अब कसर निकाल रहे हैं” भाव यही है कि तब जो कमी रह गई थी, उसे पूरा किया जा रहा है।
सेमिटिक धातु क-स-र q-s-r से इन शब्दों की व्युत्पत्ति मानी जाती है। अरबी में इस धातु से एक शब्द बना है कस्र या अल-कस्र जिसका मतलब है महल, किला या दुर्ग। सेमिटिक धातु क-स-र q-s-r का मूल अर्थ है काटना, छीलना, तराशना। ये सभी क्रियाएं आश्रय निर्माण से जुड़ती हैं। आवास बनाने के लिए आदिम मनुष्य ने पहाड़ी कंदराओं में अपना ठिकाना बनाया। उसके बाद पहाड़ी चट्टानों को तराश कर उनमें खुद अपने आश्रय बनाए। सीरिया, लेबनान में अनेक ऐसे golkunda-fort पुरातत्व स्थल हैं जहां पत्थरों को तराश कर मनुष्य ने भव्य प्रासादों का निर्माण किया। हालांकि पश्चिमी इतिहासकार और भाषाविज्ञानी कस्र शब्द को लैटिन के कैस्ट्रम castrum से निकला हुआ बताते हैं जिसका अर्थ होता है भवन, प्रासाद, काटना, तराशना आदि। लैटिन के castrare का मतलब भी यही है। इसका मतलब चाकू या छुरा भी होता है। लैटिन में इससे मिलता जुलता एक शब्द और है कैस्टेलियम castellum जिससे अरबी में बना अल-कस्तल al-qastal जिसके मायने किला, गढ़ी या सुरक्षित स्थान होता है। castellum के मूल में लैटिन शब्द कास्त्रा castr(a) है जिसमें घिरे हुए स्थान का भाव है। ध्यान रहे पर्वतों को तराश कर कंदरा का निर्माण सुरक्षा के लिए घिरे हुए स्थान का निर्माण करना ही था। सुरक्षा के लिए चारों और से आवरण जरूरी है। वस्त्र से लेकर भवन तक में यह घेरा स्पष्ट है। अंग्रेजी में किले के लिए कैसल castle शब्द का निर्माण इसी कैस्टेलियम से हुआ है। स्पैनिश में इसका रूप अल्काज़ार alcazar है, जो अरबी के अल-कस्र का रूपांतर माना जाता है और यही वह तथ्य है जिससे लगता है कि भवन के अर्थ में अरबी कस्र और लैटिन के कैस्ट्रम में अर्थ और ध्वनि साम्य की वजह से जन्मसूत्री रिश्ता भी हो सकता है।
रबी विद्वानों का यह दावा दुराग्रह नहीं लगता है कि क-स-र q-s-r अरबी की स्वतंत्र धातु है। यह सिद्ध होता है स्पेनिश भाषा के अल्काजार शब्द से। स्पेन, इटली से लगा हुआ है। वहां महल या दुर्ग के अर्थ में अरब के अल-कस्र से बना अल्काज़ार शब्द प्रचलित है। वजह सिर्फ यही नहीं हो सकती कि स्पेनी भाषा पर अरबी प्रभाव है। गौरतलब है कि आठवीं नवीं सदी में स्पेन के कई इलाकों पर अरबों का कब्जा था। उधर पश्चिमी विद्वानो का कहना है कि लैटिन कैस्ट्रम का अरबी रूपांतर कस्र और कैस्टेलियम castellum जिससे अरबी में बना अल-कस्तल इस तथ्य के सबूत हैं कि अरब क्षेत्रों में ईसापूर्व पांचवी सदी के पहले से लेकर ईस्वी पांचवी-छठी सदी तक रोमन और बाइजेंटाइन शक्तियों का अरब में प्रभाव था और कई स्थानों पर उनके फौजी पड़ाव थे जिसके चलते आश्रय के अर्थ में ये शब्द अरबी भाषा में ढल गए।
ससे हट कर जरा देखें कि कस्र से अरबी भाषा में कई अन्य शब्द भी बने। उनकी अर्थवत्ता देखें। कस्र का अर्थ जहां महल है वहीं कुसूर का अर्थ उस स्थान से है जहां विशाल सुंदर भवनों की बहुतायत हो। यह कस्र् का बहुवचन है। स्पष्ट है कि जहां सुंदर इमारतें हों, वह बड़ा शहर होगा। इतिहास में कसूर नाम के कई स्थानों का उल्लेख है। पाकिस्तान में भी कसूर नाम का एक शहर है जिसे यह नाम उसकी खूबसूरत गढ़ियों की वजह से मिला था। कई मुसलमानों का एक उपनाम कसूरी भी होता है जैसे अहमद रज़ा कसूरी। यह कसूर से रिश्तेदारी ही स्थापित करता है। उर्दू-हिन्दी के कसूर शब्द में जो त्रुटि का भाव है उस पर गौर करें। किसी प्राकृतिक शिला में विभिन्न रूपाकार उकेरने के लिए उसके विभिन्न हिस्सों को छेनी-हथोड़े से काटा जाता है। सेमिटिक धातु क-स-र q-s-r से यह अभिव्यक्त हो रहा है। इसी तरह किसी वस्तु में जब कोई कमी रह जाती है  या टूट-फूट हो जाती है तो उसे दोष माना जाता है। देवप्रतिमा का कोई हिस्सा टूट-फूट जाता है तब उसे भी खण्डित मान कर प्रभावहीन समझा जाता है। यहां क-स-र q-s-r में निहित भाव स्पष्ट हैं। दिलचस्प है कि जिस मूल धातु का अर्थ किसी मूल या प्राकृतिक आकार में काट-छांट कर किसी आश्रय का निर्माण करने से है उसी से निर्मित एक अन्य शब्द की अर्थवत्ता में किसी वस्तु में हुई टूट-फूट को कसर यानी दोष या कमी माना जाता है और दोषी को कसूरवार कहा जाता है।

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Monday, December 21, 2009

लिफाफेबाजी और उधार की रिकवरी

संबंधित कड़ी-जल्लाद और जिल्दसाजी

लिफाफा से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं जैसे बंद लिफाफा। आमतौर पर गूढ़ और अबूझ व्यक्ति के लिए यह उपमा है… envelope
कली लोगों का चरित्र अक्सर एक कृत्रिम आवरण avaran में लिपटा रहता है जिसके जरिये वे जैसे होते है, उससे अलहदा दिखने की कोशिश करते हैं ऐसे लोगों को मुहावरेदार भाषा में लिफाफेबाज कहा जाता है। यह व्यवहार आडम्बर और दिखावा की श्रेणी में आता है। आवरण कई तरह के होते हैं। लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए स्टाइलिश कपड़े पहने जाते हैं, जो शरीर का आवरण है। मेकअप यानी सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रयोग भी आवरण ही है। बर्तनों को चमकाने के लिए उस पर कलई की जाती है और गहनों पर मुलम्मा चढ़ाया जाता है। यानी जो कुछ प्राकृतिक है अपने मूल स्वरूप में है, उससे हटकर हम उस पर किसी न किसी असत्य की परत चढ़ाने से नहीं चूकते। इस तरह नकली रूप या किरदार सामने लाकर हमें खुशी मिलती है। दिलचस्प यह कि हर कोई यही कर रहा है और अपनी सिफत छुपाने की कोशिश में हम सब बहुरूपिया बन चुके हैं। बल्कि कहना चाहिए कि लिफाफेबाजी करते करते हम सिर्फ  लिफाफा भर रह गए हैं जिसके अंदर कुछ नहीं है।
लिफाफा हिन्दी का बड़ा आम शब्द है जो बरास्ता अरबी-फारसी होते हुए हिन्दी-उर्दू में दाखिल हुआ है। सेमेटिक भाषा परिवार की अरबी, हिब्रू और आरमेइक भाषाओं में लफ़्फ़ा laffa या lapu जैसी धातुए हैं जिनमें लपेटने, अंतर्निहित करने, आवरण चढ़ाने जैसे भाव है। अरबी लफ़्फ़ा से बना लिफ़ाफ़ाह lifafah शब्द जिसका अर्थ था आवरण, रैपर या कवर। किसी चीज़ पर दूसरी चीज़ जोड़ना या चस्पा करना। ढकने का अर्थ भी इसमें निहित है। हिन्दी उर्दू में इसका उच्चारण लिफाफा होता है। यह आमतौर पर कागज से बनी आयताकार थैली है जिसमें कागजी दस्तावेज रख कर उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है। इसका मूल काम किसी दस्तावेज को सुरक्षित और गोपनीय रखना है। लिफाफे का इस्तेमाल डाक भेजने के काम आनेवाली कागज की थैली या खरीते के तौर पर

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किया जाता है। अरबी में इसका मतलब कफन भी होता है। इसके अलावा दो दशक पहले तक दुकानदार अखबारी रद्दी से बनाए गए लिफाफों में सामान दिया करते थे। लिफाफा से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं जैसे बंद लिफाफा। आमतौर पर गूढ़ और अबूझ व्यक्ति के लिए यह उपमा है। लिफाफा खुल जाना यानी किसी का भेद उजागर होना या वास्तविक बात का प्रकट हो जाना। लिफाफे को देखकर मजमून भांपना यानी किसी के मन की बात जान लेना या भेद की बात उजागर हो जाना आदि।
रैपर शब्द का इस्तेमाल बोलचाल की हिन्दी में खूब होता है। इसका मतलब भी आवरण ही होता है। बाजारवाद के दौर में इसकी महत्ता बहुत ज्यादा है। रोजमर्रा की जितनी भी रेडीमेड वस्तुएं हैं, निर्माता उन्हें चमकदार आवरण में लपेट कर बाजार में उतारता है ताकि ग्राहक उसके बाहरी रूप से आकर्षित हो सके। यह अंगरेजी के रैप wrep से बना है जिसका अर्थ है लपेटना, घुमाना, मोड़ना आदि। भाषाविज्ञानी इसकी व्युत्पत्ति संदिग्ध मानते हैं। वैसे कुछ विद्वान इसकी व्युत्पत्ति प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार की धातु वर् wer से मानते हैं जिसमें घुमाना, दोहरा करना, लपेटना जैसे ही भाव हैं। इससे मिलती जुलती संस्कृत धातु है वृ जिसमें और साफ नजर आ रहे हैं जिसका अर्थ है घेरना, लपेटना, ढकना, छुपाना और गुप्त रखना। इससे बने वर्त या वर्तते में वही भाव हैं जो प्राचीन भारोपीय धातु वर् wer में हैं। गोल, चक्राकार के लिए हिन्दी संस्कृत का वृत्त शब्द भी इसी मूल से बना है। गोलाई दरअसल घुमाने, लपेटने की क्रिया का ही विस्तार है। वृत्त, वृत्ताकार जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं। संस्कृत की ऋत् धातु से भी इसकी रिश्तेदारी है जिससे ऋतु शब्द बना है। गोलाई और घूमने का रिश्ता ऋतु से स्पष्ट है क्योंकि सभी ऋतुएं बारह महिनों के अंतराल पर खुद को दोहराती हैं अर्थात उनका पथ वृत्ताकार होता है। दोहराने की यह क्रिया ही आवृत्ति है जिसका अर्थ मुड़ना, लौटना, पलटना, प्रत्यावर्तन, चक्करखाना आदि है।
ब बात कवर की। अंगरेजी cover लैटिन के co+operire (समान रूप से, भली भांति+ ढकना, छुपाना) से बना है। operire के मूल में प्राचीन भारोपीय धातु वर् अर्थात wer ही है। इस तरह कवर cover का अर्थ हुआ अच्छी तरह ढका हुआ, छिपाया हुआ जिसमें सुरक्षा कवच या आवरण का भाव स्पष्ट है। हिन्दी में कवर शब्द अपने सभी भावों के साथ इस्तेमाल होता है जैसे कवर करना यानी सम्पूर्णता में समेटना वगैरह वगैरह। कवर का मतलब आमतौर पर किसी वस्तु के आवरण से ही होता है और इस अर्थ में कवर शब्द का इस्तेमाल बहुत आम है। बुक कवर, सीट कवर, फाइल कवर जैसे शब्द इसे उजागर कर रहे हैं। कवर से कई शब्द बने हैं जिनमें आवृत्ति या लौटने का भाव साफ नजर आता है जैसे रिकवर अर्थात पूर्ववत होना। किसी स्थायी परिस्थिति में बदलाव के बाद फिर अपनी पूर्वावस्था में लौटना रिकवर कहलाता है। रिकवरी भी इसी मूल से उपजा शब्द है। अर्थ इसका भी वही है जो रिकवर का है, मगर उधार वसूली जैसे मामलो में इसका इस्तेमाल बड़ा सूझ-बूझ भरा है। उधार की वसूली में ऋणदाता की जेब से कर्जदाता के हाथों से होते हुए मुद्रा फिर ऋणदाता के पास पहुंचती है और एक चक्र पूरा होता है। यानी सब कुछ पूर्ववत हो जाता है। ver में निहित घूमने, लौटने पलटने की बात यहां साफ हो रही है। किसी वस्तु को चारों और जब आवरण में लपेटते हैं तब भी उसके दोनों सिरे चक्कर लगाते हुए एक साथ मिल जाते हैं। (क)वर और (आ)वरण में समानता पर भी गौर करें। अंगरेजी और हिन्दी उपसर्गों के हटने पर जो ध्वनियां बचती हैं वे स्पष्ट तौर पर एक ही मूल से निकली हुई दिखती हैं।

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Sunday, December 20, 2009

माई नेमिज चन्द्रभूषण मिश्रा [बकलमखुद-118]

बखानल धीया, डोम घर जइहैं…यानी कलंकिता के भाग्य में डोम का घर- दूसरी कड़ी...

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे चंद्रभूषण अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 117 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पहला पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
पिछली कड़ी-चंदूभाई की अनकही [बकलमखुद-117]
गां व का घर एक बड़े अंधियारे खंडहर जैसा था। वहां दादी थीं, जिनकी एक आंख पहले से खराब थी और दूसरी समलबाई के ऑपरेशन के वक्त खराब हो गई थी। 'हरे चनुआ'- नन्हीं लाल चुन्नी की कहानी वाले 'नानी' भेड़िए की तरह वे बहुत भारी मर्दानी आवाज में मुझे बुलाती थीं। राख लगाकर उनकी दाढ़ी-मूंछें नोच निकालने की मेरी ड्यूटी अक्सर लगा करती थी। घर में एक गाय थी, जिसका लालटेन या ढिबरी की रोशनी में घर्र-घों दुहा जाना भी अच्छा दृश्य बनाता था। मां उसे दुहती थी और मैं उजाला दिखाता था। घर के सामने एक गझिन बंसवार थी, जिसपर शाम के वक्त किलहंटियों (जंगली मैनाओं) की जबर्दस्त कचपचिया पंचायत जुटती थी। मां को सिलाई-पुराई का गुन आता था और सलाहें तो उसके पास हर चीज के लिए हुआ करती थीं। दोपहर में बगल की चाची जांता पीसने या चूड़ा कूटने आती थीं। उनकी आम बातें भी किस्सों जैसी लगती थीं। इन छिटपुट बातों के अलावा कोई रोचक और भरोसेमंद चीज गांव में नहीं थी।
नौकरी छोड़ने को लेकर पिताजी से मां का झगड़ा लगातार ही चल रहा था। गांव पहुंचने के कुछ ही दिन बाद यह इस कदर बढ़ा कि पिताजी घर छोड़कर कई महीनों के लिए पता नहीं कहां चले गए। वहां से उनके लौटने के बाद भी झगड़े में कोई कमी नहीं आई लेकिन धीरे-धीरे पिता के साथ एक बारीक सा दिमागी संतुलन शायद मां ने साध लिया कि निखट्टू हालत में भी उनका होना उनके न होने से थोड़ा बेहतर ही है। उधर पिताजी खुद को और अपने परिवार को जिंदा रखने के लिए एक मिथक अपने साथ लेकर लौटे थे। उनका कहना था कि बनारस के मणिकर्णिका मुर्दघट्टे पर कई दिनों की भूखी-प्यासी अधनींद में लाल साड़ी पहने एक सुंदर जवान औरत उनके सपने में आई और बोली कि अब उठो, घर जाओ, तुम्हारे बच्चे कभी भूखे नहीं मरेंगे। उन्हें यकीन था कि यह औरत देवी थी और गांव में, कम से कम उनके सामने, कई लोग इसपर हामी में मूंड़ हिलाते थे। इसका उपयोग उन्होंने ज्योतिष की जोर-आजमाइश में किया। उनके जुनूनी स्वभाव, पहलवानी शरीर और झझक वाली ज्योतिष का यह कॉकटेल साल भर के अंदर उन्हें कभी दो तो कभी चार रुपये की कमाई कराने लगा। मेरे लिए इसी समय स्कूल की एक नई आफत और शुरू हो गई। शहर में सीखे गए अंग्रेजी के दस-बारह शब्द मेरे जी का जंजाल बन गए। कोई कहीं भी पकड़ लेता और पूछता कि बोलो मुंह माने क्या, नाक माने क्या (अंग्रेजी मुझे तब कितनी आती थी, इसकी बानगी काफी बाद में दर्जा तीन की एक किताब में आमने-सामने के दो पन्नों पर देखने को मिली। सरकंडे की कलम से एक पर लिखा था- वाटिज योर नेम? और दूसरे पर- सर माई नेमिज चन्द्र भूषण मिश्रा)।
हरहाल, इस तरह हर जगह सर्कस के जानवर की तरह पेश होना निजी झंझट  के अलावा स्कूल smartमें भी मेरे लिए भारी मुसीबत का सबब बना। मुझे हर चीज पढ़ना आता था। यहां तक कि अपना सर्किल टूटने और लगातार खराब डिवीजन से स्थायी रूप से फ्रस्टेट रहने वाले अपने भाइयों के रसीले उपन्यास भी मैं छह-सात साल की उम्र में चट कर जाता था। लेकिन लिखने के नाम पर बिल्कुल कोरा था और गिनतियों के खेल में भी मेरी कोई खास गति नहीं थी। पता नहीं किस 'प्रतिभा' के चलते मुझे गदहिया गोल या दर्जा एक के बजाय सीधे दो में बिठा दिया गया। लेकिन शिक्षक गण किसी भी गलती पर या सवाल का जवाब न देने पर मुझे 'तेजूखां' कहकर बुलाते थे और 'बखानल धीया डोम घरे जइहैं' (बखानी अर्थात कलंकित हुई लड़की तो डोम के घर ही ब्याही जानी है) का आशीर्वाद देते थे।इस तरह बात-बात पर बेइज्जत होना मुझे बहुत खलता था लिहाजा अक्सर पिताजी की चापलूसी करके मैं उनके कंधे पर बैठ जाता था और उनके साथ जहां-तहां घूमते हुए ज्योतिष का नरम-गरम देखता रहता था। यह सिलसिला पांचवें दर्जे तक नियमित चला।
किसी भी साल स्कूल में आधी से ज्यादा उपस्थिति मेरी नहीं रही होगी। पांचवीं के इम्तहान तब बोर्ड से होते थे। इम्तहान की रात में हम लोग स्कूल में ही सोए। अगली सुबह तड़के ही स्कूल के अकेले गैर-ब्राह्मण शिक्षक 'मुंशीजी' के पीछे दौड़ते-भागते करीब पांच मील दूर मेहमौनी गांव में इम्तहान देने गए, जहां अपना पर्चा कर लेने के बाद अपने एक दगाबाज दोस्त की कापी लिखते हुए मैं पकड़ लिया गया। मजे की बात कि मुझे रेस्टीकेशन से डराने वालों में मेरे वह मित्र सुरेंदर भी शामिल थे, जिन्होंने अपने सवाल हल करने के लिए अपनी कापी मेरे हवाले कर दी थी। आठवीं तक लगातार मेरी क्लास के सबसे तेज लड़के थे मेरे ही गांव के रामधनी प्रसाद मौर्य। उनकी लिखावट जबर्दस्त थी, अथलीट वे अच्छे थे और शिक्षकों के अलावा लड़कियों में भी समान रूप से पॉपुलर थे। पता नहीं कैसे आठवीं के बाद अचानक उनके नंबर खराब होने लगे। शायद इसलिए कि तबतक उनका गौना आ गया था और जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं। या इसलिए कि पढ़ाई में अचानक आए अमूर्तन को पकड़ने के लिए उनका दिमाग तैयार नहीं था। या शायद इसलिए कि लंबी पढ़ाई करके बड़ा अफसर बन जाने की कोई प्रेरणा उनके निजी दायरे में मौजूद नहीं थी।
[बाकी अगले रविवार]

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Saturday, December 19, 2009

भेड-चाल से भेड़िया-धसान तक

संबंधित पोस्ट-1.कुलीनों की गोष्ठी में ग्वाले. 2.गवेषणा के लिए गाय ज़रूरी है.3.गोस्वामी, गोसाँईं, गुसैयांsh2

प्र कृति के विविध रूपों और पशु-पक्षियों के स्वभाव से जुड़े शब्दों ने भी भाषा को समृद्ध किया है। आंख मूंद कर किसी के पीछे चलने को अंधानुकरण कहा जाता है। भाषा को लालित्यपूर्ण और वाक्य को ज्यादा अर्थपूर्ण बनाने के लिए इस संदर्भ में भेड़-चाल मुहावरा है जो खूब प्रचलित है। सामाजिक प्राणियों की एक लम्बी श्रंखला है जिसमें भेड़ें भी आती हैं। भेड़ों का स्वभाव होता है एक दूसरे के पीछे चलना। किसी स्थान पर अगर एक भेड़ किसी ओर चल पड़ती है तो बाकी भेड़ें भी उसी का अनुसरण करती हैं। गति करते इस समूह को ही भेड़ों का रेवड़ कहा जाता है। भेड़ को हिन्दी की कुछ शैलियों में गाडर भी कहा जाता है। एक दूसरे के पीछे चलने की वजह से भेड़ों को कभी नुकसान नहीं होता। प्रकृति नें किन्हीं प्राणियों को समूह में रहने का गुण दिया है जिसके चलते वे अपनी सुरक्षा कर पाते हैं। मनुष्य ने भेड़ों के इस स्वभाव को अंधानुकरण से जोड़ा। इस तरह से भेड़-चाल का अर्थ हुआ बिना सोचे-समझे किसी का अनुसरण करना, नकल करना या किसी की पटरी पर चलना। लीक पर चलना जहां लियाकत की बात है वहीं भेड़चाल बुद्धिमानी की निशानी नहीं है।
भेड़चाल के लिए हिन्दी में एक मुहावरा और प्रचलित है-भेड़िया-धसान। अर्थ वही है-आंख मूंदकर किसी का अनुसरण करना। यहां कई लोग भेड़िया-धसान में हिंस्र जंतु भेड़िया को देखते हैं जबकि यहां भेड़ से ही तात्पर्य है। पहले भेड़ शब्द की व्युत्पत्ति देखते हैं। यह बना है संस्कृत के मेष से जो एक राशिनाम के अलावा बकरी  प्रजाति के एक चौपाए का नाम भी है, जिसका आकार उससे कुछ कम होता है। मेष से बने मेढ़ा या मेढ़ी जैसे शब्द। इनका अगला रूप हुआ भेड़। आमतौर पर लिंग निर्धारण के लिए भेड़ के आगे नर या मादा शब्द लगाया जाता है। बकरी का पुल्लिंग बकरा होता है उसी तरह भेड़ का पुल्लिंग मेढ़ा होता है। उसे भेड़ा भी कहते हैं पर यह शब्द आज की हिन्दी में sheep2अप्रचलित है। संस्कृत में मादा भेड़ को मेषिका कहते हैं। मेषिका> मेढ़िका> भेड़िका> भेड़िआ के क्रम में इसका रूपांतर हुआ। प्रसंगवश बकरी के बच्चे को मेमना कहते हैं। यह ध्वनि अनुकरण प्रभाव से बना शब्द है। बकरी का शावक में-में की आवाज करता है जिसकी वजह से इसका यह नाम पड़ा। भेड़ के बच्चे को दुम्बा कहते हैं। खासतौर पर भेड़ की वह प्रजाति जो सामान्य भेड़ो से तगड़ी होती है। ऐसे भेड़ों के बच्चों की दुम काफी झबरीली होती है जिसकी वजह से उसे दुम्बा कहते हैं। दुम फारसी का शब्द है। 
सान शब्द का मतलब है गिरना, फिसलना, धंसना, दल-दल भूमि, रेतीली भूमि आदि। जॉन प्लैट्स की डिक्शनरी के मुताबिक धसान का अर्थ किसी को रास्ता देना या आगे बढ़ाना भी है। यह बना है संस्कृत की ध्वंस् धातु से जिसमें नष्ट होना, ढहना, गिरना आदि भाव हैं। विनाश के अर्थ में विध्वंस इसी मूल से जन्मा है। प्राचीन खंडहरों को ध्वंसावशेष भी कहते हैं। धसान संस्कृत के ध्वंसन का अपभ्रंश है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक धंसना, धसकना, धंसाना जैसे शब्द इसी मूल से जन्मे हैं। धंसना में पैठना और चुभने का भी है। जैसे मन में किसी  की बात धंसना। तीर या कांटे का धंसना आदि। इस तरह भेड़िया-धसान शब्द में गड्ढे में गिरने का भाव स्पष्ट हो रहा है। खुद का अहित करने के अर्थ में गड्डे में गिरना भी हिन्दी का प्रसिद्ध महावरा है। किसी के अंधानुकरण का परिणाम भी आखिरकार यही होता है। यह भाव कबीर के इस दोहे से भी उजागर हो रहा है-
ऐसी गति संसार की, ज्यों गाडर की ठाट।
एक पडी जेहि गाड मैं, सबै जाहिं तेहि बाट।।
र्थात, इस संसार की अजीब गति है। जिसे देखो, भेड़-चाल में मगन, बिना यह सोचे-विचारे कि जिसके पीछे वे जा रहे हैं, अगर वह गड्ढे में गिरेगा तो सबकी गति भी वही होगी। कबीर के उक्त दोहे में भेड़ के लिए गाडर शब्द का इस्तेमाल हुआ है। भेडिया धसान या भेड़चाल के लिए संस्कृत उक्ति भी है-गड्डरिका प्रवाह। इन्हीं अर्थों में संस्कृत की एक और उक्ति है-लोकानुलोका गतिः  अर्थात एक दूसरे को देखकर अनुकरण करना। यहां समाज में व्याप्त नकल की वृत्ति की ओर ही इंगित किया है। वाशि आप्टे के संस्कृत-इंग्लिश कोश के अनुसार संस्कृत में भेड़ को गड्डरः कहा जाता है। भेड़ों के रेवड़ या उनकी कतार के लिए गड्डरिका या गड्डलिका शब्द है। गड्डरिका-प्रवाह में भेड़ों के एक के पीछे एक चलने की बात ही उभर रही है। यह शब्द तो हिन्दी में प्रचलित नहीं हैं मगर इससे बने कुछ शब्दों का प्रयोग खड़ी बोली और लोकबोलियों में खूब होता है जैसे चरवाहा के लिए गड़रिया एक आम शब्द है। यह चरवाहों की एक जाति का नाम भी है। यह बना है गड्डरिक से। स्पष्ट है कि किसी दौर में भेड़ो को चरानेवाले चरवाहों को ही गड़रिया कहते थे। गायों की देखभाल करनेवालों को गोपालक कहा जाता था। गड्डरी से ही बना है गाडर शब्द जिसका अर्थ है भेड़। मध्यप्रदेश के सिवनी जिले की तहसील का नाम भी गाडरवारा है, जो ओशो की जन्मस्थली भी है। संभवतः भेड़ों की बहुतायत अथवा भेडपालन यहां का प्रमुख कर्म था। एक तथ्य यह भी है कि चर्मकार समाज, जिसे यहां अहीरवार कहा जाता है, की संख्या यहां सर्वाधिक है। पिछले दिनों मृत पशुओं की खाल न उतारने का संकल्प करते हुए उन्होंने आंदोलन भी किया था। 
हिन्दी में गड़रिया-पुराण कहावत भी है जिसका अर्थ है बेमतलब की, ऊबाऊ चर्चा। गंवारों की बातें। भेड़ों को चरने के लिए छोड़ कर गड़रिये दूरदराज की कहानियां और तरह तरह की गल्पचर्चा कर समय व्यतीत करते थे, जिसका नागर समाज में कोई महत्व नहीं था। आज का लोकप्रिय और शिष्ट शब्द गोष्ठी भी इसी तरह जन्मा है। प्राचीन काल में गोष्ठ sheepवह स्थान था जहां गाएं बांधी जाती थी, उन्हे चारा-दाना –पानी दिया जाता था। तब सभी गोपालक एक साथ बैठकर दुनिया-जहान की चर्चा करते थे जिसे गोष्ठी कहा जाता था। पिकनिक के अर्थ में मालवा राजस्थान में गोठ शब्द बहुत आम है। खान-पान और आनंद के उद्धेश्य से एकत्र एक छोटे जमावड़े के लिए गोठ इतना उचित शब्द है कि इसे सभी क्षेत्रों के लोगों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। आज बड़ी-बड़ी कान्फ्रेन्स, कान्क्लेव, सेमिनारो को गोष्ठी कहा जाता है। देश की सबसे बड़ी गोष्ठी संसद की कार्यवाही देखकर समझा जा सकता है कि नागर समाज सभ्य होने का जो दावा करता है, कितना खोखला है।

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